ज्ञानी और अज्ञानी के बीच अंतर

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प्रश्न: ज्ञानी कौन है और अज्ञानी कौन है?

वक्ता: ज्ञानी वो जिसे ज्ञान है; अज्ञानी वो जिसे ये ज्ञान है कि वो अज्ञानी है। दोनों ज्ञानी हैं, अज्ञान कुछ नहीं होता।

श्रोता १: किस चीज़ का ज्ञान?

वक्ता: चीज़ का ज्ञान, चीज़ कुछ भी हो सकती है। हर ज्ञान, चीज़ का ही होता है। किसी भी चीज़ का ज्ञान हो, चीज़ कुछ होती रहे, क्या फ़र्क पड़ता है। ज्ञान के मध्य में हमेशा चीज़े ही होती हैं – व्यक्ति, वस्तु, विचार – सब चीज़ हैं।

श्रोता १: कुछ इससे भी परे है?

वक्ता: वो ज्ञान का विषय नहीं होता। ज्ञान में हमेशा विषय और विषयी होते हैं। ज्ञान का हमेशा विषय होता है — चीज़; जहाँ विषय है और विषयी है, वो द्वैत हो गया न। परे जो है, उसकी क्या बात करें और क्या नाम लें, उसे भी द्वैत के दायरे में ला दें, तो फिर कहें भी क्यों कि परे कुछ है।

श्रोता १: तो फिर उसके परे वो विषय किस चीज़ का है – अनुभूति का या शब्दों का?

वक्ता: तुम जितनी भी बातें करोगे, उन सब में पीछे कोई बैठा होगा – अनुभव लेने वाला, शब्दों का अर्थ करने वाला – ज्ञानी। अज्ञान को ज्ञान से अलग मत समझ लेना। और ये धारणा बिलकुल मन से निकाल दो कि अज्ञानी दुःख पाता है, तो इसीलिए कुछ ज्ञान होना चाहिये; दुःख हमेशा ज्ञानी पाता है, ज्ञान ही दुःख है। अज्ञान क्या है? — ये ज्ञान कि मुझे ज्ञान की कमी है – इसे अज्ञान कहते हैं। अज्ञान का कोई अस्तित्व है ज्ञान से हट करके!

किसी को तुम कहो कि “तू अज्ञानी”, तो तुम्हारा आशय क्या होता है? — कि जितना ज्ञान तुझे है, कम है, कुछ और होना चाहिये; यही तो होता है। कोई कहे मैं अज्ञानी, तो इसका अर्थ क्या है? — वो कह रहा है, “जितना जानता हूँ, कम है; और वस्तुओं का, चीजों का, व्यक्तियों का पता होना चाहिए; द्वैत का भण्डार मेरा और बढ़ना चाहिए।”

तो अज्ञान कुछ होता ही नहीं है।

ज्ञान ही तुम्हारा बोझ है।

श्रोता २: दृष्टा और दर्शन के बीच में क्या अंतर है ?

वक्ता: ज्ञान, और क्या है! दृश्य, दृष्ण, दृष्टा – ये सब मिलकर क्या बनते हैं? यही तो ज्ञान है, यही ज्ञान की त्रिपुटी है।

तुम हो विषयी, सामने कोई विषय है जानने का, और उनका एक सम्बन्ध बना है; इस सम्बन्ध को जानना कहते हैं; इस सम्बन्ध को ज्ञान कहते हैं। उसमें तुम अपने-आप को ‘ज्ञाता’ बोल देते हो, उधर वाले को ‘ज्ञेय’ बोल देते हो, और अपने रिश्ते को ‘ज्ञान’ बोल देते हो। पर इन तीनों की सत्ता को तुमने सत्य मान लिया; अब एक नहीं कितने कर दिए? – तीन। नहीं तो कम से कम ‘दो’ तो कर ही दिए। खंडित कर दिया न एक को; ज्ञान का अर्थ ही है खंड कर देना।

पर जानने की भूख हम में खूब रहती है; कुछ और ज्ञान मिल जाए क्या पता, इससे शांति मिल जाएगी; कुछ और ज्ञान मिल जाए।

जितना ज्ञान इकट्ठा करोगे, उतने और अशांत होते जाओगे।

जो इकट्ठा है ही, उसकी निवृत्ति करो, और इकट्ठा करने के पीछे मत भागो।

~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi: ज्ञानी और अज्ञानी के बीच अंतर (Difference between gyani and agyani)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान

लेख २: ज्ञान इकट्ठा करके नहीं जान पाओगे

लेख ३: समझ और ज्ञान में अन्तर

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय शकुन्तला जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

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      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      Like

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