उक्तियाँ, अगस्त ‘१५

उक्तियाँ, अगस्त ‘१५


१. श्रद्धा – सच धुंधला दिख रहा है, पर जाएँगे उसी की ओर|

२. ज्ञान बंधन तो दिखा देगा, पर बंधन को तोड़ने का विश्वास श्रद्धा से ही आएगा|

ज्ञान झूठ तो दिखा देगा, पर सत्य की समीपता का अनुभव श्रद्धा में ही होगा|

ज्ञान झूठे आसरे हटा देगा, पर सच्चा सहारा श्रद्धा से ही मिलेगा|

श्रद्धाहीन ज्ञान सिर्फ़ तड़प है|

३. संदेह समस्या बनता है, सिर्फ़ आखरी बिंदु पर| वो बिंदु पूर्ण श्रद्धा का होता है| पर आखरी बिंदु पर यहाँ कौन आ रहा है? तो अभी तो संदेह है तो अच्छी बात है| जितना हो सके उतना संदेह करो| और फ़िर उस संदेह को पूरा खत्म होने दो| और याद रखो कि खत्म करने का ये मतलब नहीं हैं कि उसे दबा दिया जाये| खत्म करना मतलब है कि उसकी पूरी ऊर्जा को जल जाने दो| उसमें जितनी आग थी, तुमने जला दी|

अब जल गया, खत्म हो गया|

४. मत पूछो कि मैं करूँ क्या|

पूछो कि मैं हूँ कौन|

५. सारी हिंसा अज्ञान जनित होती है|

जब ज्ञान उठता है, जब बोध उठता है, तो हिंसा का एक प्रकार नहीं, उसके सारे रूप हटते हैं|

जब हिंसा मन से जाती है, तो जितने भी रूपों में अभिव्यक्त होती है, हर रूप से जाती है|

अन्यथा किसी एक रूप पर आक्रमण करते रह जाओगे, और बाकी सारे रूप कायम रहेंगे|

अज्ञान ही हिंसा है।

६. नकली आस्तिक होने से कहीं बेहतर है कि तुम सच्चे नास्तिक हो जाओ और उसके बाद फिर तुम्हें अपनेआप कुछ पता लगना शुरू होता है, वही सच्ची आस्तिकता होती है।

७. जहाँ संग्राम नहीं वहाँ राम नहीं|

जहाँ राम नहीं वहाँ विश्राम नहीं|

विश्राम जीवन के संग्राम से पलायन नहीं है|

विश्राम घोर संग्राम के मध्य भी रामस्थ रहकर है|

जितना गहरा तुमें राम

उतना घोर तुम्हारा संग्राम

और उतना ही शांत तुम्हारा विश्राम

८. मोह भय में मरे, प्रेम चिंता न करे|

९. प्रेम कल की परवाह नहीं करता, वो समझदार होता है, वो अच्छे से जानता है कि कल आज से ही निकलेगा। प्रेम कहता है आज में पूरी तरह से डूबो, आज अगर सुन्दर है तो कल की चिंता करने की ज़रूरत ही नहीं। ये प्रेम का अनिवार्य लक्षण है कि प्रेम आज में जियेगा।

१०. ऐसे हो जाना कि दुनिया तुम्हारे मन में कोई विक्षेप खड़ा ही ना कर सके, यही तुम्हारा धर्म है। विक्षेप माने डिस्टर्बेंस। जो कुछ तुम्हें उत्तेजित करता हो, उद्द्वेलित करता हो, जो कुछ तुम्हारे मन में लहरें खड़ी कर देता हो, उसी से सुरक्षित हो जाना धर्म है।

११. जब तक सुख में सुख मिलेगा, तब तक दुःख में दुःख भी मिलेगा|

१२.  जो अच्छे में खुश होगा, उसे बुरे में दुखी होना ही पड़ेगा|

तो अगर तुम यह चाहते हो कि –

  • तुम्हें डर न लगे
  • तुम्हें दुःख न सताए
  • तुम्हें छिनने की आशंका न रहे

तो तुम पाने का लालच भी छोड़ दो|

१३.  भीतर शून्यता, बाहर तथाता|

१४. आनंद, मन की वो स्थिति है, जिसमें वो अपनी ही मौज में है, जिसमें वो किसी पर आश्रित नहीं है|

ऐसा नहीं है कि उसे दुनिया से कुछ लेन-देना नहीं है|

वो दुनिया में काम कर रहा है, दुनिया में रह रहा है, दुनिया में परिणाम भी आ रहे हैं, पर वो उन परिणामों को बहुत गंभीरता से नहीं ले रहा|

वो उन परिणामों को मन में गहरे नहीं उतर जाने दे रहा|

१५. संसारी – भूल कर करता है|

साधक – याद करके करता है|

सिद्ध – अब कर्ता रहता ही नहीं। वो अब करने के पार चला जाता है।

तो इस सूत्र का तुम्हारे लिए महत्व क्या हुआ? ये कि करते तो तुम हो ही पर ज़रा सुरति के साथ करो, स्मरण लगातार बना रहे। अब जो भी कुछ करोगे उससे तुम्हारी बेड़ियाँ टूटेंगी। भूल में, नशे में, अज्ञान में, जो भी करोगे उससे अपनी ही बेड़ियाँ और मजबूत करोगे। अपने ही बंधन और कड़े करोगे।

और चेतना में, स्मृति में जो भी करोगे, उससे मुक्त होते जाओगे।

 १६. जिसका भी जीवन बाहरी पर आश्रित है, उसकी आँखों में सिर्फ़ डर और मूर्खता दिखाई पड़ती है|

१७. पर्दों के पीछे से सत्य न दिखेगा|

१८. गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं, वो तुम्हें पैदा करता है|

१९. फर्क नहीं पड़ता कि हमने जीवन के कितने साल बिता लिए हैं, लेकिन डर के मारे हम किसी भी प्रकार के खतरे के करीब भी नहीं गए होते हैं। जो खतरे, जो चुनौतियाँ जीवन अपनी सामान्य गति में भी प्रस्तुत करता रहा है, हम उनसे भी डर-डर कर भागे होते हैं। हमने अपनेआप को लुका-छिपा कर रखा होता है। नतीजा यह होता है कि एक तो हम खौफ में और धंसते चले जाते हैं, और दूसरा यह कि एडवेंचर, रोमांच किसी तरह हासिल करने की हमारी इच्छा बढ़ती जाती है।

२०. जिनका जीवन यूँही चुनौतियों से, और खतरों से हर पल खेल रहा होता है, उन्हें रोमांच की ज़रूरत नहीं पड़ती। 

२१. जीवन ऐसा जियो जिसमें पूर्णता पहले ही विद्यमान हो| ताकि तुम्हें कर्म के माध्यम से पूर्णता न तलाशनी पड़े| 

जीवन पूर्णता के भाव में जियो|

२२. उत्तेजना की चाह सिर्फ़ एक गलत जीवन से निकलती है।

क्योंकि जीवन में अन्यथा कुछ होता नहीं, इसीलिए आपको उत्तेजना चाहिए होती है।

२३. जब जीवन बेरौनक और रसहीन होता है, तब तुम जानते नहीं हो कि तुम्हारी वृत्तियाँ तुम्हारे साथ क्या-क्या खेल, खेल जाती हैं।

२४. तुम सोचते हो कि अपनी चतुराई में तुम आपदाओं से बचने का उपाय कर रहे हो|

तुम आपदाओं से बचने का इंतजाम नहीं, आपदाओं को ही इकट्ठा करते हो|

जीवन भर खट-खट कर तुम अपने बुढ़ापे के कैंसर के लिए पैसा इकट्ठा करते हो, और देख नहीं पाते कि खट-खट कर तुमने कैंसर ही इकट्ठा कर लिया है|

२५. मन क्या कर रहा है, कहाँ को जा रहा है, इसके प्रति ज़रा सतर्क रहो। कुछ भी यूँही नहीं हो जाता। कुछ भी यूँही नहीं पसंद आता।

जीवन के प्रति ज़रा खुलो। जब मन स्वस्थ होता है तो उसको फिर मिर्च-मसाले की बहुत आवश्यकता नहीं पड़ती।

२६. अहंकार हमेशा द्वंद्व में जीना चाहता है|

सभ्यता ऐसी व्यवस्था है जिसमें अहंकार कायम भी रहे और ऊपर-ऊपर वो द्वंद्व दिखाई भी न दे|

२७. विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है| हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते|

बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपनेआप को ध्यान से देखें| यही आत्म ज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान|

और आत्म ज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है| वहाँ विचारों की तरंगे निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं|

२८. जो संबंध उपजा ही बीमारी से है, वो स्वास्थय कैसे दे सकता है आपको?

 जो व्यक्ति आपके जीवन में आया ही प्रपंचवश है, वो प्रेम कैसे दे सकता है आपको?

प्रेम पूर्णता से उठता है, प्रपंच से नहीं|

२९. संसार का अर्थ है – जिसमें आप कभी किसी के हो नहीं सकते। न आप किसी के हो सकते हो, न आप किसी को त्याग सकते हो, आप बस बीच में भटकते रह जाते हो, त्रिशंकु। संसार वह जगह है, जहाँ आपने जिसको पाया, उसको पाया नहीं, और जिसको छोड़ा, उसको छोड़ा नहीं। और पाने और छोड़ने के अतिरिक्त आपने कुछ किया नहीं। 

३०. जब तक सुख में सुख मिलेगा, तब तक दुःख में दुःख भी मिलेगा|

३१. साक्षित्व का अर्थ है कि सारे बदलावों के बीच में आप शांत हो|

३२. फूल से किसी का वैर नहीं है। कैसे हो सकता है? मूल की अभिव्यक्ति है फूल। यदि मुझे आपसे प्रेम है तो आपकी अभिव्यक्ति से वैर कैसे हो सकता है मुझे। जो आत्मा के प्रेम में है, उसे शरीर से कैसे बैर हो सकता है। शरीर और है क्या? आत्मा की अभिव्यक्ति ही तो है। जो सत्य को समर्पित है, वो संसार से भाग कैसे सकता है। संसार यूँ ही तो कहीं से नहीं टपक पड़ा है। इस दुनिया में जो कुछ है, वो कहाँ से आया है? उसका स्रोत क्या है? उद्भूत कहाँ से है? उसी एक बिंदु से, शून्यता से। तो हमें संसार से क्या वैर। वैर की तो बात ही छोड़िये, संसार उतना ही पूजनीय है, जितना की संसार का स्रोत।

३३. समस्त द्वैत का आधार है अद्वैत|

३४. संसार को स्थूल दृष्टि से देखना, पदार्थ रूप से देखना नीचता है। और वस्तुओं के, समय के, विस्तार के सत्य को समझना ही उच्चता है।

३५. आध्यात्मिक आदमी वो है जो फूल और शूल को एक समान देखे, क्योंकि निकले तो दोनों मूल से ही हैं।

३६. आत्मा सार है| संसार आत्मा का छिलका है|

अपने जीवन को देखें कि उसमें कितना महत्व है सार के लिए और कितना छिलके के लिए|

३७. जो उचित है, वो करो। नतीजा क्या आता है, छोड़ो।

क्योंकि कोई भी नतीजा आख़िरी कब हुआ है?

३८. मुक्ति का पहला चरण – शरीर का सहज स्वीकार|

३९. सत्य के सान्निध्य से बेहतर कोई विधि नहीं|

४०. जो योजना से नहीं मिला उसे बचाने की योजना मत बनाओ|

४१. सत्य के लिए साहस नहीं सहजता चाहिए|

४२. तुम्हारी धारणाओं का केंद्र है तुम्हारा अहंकार|

४३. आत्म-छवि है मिथ्या; करो आत्मा की जिज्ञासा|

४४. जो बिना मूल्य दिए मिले वो अमूल्य है|

४५. प्रेम बाँटना ही प्रेम पाना है|

४६. मुक्ति व बंधन दोनों ही में रहने के लिए मुक्त है मनुष्य|

४७. दुनिया से पाने की लालसा में तुम वास्तविक से दूर हो जाते हो|

४८. सत्य के अनंत रूपों को सत्य जितना ही मूल्य दो|

४९. एक ही तथ्य है और एक ही सत्य; दूसरे की कल्पना ही दुःख है|

५०. जो संसार से मिले सो समस्या; समस्या का साक्षित्व है समाधान|

५१. जितना लोगे उतना डरोगे, जितना लौटाओगे उतना भयमुक्त होओगे|

५२. परिपक्वता का अर्थ है अनावश्यक से मुक्ति|

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