जो तुम्हारे विचार हैं वही तुम हो

वक्ता: “चित्तं मन्त्रः” – चित्त और कुछ नहीं है दोहराव के अलावा।

‘मन्त्र’ माने वो जो दोहराया जाए। चित्त और कुछ नहीं है दोहराव के अलावा, और जो कुछ भी आप लगातार दोहराते आए हैं, वही चित्त बन जाता है। जो कुछ भी जीवन में लगातार पुनरुक्त होता रहा है, वही चित्त बन जाता है। चित्त और कुछ नहीं है।

जो ही लगातार होता रहा है, वो ही हम हो जाते हैं। इसी कारण बुद्ध ने कहा था कि तुम कुछ और हो ही नहीं अपने विचारों के अलावा। वो कहते थे कि तुम अपने विचार को बदलो, तुम भी बदल जाओगे। अब ये बात बड़ी अजीब है। लोग सुनकर कहते हैं, “एक ओर तो मैं वो हूँ जो नित्य है, जो बदल ही नहीं सकता, शाश्वत है। और बुद्ध इसकी बिल्कुल विपरीत बात कह जाते हैं, कहते हैं कि तुम अपने विचार हो, विचार बदलो तुम बदल जाओगे।”

बुद्ध यही कह रहे हैं कि – “चित्त मन्त्र है।” तुम वही हो जिसको तुमने बार-बार दोहराया है। बार-बार, बार-बार दोहराया है कि तुम ज्ञानी हो, तो ठीक। जो तुम मन्त्र की तरह दोहराते हो, वैसे ही हो जाते हो। वही जीवन हो जाता है तुम्हारा। उसके आगे जो है – बियॉन्ड, ट्रान्सेंडैंटल (परलोक) उसकी तो तुम्हें वैसे भी कोई खबर नहीं, तो उसकी तो बात ही नहीं करेंगे। बुद्ध इसलिए बियॉन्ड की बात ही नहीं करते। कहते हैं, “क्या ये हिपोक्रिसी (पाखण्ड) – “ट्रान्सेंडैंटल, परलोक। सीधे ‘अभी’ की बात करो, जो सामने है, और कुछ हम जानते ही नहीं।” जिस भी चीज़ को बार-बार मन में दोहराओगे, वैसे ही हो जाओगे।

श्रोता १: सर, पतंजलि भी चित्त वृत्ति की बात करते हैं।

वक्ता: हाँ, हाँ।

श्रोता २: सर, वो लोग जो बार-बार “राम-राम”, करते रहते हैं वो क्या वैसे ही हो जाते हैं?

वक्ता: वो रेपिटिशन (दोहराव) है। राम कैसे होंगे? ‘राम’ को जानते हैं क्या वो? ‘राम’ तो नहीं जानते, तो वो दोहरा रहे हैं, तो क्या कर रहे हैं? वो सिर्फ़ रेपिटिशन  हो जाते हैं। जो बार-बार “राम-राम” करेगा, तो वो क्या हो जाएगा?

श्रोता ३: मरा, मरा, मरा।

वक्ता: वो रेपिटिशन (दोहराव) बन जाएगा।

कबीर भी ‘राम’ की बात करते थे लगातार, और दिन-रात ‘राम’ ही ‘राम’ करते थे। यही करते थे कबीर? कबीर ‘राम’ से ज़्यादा किसी का नाम नहीं लेते थे, पर कबीर का ‘राम’ बन जाना बिल्कुल दूसरी घटना है। क्योंकि कबीर जब ‘राम’ कह रहे हैं, तो वो उनके आत्म-ज्ञान से निकला है। वो दोहरा भर नहीं रहे हैं। वो सुमिरन है, वो सुरति है, वो मन्त्र नहीं है।

कबीर का मन्त्र कबीर के लिए मन्त्र नहीं है। कबीर तो ‘राम’ से लड़ाई भी कर लेते हैं। कबीर ‘राम’ को मन्त्र की तरह नहीं इस्तेमाल कर रहे। किसी ने कबीर से कहा था कि ये मंदिर है, बड़ा मान्य है, सब जाते हैं, पूजा करते हैं, तुम भी जाओ। मंदिर में परिक्रमा की जाती है कई बार, तुम भी जाओ घूमो, परिक्रमा करो। कबीर बोलते हैं, “उठूँ-बैठूँ परिक्रमा।” बोलते हैं, “तुम जाओ, तुम्हें ज़रुरत है। हम उठते-बैठते हैं, यही हमारी परिक्रमा है। हम जो कर रहे हैं ‘वही’ है।”

वक्ता: ‘राम’ कोई मन्त्र नहीं हो सकते। ‘राम’ कोई मन्त्र नहीं हो सकते।

श्रोता ५: सर, जो यहाँ पर ‘मन्त्र’ का मतलब निकाला जा रहा है वो मेरे हिसाब से ये है कि – “चित्तं मन्त्रः”- मतलब माइंड इज़ नथिंग बट रेपिटिशन (मन दोहराव के अलावा कुछ नहीं है)।

वक्ता: माइंड इज़ नथिंग बट रेपिटिशन 

श्रोता ५: ये वो मन्त्र नहीं है जो हम समझ रहे हैं?

वक्ता: ये वही मन्त्र है। हर मन्त्र दोहराने के लिए ही तो दिया जाता है। मन्त्र का और क्या करते हो? जाप ही तो करते हो। मन्त्र का जाप ही तो करते हो। मन्त्र का जाप ही तो करते हो। इसी को देखने का दूसरा तरीका भी है। वो ये है कि मन्त्र को एक तो दोहराव के तरीके से देख सकते हो, दूसरा उपाय के तरीके से देख सकते हो।

वो पूछते हैं न कई बार कि वाट इज़ योर सक्सेस मंत्र (तुम्हारा सफलता मन्त्र क्या है)? कैसे किया, द मेथड(उपाय)? तो सारे उपाय चित्त से ही निकलते हैं। सारे उपाय, तुम्हारी हर हरकत, वो चित्त से ही निकलती है। अब वो बात भी दो तरीके से जाती है।चित्त अगर उल्टा-पुल्टा है, तो उपाय भी उल्टे-पुल्टे होंगे। और चित्त अगर ठीक है, तो उपाय भी सारे ठीक होंगे।

श्रोता ६: सर, एक दो महीने पहले बात हुई थी कि ध्यान की स्थिति के तीन डोमेन्स(ज्ञानक्षेत्र) हैं। तो पहला था – द रेपिटिशन

वक्ता: ये वो वाला रेपिटिशन नहीं है। ये सुमिरन वाला है। ये वो वाला रेपिटीशन नहीं है। देखो रेपिटीशन दो तरीके से होता है।पंखा क्या कर रहा है दिन-रात? रिपीट कर रहा है न? रिपीट कर रहा है कि नहीं कर रहा है। और हम क्या कर रहे हैं तीन साल से हर रविवार को? क्या कर रहे हैं? नौ बजे आते हैं, ग्यारह बजे चना खाते हैं, एक बजे घर चले जाते हैं। क्या कर रहे हैं? अंतर समझ में आ रहा है दोनों रेपिटीशन में? नहीं समझ में आ रहा?

श्रोता ७: सर, वो आने और जाने के बीच में कुछ लेकर जाते हैं।

वक्ता: रिपीट  ही तो कर रहे हैं। यहीं तो बैठते हैं।

श्रोता ४: पर हर बार हमें यहाँ कुछ नया मिलता है।

वक्ता: ये भी हर बार जब चलता है, तो यहाँ कुछ नए लोग बैठे होते हैं, कुछ नया डिस्कशन (चर्चा) हो रहा होता है।

श्रोता ५: (पंखे से तुलना करते हुए) सर, वो थोड़ी न बदल रहा है। वो तो वही कर रहा है जो कर रहा था।

वक्ता: बस तो ठीक है।

श्रोता ८: उसमें चेतना नहीं है। इसमें हमारी चेतना में विकास हो रहा है।

वक्ता: पर रेपिटिशन  ही है। जिस हद तक वहाँ रेपिटिशन है, उस हद तक यहाँ भी है। वैसे तो वहाँ भी फ्लकचुएशन (बदलाव) है। कभी दो सौ अढ़तीस वोल्ट आता होगा, कभी दो सौ साठ वोल्ट आ जाता होगा। थोड़ा-बहुत तो बदलाव उधर भी हो रहा है। पर जितना रेपिटिशन नीचे है, उतना तो ऊपर भी है। वहाँ भी है। इन दोनों रेपिटिशंस में कुछ अंतर है न। क्या अंतर है? क्या अंतर है?

श्रोता ८: चित्त का बदलाव है। कुछ सीख कर जा रहे हैं।

वक्ता: वो कब आएगा?

श्रोता ८: वो निरंतर हो रहा है।

वक्ता: उसके (पंखे के) रेपिटिशन में उसका कुछ नहीं। एक रेपिटीशन ऐसा भी हो सकता है जिसमे मैं सतर्क हो कर, जागरूक हो कर अपने ही जालों को काटने की कोशिश कर रहा हूँ। वो कोशिश भी निरंतर है, इसी कारण रेपिटिटिव (पुनरावृत्ति) लगती है। ठीक वैसे ही जैसे कोई रोज़ सफाई कर, तो सफाई रेपिटिशन है, पर वो सफ़ाई भी रोज़ चाहिए क्योंकि धूल भी रोज़ जम रही है।

और वो अंधी सफ़ाई नहीं है, कि अँधा होकर झाड़ू लेकर कुछ इधर-उधर कर दिया। जहाँ गन्दा है, वहाँ साफ़ कर रहे हैं। उस सफ़ाई में एक चेतना है, जानने का भाव है। तो देखने में वो रेपिटिशन ही लगेगा, पर है नहीं, कुछ और ही चल रहा है। दिखने में एक-सी ही बात लगेगी, पर है नहीं।

श्रोता ३: तो ऐसा कह सकते हैं कि एक गति उस कक्ष के भीतर ही है, पर वो और ज़्यादा अंदर कक्ष में जा रही है। एक दूसरी गति हो सकती है जो कक्ष से बाहर जाने के लिए दरवाज़े की ओर जाए।

वक्ता: जो भी होगा हमेशा मन के भीतर ही तो होगा न? चित्त मन्त्र। जो भी होगा हमेशा मन के भीतर ही होगा। मन ही तो आपका दोस्त है, और मन ही तो आपका दुश्मन भी है। लेकिन जो होगा, वो मन में ही होगा। चाहे दोस्ती कर लीजिये, चाहे दुश्मनी कर लीजिये।

श्रोता ९: सर वो ‘लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन‘ (आकर्षण का नियम) वाला जो सिद्धांत था कि आप किसी चीज़ को बार-बार लेकर आओगे, तो वो अपनी तरफ आकर्षित हो जाएगा।

वक्ता: हाँ, वो है, बिल्कुल है।

आप जिस चीज़ का बार-बार विचार करोगे, किसी न किसी रूप में आप उसको जीवन में आमंत्रित कर लोगे। ये बात पक्की है।

श्रोता ४: किसी चीज़ का विचार करना उस चीज़ से संयुक्त होना ही तो है सर?

वक्ता: हाँ, पर उसमें ध्यान नहीं है।

आप जो भी बार-बार सोचोगे, ये बात बिलकुल ठीक है, कि आप जिस भी चीज़ का बार-बार विचार करोगे, वो किसी न किसी रूप में आपके जीवन में आ जाएगी। इसका अर्थ ये बिल्कुल भी नहीं है कि जिस चीज़ की बार-बार इच्छा करो, कामना करो, वो मिल जाएगी। कुछ और कहा जा रहा है यहाँ पर।

‘लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन’ ये नहीं है कि दिन-रात बैठ कर आप ध्यान करो कि दो करोड़ मिल गया, तो एक दिन अचानक दो करोड़ आकर्षित होकर के आपके पास खिंचा चला आएगा। इसका अर्थ कुछ और है कि – अगर आप दिन-रात रूपये-पैसे का ख्याल कर रहे हो, तो पक्का है आपका जीवन लालच से सड़ेगा।‘लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन’ का ये मतलब है कि अब आपकी हर गतिविधि ऐसी ही हो जाएगी जिसमें लालच बैठा होगा।

‘लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन‘ का ये मतलब नहीं है कि मुझे कोई लड़की पसंद आ गई है और दिन-रात बैठ कर उसका नाम जपता हूँ, तो एक दिन वो आकर मेरे सामने खड़ी हो जाएगी। इसका यही अर्थ है कि तुमने अब दिमाग में बीमारी पाल ली है, तो जीवन अब बीमार होगा।

यू हैव अट्रैकटेड डिज़ीज़ यू हैव अट्रैकटेड डिज़ीज़ (तुमने बीमारी को आकर्षित कर लिया है)

~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi: जो तुम्हारे विचार हैं वही तुम हो (You are your thoughts)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: ‘यहाँ’ से बेहतर कोई जगह नहीं

लेख २: माध्यम मंज़िल नहीं

लेख ३: उचित विचार कौन सा?

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