प्रेम बेहोशी का सम्बन्ध नहीं

श्रोता: सर मेरा प्रश्न ये है कि किसी को चाहने से हमारी ज़िंदगी इतनी अस्त-व्यस्त क्यों हो जाती है ? असर क्यों पड़ता है हमारे जीवन पर? अक्सर नकरात्मक असर ही होता है। क्यों होता है ऐसे?

वक्ता: ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ‘कोई’ नहीं है जो तुम्हारी ज़िन्दगी में आता-जाता है| जो आता-जाता है, तुम उसको ही ज़िन्दगी बना लेते हो |

तुम यदि ये कहते कि ज़िन्दगी अपनी जगह है, कोई मेहमान की तरह आया और फिर मेहमान की तरह रह कर चला गया, तो कोई अंतर नहीं पड़ता| पर यहाँ तो होता ये है कि मेहमान आता है और फिर जब जाता है तो अपने साथ घर ही लेकर चला जाता है| अब तुम खड़े हो कि घर कहाँ गया| अरे! मेहमान ही घर लेकर चला गया|

(सभी श्रोता हँसते हैं)

अगर ज़िन्दगी अपनी जगह हो और लोग उसमें आएं-जाएं तो कोई बुराई नहीं है| आप आईये आपका स्वागत है, आप कुछ समय बाद अब आप जा रहे हैं, नमस्कार, विदा|

यहाँ तो होता ये है कि जो आता है वही ज़िन्दगी बन जाता है। क्यों गाने नहीं सुने हैं? ‘ज़िन्दगी बन गये हो तुम’!

(सभी श्रोता हँसते हैं)

अब वो आदमी ही ज़िन्दगी बन गया, वो व्यक्ति ही ज़िन्दगी बन गया या जो भी है वो वस्तु या विचार, वो ज़िन्दगी बन गया| तो जब वो जाएगा तो क्या चला जाएगा?

श्रोता(एक स्वर में): ज़िन्दगी|

वक्ता: ज़िन्दगी ही चली  गयी ! अब मुर्दा मुर्दा से घूम रहे हो क्यूंकि ज़िन्दगी तो चली गयी | अब जब ज़िन्दगी चली गयी तो तुम्हें किसका इंतज़ार है – ज़िन्दगी का | ज़िन्दगी चली गयी है तो अब इंतेज़ार भी ज़िन्दगी का ही है, तो अब कोई और आता है और जब कोई और आता है तो तुम क्या बोलते हो ?

श्रोता(एक स्वर में): ज़िन्दगी आ गयी|

वक्ता: ज़िन्दगी आ गयी, पर इस ज़िन्दगी के तो पाँव लगे हैं| अब ये जैसे आई है, वैसे चली भी जाएगी और फिर रोना! हो गई न दिक्कत! इसी चक्र में फिर आदमी लगा रह जाता है-‘ज़िन्दगी आई, ज़िन्दगी गयी’| ऐसे नहीं होने दो

ज़िन्दगी आंतरिक हो| जीवन अपना है, बाकि पूरा तंत्र चारों ओर पसरा हुआ है, उसमें बहुत सारी घटनाएं हैं, जो घट रहीं हैं, सब कुछ आ रहा है, सब कुछ स्वीकार है लेकिन कुछ भी इतना महत्वपूर्ण नहीं है मेरे लिए कि मेरे जानने से, मेरे जीवन से, ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाए|

याद है, आज शुरू में ही कहा था कि जानना ही जीना है |

अगर होश में रहोगे तो झटके नहीं खाओगे और होश का मतलब होता है, ‘जानना’, ये पक्का समझ लो| अच्छा इसमें भूल मत कर बैठना, मैं जब कह रहा हूँ कि होश में रहोगे, तो उससे मेरा ये मतलब नहीं है कि हमेशा सोच-विचार में पड़े रहो| होश से मेरा मतलब ये है कि स्पष्ट समझने की काबिलियत रखो| जो बात सीधी है, उसे सीधा देख पाओ, तथ्यों से भागो नहीं, डरे-डरे नहीं रहो, तथ्यों के पास जाओ| सवाल पूछने से सकुचाओ नहीं| पूछ लो कि हाँ बात तो आप ठीक कह रहे हो कि आप बड़ा प्यार करते हो मुझसे, आप मेरी ज़िन्दगी हो पर थोड़ा ये तो बता दो…पूछ लो, फिर झटके नहीं लगेंगे | देखो, संबंध अगर किसी से बनाना है, प्रेम में भी यदि उतरना है, तो बेहोशी का कौन सा प्रेम होता है? दो शराबी हैं और दोनों का दावा है कि हम प्यार करते हैं एक दूसरे से, और दोनों बिल्कुल धुत्त हैं|

(सभी हँसते हैं)

अब वो गले भी मिलने जा रहे हैं तो कोई दाएं जा रहा, कोई बाएं जा रहा और दोनों दीवारों से अपना सर फोड़ रहें है| और उनका दावा है कि हम आपस में गले मिल रहें हैं और तीन-चार बार जब उन्होंने सिर फोड़ लिया तो उन्होंने तय किया कि इस बार ज़रा सावधानी से मिलेंगे| तो सावधानी से एक दूसरे के पास आए और पास आते ही आपस में माथा फोड़  लिया| भड़ाक! ये गले मिले हैं| क्या हमारा प्रेम ऐसा ही नहीं है? प्रेम में माथा-फोड़ी ही नहीं होती? कि आ तो रहे थे पास गले मिलने और फोड़ दिया कपाल|

(सभी हँसते हैं)

प्रेम के लिए भी तो होश चाहिए न? बेहोश हो, कि सोए पड़े हो और उस समय कोई तुमसे प्यार की चार बातें बोल भी दे तो तुम्हें क्या समझ में आएंगी? तुम्हें क्या आनंद है? क्या आनंद है ?

जो प्रेम, जो संबंध बेहोशी का हो, वो सिर्फ तुम्हें दुःख देगा |

बात समझ रहे हो ?

प्रेम परम होश है| जो ही संबंध होश का है, उसी का नाम प्रेम है|

वो तुम्हारा चाहे तुम्हारी किताब से संबंध हो, चाहे पालतू जानवर से, चाहे पौधों से, पेड़ों से संबंध हो, पूरे अस्तित्व से हो या किसी व्यक्ति से हो|

संबंध जागृति का रखो, ये नहीं कि बस जुड़ गये हैं।

क्यों जुड़ गये हैं वो पता नहीं| एक आदत सी थी या कि कोई रासायनिक कुलबुलाहट उठी थी शरीर में, तो जुड़ गये| एक ख़ास उम्र हो गई, उसके बाद होरमोंस सक्रीय हो जाते हैं, तो जाकर जुड़ गये! ऐसे नहीं| सोडियम पर पानी पड़ गया और वो जुड़ गये, सोडियम हाइड्रो-ऑक्साइड बन गया| इसमें किसको क्या आनंद मिल गया? बस बदबू-बदबू हो गयी, धुआं-धुआं फैल गया, इतना ही हुआ है|

(सभी हँसते हैं)

और धमाका जोर का हुआ! इसमें क्या आनंद है? ये बेहोशी का मिलन है| सोडियम और पानी मिल गये, बेहोशी का मिलन हो गया| मिलन हो भी गया और किसी को पता भी नहीं कि क्या हो गया? या लोहा है और वो चुम्बक की तरफ खीचा चला आ रहा है, सम्बन्ध ही तो है| क्यों खिंचा चला आ रहा है कुछ पता नहीं| पर दावा उसका क्या है? ‘आई एम इन लव’|

(सभी हँसते हैं)

कुछ रखा है इसमें? ऐसा ही तो तुम्हारे साथ होता है, खासतौर पर इस उम्र में| एक रसायन(केमिकल) इधर से कुलबुला रहा है, एक उधर से बुदबुदा रहा है|

(सभी श्रोता हँसते हैं)

दोनों एक दूसरे को आवाज़ दे रहे हैं और तुम्हें भ्रम हो गया है कि तुम्हें इश्क हो गया है| केमिकल जैसे उठा है, वैसे गिर भी जाएगा| बस ख़त्म ही हो जाएगा|

जो केमिकल के रास्ते जीवन में आये हैं, वो उन्हीं केमिकल रास्तों से वापस भी चले जाएंगे| तुम्हारे भीतर कब तक उत्तेजना ज़ोर मारेगी, कभी तो शांत होओगे और जब शांत होओगे तब कहोगे, ‘चल निकल’!

(सभी हँसते हैं)

तो जानो तो, समझो तो ठीक-ठीक कि ये संबंध क्या है|

-‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें:  प्रेम बेहोशी का सम्बन्ध नहीं

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय धीरज जी,

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      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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