मूर्ति द्वार है अमूर्त का

प्रश्न: सर, मीरा ने लगातर अपने पदों में छवियों का प्रयोग क्यों किया है? काछनी, मोती-माला, कुंडल, कजरारे-नैन, मोर-पंख, मीरा लगातार इन गुण-सूचकों का इस्तेमाल क्यों करती हैं?

मनकीचालवक्ता: क्योंकि ईमानदार हैं; क्योंकि ये दावा करना कि मन के पार जा चुके हैं, मन की बड़ी गहरी चाल होती है कबीर कहते हैं,“मन को मृतक मानकर कभी विश्वास मत कर लेना, ये पिंजर अभी साँस ले रहा है; उठ बैठेगा।”

मीरा ही गा रहीं हैं ना? ‘पति’ ही कह रही हैं ना? तो मीरा अभी हैं शब्दों से ही गाया जा रहा है ना? शब्दों से गाने वाली स्त्री अभी है उसके लिए, ‘निर्गुण-निराकार’ यह शब्द मायने नहीं रखते और अधिकांश निर्गुणवादी, अद्वैतवादी निरे झूठे लोग होते हैं; उनका पहला झूठ तो यही होता है कि “हम अद्वैतवादी हैं!”

लो! ‘तुम’ हो  अभी? और ‘अद्वैत’ भी है? ये तो गज़ब हो गया!

(व्यंग्कयात्मक तरीके से) आओ, एक चुटकुला सुनाएं; क्या? “हम  निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते हैं!”

तुम्हें तो कोई पदक मिलना चाहिए! “हम  निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते हैं!”

‘तुम’ निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते हो? शाबाश!

मीरा सीधी स्त्री हैं, उन्हें तुम्हारी तारीफ़ें नहीं चाहिए, उन्हें बड़े-बड़े दावे नहीं करने, वो तो पति रूप में ही पूजती हैं, वो तो बार-बार कहती हैं, “रो रहीं हूँ, और याद आती है और बिस्तर सूना पड़ा है।” वो नहीं कहती, “मैं, तुम हो गयी हूँ और मैं और तुम एक हैं।” वो तो कहती हैं, “नहीं एक हैं, मैं विरह की अग्नि में जल रही हूँ। वो नहीं कहती हैं, “मैं ही मेरा आधार हूँ, और मेरे अतिरिक्त कुछ है नहीं, तो कैसी पूजा और कैसी अर्चना?”

वो करती हैं पूजा और करती हैं अर्चना। वो नहीं कहती हैं, “मेरा स्वभाव है शांत रहना और मेरे अंतरमन में दीए की अकंप ज्योत है”। वो तो पूरी ही बावली हैं; वो तो कांपती ही रहती हैं, कुछ अकंपित नहीं है उनके यहाँ; नाचती हैं; कहाँ की स्थिरता? और पागलों की तरह नाचती हैं – ईमानदार हैं।

न होती पागल, न होती ईमानदार तो विष नहीं पी सकती थी। दावे ही अगर उसे करने होते, तो चर्मकारों के यहाँ जाकर न सीखती। जाति-प्रथा बड़ी गहरी थी उन दिनों, इस संसार से ही अगर अभी सरोकार होता तो राजरानी होकर के सड़कों पर बदहाल न घूमती। सीधी है, सरल है; मन लग गया है उसका, मन  ही लग गया है। और अच्छे तरीके से स्मरण रखें, बड़े विनय के साथ, सर झुका करके स्मरण रखें कि जब तक कहने वाला  मौजूद है, जब तक सुनने वाला  मौजूद है, जब तक इस कक्ष में शरीर रूप  में हम सब बैठे हुए हैं तब तक तो मन की ही सत्ता है। कोई फिजूल दावे न करे कि, “हम आत्मरूप हैं। हम परम से संयुक्त हैं।” इस्लाम में इसलिए ऐसा कहने पर भी पाबंदी है। क्योंकि १००० में से ९९९ लोग जो ये बात कहेंगे, वो सिर्फ अपने मुँह मियाँ मिटूठ हो रहे होंगे।

कोई बिरला, कोई मंसूर, “अनल-हक़” कहदे तो वो अलग बात होती है; पर मंसूर तो करोड़ों में एक है, उसकी देखा-देखी और पता नहीं कितने हैं जो यूँ ही दावा करना शुरू करदें। बड़ा आसान है झूठ-मूठ का ब्रह्मज्ञानी बन जाना और कहने लगना, “नहीं, अब हमें छवियों से, दृश्यों से, ध्वनियों से, स्पर्श से कोई प्रयोजन ही नहीं रहा।”

संत ऐसा नहीं होता, वो तो चखता है – राम को चखता है, वो तो सुनता है – बांसुरी सुनता है, वो तो सोचता है – कृष्ण को सोचता है; उसका मन और इन्द्रियाँ हैं; सक्रिय हैं, पर डूबी हुई हैं, राम में डूबी हुई हैं। उसके लिए उसका इष्ट एक जीवंत सत्य है। रामकृष्ण कहते थे, “पहले मैं खाऊँगा, चखूंगा, फिर माँ को खिलाऊँगा”। लोग उनको दक्षिणेश्वर से निकालने पर उतारू हो गए, बोलें, “क्या हरकत है ये!” रामकृष्ण बोले, “हम हरकत-वरकत नहीं जानते पर इतना जानते हैं कि जब हम बच्चे थे तो हमारी माँ हमको कड़वा-खट्टा खाने को नहीं देती थी, तो हम माँ को बिना चखें कैसे दे दें?”

वहाँ बड़ा भाव है, वहाँ आँसू सूख नहीं गए हैं, वहां भीतर अकाल नहीं पड़ गया है; वहाँ तरलता है, अभी द्रव्यता का संचार है। हमारे मन तो ऐसे हैं जैसे अकाल से फटी हुई धरती देखी है? पानी न बरसे दो साल तो धरती कैसी फट जाती है – हमारे मन ऐसे हैं। और अपने इस सूखेपन को हम ज्ञान का नाम देते हैं।

नहीं, मीरा ज्ञानी नहीं है, मीरा तो रोती है, हमारी आँखें पथरा गई हैं मीरा की नहीं पथराई हैं। हमारे कानों को सिर्फ़ सांसारिक आवाज़ें सुनाई देती हैं, मीरा को तो बांसुरी सुनाई देती है। और हमारे पैमानों पर देखेंगे तो मीरा पगली है। बांसुरी सुन रही है! किसकी? जिसको मरे २००० साल हो गए; अपने धर्म का पालन नहीं कर रही है। अरे, पत्नी है, रानी है- “अपने धर्म का पालन करो!” मौनाश्रम है, सिखा गया है, कर्तव्य हैं, ज़िम्मेदारियाँ

(मौन)

जब जानते ही हो कि मन अभी विषयों से आसक्त ही है तो उसे ऐसे विषय दो जो उसे केंद्र की और वापस ला सकें। भाग तो ये रहा ही है, सदियों पुरानी आदत है इसकी, इच्छा भर करने से नहीं चली जाएगी। भाग तो यह रहा ही है, और विषयों की तरफ़ ही भाग रहा है, तो इसे ऐसे विषय दे दो जो इसे इसके स्त्रोत की तरफ़, इसके केंद्र की तरफ़, आत्मा की तरफ़, राम की तरफ़ वापस ले जा सकें।

बांसुरी कृष्ण की याद दिलाएगी, सुन्दर आखें कृष्ण की याद दिलाएंगी, मोर-पंख कृष्ण की याद दिलाएगा, करधनी कृष्ण की याद दिलाएगी। ये कहने से कोई फ़ायदा नहीं होगा कि, “समस्त दृश्य झूठें हैं। अरे! बांसुरी क्या है? मन का भ्रम ही तो है।” “हम बड़े ज्ञानी हैं, हमें पता है कि बांसुरी जैसा कुछ है नहीं; मन ही तो कुछ छवियों को प्रक्षेपित करता है”- अच्छा! इस मामले तुम बड़े होशियार हो, तुम्हें पता है कि बांसुरी जैसा कुछ नहीं है तो जो बांसुरी को देखकर के भावविभूत हो रहा हो उसको तुम कह देते हो, “मूर्ख है, ‘बांसुरी’ नाम की वस्तु झूठी है, तू क्यों भावावेश में आ रहा है?”

तो वस्तु अगर बांसुरी है, तो झूठी है और वस्तु अगर हज़ार-हज़ार के नोंट हैं तो?

(व्यंग्कयात्मक तरीके से) वो सच्चे हैं। वो सच्चे हैं।

प्रभावोंवस्तु की तरफ़ तो भाग ही रहे हो न? तो ऐसी वस्तुओं से नाता जोड़ो जो वस्तु से परे की याद दिला दे; ऐसा शब्द सुनो जो मौन में ले जाएँ; ऐसे व्यक्ति से नाता जोड़ो जो व्यक्तियों के आगे के संसार की याद दिलाता हो, जो किसी और देश से आता सा लगता हो। नाते तो तुम जोड़ ही रहे हो ना? संगति ही सब कुछ है – और मीरा ने कर ली है कृष्ण की संगति। तुम देखो तुमने किसकी संगति करी है? मन तो प्रभावों के संकलन का नाम है, जैसे माहौल में उसे रखोगे वैसा हो जागा; तुम देखलो कि तुमने उसे कैसे माहौल में रखा है? मीरा को कृष्ण के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता था, दिन-रात वो कृष्ण के साथ ही रहती हैं। तुम देखो कि तुम्हारी आँखों के सामने किसका चित्र घूमता है हर समय? सुबह उठते हो तो कौन-से भगवान की शक्ल दिखाई देती है? आँख खोलते हो तो सामने कौन-सी देवी मौज़ूद रहती है?  जिनकी शक्ल दिन-रात देख रहे हो वैसे ही हो जाओगे

और इस भ्रम में मत रहना कि, “न, न, न, हम तो जल में कमलवत रह जाएँगे, कीचड़ में कमल के समान अनछुए रह जाएँगे!” कमल बहुत ऊँची बात है, वो सहस्रार पर है और तुम बैठे हो बहुत नीचे, तुम अनछुए नहीं रह जाओगे। दिन-रात जिनकी आवाज़ें सुन रहे हो और दिन-रात जिनकी शक्लें देख रहे हो वैसा ही तुम्हारा मन हो जाना है, असंभव है कि प्रभाव न पड़े व्यर्थ दिलासा मत दो अपनेआप को। और यदि उनकी वाणी से तुम पर प्रभाव नहीं पड़ता तो कबीर वाणी से क्यों पड़ेगा? ये भी बतादो! फिर तो तुम्हें समस्त वाणियों से अनछुआ हो जाना चाहिए! पति-देव की नारकीय वाणी तुमपर अगर प्रभाव नहीं डाल रही है तो फिर कबीर के वचन भी तुम्हें आनंद के स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? फिर तो कोई शब्द तुम्हें प्रभावित नहीं करेगा ना, फिर तो तुम अचल मौन में स्थापित हो। ऐसे तो हो नहीं, क्या हो ऐसे?

जब सुनते हो कबीर को तो कहते हो ना कि शान्ति मिली? जब कबीर शान्ति दे रहे हैं तो ये जो इतने, इधर-उधर घूम रहे हैं- ‘झज्जुमल-पज्जुमल’ ये क्या दे रहे होंगें? जब कबीर शान्ति दे रहे हैं, तो ये सब क्या दे रहे होंगें, जिनके संपर्क में हो दिन रात? निश्चित रूप से अशांति दे रहे होंगें ना? क्योंकि प्रभावित तो होते ही हो। संगति का ख़याल करो और अपने तथ्य से मुख मत छुपाओ। तुम आत्माराम नहीं हो, तुम केंद्र पर अविचल स्थापित नहीं हो, तुम जीवनमुक्त नहीं हो, तुम्हारी देह पर तो बररईया काटती है तो चिल्लाते हो, “हाय, हाय,” और फिर कहते हो “अहम् ब्रह्मास्मि।”

अपने तथ्य के प्रति ईमानदार रहो, “हाँ, शरीर से संयुक्त हूँ” और शरीर माने इन्द्रियाँ तो इन्द्रियों को उचित भोजन देना ही तुम्हारा कर्तव्य है।

(मौन)

जैसे माँस खाने से परहेज़ करते हो ना? वैसे ही माँस देखने से भी परहेज़ करो। माँस तो देखे जाते हो दिन-रात, कि नहीं देख रहे हो? जिधर देखते हो उधर माँस ही माँस है या बस मुहँ से खाओगे तभी भोजन किया माँस! आँख से भी तो माँस का सेवन करे ही जाते हो, पर नहीं, “हम तो जी बड़े शाकाहारी है!” निरामिष खाते ही नहीं। निरामिष खातें हैं। और आँख से जो माँस ही माँस भीतर जा रही है उसका क्या?

(मौन)

और बहाने खूब हैं – तुम्हें कहीं भागना होता है तो कहते हो, “क्या फर्क़ पड़ता है जिस दिशा जाएँ वहीं राम हैं”। तुम्हारे लिए ऐसा है? तो काहे को झूठ बोलते हो? “कबीर कह गए हैं, उठूँ-बैठूं करूँ परिक्रमा, तो क्यों बैठें?” तुम्हारे लिए ऐसा है कि उठूँ-बैठूं करूँ परिक्रमा? तो काहे को झूठ बोलते हो?

“जलवत कमल! कि संतों ने कहा है कि साधु तो सूप जैसा होता है- मात्र सार-सार ग्रहण कर लेता है।”

तुम ऐसे हो?

पर तुम कहोगे, “नहीं देखिए हमें जाने दीजिए, हमें गंदगी के ढेर में घुस जाने दीजिए, हम तो बस सार-सार ग्रहण करेंगे और बाहर आजायेंगे।”

तुम ऐसे हो?

मीरा में ईमानदारी थी, मीरा नहीं दावा करती थी कि हम ऐसे हैं, मीरा नहीं कहती थी कि कृष्ण की बांसुरी का क्या करना है, “अरे, भोपूं निकालो, दुदुम्भी निकालो, तोप निकालो, कृष्ण तो तोप के गोले में भी बसते हैं, भजन गाके क्यों याद करना है कृष्ण को? तोप की सलामी देंगे!”

मीरा को तो पता था कि गृहस्थी के चक्करों में फसुंगी तो फंस ही जाऊँगी। मीरा ने स्वांग नहीं किया कि, “मैं तो इतनी ताकतवर हूँ कि जैसे बत्तीस दाँतों के बीच में जीभ रहती है, वैसे रहूँगी!”। मीरा जानती थी, “इनके बीच रही तो फसुंगी।” और तुम बताने आते हो कि, “देखिए साहब, भोग से ही तो योग है!”। तुममें ज़्यादा ताकत होगी? उस दिन कोई कह रहा था, “ये दुनिया इसलिए ही तो बनाई गयी है कि इसका आनंद लूटा जाए और यदि हमने दुनिया को तिरस्कृत किया तो वो दुनिया के रचयिता का तिरस्कार होगा”। अच्छा, तो तुम दुनिया में इसलिए घुसे रहते हो ताकि दुनिया के रचयिता की आराधना कर सको? शाबाश!

ये साहब धन्यवाद देने की खातिर दुनिया के रस भोग रहे हैं। “जितना हम रस भोगते हैं, उतना हम धन्यवाद देते हैं,” अहा! “हमारी जीभ पर पिज़्ज़ा  पड़ता है तो हमें याद आता है कि जीभ के पीछे कौन है! जिसे जीभ चख नहीं सकती पर जो जीभ को चखने की शक्ति देता है- जैसा उपनिषदों ने कहा है। तो पिज़्ज़ा-हट  हमारा मंदिर है, वहाँ जाकर के हमें परमात्मा की याद आती है। हम जब किसी फूहड़ फिल्म में नंगी औरत को नाचते देखते हैं तो हम कहते हैं, “न, हम उसे नहीं देख रहे, हम तो उसके ध्यान में डूबे हैं जिसे आँखें देख नहीं सकती पर जो आँखों को देखने की शक्ति देता है”।

तुम किसको बेवकूफ बना रहे हो? तुम किसको बेवकूफ बना रहे हो? तुम कहते हो कि तुम्हें दुनिया का नाम लेते हुए परमात्मा याद रहता है; मैं बताता हूँ- तुम्हारी हालत ये है कि तुम्हें परमात्मा का नाम लेते हुए भी दुनिया याद रहती है- ये तुम्हारी हालत है! तुम से तो कहा जाए कि भजन भी गाओ तो तुम उसका मनोरंजन बना देते हो।

“जो भजन को मनोरंजन बनाने में उतारू हो, उसे क्या मनोरंजन में भजन याद आएगा?”

तो क्यों झूठे दावे करते हो? पर नहीं, इतना आसन होता माया को जीत लेना तो फिर माया उद्भूत ही क्यों होती? माया इसलिए नहीं है कि हर ऐरा-गैरा नथ्थूखैरा उसे पटखनी देदे। माया है ही इसलिए कि तुम्हें नचाए, और अच्छे से नचाए। इतना सरल होता माया के पार निकल जाना तो निकल ही गए होते ना?

माया तो ठगनी बड़ी, ठगत फिरत सब देस”  किसी को छोड़ा नहीं है उसने।

(मौन)

कैसे-कैसे तो हमने गंदे मुहावरे बना रखे हैं- “काम ही पूजा है”। काम क्या है तुम्हारा? तुम टिम्बर के व्यापारी हो। और काम क्या है तुम्हारा? कि तुम पहाड़ काट-काट के सड़कें बनाते हो। और काम क्या है तुम्हारा? कि तुम प्लास्टिक  में भर-भर के आलू के चिप्स  बेचते हो। और काम क्या है तुम्हारा? कि जिन लोगों के मन में इच्छा नहीं भी हो, उन लोगों के मन में तुम इच्छा जगाते हो कि, “आओ, स्विट्ज़रलैंड  घुमाएँ तुम्हें”। और तुमने क्या बना रखा है? काम ही पूजा है! (वर्क इस वर्शिप।) इससे बड़ा झूठ कोई हो सकता है? तुम जब काम में होते हो तो तुम्हें वाकई परमात्मा की सुध रहती है? वाकई? तुम रोज़ सुबह नौकरी पर इसलिए जाते हो कि पुजारी हो, और मंदिर जा रहे हो? या इसलिए जाते हो कि, “और रुपया-पैसा इकट्ठा करूँ और अपनी हवस की पूर्ती करूँ”? क्या बात है! “काम ही पूजा है!”

एक पुरानी महोदया मिलीं, यहाँ पर आती थीं जब अद्वैत नया-नया शुरू हुआ था, बोलती हैं, “अद्वैत ने तो नया ही रूप ले लिया है, पर हम भी पीछे नहीं रहे हैं, मेरे पति ही शिव हैं, और मेरे नन्हे-मुन्हे गणेश और कर्तिकेय हैं।” अच्छा! तुम्हें छग्गुमल की शक्ल में रुद्र  दिखाई देते हैं? वाकई? ये जो तुम नमूना लेकर के घुमती हो, बगल में अपने, छग्गुमल, इसकी शक्ल में तुम्हें शिव दिखाई देते हैं? और तुम शिव के साथ सोई थीं ये गणेश और कर्तिकेय लाने के लिए?

कचरा लेकर फिर रही हो पर ईमानदारी नहीं है, स्वीकार नहीं करोगे कि झोला लटका रखा है और उसमें से दुर्गन्ध उठ रही है। और एक सज्जन कह गए हैं, “गृहस्थ वो तपोवन है जिसमें सेवा, सहिष्णुता की पूजा होती है”। अच्छा! गृहस्थ तपोवन है? जब तुम जाते हो पत्नी चुनने तो उसे देखकर कहते हो, “अब तपस्या करूँगा?” ज़रूर तपस्या करते हो तुम पत्नी के साथ, दोनों मिल के ब्रह्मचर्य साधते हो!

एक और आये थे – “अरे, जो इंसान को ही प्रेम नहीं कर सकता वो भगवान को क्या प्रेम करेगा?” इनके आठ बच्चे हैं! वो प्रेम विव्हल रहते हैं हर समय, और रुकने वाले नहीं है वो, क्योंकि परमात्मा का प्रेम अनंत है। “हम होते कौन हैं? बड़ा गहरा कर्ताभाव है आप में, आपने रोक कैसे दिया, आप रोकने वाले कौन? अरे, इन्हें (बच्चों को)  हम थोड़ी लेकर आएं हैं!” अच्छा? और कौन आया था? और जान ही जाओ कि कोई और आया था तो तुम्हारा होगा क्या? फिर चाहें राम हो, चाहें कृष्ण हो, बंदूक चलेगी।

“इश्क-ए-मजाज़ी, इश्क-ए-हकीकी की सीढ़ी है।” अच्छा? तो लिपट जाओ सीढ़ी से और चूमों सीढ़ी को और एक के बाद एक सीढ़ियाँ लगाते चलो- एक सीढ़ी, दो सीढ़ी, तीन सीढ़ी, चार सीढ़ी, अगल-बगल लगाओ सब सीढ़ियाँ ही सीढ़ियाँ। “अरे, ये सब हम इसलिए कर रहें हैं ताकि परमात्मा तक पहुँच सकें”।

“दीन-दुखियों की सेवा इश्वर की सबसे बड़ी सेवा है” अच्छा! फिर तो ईश्वर की सेवा के लिए बहुत सारे दीन-दुखी इम्पोर्ट  किए जाने चाहिए! लेकर आओ भई, दो-चार दर्जन दीन-दुखी और। दीन-दुखियों ने बड़ा उपकार किया हमारे ऊपर कि वो दीन-दुखी बने रहे, वो न होते तो ईश्वर की सेवा कैसे होती? फैक्टरीयाँ लगनी चाहिए, जिसमें से दीनों का उत्पादन हो, नंगे-भूखे बहुत ज़रूरी हैं। क्यों? “क्योंकि जो नंगे को कपड़ा पहनाता है वो ईश्वर को कपड़ा पहनाता है, जो भूखे का पेट भरता है वो इश्वर का पेट भरता है।”

अच्छा?

अपनी दुनिया कायम रखने के लिए कैसे-कैसे झूठ गढे हैं ना हमने? हमारी कामना, हमारी वासना बनी रहे और पर्दा भी पड़ा रहे, कहना भी न पड़े कि ये वासना है, कहना भी न पड़े कि ये सिर्फ़ हमारी घोर बेहोशी है, तो उसको हमने बड़े सुन्दर नाम दे दिए हैं। समाज की एक-एक संस्था के साथ हमने ईश्वर का नाम जोड़ दिया है और ईश्वर का उनसे कोई लेना देना नहीं। अभी कल-परसों, यहाँ रोहित बैठे हैं, गा रहे थे कि बकरीद बीती तो कबीर ने कहा,

“मुल्ला तोहे करीम का कब आया फरमान।

राम नाम जाने नहीं जीबह करे हैवान।।”

तुम्हें तो जानवर भी काटना है, उसका माँस भी खाना है तो क्या बोलते हो? “करीम ने बोला है, अल्लाह का फरमान है।” अच्छा? अल्लाह ने कहा है?

विवाह जैसा घोर गैर-आध्यात्मिक सम्बन्ध तुम एक स्त्री और पुरुष के बीच में बना देते हो, जिससे बड़ा पाप कोई दूसरा नहीं हो सकता और तुम विवाह के अवसर पर नाम किसका लेते हो? इश्वर का, “ये सब तो जी इश्वर के नाम पर हो रहा है”। अच्छा?

ब्रह्म की आज्ञा है, कि विवाह होने चाहिए? अस्तित्व ने उठकर के कहा था कि इस तरह एक आदमी और एक औरत को बाँध दो आपस में? पर नहीं, तुम्हारी अपनी असुरक्षाएँ, तुम्हारी अपनी क्षुद्रताएँ और उनके साथ तुमने नाम जोड़ दिया है परमात्मा का। राम ने कहा था कि दिवाली मनाओ? राम ने कहा था कि पटाखे जलाओ? पर तुम्हें मनोरंजन करना है अपना, तो तुमने उसके साथ राम का नाम जोड़ दिया! राम ने कहा था कि, “तुम्हारी हवस से दुनिया की आबादी ८ अरब हो जाए?” पर नहीं, बच्चा पैदा होता है तो तुम कहते हो, “ईश्वर ने भेजा है।” ईश्वर ने भेजा है? तो तुम काहे के लिए माँ-बाप बने फिरते हो? फिर उसे रहने ही दो ना, उसे ईश्वर का ही बेटा रहने दो! वो तुम नहीं करोगे। तब तुम माँ-बाप बन जाओगे, “हमारा बच्चा”।

(मौन)

कोई सीमा नहीं है हमारी बेमानी की और हममें और मीरा में जो अंतर है वो साफ़-साफ़ देख लीजिए। हम परमात्मा का भी नाम लेते हैं तो उसके पीछे हमारा सांसारिक स्वार्थ होता है; हम कहते हैं, “राम” और मन में होता है, “काम”। हम कहते हैं, “मंदिर” और मन में होती है, “मुद्राएं”।

मीरा का उल्टा है – वो कहती है, “बांसुरी” पर भीतर कहीं होता है मौन। वो नाचती है जोर से, पर भीतर कहीं होती है स्थिरता; मीरा बार-बार सांसारिक चीजों का ही नाम ले रही है, तुमने ठीक लिखा है, “कभी ‘कछनी’ कहती है, किभी ‘करधनी’ कहती है, कभी ‘काजल’ कहती है, कभी ‘मोर-पंख’ कहती है, कभी ‘बिस्तर’ कहती है, कभी ‘मूर्ती’ कहती है, कभी ‘आँखें’ कहती है, कभी ‘मुस्कान’ कहती है लेकिन मीरा जब ये सब कुछ कह रही होती है तब उसके मन में लगातार परमात्मा बसा है और हम जब परमात्मा भी कह रहे हैं तो उसके पीछे बस हमारे क्षुद्र सांसारिक स्वार्थ बसे हैं – यही अंतर है

~ ‘शब्द-योग सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षेपित हैं।

सत्र देखें:  मूर्ति द्वार है अमूर्त का

इस विषय पर अधिक स्पष्टता के लिए पढ़ें:-

लेख १. तुम्हारा सबसे अंतरंग सम्बन्ध

लेख २. शरीर और आत्मा के मध्य सेतु है मन

लेख ३. सत्य से सदा बचने की दौड़

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2 टिप्पणियाँ

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      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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