कर्त्तव्य सज़ा है नासमझी की

कर्त्तव्य संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः ।

शून्याकारो निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ (अष्टावक्र गीता अध्याय १८, श्लोक ५७)

वक्ता: ‘सेंस ऑफ़ ड्यूटी’, कर्त्तव्यों के बारे में बात करने जा रहे हैं| अष्टावक्र गीता का अध्याय १८, श्लोक ५७ और यह सिर्फ अष्टावक्र गीता में नहीं है जहाँ कर्त्तव्यों से अच्युत होने के लिए कहा गया है, या यूँ कहा गया है कि जो ज्ञानी है उसके लिए कोई कर्त्तव्य शेष नहीं बचता है| भगवत गीता में कृष्ण कई बार यह कहते हैं कि कर्त्तव्य सिर्फ उसके लिए रह जाते हैं जो अभी भली-भाँति योग में आरूढ़ नहीं हुआ है| ‘सर्व-धर्मान् परित्यज्य माम् एकं शरणं व्रज’- बहुत प्रसिद्ध उक्ति है कृष्ण की| यहाँ तक की कर्म-योग का जो अध्याय है जिसमें कृष्ण लगातार कह रहे हैं कि ‘तुम अपने कर्त्तव्यों का ही पालन करते रहो, बस कर्मों के कर्ता ना बनो, जो भी करो वह मुझे समर्पित करते चलो’, वहां पर भी इतना वह कह गए हैं कि ‘यह सारे कर्त्तव्य तुम्हारे लिए सिर्फ तब तक हैं जब तक तुम आत्मा में स्थित ही नहीं हो गए’|

भगवद गीता के तीसरे अध्याय में एक श्लोक है जिसका अर्थ है, ‘जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला, आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट हो उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है’| आगे के अध्याय में जब वह अर्जुन से कहते हैं कि जितने तू धर्मो का पालन करता है उन सबको छोड़ दे और सारे धर्मो को छोड़कर धर्म की शरण में आ जा| कर्त्तव्यों को छोड़ कर जो तेरा एक मात्र कर्त्तव्य है उसको जान ले, धर्मों को छोडकर जो तेरा एक मात्र धर्म है उसको जान ले| ठीक यही बात अष्टावक्र भी कह रहे हैं| कर्त्तव्य सिर्फ तब तक हैं जब तक कोई अपने आप को कर्ता मानता रहे, आत्मा ना कर्ता है ना भोक्ता है| तो इसलिए जो आत्म-रूप में स्थित हो गया उसके लिए कोई कर्त्तव्य शेष बचता नहीं है| वह बस आत्मा में रमण करता है, खेलता है| लीला हो जाता है उसका जीवन|

आपने जो बात रखी है वह कहाँ से आती है यह मैं समझ रहा हूँ| रोज़-मर्रा के कर्त्तव्यों से बंधा हुआ आदमी जब रोशनी देखता है, उसकी और बढ़ने लगता है तो कर्त्तव्य उसको बुलाते हैं, मन में ग्लानि भी उठती है कि कहीं मैं गैर जिम्मेदार तो नहीं हूँ, कि मेरे यह जो कर्त्तव्य हैं मैं उनका भली-भाँति पालन नहीं कर पा रहा हूँ यह मेरी कमजोरी तो नहीं है, और दूसरे लोग जो कर्त्तव्य की रस्सी से आपस बंधे हुए हैं उन लोगों द्वारा इस बात का एहसास भी आपको कराया जाता है कि तुम अपने कर्त्तव्य का, धर्म का, कर्त्तव्यों का पालन करो| हो सकता है आपसे कोई वर्णाश्रम धर्म की भी बात करे कि अभी तुम जिस धर्म में हो, तुम्हें उसके अनुसार चलना चाहिए, तुम अभी गृहस्थ हो तो गृहस्थी का पूरा-पूरा पालन करो| यह सब बातें ठीक हैं पर तब तक, जब तक आप वह हो| जो अपने आप को गृहस्थ जाने उसको तो गृहस्थ का पालन करना ही पड़ेगा ठीक बात है लेकिन जिसने अपने आप को अब जान लिया गृहस्थ से परे, गृहस्थ से अतीत वह कैसे गृहस्थ के कर्त्तव्य निभाएगा| वह कैसे बंधा रहेगा? उसका धर्म अब वृहद धर्म हो जाता है, उसका धर्म अब गृहस्थ धर्म नहीं है| ‘गृह’ का अर्थ ही होता है दीवारें, एक छोटा दायरा, जो अपने आपको आत्मरूप जानने लगे उसका धर्म मिट नहीं जाता, अतिव्यापक हो जाता है| छोटे-छोटे धर्म उसके मिटते हैं, छोटे-छोटे धर्म चले जाते हैं क्योंकि वृहद धर्म में अब वह स्थापित हो जाता है| अब उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ दो चार लोगों के प्रति नहीं है पूरे अस्तित्व के प्रति है| अब वह दीवारों में क़ैद नहीं है वह सबका है| वह यह कह कर पल्ला नहीं छुड़ा पाएगा कि मैंने सिर्फ अपनी पत्नी और दो बच्चों की देखभाल कर ली बस बहुत है| अब उसका काम ऐसे चलेगा नहीं अब वह सबका है या यूँ कह लीजिये कि किसी का नहीं है एक ही बात है, पर यह पक्का है की अब वह दो चार का नहीं हो सकता तो किसी दृष्टि से देखकर आप यह कह सकते हैं की अब उसके लिए कोई कर्त्तव्य शेष नहीं बचा और थोड़ा अलग दृष्टि से देख कर यह कह सकते हैं की उसका कर्त्तव्य, उसका धर्म अब व्यापक हो गया, एक ही बात है|

अपने मन में यह अपराध भाव ना आने दीजिये, यह ग्लानि मत आने दीजिये की आप अपने कर्त्तव्य पूरे नहीं कर रहे हैं| यह जो छोटे-मोटे कर्त्तव्य संसार समाज हमें थमा देता है यह कोई कर्त्तव्य हैं ही नहीं| यह तो सिर्फ गुलामी के आचरण हैं| कह दिया है कि ऐसा-ऐसा आचरण करो और यह भी बताया गया है की ऐसा-ऐसा आचरण करो तुम गुलाम हो और गुलाम को यह आचरण करना ही होता है| हाँ ठीक है यह आचरण करो मगर कभी हम यह नहीं पूछते कि कौन यह आचरण कर रहा है, किसका है यह आचरण, और कौन है वह जिसको तुम यह कर्त्तव्य दे रहे हो, और क्या वह ‘मैं हूँ?’| तुमने जिस प्रकार की बातें दी मुझे करने को, तुमने जिस प्रकार का जीवन दिया जीने को, तुमने जो चर्या दी निभाने को यह तो बता दो कि वह सब तुमने दिया किसको? यदि मैं वह हूँ तो ठीक, पर यदि मैं वह हूँ ही नहीं तो? तो प्रश्न उठ सकता है कि ठीक है आज तुम जान गए हो कि तुम वह नहीं हो पर जिस समय पर तुमको वह सब दिया गया था तब तो तुम वही थे| तब तुम अपने कर्त्तव्यों से कैसे भाग सकते हो? यह तर्क दिया जा सकता है कि आज तो उठ बैठे हो पर जब दिया गया था तब तो तुम वही थे? तो बात सीधी है, सपने में आप किसी से वादा कर दें कि तुझको एक अरब दूंगा तो जगने के बाद आपकी कोई बाध्यता नहीं है आप उसको पैसे लौटाएं| हाँ, जब तक आप सपने में हैं तब तक आप ज़रूर असमंजस में रहेंगे की कैसे-कैसे करके उसको यह पैसे लौटाऊंगा| सपने में हो सकता है आपने हत्या भी कर दी हो, पर क्या उठ करके आप उसका प्रयाश्चित करते हैं? या उसके लिए आपको सजा मिलेगी? नहीं मिलेगी ना? पुराना कर्म अभी आपको अपना फल तभी देगा जब आप अभी भी वही हो जो पुराना था|

कर्मफल का सिद्धांत समझियेगा। अतीत में आपने कोई कर्म किया अभी आपकी कोई बाध्यता नहीं है उस कर्म को निभाए चले जाने कीउसका फल लिए चले जाने की, कोई बाध्यता नहीं है आपके ऊपर| बाध्यता तब है जब आप वही व्यक्ति हो जिसने वह कर्म किया था अगर आपको बोध ना आया हो, आपने वही पहचान अपनी कायम रखी हो तब तो आपको फल ग्रहण करना पड़ेगा तब तो जो आपने अतीत में किया था उसकी आज की ज़िम्मेदारी को भी आपको पूरा करना पड़ेगा| बुद्ध लौट के गए बारह साल बाद पिता के पास, पिता ने ताने देना शुरू किया| ‘यह कर दिया तुमने, वह कर दिया, अरे साधना करनी थी तो मुझे बताते मैं यहीं आसपास इंतज़ाम कर देता| पत्नी को छोड़कर चले गए, बच्चे को छोड़कर चले गए| कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी तुम्हारी? अपने कर्त्तव्यों का कोई पालना नहीं किया तुमने?’ पूरी दुनिया जान गयी थी की बुद्ध क्या हैं पर पिता को नहीं दिखाई पड़ रहा था, परिवारजनों को अक्सर नहीं ही दिखाई पड़ता| बुद्ध ने सुना सब और उसके बाद क्या बोलते हैं? ‘पिता ठीक से देख तो लो क्या मैं वही हूँ जो घर छोड़ के गया था? तुम जिससे बात कर रहे हो क्या मैं वही हूँ? ज़रा ध्यान से देखो| घर छोड़ कर जो गया था वह दूसरा था तुम्हारे सामने जो व्यक्ति खड़ा है वह दूसरा है| तुम गलत व्यक्ति से बात कर रहे हो’|

कर्मफल तब मिले न जब आप वही व्यक्ति हो जिसने कर्म किया था| यदि आप वही हो, आपने अपनी पहचान को, मान्यताओं को पकड़ कर रखा है, उसको नया हो जाने का, ताज़ा हो जाने का, असली हो जाने का मौका ही नहीं दिया है तब तो आपके पास कोई विकल्प नहीं है| आप जीवन भर कर्त्तव्यों का ही पालन करें पर यह सारी बातें मैं दोहरा रहा हूँ कि जागृत मनुष्य पर लागू नहीं होती| जागृत मनुष्य का एक मात्र कर्त्तव्य है अपने बोध से चलना, और कोई कर्त्तव्य नही है| जीवन को देखें, जाने और फिर जो समुचित लगे उसे होने दें| यही आपका कर्त्तव्य है, इसके अतिरिक्त कोई कर्त्तव्य नहीं है आपका| न समाज का दिया हुआ, न आपका ही कोई पुराना वादा; कुछ नहीं निभाना है आपको| समझ रहे हैं इस बात को? इसमें घबराने की कोई बात नहीं| यह कोई वादा-खिलाफी नहीं होगी| जिनके प्रति आप कर्त्तव्य रखना चाहते हैं आप उनके ही ज़्यादा काम के होंगे अगर आप बोध-युक्त हैं| आपको क्या लगता है यह जो पूरी दुनिया अपने कर्त्तव्यों को पूरा किये जा रही है यह लोग एक-दूसरे को सुख दिए जाते हैं? यह लोग एक-दूसरे के आनंद के, प्रेम के कारण बनते हैं? यह कुछ नहीं बनते हैं|

कर्त्तव्य की पूर्ति नहीं होती है, कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती है| मैं पिता हूँ तो मेरा क्या कर्त्तव्य है? कि बेटे को पढाओ, लिखाओ और शादी कर दो; हो गया कर्त्तव्य| यह कौन सा कर्त्तव्य है? तुम इंसान हो या पिता हो? पहले तय कर लो| इंसान में भी क्या हो? शरीर हो या आत्मा हो? तय कर लो| इन बातों को हम यूँ लेते हैं जैसे की यह प्राकृतिक बातें हो| हम ऐसे बात करते हैं कि देखिये बन्दे का कुछ कर्त्तव्य तो होता ही है न| और आपको लगता है कोई महावाक्य बोला जा रहा है| यह बेवकूफी की बात है जो बोली जा रही है| तुम अंधे हो इसलिए तुम्हे एक कोड ऑफ़ कंडक्ट थमा दिया गया है की जब बच्चे हो तो ऐसा-ऐसा करना| अरे, जागृत आदमी को बताने की ज़रूरत पड़ेगी कि बच्चे के साथ क्या करना है? जागृत आदमी के घर बच्ची पैदा हुई है तो उसे बताना पड़ेगा की क्या करना है? पर नहीं हमे बताना पड़ता है| बच्ची पैदा होती है तो तुरंत सबसे पहले तो उसके नाम का खाता खोला जाता है वह इसलिए ही खोला जाता है क्योंकि आप को पता ही नहीं है क्या करना है? आप अंधे हैं और आप सोचते हैं मैं बड़ा रेस्पोंसीबिल पिता हूँ, मैंने इसलिए यह किया है| आपको बड़ा अच्छा लगता है, सुकून की भावना आती है, दहेज़ देने के काम आएगा| हमारा तो प्रेम भी कर्त्तव्य होता है| अब शादी कर ली है न तो चलो घुमाने-फिराने ले जाओ| क्यों प्रेम कर्त्तव्य बन गया है? क्योंकि हम अंधे हैं, हम जानते नहीं इसलिए बाहर से कोई एक पट्टी थमा देता है कि प्रेम यह है| एक चर्या दे दी जाती है की ऐसा-ऐसा कर लेना और यह जो ऐसा-ऐसा किया जाता है उसे प्रेम कहते हैं| अब शादी के दो तीन साल हो गये, अब तुम्हारा कर्त्तव्य है कि बच्चे पैदा कर लो क्योंकि हम अंधे हैं| यह कोई बाहर वाला आ कर बताएगा की प्रेम क्या है और संतान क्या है? पर हमारे जीवन में जो कुछ है वह सब कर्त्तव्य से बंधा है, वो सब कर्त्तव्य-जनित ही है| घर क्यों? क्योंकि कर्त्तव्य है| शादी क्यों कर रहे हो? क्योंकि कर्त्तव्य है| बच्चे क्यों हैं? क्योंकि कर्त्तव्य है| जीवित क्यों हो? क्योंकि क्योंकि कर्त्तव्य है| कर्त्तव्य का मतलब समझते हैं? जो करना चाहिए| कर्त्तव्य मतलब, ‘करने योग्य है’| किसने बता दिया की यह करने योग्य है और किस इन्सान को हक है कि बताये हमे की यह करने योग्य है? कर्त्तव्य शब्द ही गन्दा है|

श्रोता १: यहाँ पर मे एक सवाल करना चाहती हूँ| हम जब गीता की बात कर रहे हैं तो हम रामायण को भी देख सकते हैं कि उसमे कहा जाता है कि मर्यादा पुरोशोत्तम राम ने एक आदर्श प्रस्तुत किया कि उन्होंने अपनी सौतेली माँ को इतना आदर और सम्मान दिया और उनके कहने पर १४ साल का वनवास लिया |

वक्ता: क्योंकि हम अंधे हैं इसलिए हमे पता नहीं है कि राम के साथ योग-वशिष्ठ जैसा अद्भुत ग्रन्थ भी जुड़ा हुआ है| क्योंकि हम अंधे हैं, हमने राम-गीता नहीं पढ़ी है, हम बस इतना ही जानते हैं की राम पिता के कहे पर चले गए थे जंगल पर राम का बोध कितना गहरा है वह हम नहीं जानते हैं| राम कोई कर्त्तव्य पालन करने वालों में नहीं हैं| आपको राम को जानना है तो आप वशिष्ठ के पास जाइये तब आप कहेंगे की राम ऐसे हैं| तब आपको राम और कृष्णा में कोई अंतर ही दिखाई नहीं देगा पर क्योंकि हम कुछ नहीं समझते, हम खुदको नहीं समझते, हम जीवन को नहीं समझते तो यह स्वाभाविक ही है की हम राम को नहीं समझते| आप मुझे इतना बता दो कि यह जो आपका आम आदमी है उसको कुछ समझ नहीं आता, उसको राम कैसे समझ आ जाएगा? वो दावा यूँ करेगा जैसे राम को जानता है, वह कहेगा देखो राम ने यूँ किया इसलिए हम भी कर रहे हैं| गजब हो गया|

तुम राम के अंतस को नहीं समझते, राम के कर्म को कैसे समझ जाओगे? राम का हर कर्म कहाँ से उद्भूत हो रहा हो रहा है यह तुम जानोगे कैसे? राम तो आत्म रूप हैं| कबीर लगातार राम-राम बोलते हैं, वह आत्मा बोलते ही नहीं| राम कुछ नहीं है| आत्मा ही राम है| तुम न स्वयं को जानते, तुम न ब्रह्म को जानते| तुम राम को कैसे जान जाओगे? फिर इसलिए तुमने राम के इर्द-गिर्द हर तरीके की नौटंकी बुन रखी है| ऐसी-ऐसी कहानी प्रचलित कर रखी है कि पूछो मत और वही कहानी तुम अपने बच्चों को सुनाते हो, वही कहानी तुम रामलीलाओं में दिखाते हो और इसलिए असली राम पीछे छूट गया| कबीर के राम का किसी को पता नहीं है| कौन-सा राम बचा है? बस मृतकों का राम बचा है| हम किस राम को जानते हैं? हम उस राम को जानते हैं जो रावण से लड़ा और उसका सर काट दिया| उसके अलावा हम किसी राम को जानते नहीं| हम उस राम को जानते हैं जो जंगल-जंगल घूमता था| उसके अलावा हम किसी राम को जानते नहीं| राम कोई व्यक्ति थोड़ी ही है, पर हम व्यक्ति रूप के अलावा राम को जानते भी क्या हैं|

जब आप सिर्फ कर्ता होते हैं तो आप किसी और के सिर्फ कर्म ही देख पाते हैं| जब आप आत्म-रूप में होते हैं तब आपको संपूर्ण जगत में आत्मा ही दिखाई पड़ती है| पर हम सिर्फ अपने आप को कर्ता जानते हैं तो हम राम के सिर्फ कर्म देख पाते हैं| और कर्म देखकर आप किसी के बारे में क्या जान सकते हो? कृष्णा के कर्म को देखकर आप क्या जान सकते हो कृष्णा के बारे में? कर्म को देखा तो यही जान पाओगे की बेईमान हैं, चोर हैं, स्त्रियों को छेड़ते हैं; फिर तो यही दिखाई देगा| धोखे से युद्ध जीत लिया; फिर तो यही दिखाई देगा| राम के सिर्फ कर्मों को देखोगे तो बस यही दिखाई देगा की स्त्रियों का उत्पीडन करते हैं| बीवी की अग्नि परीक्षा करायी फिर धोबी के कहने पर छोड़ आए| कर्म अगर देखोगे तो क्या दिखाई देगा? और अंधे होते हैं वह जिन्हें सिर्फ कर्म दिखाई देते हैं कर्म का स्रोत नहीं देख पाते वह|

श्रोता: फिर मर्यादा पुरोशोत्तम क्यों कहा उनको?

वक्ता: जिन्होंने कहा, सो कहा, अपने सुना क्यों? राम पहले आये या यह जो उन्हें उपमा दी गयी है यह पहले आई? तो आप सीधे राम के पास जाइये न| उपमा तो देने वाले हज़ार हैं| रोशनी आई उसरो रोशनी को बाद में आप हज़ार नाम देते रहिये, हज़ार आकार देते रहिये, हज़ार मूर्तियाँ बनाते रहिये उसमे थोड़ी सच है| सच कहाँ है? सच उस रोशनी में है आप सीधे उस रोशनी से क्यों नहीं संपृक्त हो जाती| यह तो यूँ ही है के जैसा दिया जला और बुझ गया और बस धुआं-धुआं है और आप उस धुंए में आकृतियां खोज रहे हो और कोई कह रहा है रोशनी जो है न वह ऐसी होती है| कैसी होती है? गधे के सिर की तरह| क्यों? क्योंकि धुंए में गधे का दिख रहा है| कोई कह रहा है की रोशनी जो होती है सरसों के तेल की गंध जैसी होती है | आप रोशनी के पास जाइये| रोशनी के बाद की इन सब चीजों से आपको क्या लेना देना है? सीधे स्रोत से जुड़िये| मैंने कई बार कहा है की कृष्ण का चरित्र भी अगर समझना हो, कृष्ण के कर्म भी अगर समझने हो तो पहले भगवत पुराण समझिये| पहले गीता के साथ एक हो जाइए| यही बात राम के  साथ है| रामायण के राम को अगर समझना हो तो पहले वशिष्ठ के पास जाइये| जो सीधे तुलसीदास को पढेंगे वह राम को कभी नहीं जान पाएँगे| क्योंकि वह राम चरित्रमानस है| चरित्र भर है वहां पर| आचरण भर की बात है वहां, आत्मन की नहीं| समझ रही हैं?

आप बेफिक्र होकर अपने एक मात्र कर्त्तव्य पर रहिये बाकि सारे कर्त्तव्य तो छोटे हैं, धूल सामान वह अपने आप उड़ेंगे और मन छोटा मत करिए| ज़िन्दगी इतनी ज़बरदस्त रूप से बदलाव वाली, उठा पटक वाली है कि उसमे आपको कोई इंसान आकर बता कैसे सकता है कि आपका क्या कर्त्तव्य है| कितना लम्बा चौड़ा मैन्युअल लेकर आप चलेंगे जिसमें हर पल के लिए लिखा हो कि इस पल में आपको क्या करना है, ‘यह रहा आपका कर्त्तव्य’| आप अभी यहाँ बैठे हुए हैं, आपको कैसे पता की आपका क्या कर्त्तव्य है? और स्थिति अभी बदलेगी अगले पल हो सकता है आप पाएं कि आपके बगल वाला ऊंघ रहा है थोड़ी देर में यहाँ प्रकाश बंद हो जाए, आप कैसे जानोगे आपका क्या कर्त्तव्य है?

कौन बताएगा आपको आकर? बताओ ना? कौन आकर बताएगा? कितने ग्रन्थ तुम पढ़ोगे? कितने शास्त्र तुम मन में लाद कर चलोगे? तो जीवन कैसे जीना है? किसी भी पल में किसी भी स्थिति में क्या है समुचित कार्य इसका फैसला तो आपके अपने ही होश से हो सकता है, और वह होश पूर्वनिहित नहीं हो सकता कि कुछ और होशमंद लोगों ने अपने होश में आपको थमा दिया है कर्म और आपको बस उसे कर देना है| नहीं ऐसे नहीं हो पाएगा क्योंकि वह लोग कितने भी होश-मंद रहे हों, समय किसी के लिए नहीं ठहराता और स्थितियां किसी के लिए नहीं ठहरतीं| आपकी स्थिति सर्वथा नयी है और आपको कोई और मदद नहीं कर सकता| आपको किसी और की मदद की ज़रूरत है ही नहीं तो कोई और मदद कर क्यों दे? जब आपको जीवन के साथ खेलने का जीवन की सारी चुनौती का हंस कर उत्तर देने का साधन आपके अन्दर ही उपलब्ध करा दिया गया है तो आपको किसी कर्त्तव्य की आवश्यकता क्या है? जिसको आँखें दे दी गयी हो उसको अपने साथ किसी सहारे की ज़रूरत क्या है जो उसको बताता चले की आगे क्या और पीछे क्या तो यह अजीब स्थिति होगी कि आंखे हैं और इधर से उधर से पूछ रहे हैं की भाई वह क्या है? अरे, आँखें खोलो और देखलो| वैसे ही हमारी स्थिति है की अब करना क्या है| इस स्थिति में क्या कर्त्तव्य बनता है? अरे, देखो ध्यान से और जान जाओ की क्या कर्त्वय बनता है। कौन बताने आएगा? पर हमारे लिए धर्म का यही मतलब हो गया है कि ठीक-ठीक उसमे लिखा हो कि क्या कर्त्तव्य है मेरा| हमारे लिए गुरु का भी क्या मतलब हो गया है? कि जिसके पास जाएं और पूछें महाराज अब इस स्थिति में क्या करना चाहिए? और अगर ना बताए तो यह देखो इन्हें कुछ आता ही नहीं है| यह हमे ठीक से गाइड नहीं कर पाए क्यूंकि आपके क्लासरूम में भी तो यही होता है ना कि बताइए हम करें क्या? और जैसे ही आपके कान में यह पड़े कि करना क्या है बस जान जाइये की प्रश्न गड़बड़ है| वह आपसे पूछ रहा है कि मेरा कर्त्तव्य क्या है आप उसकी मदद करना चाहते हैं तो उसे जगाइए आप उसकी मदद करना चाहते हैं तो उसे बताइए कि तुम्हारा एक मात्र कर्त्तव्य है, अपनी आँखें खुली रखना, और उसके अलावा तुम्हरा कोई भी कर्त्तव्य नहीं है| ना समाज के प्रति, ना माँ के प्रति, ना पिता के प्रति, ना मेरे ही प्रति| इस पूरे अस्तित्व में किसी का किसी के प्रति कोई कर्त्तव्य है ही नहीं |

श्रोता २: लोग हमे याद कराते हैं कि तुम स्वार्थी, ऐसी बातें करते हो|

वक्ता: तो तब आपका क्या कर्त्तव्य है?

श्रोता २: कान बंद कर लेना|

वक्ता: बस ठीक| आपको जीवन इसलिए नहीं दिया गया कि यहाँ आप आयें और आपने कोई भूल कर रखी  है, आपकी कोई पुरानी देनदारी है, आपके कुछ दायित्व है आप उनको पूरा करें| उनका पालन करें| जीवन इस ख़ातिर नहीं है| ‘दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा। गज़ब कर्त्तव्य है, जीना ही पड़ेगा और जीवन है अगर ज़हर तो पीना ही पड़ेगा’| नदी आपको पानी देती है पर इसलिए नहीं कि उसका कर्त्तव्य है देना, बल्कि इसलिए कि उसे बहना है और जो बह रहा है उससे औरों को कुछ न कुछ मिलेगा ही| पेड़ आपको फल देता है इसलिए नहीं की उसको अपका बड़ा ख्याल है, इसलिए क्योंकि उसका स्वभाव है फल देना| सूरज रोशनी देता है, जानवरों को देखते हैं आपको ख़ुशी मिलती है पर उनको आतुरता नहीं है आपको ख़ुशी देने की, कि आपको ख़ुशी देने के लिए हिरण परेशान हो| हिरण की बुद्धि नहीं खराब हुई है कि आपको देखते ही कहे कि अब मुझे इन्हें ख़ुशी देनी है| मेरा कर्त्तव्य है। नहीं, यह सब बीमारियाँ आदमी को ही हैं कि पति के लौटने का समय है तो मेरा कर्त्तव्य है कि श्रृंगार कर लूँ, वह खुश होंगे| प्रकृति में और कोई नहीं है जो किसी को खुश करना चाहता है लेकिन प्रकृति सबको खुश कर देती है| यह बड़ी मज़ेदार बात है कि प्रक्रति में कुछ ऐसा नहीं है जो किसी के आनंद हेतु हो, प्रक्रति में|

अस्तित्व में कुछ ‘हेतु’ है ही नहीं | जो कुछ है बस है, स्वयंसिद्ध है| बस इंसान ने यह बना रखा  है की तुम्हारे कुछ दायित्व हैं तुम्हें कुछ देना है, अरे देना तो तब है जब पहले कुछ पाना है| दायित्वों की बातें खूब कर लेते हैं कि देय है और जो पाना  है वह कब आएगा| जहाँ पा लिया गया है वहां देना अपने आप हो जाता है, स्वमेव हो जाता है| आप पाने पर रहें, अपने आप बटेगा| बड़े से बड़े कर्त्तव्य पूरे हो जाएंगे। आप आनंदमय रहें, अस्तित्व के साथ एक हो जाएं, अपनी मौज में जियें; यही कर्त्तव्य है| इसमें यह शक बिल्कुल  न आये की क्या हमारे बगल में अगर कोई तड़प रहा हो तो हम अपनी मौज में रहे| जो इंसान मौज में है वह ठीक-ठीक जानेगा की क्या करना है अगर कोई तड़प रहा है और जो करना है वह भी एक-सा नहीं होगा| वह अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग होगा तो मैं यह पहले से कुछ नहीं कह सकता कि क्या करना है| स्थितियां इतनी अलग अलग होती हैं कि मैं यह कुछ भी नहीं कह् सकता कि क्या करना है पर मुझे पता है कि अगर मैं स्वस्थ हूँ, तो मैं जो भी करूँगा किसी भी स्थिति में तो वह उचित होगा| बिना कर्ता के कर्म होगा, बिना कर्त्तव्य के कर्म होगा और वह जो कर्म होगा वही दैवीय कर्म है| वही सम्यक कर्म है, वही कृष्ण का निष्काम कर्म भी है|

श्रोता: और ऐसा भी हो सकता है कि कुछ अतीत के लोग जो होश में थे उन्होंने यह जान  के कि आनेवाले जो लोग होंगे वह बेहोश होंगे, तो उनके लिए कुछ कर्म बना दिये और यह कर्त्तव्य यह सोचकर दिए कि इंसान इन कर्त्तव्यों से प्रसन्न रहेगा, खुश रहेगा|  तब यह क्यों है कि इन्सान की दुनिया में बड़ी दुर्गति है?

वक्ता: देखो, जितने कर्त्तव्य होंगे वह सब विरोधाभासी होंगे वह सब ऐसे होंगे जो तुम्हे एक दूसरे से लड़वायें| तुम्हारा कर्त्तव्य क्या है? अपने परिवार की ख़ुशी और पडोसी का कर्त्तव्य क्या है? उसके परिवार की ख़ुशी| अब लड़ोगे न आपस में| एक देश क्या चाहेगा? कि अधिक से अधिक मुझे मिल जाए धन के रूप में, संसाधन के रूप में और पडोसी देश भी यही चाहेगा| अब लड़ोगे ना? जो भी कर्त्तव्य छोटा है, सीमित है वह तुम्हें आपस में लड़वाएगा| एक मात्र कर्त्तव्य जिस में आदमी आदमी से न लड़े वह तो व्यापक कर्त्तव्य ही हो सकता है, अस्तित्वगत कर्त्तव्य, वर्ना यह जो सारे छोटे-छोटे कर्त्तव्य हैं वह कलह और द्वेष के कारण बनेंगे|

श्रोता ३: और यह समय सीमित भी होते हैं| जैसी ज़रूरत है वैसे बना दिये गए हैं|

वक्ता: किसके लिए बनाये गए हैं? इस बात को समझिएगा| भगवत गीता इसका बड़ा अच्छा उदाहरण है| दूसरे अध्याय में कृष्ण जो ऊंचे से ऊंची बात कही जा सकती है, वह कह देते हैं| सांख्य योग समझा देते हैं और उससे साफ़-सुथरी बात कही नहीं जा सकती, पर अर्जुन नहीं समझता है| तब फिर तीसरे अध्याय में कर्म की बात होती है कि तू अपने कर्त्तव्यों का ही पालन कर; ‘तू क्षत्रिय है क्षत्रिय धर्म का पालन कर, तू लड़’| पहले तो यही कहा उससे कि ‘न कोई मरता है न कोई मारता है, तो तू लड़ क्यों नहीं लेता, तू क्या डर रहा है’, पर वह नहीं समझ रहा। तो जो न समझे, कर्त्तव्य उसके लिए है और वहां पर भी जब वह कर्त्तव्य दे रहे हैं, कि बस तू कर्त्तव्यों का पालन कर, तब भी वह कह रहे हैं कि अपने आपको कर्त्तव्यों का कर्ता मत मान लेना| वह कह रहे हैं कि कर्त्तव्य करता चल और समस्त कर्त्तव्यों को मुझमें समर्पित करता चल| जब यह बात उससे कह भी दी है तब भी एक बात और कह दी है कि ‘जो आत्मा में रमण करता है उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है’| तो जो नासमझ हो यह उसकी सज़ा है कि उसको कर्त्तव्यों का पालन करना पड़ेगा| बात समझ में आ गयी?

तो कर्त्तव्य क्या है? नासमझी की सज़ा|

-ज्ञान सेशन पर आधारित। स्पष्टता हेतु  कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: कर्त्तव्य सज़ा है नासमझी की

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय कन्हाईलाल जी,

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      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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