तुम्हारी और संसार की प्रकृति है अनित्यता

श्री प्रशांत: कम्युनिकेशन  (संचार) की ज़रुरत हमेशा से बरकरार रही है। टेलीग्राम (तार), वायरलेस फ़ोन, और जानकारी एक जगह से दूसरी जगह भेजने का, इन सबसे ज़्यादा सुविधाजनक तरीका तो इन्टरनेट  हो गया है।

बदला क्या है?

द नीड टू कम्यूनिकेट’ (संवाद करने की ज़रुरत) तो वही की वही है।

इन्टरनेट कम्युनिकेशन  के अलावा और क्या है?

श्रोता: पर व्यक्ति भी तो बदलता है समय के साथ।

वक्ता: कैसे? क्या बदल रहा है? एक आपका कंप्यूटर सिस्टम  होता है, ध्यान से देखिएगा इस बात को, उसमें एक हार्डवेयर है। उस हार्डवेयर के ऊपर एक परत बैठी होती है सॉफ्टवेयर  की, और उसमें एक मेमोरी  होती है, जो बहुत ही टेम्पररी मेमोरी होती है। और जो हार्डवेयर है वो पूरी तरह प्रोग्राम्ड है।

उस हार्डवेयर का नाम है ‘डर’ और ‘लालच’

उसके ऊपर सॉफ्टवेयर  है जो कि सेमी-परमानेंट है। आप रोज़ अपनी विंडोज़  नहीं बदलते, आप रोज़ माइक्रोसॉफ्ट-वर्ड  भी नहीं इनस्टॉल करते, आप रोज़ मूवी-मेकर  भी नहीं इनस्टॉल  करते। पर अगर चाहो तो अन-इनस्टॉल  कर सकते हो। कोशिश करोगे तो अन-इनस्टॉल  कर लोगे।

पर हार्डवेयर  तो आप चाहकर भी अन-इनस्टॉल  नहीं कर सकते। हार्डवेयर के ऊपर है सॉफ्टवेयर, जो अर्द्ध-स्थायी है और उसका नाम है समाज और उस सॉफ्टवेयर  के ऊपर भी वो है जिसको आप बोलते हो कैशे-मेमोरी । जो दो-चार दिन रहती है या ज़्यादा-से-ज़्यादा दस-बीस दिन रहती है। जो बिल्कुल ही अस्थायी मेमोरी है, वो हैं आपके रोज़ के प्रभाव, रोज़ के चलन। अब इसमें आप देख लीजिये कि इसे परमानेंट (स्थायी) बोलना चाहते हो या इसे टेम्पररी (अस्थायी) बोलना चाहते हो। दोनों ही बोल सकते हो!

जहाँ तक मन के मूलभूत बनावट की बात है, तो वो तो परमानेंट है। डर  और लालच उसके हार्डवेयर  हैं। उसके ऊपर बैठता है समाज, और उसके ऊपर बैठते हैं ये रोज़मर्रा के अनुभव – “आज क्या हुआ, आज की मेरी क्या कार्यसूची  है, आज सुबह-सुबह मुझे किसी ने क्या बोल दिया”। तो बहुत कुछ है जो वहाँ स्थायी है, जो कभी नहीं बदल रहा। कोई कलयुग की बात कर रहा था। कलयुग हो, सतयुग हो, कोई युग हो, वो हार्डवेयर  नहीं बदल रहा। डर और लालच ही प्रेरणा हैं और वो लगातार बने हुए हैं।

डर और लालच स्थायी हैं, और फिर बहुत कुछ है जो अस्थायी भी है। आपके एक कंप्यूटर में लगातार कितना ही एम.बी.पी.एस . डाटा  आ रहा है, पर जिसमें आ रहा है, वो स्थायी है। अब आप कहना चाहो तो यह भी कह सकते हो कि इसमें सब क्षणिक है, क्योंकि इतनी सारी बिट्स  इसमें प्रत्येक क्षण आ रही हैं। पाँच एम.बी.पी.एस. लगातार उसमें आ रहा है, तो कहने वाला कहेगा कि इसमें सब क्षणिक है। दूसरा, दूसरी दृष्टि से देखकर कहेगा कि देखो न जो इसका हार्डवेयर  है कितना स्थायी है, कुछ बदल कहाँ रहा है। ये कंप्यूटर कभी अपनी प्रोग्रामिंग  के बाहर नहीं जा सकता, कभी नहीं।

जो पूरी तस्वीर इससे बाहर निकलकर आ रही है। वो यही है कि यह सारा खेल प्रोग्राम्ड  है, पूरी प्रकृति है। प्रकृति में कुछ स्थायी भी है, कुछ अस्थायी भी है। सिर्फ़ इसलिए कि कुछ स्थायी लग रहा है तो इसका मतलब वो प्रकृति से बाहर नहीं है, वो भी प्रकृति ही है।

ध्यान से देखेंगे तो प्रकृति में जो कुछ है, वो सब समय का गुलाम है। हार्डवेयर भी एक दिन मिट जाना है। अधिक-से-अधिक फ़र्क इस बात से पड़ सकता है कि आप किस टाइमस्केल  (कालक्रम) पर देख रहे हो। आप बहुत छोटी टाइमस्केल पर देख रहे हो तो आपको ऐसा कुछ स्थायी लग सकता है। पर अगर आप बड़ी लम्बी-चौड़ी टाइमस्केल  पर देखोगे तो आपको यही दिखाई देगा कि कुछ भी स्थायी नहीं है। कुछ भी नहीं।


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi:तुम्हारी और संसार की प्रकृति है अनित्यता(Your and world’s nature is impermanence)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: संसारी कौन? जो संसार से पूर्णतया अज्ञानी हो

लेख २: समाज नहीं,सामाजिकता है रोग

लेख ३: सत्य और संसार दो नहीं

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय गरिमा जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

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      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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