सही फैसले कैसे लें?

प्रश्न: निर्णय लेने की जो शक्ति है, ये क्या है और इसे कैसे बढ़ायें?

वक्ता: सुरेन्द्र, बात को और मूल रूप में पकड़ो। निर्णय शब्द का अर्थ क्या है? निर्णय करना क्यों पड़ता है? बात को ध्यान से देखना। निर्णय की जरूरत तभी पड़ती है जब मामला पूरा साफ़ ना हो। जब साफ़-साफ़ समझ में आ रहा हो, तब दो राह दिखती ही नहीं हैं। तो निर्णय कैसा? निर्णय लेने की आवश्यकता इस बात का सूचक है कि तुम दुविधा में हो। जो दुविधा में नहीं है, उसको निर्णय लेना पड़ेगा ही नहीं। उसके सामने दो राहें होंगी ही नहीं। उसको पता है कि एक ही राह है जो उचित है और ये उसने निर्णय नहीं लिया है; ये वो जानता है। तुम्हें निर्णय इसलिए लेने पड़ते हैं क्योंकि तुम कुछ जानते ही नहीं। वरना निर्णय लेने की कोई जरूरत ही नहीं है। तुमने मुझसे सवाल पूछा है तो क्या मैंने निर्णय लिया कि मैं इसका इस प्रकार उत्तर दूँगा? क्या मैंने निर्णय लिया?

कई श्रोता(एक स्वर में): नहीं।

वक्ता: मेरे सामने विकल्प ही नहीं है तो निर्णय कैसा? निर्णय के लिए तो विकल्प होने चाहिए, ‘विकल्प’ ! विकल्प एक, दो, तीन, चार… अब बताओ कौन सा लूँ? जब आप जानते हो, तो आप विकल्पहीन हो जाते हो। पूरे तरीके से विकल्प गायब ही हो जाते हैं। इसे ऐसे समझ लो, मल्टीप्ल चॉइस क्वेश्चन जानते हो न कि जिसमें ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’, ‘डी’ विकल्प होते हैं?

कई श्रोता(एक स्वर में): जी सर।

वक्ता: दो छात्र हैं। पहले के समझ में कुछ नहीं आ रहा कि क्या लिखा हुआ है, उसको बड़ा निर्णय लेना पड़ेगा कि ‘ए’ पर जाऊं, ‘बी’ पर, ‘सी’ पर या ‘डी’ पर। वो देखेगा कि पहले जो बीस सवाल थे उसमें से आठ का उत्तर ‘ए’ था इसलिए इसका उत्तर ‘ए’ नहीं हो सकता। इसी तरह से वो और कई तरीके की जुगत लगायेगा, इधर से सोचेगा, उधर से सोचेगा, कुछ तुक्का मारना चाहेगा, किसी प्रकार एक-आध विकल्पों को एलिमिनेट करना चाहेगा। पर जो जानता है, उसको क्या बाकि के विकल्प दिखाई भी पड़ेंगे? उसके लिए तो वही सही है जो है, बाकियों पर तो उसका ध्यान भी नहीं जायेगा। जिसको कुछ नहीं पता वो चारों विकल्पों को बार-बार देखेगा और जितना देखेगा उतना ही उलझता जायेगा। और जो समझ गया है, उसकी निगाह बस उसी विकल्प पर जायेगी जो उचित है; बाकि तीन से उसका कोई नाता ही नहीं रहेगा। उसे पता है कि ‘बी’ सही विकल्प है तो ‘ए’, ‘सी’, ‘डी’, उसे दिखाई ही नहीं पड़ेंगे। उससे बाद में पूछोगे कि ‘ए’ में क्या था, ‘सी’ में क्या था, ‘डी’ में क्या था, तो उसे कुछ याद ही नहीं होगा। उसके लिए वो महत्वहीन बात है, बेकार बात है। जिस राह जाना नहीं उसको याद करके फायदा क्या? हाँ, ‘बी’ उसको याद रहेगा। ये कहना कि उसे याद रहेगा भी पूरी तरह से उचित नहीं है क्योंकि वो ‘बी’ को ही जानता है।

उलझो नहीं! अगर तुम्हें बार-बार निर्णय लेने पड़ रहे हैं तो ये जीवन में उलझाव का द्योतक है। अगर हर समय तुम पाते हो कि दुविधायें खड़ी होती हैं, लगातार चौराहे दिखाई पड़ते हैं कि किस राह चल पडूँ तो ये इस बात का सूचक है कि तुम जानते ही नहीं कि तुम्हें जाना कहाँ है। तुम बस ऐसे ही भटके हुए हो और हर चौराहे पर आकर तुम्हारे सामने एक सवाल, एक निर्णय खड़ा हो जाता है कि अब क्या करूँ? ज़िन्दगी में चौराहे ही चौराहे हैं और ये चौराहे ज़िन्दगी नर्क बना देंगे अगर तुम जान ही नहीं रहे हो कि तुम हो कौन और ये यात्रा क्या है।

लेकिन तुम्हारी शिक्षा ने तुम्हें ये बताया है कि तुम्हारे पास जितने विकल्प हों तुम उतने ही मुक्त हो। तुम्हें ये बताया गया है कि विकल्प स्वतंत्रता के सूचक हैं, ‘यू शुड हैव मोर एंड मोर ऑप्स्न्स इन योर लाइफ टू चूज फ्रॉम ‘। तुम्हें ये बताया गया है कि ये जो विकल्प हैं, ये मुक्ति है क्योंकि एक मुक्त आदमी ही तो चुनाव कर सकता है न ! एकदम गलत बात है ये। एक मुक्त आदमी का जीवन विकल्पहीन हो जाता है। वो चुनाव ही नहीं करता। बस एक राह है उसके पास। तो चुनाव क्या करना? वो अपने होश में काम करता है और उसके होश से जो भी निकलता है वही उचित होता है। दूसरा सब क्या है उसे दिखाई ही नहीं पड़ता है।

एक छोटा सा किस्सा है कि पूछा किसी ने, ‘तुम हमेशा कठिन रास्ता ही क्यों चुनते हो?’ तो जवाब मिला, ‘तुम ये क्यों सोचते हो कि मुझे दूसरे रास्ते दिखाई भी पड़ते हैं? मेरे लिए बस यही है। मुझे दूसरे रास्ते दिखाई ही नहीं पड़ते’। जिसके लिए बस यही है, अब उसका जीवन बड़ा मजेदार हो जाता है। उसको कुछ हिला नहीं सकता है। उसका मन शांत हो जाता है। वो लगातार चिंतित नहीं रहता कि कुछ छूटा तो नहीं जा रहा? कहीं मैं गलत राह पर तो नहीं चल रहा? उस चौराहे पर जो और तीन राहें थीं कहीं वो तो अच्छे वाले नहीं थीं? उसके मन में ये खलबली नहीं रहती, ये बेचैनी नहीं बनी रहती। एक संगीत रहता है जीवन में, एक मधुरता।

बात समझ में आ रही है?

सभी श्रोता(एक स्वर में): जी सर।

वक्ता: जीवन ऐसा कर लो कि निर्णय लेने की जरूरत ही ना पड़े। बस जानते रहो कि ऐसा ही है। पर हम तो ऐसा कुछ जानते ही नहीं न। हम तो वो सब कुछ जिसमें मन को लाना ही नहीं बीच में, जो अति आत्यन्तिक बातें होती हैं, उनमें भी निर्णय लेते हैं। तुम बैठ कर हिसाब-किताब लगाते हो, निर्णय लेते हो कि प्रेम करूँ या ना करूँ? तुम उसमें भी प्रोबेबिलिटी जगाते हो कि परिवार वाले क्या कहेंगे? 0.65 प्रोबेबिलिटी है कि मान जायेंगे, 0.33 है कि नहीं मानेगे और 0.02 प् कि गोली मार देंगे।

(सभी ज़ोर से हँसते हैं)

तो अब क्या करना चाहिए? निर्णय क्या लें? ऐसा तो तुम्हारा जीवन है। बात समझ में आ रही है ना कि इशारा किधर को कर रहा हूँ?

सभी श्रोता(एक स्वर में): जी सर।

वक्ता: जीवन प्रेमपूर्ण हो, और प्रेम में निर्णय नहीं लिए जाते। जीवन लगातार प्रेमपूर्ण हो। तुम्हें तो बात-बात पर निर्णय लेने पड़ते हैं, सोचना पड़ता है कि पढ़ाई करें कि ना करें? जिसको पढ़ने में रस आ रहा होगा, वो इस दुविधा में थोड़े ही पड़ा होगा कि पढ़ें या न पढ़ें ! अगर पढने में आनन्द आ रहा होता तो तुम ये सवाल किनारे रख देते और तुम पढ़ते क्योंकि उसमें मज़ा आता है। जब हल कर लेता हूँ इस डिफ़्रेन्सिअल इक्वेशन को तो बस अहा ! और सिर्फ हल कर लेने पर नहीं, हल करने की पूरी प्रक्रिया बड़ी मज़ेदार है। पर नहीं तुम्हें तो टाइम-टेबल बनाना पड़ता है, निर्णय करना पड़ता है कि किस दिन क्या पढ़ें, क्या ना पढ़ें ! किसमें नक़ल करके ही काम चल जाएगा, तो बस हो गया निर्णय कि ना पढ़ो । किसमें पहले ही नंबर ठीक-ठाक आ गये हैं तो अब थोड़े कम भी आ जाएँ तो कोई बात नहीं; तो अब कम पढ़ लेंगे। बड़े निर्णय हैं, निर्णय ही निर्णय हैं ! सुबह से लेकर शाम तक यही तो कर रहे हो। चूँकि अपना कुछ पता नहीं; तुम्हारी पहचान सिर्फ कपड़ों से बनती है तो सुबह उठते हो तो बड़े निर्णय करने पड़ते हैं कि क्या पहनें? फिर कॉलेज आते हो तो निर्णय करना पड़ता है कि आ तो गये हैं, क्लास में घुसें या ना घुसें। निर्णय ही निर्णय हैं।

जब जीवन में स्पष्टता नहीं होती तो कदम-कदम पर निर्णय लेने होते हैं। इस बात को समझो, इस बात को जानो।

ठीक?

सभी श्रोता(एक स्वर में): जी सर।

-‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: https://www.youtube.com/watch?v=YwIxgCM1hSM

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