दार्शनिकता

जाड़े की सुबह को,
बैठा हूँ मैं बाहर धूप में,
जब एक भूरा कुत्ता और काला कौवा
आकर कुछ इस तरह बैठ जाते हैं-
मेरे ठीक सामने तो नहीं-
पर किसी कोण से लगातार दिखाई देते रहते हैं।

भूरा कुत्ता बहुत कुछ सड़क पर पड़ी
गंदगी जैसा लगता है-
जिसे सूँघता है वो खुद
और काला कौवा आकाश पर छाए
उसी काले धुंआ की तरह
जिसमें उड़ता है वह खुद ।

मन ही मन अपनी इस
सोच पर इतराता हूँ जब-
घर के अन्दर से आती एक आवाज़
मुझे कुछ याद दिलाती है
और मैं स्कूटर स्टार्ट कर
उसी गन्दी सड़क पर,
वैसा ही काला धुआँ छोड़ता
निकल पड़ता हूँ, कुछ काम निबटाने ।

काला कौवा और भूरा कुत्ता अब
बहुत पीछे छूट गए हैं ।

~ प्रशान्त (अक्टूबर, ९५)

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