प्रेम में तोहफ़े नहीं दिए जाते, स्वयं को दिया जाता है

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प्रश्न: आपने कहा था कि तुम्हें क्या पता कि उसे खीर पसंद है, उसे घास भी पसंद हो सकती है। जैसे कि गीता में कहा है – “पत्रम्, पुष्पम्, फलम् तोयं”। तो अगर हम प्रेम से भोग लगा रहे हैं, तो वो भी उसी श्रेणी की बात है या…

वक्ता: प्रेम प्रमुख है न! प्रेम प्रमुख है। ना पत्र, ना पुष्प, ना फल! प्रमुख क्या है? प्रेम।

अब प्रेम से देने के लिए, देखिये कोई बहुत बड़ी चीज़ें तो नहीं कही गयीं हैं। पत्र माने पत्ता, पुष्प माने फूल – न सोना, न चांदी – फूल-पत्ता! प्यार से फूल पत्ता चढ़ा दो, बढ़िया है, काफ़ी है, बहुत है। और जिस समय में गीता कही गयी थी, उस समय में प्रचुरता थी, पत्रम्- पुष्पम् की, फलम् की। तो जब कहा जा रहा है कि फूल, पत्ता, फल – तो यही कहा जा रहा है कि वही चढ़ा दो जो सर्वाधिक सुलभ है। जो यूँ ही मिल जायेगा कहीं चलते-फिरते। फूल, पत्ता, फल – चढ़ा दो! ये कहा गया है कि जा कर के कोई विशेष फल ले कर आओ? ये कहा गया है कि जा कर के आकाश्पुष्प ले के आओ?

कोई ऐसा फूल माँगा है कृष्ण ने, जो फ्रांस में उगता हो? “जा अर्जुन!”

इतना ही कहा है कि “भाई! यही सब ठीक है। अगल-बगल, किनारे, इधर-उधर, जो मिले।”

श्रोता १:  ये भी तो कई बार होता है न कि इंगित किया जाता है और हम लोग शब्द पकड़ लेते हैं।

श्रोता २: हाँ! वो तो है, पर अगर मैं खीर का भोग लगा रही हूँ, तो मैंने अपने अहम् का प्रयोग किया या प्रेम का प्रयोग किया, ये कैसे पता लगेगा? मतलब, मैंने बहुत प्रेम से बनाई, लेकिन निश्चित रूप से, मुझे तो भगवान ने आ कर नहीं कहा कि, “मेरे लिए खीर बनाओ!” फ़िर? मेरा मन किया खीर का, और मेरे सोच में है कि मैं भगवान को पहले निवेदित करूँ, तो फिर कैसे समझ में आये कि…

वक्ता: जब प्रेम प्रमुख होगा, तो फिर खीर ही नहीं देंगी आप। फिर जो होगा, सब देंगी। आपको जिससे प्रेम होता है – आपका एक नाखून बड़ा सुन्दर है। खूब आपने उसे धोया है, चमकाया है, रंगा है। अब प्रेमी के पास जाती हैं। उसे नाखून दिखाती रहेंगी? या अपना सर्वस्व दे देती हैं?

बात समझ में आ रही है?

श्रोतागण: जी!

वक्ता: जहाँ प्रेम होगा, वहाँ बस खीर ही भर नहीं दोगे, वहाँ तो पूरा दोगे। या ये कहोगे कि “खीर मीठी है तो खीर ही लो।”

“लो! तुम नाखून लो बस! बहुत चिकना है एक दम!”

(श्रोतागण हँसते हैं )

वक्ता: जहाँ प्रेम होता है फ़िर वहाँ लुक्का-छिप्पी नहीं होती। वहाँ ये नहीं होता कि “ये सुन्दर वाली चीज़ है, इतना देखो! ये तो तुम्हारा है। आज विशेष खीर बनी है…”

अब विशेष हो कि निर्विशेष हो, आम हो, ख़ास हो, जो हैं, जैसे हैं, पूरे हैं, तुम्हारे हैं; और ख़बरदार, अगर तुमने कुछ भी ठुकराया! और फिर ये भी नहीं होता कि साल में एक दिन हम लाये हैं खीर तुम्हारे लिए। “आज खाना बिगड़ गया, खाओगे वो तुम भी।” (मुस्कुराते हुए )

“आज नहीं बना, तो भूखे रहोगे फिर तुम भी।” फ़िर तो जैसे हम, वैसे तुम। हाँ! इतना ठीक है कि हमसे पहले खा लो! पर ये तो नहीं करोगे ना कि आज तुम्हारा जन्मदिन है तो आज खीर ले लो! बाकी दिनों? वो कैलेंडर पे चिपकी हुई है। चावल के दो दाने, दूध में, वो लेई जैसी बन के चिपक गए हैं। अगली जन्माष्टमी तक के लिए। ऐसे ही होता है। एक जन्माष्टमी से अगली जन्माष्टमी तक वो चिपके रहते हैं।

(श्रोतागण हँसते हैं )

ये प्रेम हमें कुछ समझ में नहीं आया। साल में एक बार चटाते हो!

सर्वस्व न्योछावर करो! पूरे हो जाओ!

“खीर भी तुम्हारी, भगोना भी तुम्हारा, करछुल भी तुम्हारा, चूल्हा भी तुम्हारा, आग भी तुम्हारी। हम ही तुम्हारे!”


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant: प्रेम में तोहफ़े नहीं दिए जाते, स्वयं को दिया जाता है (Offer yourself, not gifts)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: शाश्वत उन्मत्तता प्रेम की (The eternal craziness of Love)

लेख २: प्रेम क्या है और क्या नहीं (What is love and what is not)

लेख ३: प्रेम तुम्हारी दुनिया बर्बाद कर देगा (Love will destroy your world)

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