ज्ञान इकट्ठा करके नहीं जान पाओगे

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पढ़ा सुना सीखा सभी, मिटी न संशय शूल।

कहे कबीर कैसो कहूँ, यह सब दुःख का मूल।।

~ कबीर

वक्ता: पढ़ने, सुनने, सीखने, के बाद भी एक संशय बच जाता है। एक ही संशय होता है। और वह संशय सदा यही होता है कि “क्या यह मेरे लिए ठीक है? हाँ, ठीक! कबीर ने कुछ कह दिया, नानक ने कुछ कह दिया, अष्टावक्र ने कुछ कह दिया, जीसस ने कुछ कह दिया, उन्होंने कह दिया! मेरे लिए ठीक है क्या?”

पूरे तरीके से हमें यह पक्का नहीं होता कि “हाँ! यही ठीक है। पढ़ लिया, बाहर से कुछ ज्ञान आ गया, सुन लिया, बाहर से कुछ ज्ञान आ गया, सीख लिया, कोई विधि, कोई कला जान ली। लेकिन मूल संशय अभी भी बाकि है कि यह सब जो जाना है, मेरे लिए ठीक है क्या?”

कबीर कह रहे हैं “यही सब दुःख का मूल है, यह जो संशय, शूल, चुभा हुआ है, निकल नहीं रहा है। यही दुःख का मूल है। यह शूल चुभा ही रहेगा, हम सब के मन में चुभा हुआ है; जिसने भी ज्ञान अर्जित करना चाहा है उसे यह शूल चुभा ही रहेगा।

क्या कहता है वह संशय, हम दोहराएंगे – संशय कहता है “यह सब जो जाना है सुनने में अच्छा है, किस्से कहानी के तौर पर अच्छा है, ज्ञान के तौर पर अच्छा है, पर मेरे लिए ठीक है? मेरा कोई नुकसान तो नहीं हो जाएगा इससे? इस रास्ते चलूं कि न चलूं? हाँ ठीक है, ज्ञान ले लिया कि यह रास्ता कैसा है, पर इस पर चलूं कि न चलूं?” असल में आपको जो संशय है वह बिल्कुल ठीक है।

आपका संशय यही है “मेरे लिए ठीक है कि नहीं? मेरा कोई नुकसान तो नहीं कर देगा?” नुकसान बिल्कुल कर देगा, बहुत नुकसान कर देगा। आपने गलत नहीं पकड़ा है, बात आपके सामने खुल गयी है, आप जान गए हैं, आपको पता चल गया है कि नुकसान होगा। यही कारण है कि शास्त्रों और धर्म ग्रंथो का सेवन निषिद्ध था कुछ खास परिस्थितियों के बगैर।

शास्त्र स्वयं बताते थे कि किसकी क्या पात्रता हो इसको पढ़ने से पहले। कई मौकों पर शास्त्र स्वयं ही निर्धारित कर देते थे कि बिना गुरु के इस ग्रंथ को न पढ़ लेना। क्योंकि ज्ञान औषधि है, विधि है, तरीका है, एक तरीके का बाण है, अगर वह खाली चला गया तो अब आपके लिए कोई संभावना शेष नहीं रह जाती; ब्रह्मास्त्र है वो। अब आपको कौन बचाएगा अगर कृष्ण और अष्टावक्र और कबीर भी आपको न बचा पाए? अब आपके लिए क्या उम्मीद बची?

तो इसी कारण, कहने वालों ने अक्सर यह कहा कि इस ब्रह्मास्त्र को व्यर्थ मत जाने देना, इस दवाई को यूँ ही मत खा लेना। बिल्कुल उचित स्थितियाँ हों तभी इनका पान करो, क्योंकि अगर तुमने पान किया और उसके बाद भी संशय शूल बचा रह गया तो इस जन्म में तुम्हारे लिए कोई आशा नहीं। अब तो गए तुम। ब्रह्मास्त्र भी निष्फल हो गया तुम्हारे ऊपर, अब गए। जब तक तुम यूँ ही भटक रहे हो दुनिया में, तब तक कम से कम यह कहा तो जा सकता है न कि “अभी तक तो बिचारे का आध्यात्मिकता से कोई परिचय ही नहीं हुआ”। पर जिसका पूरा परिचय कराया जा चुका और उसके बाद भी उसके जीवन में कोई क्रांति नहीं हुई, अब उसके लिए क्या बचा?

ग्रंथो में मात्र तब उतरना चाहिए, जब पहले ही अपनी आदतों, अपने ढर्रों, अपने मन के व्यसनों, अपने मन के तमाम संस्कारों, और अपने जीवन के तरीकों के प्रति गहरी जुगुप्सा जग गयी हो। जब सब कुछ “छी!” जैसा दिखाई देता हो तब, और जब साथ ही साथ अपने जीवन से अतीत, इन ढर्रों से बहुत आगे किसी की आहटें सुनाई देने लग गयी हों। जब आप बिल्कुल क्रांति के द्वार पर खड़े हों, तब ग्रंथो में प्रवेश करना चाहिए।

संशय ले कर ग्रंथ में प्रवेश करेंगे तो कुछ न मिलेगा क्योंकि कोई भी ग्रंथ वह आतंरिक संशय नहीं हटा सकता। वह आतंरिक संशय बस यही कहता है कि “कहीं मेरा नुकसान तो नहीं होगा?” दूसरे शब्दों में वह यह कहता है कि “अहंकार साबुत बचेगा या नहीं?” जब आप यह उद्देश्य ले कर ही ग्रंथ के पास आए हैं कि मुझे अपने अहंकार को और अपने जीवन को बचा कर रखना है तो ग्रंथ आप पर निष्फल जाएगा। आपको ग्रंथ का सेवन करना ही तब चाहिए, उसकी शरण में आना ही तब चाहिए जब पहले आप यह जान चुके हों कि “मेरे पास जो कुछ है वह तो बहुत घटिया है, सढ़ चुका है और दुर्गन्ध आती है उसमें से। मुझे अपने पुराने रास्तों पर तो चलना ही नहीं है। हाँ, नया रास्ता है ज़रूर, नए रास्ते की पुकार सुनाई पड़ती है।

उस नए रास्ते को और साफ़-साफ़ देख पाने के लिए आते हैं आप ग्रंथो के पास। जो अभी पुराने से चिपका हुआ हो वह यदि ग्रंथ के पास आएगा तो उसको कोई मदद नहीं मिल सकती। ग्रंथ के पास वही आए, मैं दोहरा रहा हूँ, जिसने पहले यह तय कर लिया हो, जिसे स्पष्ट दिख गया हो कि पुराना व्यर्थ है। जिसका अभी पुराने से मोह है, ग्रंथ उसको काम नहीं आएंगे। जिसको अभी अपनी ज़िन्दगी के ढ़र्रों में ही बड़ा रस है। जिसको अभी सुख के प्याले छक कर पीने हैं। जिसको अभी कामना और वासना खूब आमंत्रित करती हैं, वह यदि ग्रंथो के पास आएगा भी, खूब पढ़ लेगा, खूब रट लेगा, लेकिन कुछ पाएगा नहीं। क्रान्ति नहीं होगी।

समझ रहे हो?

किसी ने कहा है कि ग्रंथ सिर्फ गवाही देते हैं। आप जब ग्रंथो के पास आओगे न, तो ग्रंथ आपसे बस इतना कहते हैं कि “हाँ, तुम्हें जो उस अज्ञेय की पुकार सुनाई दे रही है, वह मन का भ्रम ही नहीं है। हमने भी सुनी थी।” तुम्हें एक तरीके का सहारा मिलता है। तुम्हारे आत्म-बल में वृद्धि होती है। रूमी तुम से कह देते हैं कि प्रेम में जैसा तुम्हें प्रतीत हो रहा है, तुम पहले नहीं हो, हमे भी हुआ था। ऐसा नहीं है कि रूमी तुम्हें न बताएं तो तुम्हें पता नहीं चलेगा। तुम्हें पहले से ही पता चल रहा है, रूमी सिर्फ गवाही देने आए हैं। तुम्हें अच्छा लगता है, जैसे कोई मित्र मिल गया हो, तुम्हें अच्छा लगता है जैसे कोई हमसफ़र मिल गया हो, कि “जिस राह पर मैं चल रहा हूँ, इसी पर रूमी भी चले थे, चल रहे हैं”। बस इतना सा महत्व है ग्रंथो का और कुछ नहीं।

जो राह पर चलना ही न चाहता हो, उसके लिए रूमी किसी काम के नहीं। जिसको अपने घर की चार दीवारों में ही बहुत सुकून मिलता हो, वह दुनिया भर का मान चित्र ले कर बैठा है ‘वर्ल्ड मैप’, तो उसे क्या मिल जाएगा उस मैप से? “आप कह रहे हो ठण्ड बहुत है और यहाँ बड़ा सुकून है, गरमा गर्म।” और हाथ में क्या है आपके? पूरे ब्रह्माण्ड का मान चित्र है। “यहाँ यह है, यहाँ यह है। उधर सत्य के द्वार हैं। आकाश गंगाओं के पार मुक्ति की उड़ान है।” और तय क्या कर रखा है? कि बैठना इसी चार दीवारी में है, और हाथ में ले के बैठे हुए हो दुनिया का नक्षा। काहे हो? काहे को? उस नक्षे पर खूब सुन्दर-सुन्दर चित्र बने हों, मान लो वह नक्षा पूरी बड़ी भारी एक पुस्तक ही हो। वह सिर्फ राह ही न दिखाता हो यह भी बताता हो कि वहाँ क्या-क्या मिलेगा। विविध तरीके से विवरण दिए हों। सारे चित्र सजीव कर दिए हों। लेकिन तुम्हारा मन कहाँ अटका हुआ है? चार दीवारों में। तो यह संशय तो लगातार रहे ही जाएगा न; क्या? “मेरी यह दीवारें मिलेंगी मुझे वहाँ या नहीं मिलेंगी, मुझे तो इन्हीं से प्यार है।” तुम्हारा संशय ठीक है, यह दीवारें नहीं मिलेंगी।

मुक्ति की उड़ान में तुम्हारी दीवारों के लिए कोई जगह नहीं।

कोई जगह नहीं। तुमने ठीक ही पकड़ा। मैं फिर कह रहा हूँ, लक्ष्य सिर्फ उसके काम आते हैं जो पहले घर से बाहर निकल चुका हो। जो अभी घर से बाहर नहीं निकले हैं और न निकलने का इरादा रखते हैं, वह कृपा करके नक्षे बार-बार न पढ़ें। जी.पी.एस. (भूमंडलीय स्थिति निर्धारण प्रणाली) कार में लगा होता है, तुम्हारे बिस्तरों में नहीं! कि लेटे बिस्तर पर हो और वहाँ पर देख रहे हो कि कौनसी चीज़ कितनी दूर है। तुम्हारा इरादा है पहुँचने का?

आने का इरादा हो, उड़ने का इरादा हो, तो कबीर के पास जाओ, कबीर सब बताएंगे। कबीर कहते हैं “हम नाम ही नहीं बताते, हम गाँव दिखाते हैं। हम यह ही नहीं कहते कि वहाँ पर जा कर मुक्ति मिलेगी, अरे हम ले कर जाएंगे वहाँ तक।” पर कबीर क्या ज़बरदस्ती ले कर जाएं?

क्या ज़बरदस्ती ले कर जाएं?


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi : ज्ञान इकट्ठा करके नहीं जान पाओगे (You will not know through knowledge)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: समझ और ज्ञान में अन्तर

लेख २: आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान

लेख ३: आत्म- विचार से आत्म-बोध तक

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय मोहित जी,

      यह वेबसाइट प्रशान्त अद्वैत फाउन्डेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित है एवं यह उत्तर भी उन्हीं से आ रहा है।

      बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से, लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है, आचार्य जी के सम्मुख होकर, उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
      इस अद्भुत अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
      सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर:
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर, आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। निःसंदेह यह शिविर खुद को जानने का सुनहरा अवसर है।

      ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित 31 बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
      इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
      श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
      सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
      श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।

      सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें:
      सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      Like

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