स्वधर्म क्या है?

प्रश्न: सर, स्वधर्म क्या है और कहाँ से आता है ?

वक्ता:  स्वधर्म आपके होने से आता है । कैसे आता है ? समझिये । आप जब ‘घर’ में होते हो तो आप कुछ नहीं होते हो । हम कहते हैं ना कि तुम ‘घर’ से बिछड़ गये हो । तुम घर से बिछड़ते नही हो । तुम जैसे-जैसे घर से दूर होते जाते हो, वैसे-वैसे ‘तुम’ होते जाते हो । स्नो-बोलिंग जानते है ना?  तो पहाड़ की चोटी से हिम के दो कण चलते हैं और वे चोटी से जितना दूर होते जाते हैं, वे हिम की पूरी एक चट्टान बनते जाते हैं । तुम घर से जितना ज्यादा दूर होगे, तुम उतने ज्यादा ‘तुम’ हो जाओगे ।

धर्म क्या है? – घर को लौटना । आप पूछ रहे हो, धर्म कैसे पता चले, स्वधर्म कैसे पता चले ? अपने होने से, अपनेआप को देख करके । आप जितने हो, उतने ही आप घर से दूर हो । घर से दूर ना होते तो आप होते कैसे ? स्नोबॉल  जितनी बड़ी है, वह अपनी चोटी से उतना दूर निकल आई है ना । तो अपने होने को देखो । अपने होने को देखो । अपनेआप को जितना पाओ, उतना ज्यादा समझ जाओ कि घर से दूर हो और अपनेआप को काटना है, गलाना है ।

रूमी ने कहा है ना, “अपनेआप को साफ़ करो अपने ही पानी से”। गलो और तुम जब गलोगे तो उसी गलने में तुम्हारी सफाई है । जैसे कोई गन्दा स्नोबॉल हो, और वह पिघलता जा रहा हो और उसके पिघलने के कारण ही वह साफ़ होता जा रहा हो । तो देखो कि तुम क्या-क्या हो गये हो | उसी से तुम स्वधर्म जान जाओगे । जो तुमने इकठ्ठा कर लिया है, जो भी तुम अपनेआप को समझते हो, वही बोझ है तुम्हारा । और तुम्हारा धर्म है ‘बोझ से मुक्ति’ । तुम्हारा धर्म है वापस लौटना । समझ रहे हो ?

हु ऍम आई ? –  इस सवाल के जितने भी जवाब तुम लिख सकते हो, उन सारे जवाबों से मुक्त हो जाना ही धर्म है ।

धर्म का अर्थ समझते हो क्या होता है? हम सोचते हैं कि धर्म का मतलब है, किसी परिस्थिति में मुझे क्या करना चाहिए । धर्म का असली अर्थ होता है कि किसी भी परिस्थिति में कुछ ऐसा करना कि अगली बार तुम्हारे लिए वह परिस्थिति आ ही ना सके । हर परिस्थिति एक चुनौती है, एक तरह का व्याघात है । एक परेशानी है । हर परिस्थिति वास्तव में एक परेशानी है । अगर परेशानी ना होती, तो तुम्हें उसका पता ही ना चलता ।

अभी बारिश हो रही है और यदि आप मुझे ध्यान से सुन रहे हैं तो आपको बारिश का पता नहीं चल रहा होगा । और चूँकि पता नहीं चल रहा है, इसलिए वह परिस्थिति है ही नहीं । लेकिन जिस क्षण इस बारिश के कारण आपके ध्यान में बाधा पड़ेगी, ठीक उसी क्षण यह बारिश आपको सुनाई देगी । बात समझ रहे हैं कि नहीं ? ‘परिस्थिति’ परिस्थिति है ही नहीं यदि वह परेशानी नहीं है । फिलहाल आपको बारिश से परेशानी नहीं है इसलिए आप कहोगे ही नहीं कि बारिश हो रही है । ऐसा पूछा जाये कि अभी क्या-क्या है ? तो आप दस चीजें गिनाओगे जिसमें बारिश शायद हो भी ना क्योंकि अभी आप ध्यानस्थ हो ।

तो प्रत्येक परिस्थिति में आपका धर्म है, ऐसा कुछ करना कि आप ‘वो’ बचो ही ना जिसके लिए वो परिस्थिति महत्व रखती है । ऐसे हो जाओ कि अब यह परिस्थिति भी गयी । मैं वापस आया । मैं वापस आया । मैं एक कदम और आगे बढ़ा घर की तरफ । आपके पास कोई स्पैम कॉल आती है । कोई व्यर्थ ही आपको कॉल कर करके परेशान कर देता है । आपका क्या धर्म है…?

श्रोता: उसे ब्लॉक करना ।

वक्ता: जैसे ही ब्लॉक किया, अब वह परिस्थिति दोबारा आ ही नहीं सकती । लेकिन आप उसे ब्लॉक नहीं कर पाते क्योंकि आप कुछ हो और धर्मआपका उससे कोई सम्बन्ध है । स्पैम वही नहीं होते जो आपको कुछ बेचना चाहते हैं । सबसे बड़े स्पैमर्स आपके दोस्त होते हैं । पर आप जान भी नहीं पाते कि आपका धर्म है कि ट्रू-कॉलर में इसको ब्लॉक कर दूँ । तेरा फ़ोन ही नहीं आयेगा । उसको ब्लॉक करने के लिए आपको पिघलना पड़ेगा । आपको अपनी पहचान में से कुछ खोना पड़ेगा । पहचान का कौन सा हिस्सा खोना पड़ेगा कि “मैं इसका दोस्त हूँ” । जैसे ही आपने उसको ब्लॉक किया, अब वह परिस्थिति आपके साथ दोबारा नहीं आ सकती, आप बदल गये । आप बदल गये ।

परिस्थितियों से नफरत होते-होते, होते-होते, अंततः आप ऐसे हो जाते हो कि आप अन्तः-स्थित हो जाते हो । परि, माने बाहर । बाहर जो कुछ भी चल रहा है, वो अब है नहीं । जो भी है, वो अब भीतर है । आयी बात समझ में ?

ऐसे हो जाना कि दुनिया तुम्हारे मन में कोई विक्षेप खड़ा ही ना कर सके । यही तुम्हारा धर्म है । विक्षेप माने डिस्टर्बेंस । जो कुछ तुम्हें उत्तेजित करता हो, उद्द्वेलित करता हो, जो कुछ तुम्हारे मन में लहरें खड़ी कर देता हो, उसी से सुरक्षित हो जाना धर्म है । और लहरें बड़ी आकर्षक लहरें होती हैं । लहरों का नाम यह नहीं होता कि हम तो आपको परेशान करने वाली लहरें हैं । लहरें बड़े सुन्दर नाम लेकर आती हैं । कैसे-कैसे नाम ? परवाह, प्यार, शुभचिंतक, लालच, पैसा, ज़िम्मेदारी, प्रतियोगिता ।

-‘बोध-शिविर सत्र’ पर आधारित| स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं|

सत्र देखें: Prashant Tripathi: स्वधर्म क्या है? (What is my Dharma?)

इस विषय पर अधिक स्पष्टता के लिए पढ़ें:-

लेख १: आत्म- विचार से आत्म-बोध तक

लेख २: अलग-अलग धर्म क्यों हैं?

लेख ३: झूठी आस्तिकता

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय वैभव जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

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      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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