अलग-अलग संस्कार ही अलग-अलग व्यक्ति बनते हैं

प्रश्न: सर, उदाहरण के लिए दो व्यक्ति हैं, दोनों भाई हैं। एक इंजीनियर बनता है और दूसरा पढ़ा-लिखा नहीं है और ऑटोरिक्शा चलाता है। दोनों ही व्यक्ति एक ही घर में पैदा हुए, दोनों भाई हैं, माँ-बाप एक ही हैं। लेकिन एक इंजीनियर बन गया और एक नहीं बना। एक रिक्शा चला रहा है, एक गाड़ी चला रहा है। इसको क्या हम इस तरह कह सकते हैं कि जो इंजीनियर बना, वो ज़्यादा समाज से प्रभावित है इसलिए वो इंजीनियर बन गया, क्योंकि उसका अपना कुछ नहीं है, इसलिए वो इंजीनियर बना और दूसरा जो रिक्शा चला रहा है या जो बेरोज़गार है उसे समाज ने कम प्रभावित किया? क्योंकि दोनों जी रहे हैं, दोनों काम कर रहे हैं लेकिन दोनों की अवस्थाओं में अन्तर है।

श्री प्रशान्त: तुम सीधे-सीधे ये पूछ रहे हो कि संस्कार हमें किस हद तक प्रभावित करते हैं?

चलो, मैं तुम्हारे सवाल को और तीखा कर देता हूँ। दो जुड़वाँ भाई पैदा होते हैं। जुड़वाँ भी ज़्यादा हो गया, तो मान लो कि दो क्लोंड भाई पैदा होते हैं। जुड़वाँ तो फ़िर भी अलग-अलग हैं। क्लोंड, उनका डी.एन.ए. भी एक है। लिंग एक, घर एक, और पूरी उनकी जो परवरिश है वो भी एक-सी। उसके बाद भी यह पता चलता है कि एक डाकू बन गया और एक साधू। तो यह तर्क दे सकते हो तुम कि संस्कारों से कुछ नहीं होता, यह तो कुछ और ही है।

श्रोता १: पर दोनों की कोशिशों में अंतर रहा होगा।

वक्ता: कोशिश तो बहुत बाद में आती है। कोशिश से पहले आता है ‘कारण’। तुम कुछ भी कोशिश तभी करते हो जब उसके पीछे कोई कारण होता है। और कारण मतलब लालच। और तुम उसी चीज़ का लालच रखते हो जिसके लिए तुम्हें प्रेरित किया गया है। जिसके लिए तुम्हें कहा गया है कि यह लालच के योग्य है। वरना तुम लालच भी नहीं रखोगे उसका। अभी यहाँ बढ़िया, मस्त मटन रख दिया जाये तो यहाँ कई लोग हैं जिनको उसका लालच नहीं आयेगा और कई हैं जो टूट पड़ेंगे।

(सब हामी में सर हिलाते हैं)

तो तुम्हें लालच भी उसी चीज़ का उठता है जिसका तुम्हें संस्कार दिया गया है। तो तुम किसकी कोशिश कर रहे हो यह तुम्हारे संस्कारों पर निर्भर करता है। कहानी यहाँ से शुरू बिल्कुल भी नहीं होती कि एक मेहनत कर रहा है और दूसरा नहीं कर रहा। तुम बड़ी मेहनत कर सकते हो अगर अभी तुम्हें एक बड़े उपयुक्त तरीके से संस्कारित कर दिया जाये। बहुत मेहनत करोगे।

यह भी एक बहुत बड़ी भ्रान्ति है कि कुछ लोग मेहनती होते हैं और कुछ लोग आलसी। नहीं! जो मेहनती है वो दूसरी किसी दिशा में महा-आलसी बन जाएगा और जो आलसी है, उसको अगर उचित लालच दे दिया जाये तो वो महा-मेहनती बन जायेगा।

(सब हामी में सर हिलाते हैं)

श्रोता: सर, फ़िर अंतर कैसे और कब आ जाता है?

वक्ता: एक ने कोई पिक्चर देख ली थी जब वो तीसरी कक्षा में था। और वो बड़ी खतरनाक किस्म की पिक्चर थी। उससे उसकी धारा ज़रा-सी मुड़ गयी। जैसे पानी की दो धारायें जा रहीं हों। इधर भी वादी है और उधर भी वादी है। और दोनों जा रहीं हैं। उनमें से एक को बस ज़रा-सा मोड़ दिया जाये तो वो पहली वाले से बहुत दूर हो जायेगी। वो वादी में पहुँच जायेगी और ऐसा लगेगा कि वो कितनी अलग-अलग हो गयीं। एक ज़रा-सा धूल का कण आ गया था पहली वाली धारा के सामने, वो ज़रा-सी मुड़ी और पता नहीं कहाँ पहुँच गयी।

आप किन्हीं भी दो लोगों को बिल्कुल ही एक-सी परिस्थितियाँ नहीं दे पाओगे। बिल्कुल एक-सी, कभी भी नहीं दे पाओगे। मन ऐसा है कि बस ज़रा-सा उसे रास्ता मिले, वो उधर को ही बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है।


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi: अलग-अलग संस्कार ही अलग-अलग व्यक्ति बनते हैं(Different conditioning different men)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: तर्क निश्चित सिद्ध कर देंगे कि मेरे पास आना व्यर्थ है

लेख २: फ़ायदे का फ़ायदा क्या?

लेख ३: नींद से उठने में थोडा कष्ट तो होगा

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय गरिमा जी,

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      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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