छवि भक्ति माने क्या?

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उद्धरण:

तुम्हारे भीतर जब तक वो मौजूद है जो कुलबुला रहा है कि, ‘मुझे मालिक होना है मुझे मालिक होना है’ तब तक तो तुम दास ही रहोगे।

दासता से मुक्ति ही इसी में है कि परम के दास हो जाओ। तुम जाकर उसके पाँव में गिरोगे, वो तुम्हें गले से लगा लेगा— मिट गई दासता।

और जब तक तुम उसके पाँव में गिरते नहीं तब तक तुम्हारे हज़ार मालिक रहेंगे और क्षुद्र से क्षुद्र की गुलामी करोगे।

दोहा:
दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावे दास।
पानी के पीये बिना, कैसे मिटे पियास॥

~ संत कबीर

वक्ता: आदमी का मन किसी भी तरीके से अपनी बेहूदी चालाकियाँ छोड़ना नहीं चाहता। आप उसे एहसास कराओ कि तू अज्ञानी है तो वो कहेगा, ‘अच्छा, मैं ज्ञान हासिल कर लेता हूँ’ कौन ज्ञान हासिल करलेगा? मैं , मैं ज्ञान हासिल कर लेता हूँ। ज्ञान मिल गया, और मैं, मैं  का मैं  ही रहा। पहले अज्ञानी-मैं  था अब और अच्छा है, अब कौन सा मैं  है?

श्रोता: ज्ञानी मैं 

वक्ता: अब ज्ञानी मैं  है। अब तो कोई ऊँगली भी नहीं उठा सकता कि मैं को तोड़ो, ज्ञानी-मैं  है। ज्ञान में भी प्यारा से प्यारा वाक्य अगर कोई है जो मैं को अच्छा लगता है तो वो है—‘अहं ब्रह्मास्मि ‘ या ‘सोऽहं ‘ या ‘अयं आत्मम ब्रह्म ‘ यह वाक्य बड़े अच्छे लगते हैं ज्ञान में। क्यों?

मैं ब्रह्म हूँ। मैं कौन हूँ? मैं तो वही हूँ जो मैं था और अब मैं एक चीज़ और हो गया, क्या? ब्रह्म। बड़ा अच्छा लगता है, बड़ा प्यारा लगता है। सोऽहं; ब्रह्म में तो फिर भी नाम दे दिया; अब और ऊँचा हो गया, वह जिसका नाम भी नहीं लिया जा सकता वो मैं हूँ। बड़ा अच्छा लगता है। ‘अप्प दीपो भव ’—मैं स्वयं ज्योति हूँ अपनी। कौन ज्योति है? मैं । जीवन को देखूंगा मैं अपनी दृष्टि से – बड़ा अच्छा लगता है। इसीलिए अहंकारियों का साधना में उतरना अधिकांशतः ज्ञान मार्ग से होगा।

इसी कारण मेरा अनुभव रहा है कि जे.कृष्णमूर्ति की तरफ गहरे से गहरे अहंकारी आकर्षित होते हैं। जिन्होंने ठान रखा होता है कि मैं पर आंच न आए उन्हें कृष्णमूर्ति बहुत भाते हैं और इससे बड़ा दुरूपयोग नहीं हो सकता उस महात्मा का क्योंकि वो बार-बार आपसे कहते है कि खुद जानो, खुद करो और मैं को इससे ज्यादा कुछ अच्छा लगता नहीं- मैं कर सकता हूँ, मैं करूँगा।

“अरे मैं ब्रह्म से कोई नीचे हूँ? अहं ब्रह्मास्मि।” उपनिषदों ने भी यही कह दिया, बुद्ध ने भी यही कह दिया, कृष्णमूर्ति भी यही कह रहे हैं और  मैं तो हमेशा से ये जानता ही था। “हम ब्रह्म नहीं होंगे तो कौन होगा?  ये छुछुंदर! हमें शक हमेशा से था कि हम ही ब्रह्म हैं, भला हो इस आदमी का कि ये मिल गया इसने मुहर लगा दी पर ये नहीं भी बताता तो हम जानते थे, इसकी औकात क्या है हमें बताने की!” जो आदमी आपसे कह रहा है कि तुम खुद जान सकते हो, आपकी नज़रों में तो उस आदमी की भी औकात क्यों रहे?  क्योंकि आप तो खुद ही जान सकते हो, उस आदमी की भी क्या ज़रूरत है।

यही कारण है कि उपनिषदों के बाद, बहुत बाद, और उपनिषदों की विफलता को देखकर, एक और ज्यादा पका हुआ रास्ता निकलता है जिसका नाम होता है —भक्ति। वहां ये दावा कभी किया नहीं जाता कि “मैं ब्रह्म हूँ”, वहां कहा जाता है कि “मैं दास हूँ।”

पूरी दुनिया में भक्ति का उदय ज्ञान के बाद हुआ, ज्ञान पहले आया। उपनिषद भक्ति के ग्रन्थ नहीं हैं। उपनिषदों में जो बात कही गयी है वो सटीक, साफ़, सफ़ेद,निरभ्र है लेकिन वो आदमी के काम नहीं आई क्योंकि आदमी के अहंकार ने उपनिषदों को भी लपेट लिया, खूब लपेट लिया, बुद्ध को लपेट लिया, महावीर को लपेट लिया। इनके कई हज़ार साल बाद, आदमी के मन का अनुभव ले चुके बोध से ये बात निकली कि ये कहना खतरनाक है कि अप्प दीपो भव’, ये कहना खतरनाक है कि ‘सोऽहं’, किसी को अनुमति नहीं होनी चाहिए ये कहने की कि ‘अहं ब्रह्मास्मि’; जिसने ये कह दिया अब उसके लिए कोई रास्ता नहीं बचेगा। तब ये बात सामने आई कि “मैं सेवक हूँ”- इसके आगे कुछ मत कहना।

दो बहुत विपरीत वक्तव्य फ़िर सुनने को मिलते हैं आध्यात्म की दुनिया से:

  • एक वक्तव्य होता है जो कहता है कि “मुझसे ऊँचा कोई नहीं।”— यह ज्ञानी का वक्तव्य है। अभी अष्टावक्र हमसे कह रहे थे- अहो अहं नमो मह्यं। अहो अहं – स्वयं को ही देख कर अहं भाव आ रहा था; नमो मेहम – अपने सामने ही नमन कर रहे थे। ये एक प्रकार का वक्तव्य है जो आध्यात्म की दुनिया से आता है।
  • दुसरे प्रकार का वक्तव्य आता है कि, “मैं दासन का दास। मैं कुछ नहीं हूँ। हे परम! में तेरे पैरों की धूल बराबर भी नहीं हूँ।” और मैं आपसे कह रहा हूँ कि आप के लिए ज्यादा काम का दूसरा वक्तव्य है, आप पहले को भूल जाएँ और यही याद रखें जो कबीर आपसे कह रहे हैं कि आप दासों के दास हैं।

बहुत साफ़ मन चाहिए जे.कृष्णमूर्ति को पढ़ने के लिए, वो नहीं है आपके पास। आपके मन में बहुत कपट है। आप मत जाइए उनके पास आपको नुक्सान हो जाएगा। एक बहुत सुलझा हुआ ध्यानस्थ मन ही कृष्णमूर्ति के पास जाकर कुछ भी समझ सकता है। उपनिषद को पढ़ने के लिए फिर आपको वैसा ही होना पड़ेगा, जो लोग उपनिषद पढ़ा करते थे। वो कैसे लोग थे? वो एक शांत माहौल में, बहुत निर्मल मन के साथ पढ़ते थे। आपके पास वो मन नहीं है।

जब अष्टावक्र कह रहे हैं ‘अहो अहं’ -तो उनका अहं  विशुद्ध अहं  है, वो आपका वाला अहं (अहंकार) नहीं है, आपका दावा गलत हो जाएगा अगर आप कहेंगे नमो मह्यं – बिलकुल गलत है, मत कहियेगा। आपको हक़ नहीं है कहने का।

आप तो यही कहिये कि “भक्त हूँ, समर्पित हूँ, चरणों में हूँ, झुका हुआ हूँ।” कबीर कह रहे हैं- ‘दासातन हिरदये नहीं नाम धरावे दास’। और जब कहिये कि दास हूँ तो सिर्फ होठों से मत कहिये, देखिये साफ़-साफ़ कि दास ही तो हैं! और दुनिया के दास बने उससे कई ज़्यादा अच्छा है कि अस्तित्व के दास बन जाएँ।

हम जब शिविर में थे तो एक बार तो हमने कहा था कि,

किसका फतवा लेना है – इस संसार का या उस दरबार का ?

दासता तो है ही, अब देख लीजिये कि किसकी दासता करनी है? संसार की दासता  करनी है या अस्तित्व की दासता करनी है? और ये बात आपकी अनुभूति की गहराईयों से निकले, दिल से निकले।

दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावे दास।
पानी के पीये बिना, कैसे मिटे पियास॥

कबीर कह रहे हैं – सिर्फ़ मुंह से बोलो ही नहीं, साफ़-साफ़ जानो कि तुम्हारा कर्ताभाव झूठ है, तुम्हारे भीतर जो आकुल है अपने आप को मालिक कहने को, वो मालिक हो नहीं सकता। और तुम्हारे भीतर जब तक वो मौजूद है जो कुलबुला रहा है कि, ‘मुझे मालिक होना है, मुझे मालिक होना है ‘ तब तक तो तुम दास ही रहोगे।

दासता से मुक्ति ही इसी में है कि परम के दास हो जाओ
तुम जाकर उसके पाँव में गिरोगे, वो तुम्हें गले से लगा लेगा— मिट गई दासता।

और जब तक तुम उसके पाँव में गिरते नहीं तब तक तुम्हारे हज़ार मालिक रहेंगे और क्षुद्र से क्षुद्र की गुलामी करोगे।   


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant on Kabir: भक्ति माने क्या? ( What is meant by devotion?)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: ध्यान का फल है भक्ति 

लेख २:गुरु वचन – अहंकार नाशी

लेख ३:क्या अहंकार से मुक्ति संभव है?

 

 

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय एकलव्य जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

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      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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