जिसने असत्ता जानी शरीर और मन की, वही करेगा खोज अब स्वयं की

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 एक दिन ऐसा होयगा, कोय काहू का नाही,
घर की नारी को कहै, तन की नारी जाहि।।
संत कबीर

वक्ता: कबीर ये नहीं कह रहे हैं कि एक विशेष दिन ऐसा होगा, ऐसा है ही। न घर की नारी तुम्हारी है और न शरीर की नाड़ी तुम्हारी है। तुम्हारे चलाने से शरीर की नाड़ी चल रही है क्या? और तुम किस भ्रम में हो कि तुम्हारे घर की नारी तुम्हारी है। उसके अपने अहंकार हैं, उसके अपने उद्देश्य हैं, वो अपने उद्देश्यों पर तुम्हें चलाने को तत्पर है, वो तुम्हारी कहाँ से हो गई!लेकिन ये बात बहुत साफ-साफ शायद मौत के दिन ही दिखाई देती है कि, ‘मैं जा रहा हूँ पर कोई साथ आने वाला नहीं है।’ वही जो वाल्मीकि क्षण था। इतना ही किया था वाल्मीकि ने कि पूछ लिया था अपनी पत्नी से, क्या पुछा था?

श्रोता: मैं तुम्हारे लिए जो चोरी-डकैती करता हूँ तो अगर मैं नरक जाऊंगा तो क्या तुम साथ आओगे?

वक्ता: बस इतना ही पूछा था उसने कि, ‘साथ आओगे?’ बीवी ने कहा ना; बच्चे ने कहा ना। बीवी थोड़ी ईमानदार रही होगी, आजकल की होती तो कह भी देती कि, ‘हाँ जानू जरुर आउंगी, तुम्हारा एटीएम कार्ड किधर है?’

एक दिन ऐसा होयगा, कोय काहू का नाही’।

तुम जो इतनी धारणाएं पाल के बैठे हो कि मेरा ये है और मेरा वो है, नहीं कुछ है ही नहीं तुम्हारा, सिर्फ प्रतीत भर हो रहा है तुमको। मौत के दिन वो प्रतीत होना भी बंद हो जाएगा। लेकिन कबीर ने भी अपेक्षाएं ज्यादा कर ली हैं। तथ्य यह है कि मौत के दिन भी सौ में से नब्बे अभागों को कुछ नहीं पता चलता। वो दुसरे दिन रहे होंगे जब मौत आकर सारे राज़ खोल देती थी। अब तो पहली बात मौत आती ही मुश्किल से है क्योंकि हज़ार किस्म की दवाइयाँ बन गई हैं और अगर आती भी है तो अहंकार इतना सघन हो चुका है कि कुछ नहीं खुलता।

इन्हीं दो पर हमारा अहंकार केंद्रित रहता है – शरीर और मन, और क्या कह रहे हैं कबीर कि ‘न मन तुम्हारा है और न शरीर तुम्हारा है।’ मन का द्योतक क्या है ? घर की नारी मन का द्योतक है। क्या सोचे बैठे हो कि ये सब लोग जो तुम्हारे मन पे छाए बैठें हैं, कबीर ने कहा है न कि, जो मन से न उतरे माया कहिये सोए , यही सब तो मन पे छाए रहते हैं , घंटो-घंटो विचार करते हो कि पति क्या कर रहा होगा याँ पत्नी क्या कर रही होगी और क्या है माथे का भार!

दिन भर और क्या सर पे चलता रहता है? रिश्तेदार, काम, सम्बन्ध, पति, पत्नी, बच्चे, माता, पिता— यही मन है, इसी को कबीर घर की नारी कह रहे हैं; इनको तुम मन पर लादे हो; यह मन तुम्हारा नहीं है, और दूसरा जो तुम्हारी आसक्ति रहती है, तादात्म्य में रहता है शरीर से, वो भी  नहीं रहने वाला है। और जो याद रख सके कि नहीं रहने वाला है उसका जीवन बिलकुल बदल जाएगा, बिलकुल दूसरे तरीकों से चलेगा।

संतों ने बार-बार हमें मृत्यु का स्मरण कराया है। कबीर तो कबीर हैं, कबीर से ज़्यादा फरीद; फरीद लगातार-लगातार बुढ़ापे की ही बात करते हैं। क्यों कराते हैं बार-बार मौत का स्मरण?

जिसे मौत लगातार याद है सिर्फ वही जीवन में धोखा नहीं खाएगा।
जिसे मौत लगातार याद है सिर्फ वही जी सकता है, और कोई नहीं ।

हम अपनी दैनिक क्रियाएँ ऐसे करते हैं जैसे कि यह शरीर अमर हो। हम लोभ और नफरत ऐसे पालते हैं जैसे कि हम हमेशा यहाँ रहने वाले हैं। ऐसा नहीं है कि पता नही है कि नहीं रहेंगे, पालते ही इसी लिए हैं कि अभी डर हैं कि नहीं रहेंगे।


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant on Kabir:जिसने असत्ता जानी शरीर और मन की,वही करेगा खोज अब स्वयं की(Body, Mind, Self)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: क्या तुम सिर्फ शरीर हो? 

लेख २: शरीर और आत्मा के मध्य सेतु है मन 

लेख ३: शरीर माने मृत्यु 


सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

 

 

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय ध्रुव जी,

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      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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