इच्छा जिसे तलाश रही है वो इच्छा द्वारा मिल ही नहीं सकता

बूड़ा था पै ऊबरा, गुरु की लहरि चमंकि ।
भेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरंकि ।।
~ संत कबीर

प्रश्न: हमारी उम्मीदें क्यों कभी पूरी नहीं होतीं?

वक्ता: आपकी उम्मीदें कभी पूरी नहीं होंगी। संसार से हमारी जो भी उम्मीदें हैं, वो अंततः यही उम्मीद है कि हम तर जाएँगे। हमें लगता है हमें चरमसुख मिल जाएगा चीज़ों से। वो हो नहीं सकता, पर अभिलाषा हमारी यही है कि हम ‘परम’ को, पदार्थ के माध्यम से पा लें। अभिलाषा हमारी ये है कि हम परम को पदार्थ के माध्यम से पा लें। नई कार खरीदें और उससे हमको मोक्ष-तुल्य आनंद मिल जाए।

आप नया मकान, नई कार जो खरीदते हो, आप कार नहीं खरीदते हो, आप मोक्ष खरीदना चाहते हो। ये जो इतना उपभोक्तावाद है, तुम्हें क्या लगता है, तुम नई शर्ट, नई बाइक खरीदते हो? तुम उसके माध्यम से मुक्ति खरीदना चाहते हो। कबीर कह रहे हैं, “ये उम्मीद कभी पूरी नहीं हो पाएगी। ये उम्मीद छोड़ दो।” माया के माध्यम से हरि को नहीं पाया जा सकता, उसको तो सीधे ही पाना पड़ेगा। सीधा रास्ता ही काम आएगा।

ठीक बात है। कार में भी वही है और कूड़े में भी वही है, पर कूड़े में लिप्त होकर के तुम ‘उसको’ नहीं पाओगे। आप इस बात को समझते हैं अच्छे से कि हर इच्छा है ‘उसी’ की इच्छा? आप जब प्रेम करते हो, तो आपको पत्नी नहीं चाहिए होती है, हर प्रेमी ने कभी किसी और को प्रेम नहीं किया है, ‘उसी’ को प्रेम किया है। चाहिए उसको ‘वही’ है, और इसीलिए हर प्रेम असफल हो जाता है।

क्योंकि आपकी जो इच्छा है, वो कभी पूरी हो ही नहीं सकती। आपको चाहिए ‘परम’, वो कभी परम का विकल्प नहीं बन सकती है ना।  पुरुष स्त्री में परम को तलाशता है, स्त्री पुरुष में परम को तलाशती है, वो कभी मिलेगा नहीं, तो इसीलिए आपके हाथ सिर्फ़ धूल लगती है। और कुछ ही समय बाद आप बड़े हताश हो जाते हो। आप कहते हो, “गड़बड़ हो गई, चूक हो गई,” पर आँखें तब भी नहीं खुलतीं। आप तब भी आप ये नहीं कहते कि, “परम को सीधे ही पाना पड़ेगा, माया के माध्यम से नहीं पा सकते।”

तब आप कहते हो, “अभी चूक हो गई, कोई बात नहीं, उम्मीद बाकी है। अब मैं ज़रा दूसरी औरत पर कोशिश करके देख लेता हूँ।मेरी उम्मीद ठीक थी, ये औरत गलत निकली, मैंने औरत गलत पकड़ ली। ” अरे तुम कोई भी औरत पकड़ो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। तुम एक नहीं, पाँच शादियाँ कर लो, हर शादी में तुम्हें निराशा ही मिलनी है, क्योंकि तुम्हारी उम्मीद ही मूलतः गलत है।

समझ रहे हो बात को?

Desireइसीलिए इच्छा का कोई अंत नहीं होता। बात समझ में आ रही है कि इच्छा का अंत क्यों नहीं होता? क्योंकि इच्छा जिसको तलाश रही है, वो कभी इच्छा के माध्यम से मिल ही नहीं सकता हर इच्छा उसी ‘परम’ को तलाश रही है, और वो इच्छा के माध्यम से मिलेगा नहीं। क्योंकि इच्छा कहती है, “मुझमें कोई अपूर्णता है,” और परम उनको कभी मिलता ही नहीं जो कहते हैं, “मैं अपूर्ण हूँ।”

आप ये शॉपिंग मॉल में जिन लोगों को देखते हैं, ये लोग कौन हैं? ये सब भक्त हैं। ये परम को तलाश रहे हैं माइक्रोवेव ओवन में।ये अपनी तरफ़ से शॉपिंग मॉल नहीं आए हैं, ये मंदिर आए हैं। वहाँ आप जो भी सुन रहे हो, उसको आप उनका घंटा-घड़ियाल ही समझियेगा। वो सब वहाँ देवी-देवताओं को पूज रहे हैं। जितने वहाँ पदार्थ रखे हों, या कपड़े रखे हों, चाहे जो भी रखा हो, वो उनके माध्यम से परमसुख की तलाश में हैं, कि, “हमें परमसुख मिल जाएगा, अगर हम क्या ख़रीद लेंगे?” दो नई जीन्स। मुक्ति मिल जाएगी।” एक नया घर, और एक पर एक मुफ़्त।

तो ये सब भक्त लोग हैं, शॉपिंग मॉल को इन्होंने मंदिर का विकल्प बनाया है। मंदिर में जिसलिए जाया जाता है, ठीक उसी उद्देश्य से शॉपिंग मॉल में आए हैं। अपने आंतरिक ख़ालीपन को भरने के लिए। पर वो इतना बड़ा ख़ालीपन है, कि उसे ‘परम’ के अलावा और कोई भर ही नहीं सकता।

उसमें तुम दस पिज़्ज़ा डालो, पिज़्ज़ा ग़ायब हो जाएगा, खाते रहो। उसमें तुम कुछ भी डाल लो, वो उसको भर नहीं सकता।  आ रही है बात समझ में? जिनको चीज़ें खरीदने में बड़ी उत्सुकता रहती हो, वो ये बात अच्छे से समझ लें कि आपके भीतर एक गहरी आध्यात्मिक पुकार है, और वो शॉपिंग मॉल में पूरी नहीं होगी। जिन्हें चीज़ें खरीदने में बहुत रूचि हो, कहते हैं ना उनको हम, ‘शॉपिंग एनिमल’?

श्रोता १: शॉपोहौलिक।

वक्ता: शॉपोहौलिक। ये उनकी बड़ी गहरी आध्यात्मिक पुकार है।

इसी तरीके से, जिन लोगों की शराब पीने में बहुत रूचि रहती हो, उनकी भी ये बड़ी गहरी पुकार है कि किसी तरीके से विचार से मुक्ति मिले। आ रही है बात समझ में? जो कुछ भी आपको बहुत आकर्षित करता है, वो गहराई में आपके एक ही सूनेपन की ओर इशारा करता है ।

भाग तो आप रहे ही हैं, बस पलट, दिशा बदलिये।

~ ‘शब्द-योग सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं ।

सत्र देखें: Prashant Tripathi on Kabir: इच्छा जिसे तलाश रही है वो इच्छा द्वारा मिल ही नहीं सकता

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: वहीँ मिलेगा प्रेम

लेख २: हमारा जीवन मात्र वृत्तियों की अभिव्यक्ति

लेख ३: सत्य से सदा बचने की दौड़

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय भानु जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

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      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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