बदल-बदल के भी क्या बदल पाए?

प्रश्न: हमारे जीवन में परिवर्तन कैसे संभव है?

वक्ता: हर समय हो तो रहा है परिवर्तन। अभी बैठे थे, अब खड़े हो गए, हो तो गया परिवर्तन। और कैसा परिवर्तन चाहते हो? टी-शर्ट पहनी है, थोड़ी देर में उतार दोगे, हो गया परिवर्तन।

श्रोता: सर, हम हमेशा जब भी सोचते हैं तो मौन रहने के बारे में सोचते हैं..

वक्ता: हाँ तो अभी सोच रहे हो इधर-उधर की बातों के बारे में, थोड़ी देर में मौन के बारे में सोचने लगना, हो गया परिवर्तन।

परिवर्तन क्या है?

दाएँ को अटके थे, अब बाएँ को अटक गए, यह परिवर्तन है? पहले अपरिवर्तित होने के ख़याल पर अटके थे अब परिवर्तित होने के ख़याल पर अटक गए, यह परिवर्तन है? पहले ऊपर उठना बहुत अच्छा लगता था अब नीचे गिरना अच्छा लगता है, यह परिवर्तन है? पहले एक नौकरी में थे अब दूसरी नौकरी में आ गए, यह परिवर्तन हैं? पहले एक रिश्ते में आसक्त थे अब दूसरे रिश्ते में आसक्त हैं, यह परिवर्तन है?

परिवर्तन माने क्या?

हम परिवर्तन का अर्थ यही समझते हैं कि पहले गिलास में चाय पीते थे, अब चांदी के कप में पीने लग गए, पहले रोटी खाते थे अब पूड़ी खाने लग गए, या बहुत ज़ोर लगाया तो धर्म ही परिवर्तित कर लिया। उससे भी मन नहीं भरा तो घर की दीवालों का रंग बदल दिया, हो गया परिवर्तन। और ज़रा क्रांतिकारी किस्म के हैं तो सरकार बदल दी। चल रहा है न पोरिवर्तन (कटाक्ष करते हुए )। तो यही है परिवर्तन। परिवर्तित करते तो रहते हो। कपड़े बदलते हो, हर हफ्ते नयी मूवी देखने जाते हो, टहलने निकलते हो, कहते हो न कि ज़रा मन बदल जाएगा। परिवर्तित करते तो रहते हो।

क्या यह परिवर्तन है?

परिवर्तन का यह अर्थ नहीं होता कि ‘कुछ’, ‘कुछ और’ में बदल गया। परिवर्तन का अर्थ यह नहीं होता कि ‘अ’, ‘ब’ में बदल गया। परिवर्तन का अर्थ यह नहीं होता कि सीमा, सुशीला में बदल गई। परिवर्तन का अर्थ यह नहीं होता कि टी-शर्ट, शर्ट में बदल गई, कि मुसलमान, ईसाई में बदल गया। कि एक सरकार से दूसरी सरकार आ गई।

यह सब परिवर्तन हैं ही नहीं।

परिवर्तन का अर्थ ‘कुछ’ का ‘कुछ और’ हो जाना नहीं है।

परिवर्तन का अर्थ है ‘कुछ’ का ‘ना कुछ’ हो जाना।

हम ‘कुछ’ को ‘कुछ और’ में बदलने में बड़े उद्यत रहते हैं, पर ‘कुछ’ का ‘ना कुछ’ होना बर्दाश्त नहीं कर पाते।

वास्क्ताविक परिवर्तन है ‘कुछ’ का ‘ना कुछ’ हो जाना। मन में एक ख़याल चल रहा था वो तब्दील हो कर के दूसरा ख़याल बन गया, यह परिवर्तन नहीं है।

परिवर्तन है मन का मौन हो जाना।

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जीवन में तुमने एक तरह के लोग भर रखे थे और उनपर तुम निर्भर और आसक्त थे। और फिर जगह बदली, संयोग बदले, स्थितियाँ बदलीं, तुम्हारे जीवन में दूसरे तरह के लोग आ गए और तुम उनपर भी निर्भर और आसक्त हो गए तो कोई परिवर्तन नहीं है। परिवर्तन है अनिर्भरता और अनासक्ति। यह परिवर्तन है। बात आ रही है समझ में?

अब तुमने पूछा कि परिवर्तन हो क्यों नहीं पाता? क्योंकि जब ‘कुछ’, ‘ना कुछ’ बनता है तो उसमें तुम्हें बड़ा ख़तरा रहता है। वो ‘कुछ’ तुम्हीं हो। क्योंकि जीवन में तुम्हारे जो कुछ भी है, चाहे दाएँ जाने का निर्णय हो चाहे बाएँ जाने का निर्णय हो, वो तुम्हारा निर्णय है न। परिवर्तन के नाम पर तो तुम दाएँ को बाएँ बदलने को तो तैयार हो जाते हो, आसानी से तैयार हो जाते हो क्योंकि बदलने में भी ‘तुम’ कायम हो, निर्णय तुम्हारा ही है। और दाएँ की जगह बाएँ जाने वाले भी ‘तुम’ ही हो। तो तुम्हारी सुरक्षा तो बची हुई ही है न।

तुम कौन?

जो पहले बाएँ जाते थे।

तुम कौन?

जो अब दाएँ जाते हो।

तुम पर आंच नहीं आई। तुम पर खंरोंच भी नहीं लगी। तुम बचे हुए हो।

तो तुम ऐसे परिवर्तन के लिए तैयार हो जाते हो।

लेकिन, वास्तविक परिवर्तन, ना दाएँ, ना बाएँ, तुम ठहर जाओ, इसके लिए तुम तैयार नहीं होते। क्योंकि तुम व्यग्र हो, चिंतित हो, उद्वेलित हो। तुम्हारी बेचैनी तुम्हारी पहचान है। तुम्हारा चलना तुम्हारी मजबूरी है। तुम्हें कोई किधर भी जाने को कहे, तुम जाने को तैयार हो जाओगे, दिशा परिवर्तन के लिए सदैव तैयार रहोगे। करते ही रहते हो दिशा परिवर्तन, कभी ऊपर, कभी बाएँ, कभी दाएँ, कभी दक्षिण, कभी उत्तर, करते ही रहते हो न? चलना तुम्हारी मजबूरी है।

वास्तविक परिवर्तन उस दिन है जिस दिन तुम यह चलना, यह व्यर्थ की दौड़-धूप छोड़ दो, ठहर जाओ। उसके लिए तुम तैयार नहीं होगे। तुम चाहते हो परिवर्तन आ भी जाए और तुम कायम भी रहो। यह मांग वैसी ही है कि तुम कहो कि मैं ठहर भी जाऊँ और दौड़ता भी रहूँ। क्योंकि तुम कौन? जिसकी पहचान ही चहलकदमी और बेचैनी है। और परिवर्तन का अर्थ क्या? बेचैनी का दूर हो जाना, चहलकदमी का दूर हो जाना। बेचैनी का दूर हो जाना। तुम असंभव की मांग करते हो।

तुम कहते हो, “मेरे जीवन में परिवर्तन आ जाए”। अरे भई, तुम्हारे जीवन में परिवर्तन नहीं आएगा, जीवन ही परिवर्तित हो जाएगा। दोनो बातों का अर्थ समझना। बड़ा अंतर है। तुम्हारे जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आ सकता। हाँ, जीवन मात्र ही परिवर्तित हो सकता है। जीवन मात्र को परिवर्तित करने में तुम्हारी कोई रूचि हो ही नहीं सकती क्योंकि ‘तुम’ गए।

तुम्हारा तो ऐसा था कि तुम गाड़ी लेके घर से टेहेलने निकले हो, सैर-सपाटा करने के लिए निकले हो, और तुम किसी से दिशा पूछो कि भई आगे जाएँ कि पीछे जाएँ, चौराहे में किस तरफ जाएँ, हमें मौज करनी है, हमें आनंद मानना है। और वो तुमसे कहे, “उतरो गाड़ी से, और यहीं बैठ जाओ तसल्ली से। देखो बढिया पेड़ है, अच्छी छाया है, मौसम भी अच्छा है। मौज तुम्हें कहीं दूर नहीं मिलेगी, शांति से ठहर जाओ बड़ी मौज है”। तुम क्या उसकी बात सुन पाओगे? तुम्हें तकलीफ़ हो जाएगी। क्योंकि तुम्हारा तो ख़याल ही यही है कि मौज का अर्थ है कि गाड़ी लेके घूमें; चले जा रहे हैं और चले जा रहे हैं!

परिवर्तन मत मांगो, परिवर्तन तो लगातार तुम्हें मिल ही रहा है। तुम लगातार परिवर्तन की दौड़ में उलझे हुए हो। जो कुछ है तुम उसे बदलने के सदा आकांक्षी रहे हो। तुम ठहराव मांगो। और यह ठहराव ही बड़े से बड़ा परिवर्तन होगा। बड़े से बड़ा परिवर्तन। समझ में आ रही है बात?

जिसने बदलने की इच्छा की वो सिर्फ़ अपने आप को सुरक्षित करता है बदलने के विरुद्ध।

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जिसने बदलने की इच्छा की वो बिलकुल बदल सकता ही नहीं है। क्योंकि वो है कौन? जो इच्छाएं करता है ।

इच्छा चल रही है न लगातार? कुछ और बदले, कुछ और बदले, कुछ और बदले; तुम कायम हो! बड़ी सुविधा है। तुम्हारी लेश मात्र भी हानि नहीं हुई, तुम बचे हुए हो। यह दुष्चक्र समझ पा रहे हो? तुम कौन? जो लगातार बदलाव का इच्छुक है। तो अगर बदलाव आता जा रहा है तो इसका मतलब कि तुम बिलकुल भी नहीं बदले। नहीं समझे? तुम कौन? जो लगातार बदलना चाहता है। तुममें से कोई ऐसा है जिसे कंटेंटमेंट, परितोष मिल गया हो, जो ठहर गया हो? तो तुम हो ही कौन? जो लगातार बेचैन है। जो लगातार बदलने का अभिलाषी है। वही हो न तुम?

अगर बदलाव जिंदगी में आ भी रहा है तो इसका मतलब तुम ज़रा भी नहीं बदले। बदला तो वो जिसके भीतर से बदलने की आकांक्षा ही गई, जिसने कहा, “जो है, सो है। बदलेंगे क्या हम इसे, ज़रा इसके करीब तो आ लें”। और जब उसके करीब जाएँ, तो पता लगा कि बदलने का ख़याल ही इसीलिए आ रहा था क्योंकि समझते नहीं थे। और जिस चीज़ को तुम समझते नहीं उसी को बदलने का ख़याल खूब आता है तुम्हें। और जिस चीज़ को तुम समझते नहीं, बिना समझे उस चीज को तुम बदल कैसे दोगे?

और एक बार जो समझ लिया तो ऐसा नहीं है कि वो चीज़ स्थिर हो जाती है। समझना स्वयं बड़े-बड़े क्रांतिकारी बदलाव लाता है। तुम तो ऐसे बदलते हो कि जैसे मकान का रंग-रोंगन बदल दिया। जब करीब जाते हो बिना किसी इच्छा के, शांति से मौन में, और बस देखते हो तो छोटा-मोटा बदलाव नहीं आता है, भूचाल आता है। फिर यह नहीं होता कि ईमारत का रंग बदलता है, ईमारत की बुनियाद हिल जाती है। समझ रहे हो बात को?

इन सब ख़यालों से वास्ता छोड़ो – यह पा लें, यह बदल दें, अभी यह ठीक नहीं, कल ऐसा हो सकता है। जो है उसको देखो। और, जो है उसको देखना कोई भविष्य की घटना नहीं होती है। जो है वो प्रतिपल घट रहा है और उसे प्रतिपल ही देखना होता है। जब उसको देखते हो तो बदलाव अपने आप आता है। तुम्हारे करे नहीं आता। आ रही है बात समझ में?

परिवर्तन इसीलिए नहीं हुआ क्योंकि तुम लगे हुए हो परिवर्तन करने में।

तुम परिवर्तन से ज़रा मुक्त हो जाओ।

फिर देखो परिवर्तन आता है कि नहीं आता है।


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi: बदल-बदल के भी क्या बदल पाए? (All appears changing in absence of real change)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: बाहरी बदलाव क्यों ज़रुरी हैं?

लेख २: साहसी मन समस्या को नहीं, स्वयं को सुलझाता है

लेख ३: विवेक क्या है?.

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय रजत जी,

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      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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