तुम्हें ज़िन्दगी की पहचान होती तो ऐसे होते तुम?

 

30

मोहे मरने का चाव है, मरूं तो हरि के द्वार।
मत हरि पूछे को है, परा हमारे बार॥
~ संत कबीर

वक्ता:  मोहे मरने का चाव, मरूं तो हरि के द्वार

“धार्मिक हूँ, आध्यात्मिक हूँ, समझ गया हूँ कि, समर्पण के सिवा कोई रास्ता नहीं है। समझ गया हूँ कि जिसको मैं अपना होना कहता हूँ वही सारे दुखों का कारण है तो इसलिए मरना चाहता हूँ”, मरने का अर्थ है—पूर्ण विराम, ख़त्म होना, किसका ख़त्म होना? दुःख का ख़त्म होना।

मोहे मरने का चाव, मरूं तो हरि के द्वार

और हरि के द्वार पर ही स्वयं को विसर्जित करना चाहता हूँ, लेकिन जो दूसरी पंक्ति है वो बात को कुछ उलझा देती है—

मत हरि पूछे को है, परा हमारे बार

पर हरि हैं कि ध्यान ही नहीं दे रहें हैं कि, ये कौन है जो इतनी कशिश से, इतनी श्रद्धा से आया है अपने आप को समर्पित कर देने के लिए, अपनी आहुति चढ़ा देने के लिए।

ऐसा होना ही है।

जब भी कभी हरी को विषय बनाया जाएगा, तो पाया जाएगा कि जैसे बाकी सारे विषय निर्जीव हैं, मुर्दा हैं, कठोर हैं, काल्पनिक हैं, वैसे ही हरि भी कठोर, काल्पनिक और निर्जीव हो गए।

जैसे कि कोई दीवार आपसे प्रेम नहीं कर सकती, जैसे कि कोई पत्थर आपके प्रणय निवेदन का उत्तर नहीं दे सकता, ठीक उसी तरीके से आप पाएंगे कि हरि से भी आपको कोई प्रेम नहीं मिल रहा है। मत हरि पूछे को है—हरि ध्यान ही नहीं दे रहे, हरी ध्यान कैसे दें? कोई विषय ध्यान दे सकता है क्या तुमपर? कोई वस्तु ध्यान दे सकती है तुमपर? तुम्हें व्यक्ति से भी प्रेम नहीं मिल सकता क्योंकि वो भी विषय बन जाता है, हरि से कैसे मिलेगा? हरी को विषय बना लिया न।

विषय कैसे बना लिया?

मोहे मरने का चाव, मरूं तो हरि के द्वार—जैसे कि हरि का कोई विशिष्ट द्वार होता हो।

विशिष्टता जहाँ है,वहीं विषय है।

विषय ही विशिष्ट है।

विषय का मतलब है— कुछ ख़ास, जिसकी सीमा हो। ध्यान दीजिये-

जो भी कुछ आपका विषय बनता है वो सीमित हो जाता है, वो ख़ास हो जाता है

आप कहोगे कि, “वो पत्थर वहाँ रखा है, वो व्यक्ति वहाँ बैठा है”, अब इनकी एक विशेष स्थिति है और ये वहीं पर हैं, कहीं अन्यथा नहीं हो सकते।

हरि निर्विशेष हैं, उनमें कोई विशिष्टता नहीं है। 

निर्विशेष का अर्थ यही है कि किसी ख़ास जगह पर नहीं पाए जाते, कोई सीमा नहीं है कि सिर्फ इधर ही दिखेंगे।

जैसे ही आप ने कह दिया कि —“मरूं तो हरि के द्वार”— तो आपने ये भी कह दिया कि कुछ द्वार ऐसे भी हैं जो हरी के नहीं हैं, और आपने हरि को सीमित कर दिया। आपने कह दिया कि कुछ दरवाज़े हैं जो हरि के हैं और शायद वो मंदिरों के दरवाज़े होंगे, और बाकी सारे दरवाज़े हरि के नहीं हैं – यानी कि कोई छवि है।

आपने हरि के आगे समर्पण नहीं किया, आपने किया ये है कि आपने हरि को अपने मन का कोई विषय बना लिया। आपने कहा कि, “यहाँ-यहाँ हरि पाए जाते हैं, यहाँ-यहाँ उनका घर है, यहाँ-यहाँ वास करते हैं और मैं यहीं जाकर मरूँगा, या कि इन-इन रास्तों पर चल कर ये माना जा सकता है कि ये हरि के रास्ते हैं और मैं इन्ही पर चलूँगा”, बाकी सारे रास्ते हरि के रास्ते नहीं हैं।

देखिये कि हम बातें भी तो ऐसी ही करते हैं, हम कहते हैं—

“हे ईश्वर मैं तुम्हारी ओर आ रहा हूँ।”
अच्छा! किधर को जाओगे जब उसकी ओर नहीं जाओगे!

आपको पूजा करनी होती है तो आप मंदिर की ओर जाते हैं, आपको परमात्मा को पुकारना होता है तो आप आकाश की ओर सर उठाते हैं। आपको नमाज़ करनी होती है तो आप काबा की ओर देखते हैं। पर कोई ऐसी दिशा तो बता दो जहाँ वो न हो! पर हमने यही किया है, हमने हरि को विषय बना लिया है, हमने उसको भी वस्तु की तरह ही संसार में कहीं स्थापित कर दिया है- “मरूं तो हरि के द्वार” कौन सा द्वार है जो हरि का द्वार नहीं है?

और जब तुम ये चूक करोगे तो फिर आगे जो कहा जा रहा है वो होगा ही कि—मत हरि पूछे को है— जब तुम हरि का द्वार निर्धारित करोगे तो हरी तुम्हारी कोई पूछ करने नहीं आने वाले; वो कहेंगे, “जो करना है सो कर लो, तुम्हीं बड़े आदमी हो, तुम इतने बड़े आदमी हो कि तुमने तय कर दिया कि मेरा कौन सा द्वार है; मेरा घर-द्वार तो तुम  तय कर रहे हो तो मुझसे बड़े तो तुम हो गए, तो फिर तुम खुद ही अपनी फ़िक्र कर लो”

सत्य तो सत्य की ही फ़िक्र करता है, सत्य असत्य की फ़िक्र करने तो नहीं आता सत्य तुम्हारी धारणाओं को बचाने तो नहीं आएगा। तो हरि तुम्हारी कोई खबर लेने नहीं आएंगे। तुम पड़े रहो, तुम भले ही ये कहकर पड़े रहो कि मैं तो हरि का उपासक हूँ। तुम्हारी दोनों और से पिटाई होगी। तुम्हें संसार तो नहीं ही मिलेगा और जिस तथा-कथित हरि की तुम उपासना कर रहे हो वो भी तुम्हारी सुध नहीं लेंगे। तुम दोनों और से मारे गए— माया मिली न राम। संसार तो छोड़ा ही अब हरि भी नहीं मिल रहें है, अब उलाहना देते रहो- मत हरि पूछे को है, परा हमारे बार। तुम पड़े ही रह गए।

और यही हश्र होता है हमारे सामान्य धार्मिक आदमी का। वो किसी विशिष्ट की तलाश करता रह जाता है बिना ये समझे कि सत्य अविशिष्ट है, कि सत्य निर्विशेष है; उसके लिए कहीं जाना, कहीं पहुंचना नहीं होता, कोई ख़ास उदयम नहीं करना होता। वो है तो अभी और यहीं पर है। आप इस क्षण जो कर रहें हैं यही आध्यात्मिकता का परमोत्कर्ष  है, कि इससे ऊँचा मंदिर आपको कोई मिल नहीं सकता, कि इससे महत्वपूर्ण जीवन में कोई हो नहीं सकता।

मत हरि पूछे को है- तुम देते रहो ताने, उलाहना, हरि तो नहीं आएंगे।

वो कहानी सुनी है न….

एक साधक होता है। सीधा-सीधा बोलने की उसकी आदत होती है,  वो वही बात बोलने लगता है जो मैं अभी आपसे कह रहा हूँ कि मंदिरों-मस्जिदों में हरि नहीं मिलेगा, वहाँ है ही नहीं। तो वो यही बात बोल रहा होता है और चूंकि ये बात बोलने के लिए सबसे अच्छी जगह मंदिर ही है, क्योंकि मंदिरों में ही वो लोग पाए जाते हैं जिनका मंदिरों में यकीन है, तो वो मंदिरों में ही बोल रहा होता है। तो वहां के सब पंडित, पुजारी लोग उसकी पिटाई करते हैं और उसको वहाँ से निकाल देते हैं। वो दोबारा घुसता है, फ़िर उसकी पिटाई होती है और फ़िर निकाल देते हैं और इस बार उसको वर्जित कर दिया जाता है कि तुम जीवन भर मंदिरों में नहीं घुसोगे।

वो भी जिद्दी था तो उसने कहा कि मैं तो घुसूंगा। तो वो ऐसे ही एक शनिवार की रात, आधी रात के बाद घुसने के कोशिश कर रहा होता है और कहता है कि, “कल रविवार है और सुबह बहुत सारे लोग आएंगे तो मैं पहले से ही घुस के बैठ जाता हूँ और प्रतिमा के पीछे से बोलूँगा। दिन में तो मुझे घुसने नहीं देंगे, इन्होंने वर्जित कर रखा है, तो मैं रात में ही घुस के बैठ जाऊँगा।” तो वो रात में ऐसे ही दीवार फांदने की कोशिश कर रहा होता है और देखता है कि एक और है जो दीवार फांदने की कोशिश कर रहा है तो उससे पूछता है कि तुम कौन हो? तुम चोर हो क्या? क्या चुराने के लिए घुस रहे हो?

वह दूसरा आदमी बोलता है कि, ‘मैं हरि हूँ, मुझे भी निकाल रखा है इन लोगों ने, जिस दिन तुम्हें निकला था, तुमसे पहले इन्होने मुझे मंदिर से निकाल दिया था; अब मैं भी इसी कोशिश में हूँ कि मैं किसी तरह वापस घुस जाऊं पर मुझे भी घुसने नहीं देते ये लोग। मैं बाकी हर जगह मिल सकता हूँ पर मंदिरों में नहीं मिल सकता क्योंकि इन लोगों ने आयोजन करके सबसे पहले मुझे ही निकाला है यहाँ से’ – वो साधक फिर मंदिर में घुसने की कोशिश त्याग देता है। वो कहता है कि जब तुम ही नहीं हो तो किसकी खातिर यहाँ पर घुसूं, छोड़ो मैं भी नहीं जाता।

हरि की कोई विशिष्ट जगह नहीं है, वो अनिकेत कहलाते हैं;

अनिकेत माने—जिसका कोई घर नहीं होता

वो घरों में नहीं पाया जाता। न आपके, हमारे घरों में और न उसका कोई ख़ास घर होता है।

मोहे मरने का चाव, मरूं तो हरि के द्वार

ये अहंकार है कि, “मरूँगा तो कहीं नदी-नाले में नहीं मरूँगा, कहीं अनजानी मौत नहीं मरूँगा, हरि के द्वार मरूँगा।” अपनी कुरबानी तो देंगे पर उसके सामने जो हमारी कुरबानी का सबसे ज्यादा भाव लगाता हो,  मरेंगे तो, पर जता-जता के मरेंगे। तुम्हारे लिए ही तो मर रहें हैं सनम, तुम्हें तो खबर होनी चाहिए। प्राण प्यारे, मेरे प्रीतम, तुम्हारे लिए जान दे रहीं हूँ तो तुम्हारे द्वार पर ही तो दूंगी।

तो अब ताजुब क्यों हो रहा है कि- मत हरि पूछे को है यही तुम्हारी सजा है कि मर भी गए और हरी ने पूछा भी नहीं- मत हरि पूछे को है, परा हमारे बार। अब पड़े रहो मर के, व्यर्थ गई कुरबानी। अब कोसते रहो किस्मत को कि क्या हो गया ये, बड़ा एहसान फरामोश हरि है।

हम तो अपनी बलि तक दे आए और हरी ने रसीद तक नहीं दी हमको।


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant on Kabir: तुम्हें ज़िन्दगी की पहचान होती तो ऐसे होते तुम? (Do you know anything?)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: मत बताओ कि क्या जानते हो, दिखाओ कि तुम हो क्या

लेख २: ख्याल को तथ्य मत समझ लेना 

लेख ३: केंद्र पर है जीवन शांत, सतह पर रहे तो मन आक्रांत


सम्पादकीय टिप्पणी:

कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया 

kbir

 

 

Advertisements

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय शिवानी जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      Like

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s