न बंधन है,न मुक्ति चाहिए

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न निरोध है, न प्रवृति 

न मैं बद्ध हूँ, न साधक 

न मैं मुमुक्षु हूँ, न मुक्त 

यही परमार्थ है 

अमृतबिन्दु उपनिषद् 

वक्ता: प्रवृति का मतलब – लिप्त हो जाना। निरोध का मतलब – बंधन लगा देना। दोनों ही नहीं हैं। और मैं आपसे कह रहा हूँ, एक अर्थ में, वो दूसरे हैं, कि मज़े भी ले रहा हूँ – नदी में खेल-कूद भी रहा हूँ, और गीला भी नहीं हो रहा।

“न निरोध है, न प्रवृति”

जब स्थिति आई कि नदी में कूद जाओ, तो कूद गए। नहीं किया निरोध। नहीं रोका अपने आप को। जीवन ने एक स्थिति खड़ी करी है सामने, कि कूदो, तो कूदे। पर कूद कर के प्रवृत नहीं हो गए – न निरोध है, न प्रवृति। कूद गए, पर प्रवृत नहीं हो गए। जीवन है तो निरोध कैसा? संसार अपना है। क्यों रोकें अपने आप को? संसार तो अपना है; पर संसार से पहले हम अपने हैं। तो चदरिया को मैली भी नहीं होने देंगे। कहते हैं न कबीर – “जस की तस धर दीनी”।

एक बात वो छुपा गए कि “जस की तस धर दीनी” से पहले उनहोंने उसको जम कर के पहना भी।

इतने पर ही आपकी दृष्टि न रहे कि “मैली ना हो जाये चदरिया”। चदरिया दी इसलिए गयी है ताकि आनंद रहे। कहीं ऐसा ना हो कि चदरिया को बचाने के चक्कर में ही ज़िन्दगी बीत गयी। ऐसे भी बहुत होते हैं कि दाग ना लग जाए कहीं, दाग ना लग जाए – उनकी बस एक आकांक्षा होती है; और यह बड़ा अहंकार है कि बार-बार यही पूछ रहे हैं कि “दाग तो नहीं लग गया? चदरिया साफ़ है ना?” बात समझ रहे हो न, इशारा किधर को कर रहा हूँ? इतना भी क्या बचाना? अरे, लगने दो दो-चार धब्बे। जो धब्बे दे रहा है, सफ़ाई भी वही कर देगा। रख दो “जस की तस”। इतना भी विरोध मत करो संसार का।

“न निरोध है, न प्रवृति”

और ऐसे भी ना हो जायें कि भूल ही गए कि यह चादर लौटानी भी है।

तो वही ‘टाईट-रोप वोक’, वही, खांडे की धार। कि पूरे तरीके से संसार में हैं – यह प्रेम। और अछूते भी हैं – यह ज्ञान।

“न मैं बद्ध हूँ, और न साधक”

“मैं बंधा हुआ नहीं हूँ।” और जो बंधा हुआ नहीं है, उसको बंधन से छूटने की कामना भी क्यों? “मैं नहीं हूँ बंधा हुआ। मुझे बंधे रहने में कोई सुख नहीं है। मैंने बंधे रहने का व्रत नहीं ले रखा है। और मैंने बंधन से छूटने का भी कोई व्रत नहीं ले रखा है।” दोनों ही तरफ़ अहंकार को बचने के लिए एक छोटी से जगह मिल जाती है। कोहम को उत्तर मिल जाता है।

“कौन हूँ मैं? – बंधा हुआ।”

अच्छा!

“और कौन हूँ मैं? – मुक्त।”

इन दोनों ही उत्तरों में कोई विशेष अंतर नहीं है क्योंकि अभी मौन तो आया नहीं। उत्तर मौजूद है। अहंकार हंस रहा है; ठिकाना मिल गया है उसको।

श्रोता १: एक ने बताया था, उसकी प्रेमिका ने कहा होगा कि, “क्या तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे?” उसने कहा, “मैं नहीं जानता।” अब वो परेशान हुए पड़े हैं दोनों के दोनों क्योंकि वो समझ रही है इसका यह मतलब है – वो मुझे छोड़ने वाला है। तो प्रेमिका कहती है उससे कि इसका मतलब तो यह हुआ कि तुम मुझे छोड़ने जा रहे हो। वो कहता है, “नहीं”। फ़िर कहती है कि “एक बात पकड़ो पहले!” “क्या तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे? या तुम मुझे छोड़ कर चले जाओगे”‘ वो कहता है – “दोनों ही नहीं!” अब झगड़ा हो रहा है। अब वो कह रहा है कि समझ ही नहीं आ रहा कि क्या बोलूं! – “ना ही मेरे पास कोई योजना है छोड़ने की, ना ही हमेशा साथ रहने की कोई योजना है।”

वक्ता: अब यह बिलकुल वो प्रेम है जिसमें होश नहीं है। ऐसा होता है जब प्रेम ज्ञान-हीन होता है। समझ रहे हैं बात को? यह ज्ञान-हीन प्रेम है। अब यह ज़हर बनेगा। इसमें कोई मिठास नहीं है।

श्रोता २: लड़की की तरफ़ से ज़हर है, लड़के की तरफ़ से तो मिठास है।

वक्ता: हाँ, उसी की तरफ़ से। तो प्रेम-मार्गी तो होते भी ज़्यादा; कहा था न हमने, जो स्त्री मन है, वो ही ज़्यादा ऐसा होता है। कि प्रेम तो है, पर उस प्रेम में होश नहीं है। समझ नहीं है ज़रा भी। और पुरुष मन होता है, उसमें होश बहुत आ जाता है, पर मिठास नहीं। यह जो प्रेम-हीन ज्ञान है, यह भी उतना ही ज़हरीला है – रूखा। इसमें भी कुछ नहीं रखा – कि ज्ञानी तो बहुत हो, पर इतने रूखे-रूखे, इतने ऊबड़-खाबड़, जीवन-हीन। तुमसे किसी को कुछ मिल नहीं सकता। तो ऐसा ज्ञान किस काम का!

“न मुमुक्षु हूँ, न मुक्त”

फ़िर ‘हो’ क्या?

“न यात्रा पर हूँ, न मंज़िल पर पहुँच ही गया” – तो कहाँ हो? अब यह तो बड़ी ख़तरनाक बात हो गयी।

श्रोता ३: “हो भी नहीं और हर्जा हो”।

वक्ता: आह! यह हुई बात। बहुत बढ़िया। तो ऐसी सी बात है – “न मुमुक्षु हूँ, न मुक्त” “न यात्रा पर हूँ, न गंतव्य पर जा ही पहुंचा” – यही परमार्थ है। ठीक?

ना पाने की इच्छा, ना पा लेना का दंभ।

जो यात्रा पर है, उसे पा लेने की इच्छा है। जो कहता है ‘पहुँच ही गया’, उसे पा लेना का दंभ है। यही परमार्थ है – ना पा लेने की इच्छा; ना पा ही लिया, ऐसा दंभ।


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi on Upanishad: न बंधन है,न मुक्ति चाहिए (Neither bondage,nor the want for liberation)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: क्या अहंकार से मुक्ति संभव है?

लेख २: सहजता आचरण-बद्ध नहीं

लेख ३: मन की शीतलता का क्या अर्थ है?

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय किरण जी,

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      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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