विचार से मुक्ति, विचारहीनता नहीं

nj.jpg

वक्ता: सौरभ पूछ रहा है कि ‘ये अन्दर और बाहर तो समझ में आ रहा है कि जो दिमाग में चलता है वही बाहर दिखाई देता है और उसमें कोई वास्तविकता नहीं है। मेरा मन खराब होता है तो मुझे दुनिया भी खराब लगने लग जाती है।’ तो सौरभ ने शायद एक तरीका निकाला है, कि इस सब से बचने का तरीका है कि ‘ये विचार जो मुझे धोखे में रखता है, इस विचार को ही ख़तम करो।’ तो सवाल इसलिए ही पूछा कि ‘विचारहीन कैसे हो जाऊं?’ कि विचारहीन ही कैसे हो जाऊं?

नहीं ये एक बेकार की महत्वाकांक्षा ही हो गई कि विचारहीन होना है। जैसे हम कई तरीके के लक्ष्य बनाते हैं न तो वैसे ही ये एक और लक्ष्य हो गया कि अब मुझे विचारहीन होना है या अब मुझे अहंकारहीन होना है।

इस बात को ध्यान से समझना।

विचार से मुक्ति और विचारहीन होना दोनों बहुत अलग-अलग चीज़ें हैं।

इसी तरीके से अहंकार से मुक्ति और अहंकारहीन होना दोनों बहुत अलग-अलग चीज़ें हैं।

मैंने ये माइक पकड़ तो रखा है पर मुझे ऐसा कोई गुमान नहीं है कि ये मेरे हाथ का ही हिस्सा है और मेरे हाथ में ये काबिलियत आ गई है कि वो ध्वनि को बढ़ा देती है। ये मेरे पास तो है पर मुझे ठीक-ठीक पता है कि ये मैं नहीं हूँ। होगा ये, बेशक बहुत आकर्षक चीज़ होगी। अभी ये जो कर रहा है, वो काम, मेरा वो हाथ जिसने इसको पकड़ रखा है, मेरा वो हाथ कभी वो काम नहीं कर सकता जो काम ये माइक कर रहा है। वो काम मेरा हाथ कभी नहीं कर सकता। लेकिन उसके बाद भी मुझे ये गुमान नहीं है, ये ग़लतफहमी नहीं पाली मैंने कि ये मैं ही हूँ। होगा ये आकर्षक और लाभप्रद, पर ये मैं नहीं हूँ। उसके होने में कोई बुराई नहीं है जबतक मैं उससे अपने आप को जोड़ ही न लूँ।

ध्यान देना इस बात पर। किसी भी चीज़ के, वस्तु के, विचार के, व्यक्ति के होने में कोई दिक्कत नहीं है जबतक तुम उसके साथ जुड़ न जाओ। उस दिन बड़ी दिक्कत हो जाएगी जिस दिन एक संवाद ख़तम होगा और मैं कहूँगा कि घर चलो और हाथ में इसे पकड़े रहूँगा। और कोई कहेगा ‘रख दीजिये’ और मैं कहूँगा ‘नहीं! ये मेरा हाथ ही है। और मैंने रख दिया तो मैं अधूरा हो जाऊंगा, मेरा कुछ हिस्सा कम हो जाएगा।’ उस दिन बड़ी दिक्कत हो जाएगी जिस दिन मैं कहूँगा कि ये मेरे होने का हिस्सा है, और ऐसा हो सकता है। आप जिन वस्तुओं, व्यक्तियों के साथ बड़े लम्बे समय तक बड़े पास रहें, लम्बा समय और निकटता दो चीज़ें चाहिए, अगर ये हैं तो ये हो सकता है कि तुम उन से बिलकुल ही जुड़ जाओ। उस जुड़ने में गड़बड़ है।

विचार को मार नहीं देना है। विचारहीनता नहीं चाहिए। विचार से मुक्ति चाहिए। और विचार से मुक्ति का अर्थ है – विचार है पर हम विचार से?

श्रोता १: जुड़े नहीं हैं।

वक्ता: बहुत बढ़िया। विचार है, अपना काम कर रहा है, और विचार अपना काम क्यों न करे भई? ये जो तुम देख रहे हो न माइक, ये विचार से ही निकला है। ये तुम्हारे आस-पास जितनी दुनिया है, ये विचार की ही पैदाइश है। ये सब विचार से निकले हैं, ये फ़ोन, वो कुर्सी, ये कपड़े, ये पूरी दुनिया। ये तो चाहो ही मत कि हमारी ऐसी हालत आ जाए कि हम सोचना बंद कर दें।

सोचने में बिलकुल कोई बुराई नहीं है। सोचना बिलकुल प्राक्रतिक बात है, स्वस्थ बात है।

अस्वस्थता है उस विचार के साथ जुड़ जाना।

अन्तर कर पा रहे हो?

पूरे तरीके से सोचो, पूरे तरीके से। मन का काम है सोचना, सोचने दो उसको। तुम्हारे भीतर लेकिन एक बिंदु ऐसा बना रहे जो उस सोचने से हटकर है, जो नहीं सोच रहा। मन का काम है सोचना, उसे सोचने दो। एक छोटा सा बिंदु, केंद्र बचा रहे जो नहीं सोच रहा। उतना काफ़ी है। और उसी का अर्थ है विचार से मुक्ति।

ये काबिलियत ही है, इसको कोई तुम अभिशाप मत मान लेना। सोच पाना काबिलियत ही है। लेकिन अक्सर होता क्या है कि जो लोग नए-नए ज्ञान साहित्य की तरफ़ मुड़ते हैं, वो इन शब्दों को पकड़ लेते हैं कि मुझे अहंकारहीन होना चाहिए, मुझे विचारहीन होना चाहिए। बिना समझे कि अहंकारहीन होने का वास्तविक अर्थ क्या है। अरे! तुम अहंकारहीन  कैसे हो जाओगे। क्या नाम है तुम्हारा?

श्रोता १: सौरभ।

वक्ता: सौरभ! अब मैं तुम्हें सौरभ बोलूं और उधर को देखूं तो भी तुम्हें बुरा लग जाएगा क्योंकि तुम्हारा शरीर यहाँ बैठा हुआ है। तुम अहंकारहीन हो कैसे सकते हो, तुम तो शरीर से गहराई से जुड़े हुए हो न। ये ही तो कहते हो न- मेरा शरीर। और ‘मेरे शरीर’ का मतलब ही है अहंकार। तो अभी तो ये तो मांगो ही मत क्योकि संभव नहीं है। जो संभव है, वो करो; कि जानो कि ‘हाँ! अहंकार है। विचार है।’ फिर निर्विचार होने की बात तो वो करे जो विचार में पूरी तरह गहराई से बैठ गया हो, जिसने खूब सोच लिया हो।

तुम अपने आस-पास जो दुनिया देख रहे हो, ठीक-ठीक बताओ इमानदारी से, तुम्हें लगता है कि लोग सोचते हैं? सोच पाने की काबिलियत है लोगों में? ज़्यादातर लोग तो अभी उस जगह पर बैठे हैं जहाँ उन्हें ज़रूरत है कि वो और सोचें और तुम बात कर रहे हो विचारहीनता की। ज़्यादातर लोग तो सोचते ही नहीं, इसीलिए तो दुनिया इतनी मरी हालत में है। तुम्हें क्या लग रहा है, लोग सोच रहें हैं? सोचने में थोड़ी तो चेतना होती है न। सोचने से भी नीचे एक जगह होती है – वो होती है अविचार की। सोच पाने की जहाँ काबिलियत ही नहीं है। जहाँ तुम सिर्फ़ अपनी वृति पर चल रहे हो। ज़्यादातर दुनिया वहां से संचालित करती है। तो तुम मुझसे पूछो अगर तो मैं तो कहूँगा कि – ये दुनिया विचारों से भरी होनी चाहिए। हमें विचाराधीन लोगों की ज़्यादा ज़रूरत है। हमें लोग चाहिए जो विचार कर सकें। विचारकों की बहुत ज़रूरत है।

हाँ, विचार से भी ऊपर एक जगह होती है, बेशक होती है, तुमने ठीक पकड़ा है। उसका नाम निर्विचार है। और वो विचार से भी ऊपर की जगह है कि जहाँ पर तुम विचार से मुक्त ही हो गए और विचार बिलकुल हल्का पढ़ गया। लेकिन वहां तक जाने का कोई छोटा रास्ता नहीं है न। हम तो अविचार में जीते हैं। हमें तो पहले विचार में उतरना पड़ेगा, गहराई से विचार में उतरना पड़ेगा। हम सोचते कहाँ हैं!

आज जब पहला सवाल आया था तो मैंने कहा था ये तथ्य हैं जीवन के। हम सोचते हैं क्या? उन तथ्यों पर विचार करते हो क्या? नहीं करते न। हम तो विचार करते नहीं। हमें तो ज़रुरत है कि हम विचार करें। और मैं ये तुम सब से कह रहा हूँ, सोचा करो, खूब सोचा करो। और फिर जब वो सोचना बिलकुल पक्क जाएगा, पूरा हो जाएगा, तब वहाँ से निर्विचार निकलता है। वो बेशक बड़ी खूबसूरत जगह है, लेकिन वो तुमको ऐसे ही नहीं मिल जाएगी बैठे-बैठे कि बात कर ली निर्विचार की, नहीं पूरी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ेगा।

और निर्विचार में भी एक बात को समझना, निर्विचार में भी ऐसा नहीं होगा कि तुम कुछ सोच ही नहीं रहे होगे। विचार वहाँ भी मौजूद रहेगा, लेकिन जैसे शुरू में भी बात हुई थी, विचार से एक असम्पर्कता रहेगी, स्वाधीन रहोगे।

तो विचार को जगाओ, उठने दो उसको, और थोड़ा सा बस ये ख्याल रखो कि ‘उससे ज़्यादा जुड़ ना जाऊं’। विचार से जितना जुड़ोगे, वो उतनी ही धारणा बनती जाएगी। जानते हो जब विचार से ज़्यादा बिलकुल ही जुड़ जाते हो तो उस स्थिति को क्या बोलते हैं? उसे बोलते हैं – पूर्वाग्रह। पूर्वाग्रह का कोई और अर्थ नहीं होता। बस इतना ही अर्थ होता है कि अब तुम विचार से पूरी तरह जुड़ गए हो। अब तुम पूरे तरीके से उस विचार से जुड़ चुके हो। और बड़ी खतरनाक स्थिति होती है ये। लोग उसके लिए जान तक देने को तैयार हो जाते हैं। एक बार तुम्हारे मन में ये विचार गहराई से जड़ जमा ले कि ‘मैं हिन्दू हूँ, कि मुसलमान हूँ, तुम कहोगे जान दे दूंगा पर ऐसे काम ज़रूर करूँगा।’ देखते नहीं हो, दंगे में लोग मर-कट जाते हैं। जान दे देंगे, विचार के लिए जान दे देंगे। वो ख़तरा है सिर्फ़ विचार में रहने का। कि विचार तो है पर वो बिंदु नहीं है जो विचार से दूर हो।

तो दो बातें तुमसे एक साथ करने को कह रहा हूँ। पहली- विचार को उठने दो, विचारणा जगे; और दूसरी – एक बिंदु बचा रहे जो… कुछ समझ रहे हो?

श्रोता २: जी सर।

वक्ता: दूसरा क्या है फिर? एक बिंदु बचा रहे जो विचार को देख रहा है, जो विचार से जुड़ा हुआ नहीं है। जो विचार का साक्षी मात्र है। पहला काम पहले होगा, दूसरा काम बाद में होगा। पहला काम क्या है? विचार करना। पहला काम क्या है?

श्रोता २: विचार करना।

वक्ता: और दूसरा काम क्या है? विचार करने से जो विचार उठे उस विचार से जुड़ नहीं जाना है, क्या होना है? थोड़ा-सा उससे दूर रहके। पर जब विचार ही नहीं होगा तो दूर रहके देखोगे क्या? तो पहले तो विचार आए, ठीक है?


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi: विचार से मुक्ति, विचारहीनता नहीं (Freedom from thought, not thoughtlessness)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: विचार और वृत्तियाँ ही हैं मन

लेख २: उचित विचार कौन सा?

लेख ३: सोचो ज़रूर, पर सोचते ही मत रह जाओ 

Advertisements

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय सर्वेश जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      Like

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s