वो तो तुम्हें देख ही रहा है, तुम उसे कब देखोगे?

दीन लखै मुख सबन को, दीनहिं लखै न कोय,
भली बिचारी दीनता, नरहू देवता होय॥ 
~ कबीर

वक्ता: ऐसा होता है संत, जो कुछ भी देखता है उसे देख कर उसे याद ‘परम’ की ही आती है। कबीर दीनता को भी देखते हैं, तो उसमे उन्हें वही एक ‘परम’ नज़र आता है। इससे बढ़िया उदाहरण हो नहीं सकता। कबीर कह रहे हैं, “जैसे दीन व्यक्ति होता है, वो सबको देखता रहता है, पर उसकी ओर कोई नहीं देखता। वो परम भी ठीक ऐसा ही है, वो तुम सबकी देखभाल करता है, तुम सबको देखता रहता है, तुम उसको नहीं देखते।”

आपने सौ मरतबा भिखारी देखे, कभी भिखारी देख के परम याद आया है कि – परम भी तो बिल्कुल ऐसा ही है, वो सबकी ओर देखता रहता है, उसपर कोई ध्यान नहीं देता? भिखारी के साथ यही होता है ना? भिखारी एक-एक के पास जा रहा है, भिखारी की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा। पर कभी किसी भिखारी को देख कर के आपको ये विचार उठा ही नहीं होगा कि परम भी कुछ-कुछ इसके ही जैसा है। कभी नहीं उठा होगा।

कबीर को उठ आया – वो सब का ख़याल रख रहा है। आपको पता भी नहीं चलता, वो आपका ख़याल रख रहा है। आप कभी उसको नहीं देखते। और अगर उपनिषद के ऋषि की भाषा में कहें तो – वो आपको देखने की ताकत देता है, पर वो स्वयं देखा जा ही नहीं सकता। आँख के पास यदि देखने की ताकत है, तो उसकी दी हुई है, लेकिन आँख उसको नहीं देख सकती। चाहे जैसे कहिए।

लेकिन ‘दीनता’ और ‘दीन’ को देख करके परम की याद कर लेना – ये संतत्व है। जहाँ अपेक्षित ही नहीं है, वहाँ भी आपको सत्य दिखाई दे जाए – यही संतत्व है।

आप बैठे हों ट्रेन में, और देख रहे हों प्लेटफार्म को, और चाय बेचने वालों को, और स्टेशन पर हो रही घोषणाओं को, और लोगों के सामान को, और उनकी भाग-दौड़ को, उनकी ख़ुशी को, उनकी बेचैनियों को, और ये सब देख के तुरंत आपको सत्य दिख जाए जीवन का, आप बोध में उतर जाओ – यही संतत्व है।

और जो ये सब देखे, और इसमें परम को ना देख पाए, सत्य को ना देख पाए, वो आपका साधारण गृहस्थ है। वो अगर देखता है कि स्टेशन पर चाय बिक रही है, तो उसको याद आते हैं बीवी के हाथ कि, “वो भी बड़ी अच्छी चाय बनाती है,” उसको परम नहीं याद आता। यही अंतर है संत में और गृहस्थ में। पक्का मानिये, उस समय पर ट्रेनें होतीं, और कबीर ट्रेन में चलते होते, तो कुछ नहीं तो पाँच सौ, हज़ार दोहे ट्रेन पर होने थे। (हँसी)

चाय बेचने वाले पर, सामान पर, सर पर टंगे बोझ पर, उछल-कूद पर, भीड़ पर, हो ही नहीं सकता था कि कबीर लगातार दोहे ना कहते जाते। (दोहे के रूप में गाते हुए) “धक़-धक़ ज्यों इंजन चले (श्रोतागण ज़ोर-ज़ोर से हँसते हैं), चलता छाती फोड़, धक़-धक़ ज्यों इंजन चले चलता छाती फोड़, साहिब मार्ग जानता नहीं, जाएगा किस ओर।” तो यही तो हम सबकी दशा नहीं है क्या? धुआँ निकल रहा है इंजन की तरह, धक़-धक़, धक़-धक़, दुनिया भर का बोझ लिए बढ़े जा रहे हैं। साहिब को जानते नहीं, तो किस ओर जा रहे हैं? हो गया, बोल दिया कबीर ने। हमसे नहीं बोला जाता।

यही अंतर है। तो निर्विचार मत खोजिये, ‘उसका’ विचार खोजिये। इंजन भी देखें, तो सत्य दिखाई दे जाए बस। अस्तित्व का सत्य इस इंजन में है। जल रहा है, इसके भीतर से धुआँ ही धुआँ उठ रहा है। और कर क्या रहा है? दूसरों का बोझ ढो रहा है, पागल। और किधर को जा रहा है? बस पटरी पर चलेगा, उतर नहीं सकता, पटरियाँ दूसरों ने निर्धारित कर दी हैं।

ये रहा आम आदमी का जीवन – इंजन। (दोहे के रूप में गाते हुए) धक़-धक़ ज्यों इंजन चले चलता छाती फोड़, साहिब मार्ग जाने नहीं जाएगा किस ओर।

गंगा दिखाई दे रही है, तो पानी ना दिखाई दे कि – छपा-छप, छपा-छप मारे पड़े हैं उसमें, पानी का तत्व दिखाई दे। तब मज़ा आएगा असली। जो दिखे उसमें ‘वो’ दिखा, तब तो आया मज़ा। नहीं तो फिर क्या है? ऐसे अंधे ही हैं।

~ ‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi on Kabir: वो तो तुम्हें देख ही रहा है, तुम उसे कब देखोगे?

इस विषय पर और लेख पढ़ें :

लेख १: जीवन – अवसर स्वयं को पाने का

लेख २: एक और आख़िरी मौका

लेख ३: संसारी कौन? जो संसार से पूर्णतया अज्ञानी हो

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय किरण जी,

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      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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