मैं हूँ कौन?

वक्ता: प्रश्न है, मैं हूँ कौन? (व्हॉट इज़ द रियल आई?)

ध्यान देना। क्या हम ये पता लगा सकते हैं कि नक़ली ‘मैं’ क्या है ?

श्रोता १:  जैसा कि हमें बताया गया की मुझसे अगर कोई पूछे की तुम कौन हो, तो मैं कहूँगी कि मैं किसी की बहन हूँ, या किसी की बेटी हूँ या किसी की दोस्त हूँ, पर ये सब कुछ समाज का दिया हुआ है। अगर मैं ये भी कहूँगी कि ‘मैं आयुषी हूँ, मुझमें आत्मविश्वास है’, तो ये सब भी समाज का ही दिया हुआ है। ये वो असली ‘मैं’ तो नहीं है।

वक्ता: ऐसा लगता है ये विषय काफी उलझ गया है।

श्रोता १: जी सर।

वक्ता: बात इतनी कौम्प्लिकेटेड है ही नहीं, बात बड़ी आसान है। बात बहुत आसान है, बड़ी साधारण है और एकदम सामने है, अभी समझ जाओगे। तुम जब इस कक्ष में आये थे तो तुम एक तरीके के थे। कैसे आये थे? खूब हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा, खूब उपद्रव चल रहा था। मैं कुछ दूरी पर था बाहर, पर तब भी सब कुछ सुनाई दे रहा था। वो तुम्हारा एक चेहरा था। अभी ये कैमरा तुम्हारी ओर कर दिया जाए, तो बिल्कुल अलग चेहरा दिखाई देगा। बिल्कुल शांत हो, स्थिर हो। तुममें से कई मूर्ति की तरह बैठे हुए हैं और देख रहे हैं, एकदम ठहरे हुए, संयमित। ये दूसरा चेहरा है।

(हँसते हुए) फिर अभी बाहर जाओगे, वो तीसरा चेहरा होगा। फिर घर जाओगे, माँ बाप के सामने, चौथा चेहरा। ठीक? फिर तुममें से कुछ लोग इधर-उधर घूमेंगे, हॉस्टल जाएंगे, बाज़ार जाएंगे, चौराहों पर खड़े होंगे, वो पांचवा चेहरा होगा। ठीक है? और कदम-कदम पर चेहरे बदल रहे हैं। बदल रहे हैं न? दोस्तों के सामने एक चेहरा, शिक्षक के सामने अलग, और दोस्तों में भी किस दोस्त के सामने हो, इस पर निर्भर करता है की कौन-सा चेहरा। ठीक है? प्रेमी के सामने जो चेहरा है अगर वो पिता के सामने आ गया तो बड़ी दिक्कत हो जाएगी।

(सभी श्रोता हँसते हैं)

और माँ के सामने जो चेहरा है वो प्रेमिका के सामने आ गया तो वो छोड़ कर भाग जाएगी। कहेगी इस कमज़ोर, डरपोक आदमी के साथ कौन रहेगा। तो वहाँ एक और नया चेहरा रहता है; बहादुरी का। ठीक है न?

ये सब चेहरे जो हैं इन्हें कहा जाता है नक्ली ‘मैं’।

पहली बात तो ये कि सभी ने ये स्पष्ट देखा है कि हम चेहरे बदलते रहते हैं, और कितनी तेज़ी के साथ बदलते हैं। हमसे चालाक कोई है नहीं। गिरगिट भी रंग क्या बदलता होगा, हम चेहरे जितनी तेज़ी के साथ बदलते हैं। हमसे बढ़िया एक्टर कौन होगा।

इन्हीं सब नकली चेहरों को, जो आते-जाते रहते हैं, जो लगातार बदलते रहते हैं, इनको कहते हैं नक़ली ‘मैं’ क्योंकि तुम कहते तो यही हो न कि ये ‘मैं हूँ’, पर ये नक़ली है; नक़ली ‘मैं’। ठीक है? ये यहाँ तक बात समझ में आई है? समझ में आ रही है?

सभी श्रोता (एक स्वर में): जी सर।

वक्ता: पर हम ये भी देख पा रहें हैं अभी कि ‘मैं वो सब चेहरे लगा कर रखता हूँ और उनमें से कोई भी असली नहीं है’। देख पा रहे हो न?

सभी श्रोता( एक स्वर में): जी सर।

वक्ता: उन नक़ली चेहरों को देखने वाला कौन है? ठीक है ?

जब भी तुम नक़ली को नक़ली की तरह जान रहे हो, तो ये ‘जानने वाला’ असली है।

और जब नक़ली को नहीं जान रहे तो नक़ली में खोए रहोगे। वो जो है, जो ये जान सकता है कि ये सब नक़ली है; वही असली है। वही असली ‘मैं’ है। उसको समझ कहते हैं, उसको इंटेलिजेंस कहते हैं क्योंकि वो समझ जाता है कि नक़ली है। वो समझदार है, वो ये जान जाता है कि नक़ली है। आसान है न?

जब भी कभी जान रहे हो, तो वो जानना असली है। वही जानने की शक्ति असली है।

-‘संवाद’ पर आधारित।स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें:https://www.youtube.com/ watch?v=55Mb91fHzjk