तुम्हारी चालाकी ही तुम्हारा बंधन है; जो सरल है वो स्वतंत्र है

वक्ता: आयूष ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से मुझे लगातार असफ़लताएँ मिल रही हैं लेकिन उससे मुझपर कुछ ख़ास प्रभाव पड़ नहीं रहा है। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं इस खेल का हिस्सा हूँ ही नहीं। ऐसा क्यों हो रहा है?

आयूष, ऐसा नहीं है कि तुम पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ रहा है। थोड़ा प्रभाव तो पड़ रहा है इसी कारण यह सवाल पूछ रहे हो। भीतर से भले तुम्हें यह भाव ना उठता हो कि तुम असफ़ल हो गए, लेकिन निश्चित रूप से तुम्हारे बाहर, तुम्हारे चारों ओर ऐसी आवाज़ें हैं जो तुम्हें यह एहसास कराना चाहती हैं कि तुम असफल हुए। तुम्हें भले ना लगता हो कि कुछ गड़बड़ हो गई लेकिन और लोग हैं जो निश्चित रूप से तुमसे यह कह रहे हैं कि गड़बड़ हो रही है। क्या ऐसा है? और यही वजह है कि तुम सवाल पूछ रहे हो।जो असली है वो तुम्हारी मदद कर रहा है। तुम बड़े किस्मत वाले हो। वो तुम्हारे भीतर बैठा है और भीतर से तुमको निश्चिंत कर रहा है। निश्चिंत माने समझते हो? जिसको चिंता ना हो। वो तुम्हारे भीतर बैठा है और तुमको निश्चिंत कर रहा है कि क्यों नाहक परेशान होते हो, यह सफ़लता-असफ़लता कोई ख़ास अर्थ रखती नहीं है। वो तुमसे कह रहा है, “मस्त रहो, मग्न रहो।”

लेकिन उसके प्रति तुम्हारा समर्पण अभी पूरा नहीं है। इसी कारण तुम्हें उसकी आवाज़ के अलावा और भी आवाज़ें सुनाई दे रही हैं। और यह दूसरी आवाज़ें भीतर वाले से विपरीत बातें कर रही हैं। यह तुमसे कह रही हैं, “अरे, सफ़लता बड़ी बात है, असफ़लता बड़ी व्याधि है।” और तुम अगर इनसे पूछो कि सफ़लता-असफ़लता क्या? तो यह कहेंगी कि सफ़लता और असफ़लता को ‘हम’ परिभाषित करेंगे। ‘हम’ तुम्हें बताएँगे कि इस तरह की अगर घटना हो जाए तो उन्हें तुम सफ़लता कहना, यह घटनाएँ हो जाएँ तो उन्हें तुम असफ़लता कहना।

इन बाहर वालों का खेल समझो। यह पहले तो तुम्हें यह तय कर के दे देते हैं कि असफल किसको बोलते हैं और सफल किसको बोलते हैं; यह तय किसने किया, तुमने नहीं किया, उनहोंने तय किया। और उसके बाद यह तुमपर ठप्पा लगा देते हैं कि तुम सफल हो या असफल हो। इन दोनो बातों को मिलाओ, यह तय करते हैं कि सफल माने क्या, और फिर यह तय करते हैं कि सफल होना बड़ी बात, तुम्हें सफल होना ही पड़ेगा। इन दोनो बातों को मिलाओ तो तुम्हें दिखाई देगा कि यह तुमसे कह रहे हैं कि तुम हमारी गुलामी करो – “हमने तुम्हें बताया न कि उधर जाना सफ़लता का नाम है और हमने तुम्हें यह भी बताया कि अगर तुम सफल नहीं हुए तो तुम्हारा जीवन निरर्थक।”

इन दोनों बातों को मिलाओ तो क्या सामने आया कि यह तुमसे कह रहे हैं, उधर जाओ। सीधे-सीधे आदेश नहीं दे देते तो बात को इतना घुमा फिरा के कहते हैं क्योंकि अगर सीधे-सीधे आदेश दे देंगे तो हो सकता है तुम विद्रोह कर दो। अगर सीधे-सीधे आदेश ही दे देंगे तो यह खेल तुम्हारे सामने प्रकट हो जाएगा। तुम इनके झाँसे में नहीं आओगे इसीलिए इतना बड़ा स्वांग रचा जाता है। तुम्हारे मन में इस प्रकार के मूल्य स्थापित किये जाते हैं कि इस चीज को सफल मानना।

देखा है कभी यह तुमने कि तुमसे दो बातें हमेशा कही जाती हैं- सफ़लता क्या है, यह बाहर वाला आकर बताता है और यह बात भी बाहर वाला आकर बताता है कि सफल होना ज़रूरी है। एक बार यह दोनों बातें तुम्हारे मन में बैठा दी गईं, तो अब तो तुम उसी दिशा चलोगे न जिस दिशा तुम्हें यह बाहर वाले ले जाना चाहते हैं। इन बाहर वालों को बड़ी तकलीफ़ होती है जब किसी के भीतर से आवाज़ आनी शुरू हो जाती है। और मैं कह रहा हूँ कि बाहर वालों को जो असुविधा हो रही है वो तुम्हारा परम सौभाग्य है। बाहर वालों को जो तकलीफ़ हो रही है वो तुम्हारी बड़ी किस्मत है।

तुम बाहर की आवाज़ यदि कम सुन पा रहे हो तो यह प्रमाण है इस बात का कि कोई और आवाज़ है जो तुम्हें सुनाई देने लगी है और कोई और धुन है जिसपर अब तुम नाचना चाहते हो। वो बाहर की छिछोरी धुनों की तरह नहीं है। वो कोई बड़ी सूक्ष्म सी बात होती है, जैसे मौन का मधुर संगीत। बाहर वाले नहीं समझेंगे उसको। तुम्हें यह बिना मांगे मिला है। असल में यह मिलता ही बिना मांगे है। अनुकम्पा तुमपर यही है कि जो बिना मांगे मिलता है वो तुमसे अभी छिना नहीं है। उसका मिलना तुम अभी भूल नहीं गए हो।

अपने आप को ज़रा बचा के रखो। कहीं ऐसा न हो कि बाहर की आवाज़ें तुमपर इतनी हावी हो जाएँ कि तुम्हें वास्तव में लगने लगे कि तुममें कोई खोंट है। कोई दिन ऐसा ना आ जाए कि तुम भी यह कह दो कि मैं असफल हूँ क्योंकि ज़िन्दगी में मुझे सिर्फ़ असफ़लताएँ और ठोकरें मिली हैं। इतनी अगर तुमपर अनुकम्पा हो ही गयी है अस्तित्व की कि तुम्हें लगता है कि तुम इस खेल के हिस्से नहीं हो, तो इतना अब तुम अपनी ओर से करो कि खेल से बाहर ही हो जाओ।

देने वाला जितना दे सकता था उतना उसने तुम्हें दिया है, अब ज़रा कुछ तुम भी कर लो। तुम इन शब्दों को ही भूल जाओ – सफ़लता, असफ़लता। तुम इस खेल को ही अपने मन से निकाल दो। सफ़लता-असफ़लता क्या है? सफ़लता-असफ़लता कर्म के निर्धारक ही तो होते हैं न; कि काम ऐसे करो कि आगे सफल हो सको, काम ऐसे न करो कि आगे असफल हो जाओ।कर्मों का इससे कहीं ज़्यादा सुन्दर, कीमती और उचित निर्धारक होता है तुम्हारे भीतर बैठा परमात्मा। वो तुम्हें यह नहीं बताता कि तुम्हारी सफ़लता किस्में है और असफ़लता किस्में है। वो तो तुम्हें बस यह बताता है कि ‘करो’। वो तुम्हें कोई कारण नहीं देता कि इसलिए करो कि सफल हो जाओगे। वो तुम्हें कोई स्वार्थ नहीं देता कि करो तो यह पा लोगे। वो तुम्हें कोई भय भी नहीं देता कि करो नहीं तो यह खो दोगे। वहाँ से तो बस एक हलकी सी आवाज़ आती है, ‘करो’। उससे पूछना भी मत कि क्यों करें। वो जब कहे, ‘करो’, तो सर झुका देना।

तुम्हारे भीतर जो परम सत्ता बैठी हुई है उसकी ज़रा भी इच्छा नहीं है कि तुम सफल हो जाओ। कोई यह बिलकुल ना सोचे कि जिसे तुम परमात्मा कहते हो, वो तुम्हारी सफ़लता में सहयोगी हो सकता है।

परमात्मा तुम्हारी सफ़लता में बिलकुल भी सहयोगी नहीं हो सकता। क्योंकि जो तुम्हें सफल बनाना चाहते हैं वो तुम्हें असफ़लता के भय में धकेलते हैं।

परमात्मा भय नहीं देता, वो भय से मुक्ति देता है।

इसी कारण वो तुम्हें सफ़लता और असफ़लता दोनों से मुक्ति देता है।

वो तो तुमसे कहता है कि मौज में ‘करो’ और ‘भूलो’ कि इससे मिलेगा क्या, क्योंकि जो मिलना है वो मिला ही हुआ है।

जो मिलना है वो मैं हूँ और मैं उपलब्ध हूँ, सदा उपलब्ध हूँ।

करने में ही आनंद है, और उसी आनंद का नाम परमात्मा है।

आनंद में ही कर रहे हैं, उसी करने का नाम परमात्मा है।

बात आ रही है समझ में?

जो सफ़लता और असफ़लता के खेल को भुला देते हैं उन्हें परम सफ़लता हासिल हो जाती है। और जो सफ़लता-असफ़लता की दौड़ दौड़ते रहते हैं वो जब असफल होते हैं, तो असफल होते ही हैं, जब सफल होते हैं तो और असफल हो जाते हैं। उनके हाथ लगती है तो सिर्फ़ असफ़लता, निराशा, कुंठा और दुःख। जीवन ऐसे बिताना है? या जीवन परम सफ़लता की मौज में बिताना है?

जिन्हें जीवन परम सफ़लता की मस्ती में बिताना हो, वो सफ़लता का प्रयास छोड़ दें।

वो तो बस ज़रा बाहर की आवाज़ों को भुला कर के भीतर की आवाज़ को सुनें और फिर जब वो कहे कि ‘करो’, तो कर डालें।

रुकें ही न।

हाँ! एक बात के प्रति सतर्क रहना, कहीं ऐसा ना हो कि तुमने बाहर की आवाज़ों को ही भीतर की आवाज़ बना लिया हो। यह और बड़ा खतरा है। बाहर की आवाज़ें बड़ी चालाक हैं, वो भीतर की आवाज़ बनके बैठ जाती हैं।

जिसे तुम अक्सर कहते हो ‘मेरी अंतरात्मा की आवाज़’, वो अंतरात्मा की आवाज़ वगैरह सब समाज की आवाज़ है। मैं अंतरात्मा की आवाज़ की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं आत्मा की बात कर रहा हूँ। यह दोनों बहुत अलग हैं।

जब तुम बिल्कुल मौन होते हो, शांत होते हो, तुम्हारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं होता, ठीक उस क्षण, कुछ होता है, जो तुम्हारे सामने स्पष्ट हो जाता है। वो परमात्मा का आदेश होता है।

परमात्मा का आदेश, क्या?

जो तुम्हें मौन में सुनाई देता है।

बात समझ में आ रही है? और वो आदेश बड़ा सीधा-साधा होता है। दोहरा रहा हूँ, उस आदेश में यह नहीं लिखा होता कि ‘ऐसा करो ताकि’, ‘ऐसा करो क्योंकि’। वहाँ तो बात बस ऐसे ही होता है, “चलो, करो”। और तुम्हें हक़ नहीं है जवाब माँगने का या स्पष्टीकरण माँगने का कि ज़रा बता देते कि क्यों करें। या कि थोड़ा विकल्प दे देते। ना तो वहां से विकल्प आते हैं, ना तो वहां से स्पष्टीकरण आते हैं, ना वहां से आगा-पीछा बताया जाता है। वहां से तो फ़रमान आते हैं, “चलो, और जवाब मत माँगना क्यों करना है, बस करो।”

अब अगर तुममें श्रद्धा है तो तुम कर डालोगे, और अगर तुममे चतुराई है तो तुम ज़रा इधर-उधर सटक लोगे, बाहर वालों के पास भाग जाओगे, ना करने के और दूर जाने के बहाने निकाल लोगे।

चालाकी चाहिए या मस्ती? मस्ती चालाक लोगों को तो मिलती नहीं, मस्ती तो ज़रा मूर्खों के लिए आरक्षित होती है। मूर्खता के लिए तैयार हो?

जो बेवक़ूफ़ बनने के लिए तैयार हो जाता है उसे मूर्खता और चतुराई के आगे का बोध उपलब्ध हो जाता है।

bv.jpg

मूर्ख बनने को कौन-कौन तैयार है? कौन-कौन तैयार है बेवक़ूफ़ कहलाने को, “हाँ, हम तो बेवक़ूफ़ हैं और बेवकूफी में हमारी बड़ी मौज, हमें तो बेवक़ूफ़ रहना है”? यह देखो (सभी हाथ उठाते हुए )। बस जिनके हाथ उठे हैं, वही ‘उठेंगे’।

जिन्हें मूर्ख कहलाने में शर्म आती है, उन्हें तो परमात्मा से भी शर्म आएगी। क्योंकि वो तुम्हारी तरह नहीं है, तुम्हारे समाज की तरह नहीं है, ना तुम्हारी मान्यताओं की तरह है। वो तो बड़ा नंगा है ।

निर्लज्ज है परमात्मा।

तुम तो लजा के ही भाग जाओगे। लोग कहते हैं कि सच सामने आया तो कोई डर के भाग गया, कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया तो अर्जुन की आँखें चुंधिया गयी, यह सब बातें सुनी होंगी। तुम्हारे साथ एक और घटना घटेगी, परमात्मा सामने आया तो तुम लजा के भाग गए। क्योंकि पक्का मानो सत्य नंगा होता है। वो उनके लिए है ही नहीं जिन्होंने बड़े आवरण रखें हों।

जिन्हें आवरण रखने हों, सत्य उनके लिए नहीं है।

जिन्हें प्रतिष्ठा का, मर्यादा का और अपने नाम का बड़ा डर हो, जो अपनी इज्ज़त गंवाने से बड़े घबराते हों, सत्य, मुक्ति, प्रेम उनके लिए ज़रा भी नहीं है |

ऐसे ही एक जगह पर बात कर रहा था तो तुम लोगों का जो ग्रुप का नाम है ‘अंतस’, ऐसे ही वहाँ कुछ नाम था। मैंने कहा इसका नाम रखो ‘मूर्ख मंडली’। यह सब तो बड़े-बड़े नाम हो जाते हैं- अंतस, आनंद, साक्षी; ऐसा लगता है जैसे हम कुछ हैं। तो कानपुर में एक कॉलेज है, वहां मैंने नाम रखवाया ‘चिड़ियाघर’। मैंने कहा चलो ठीक है, तुम्हें यह तो ना लगे कि तुम जानवरों से श्रेष्ठ हो।

तुम्हारी चतुराई और तुम्हारी होशियारी, यही तुम्हारा नरक है।

अगर मैं तुमसे कोई एक बात कह सकूं आज के इन कई घंटों में तो वो यह होगी कि ‘सीधे हो जाओ’। बिल्कुल सीधे हो जाओ, निर्दोष, भोले, उसमें कोई खतरा नहीं है। उसमें कुछ गंवा नहीं दोगे। याद रख सकते हो ये, ‘सीधे हो जाओ‘? आँखों में कपट ज़रा भी ना रहे। मन में छल ज़रा भी ना रहे। होशियारी से ज़रा दूर-दूर रहो। चालाकी तुम्हारे काम नहीं आएगी, आज तक भी नहीं आई है, किसी के नहीं आई है।

जो कीमती है, जो असली है, जिसके तुम हकदार ही हो वो तुम्हें मिला ही हुआ है, आगे भी मिलता रहेगा और बड़ी बात यह है की मुफ़्त मिलेगा। तुम्हारी चालों के कारण नहीं मिलेगा। तुम्हारी उपलब्धि, तुम्हारे श्रम, तुम्हारी क्षमता के कारण नहीं मिलेगा। यूँही मिलेगा, अकारण। जैसे वो फ़रमान भेजता है न, बिना बताए, बिना वजह, कि ‘करो’, वैसे वो देता भी है बिना बताए और बिना वजह कि ‘लो’। तुम पूछोगे इतना सारा क्यों दे दिया, तो कोई जवाब नहीं आएगा। जैसे तुम पूछते हो कि क्यों करें, तो कोई जवाब नहीं आता वैसे ही वो इसका भी जवाब नहीं देगा कि छप्पड़ फाड़ के क्यों दे दिया।

दे दिया तो दे दिया, मर्ज़ी है।

‘सर, हमें तो मिला नहीं छप्पड़ फाड़ के (एक विद्यार्थी की ओर कटाक्ष करते हुए)‘, तो हम ज़रा चालाक हैं, हम खुद ही छप्पड़ फाड़ लेंगे।


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi: तुम्हारी चालाकी ही तुम्हारा बंधन है; जो सरल है वो स्वतंत्र है (Guile is bondage)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: बंधन को बंधन जानो

लेख २: निसंकोच संदेह करो; श्रद्धा अंधविश्वास नहीं

लेख ३: सत्य और संसार दो नहीं

Advertisements

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय रजत जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      Like

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s