जो भयानक है वो कुछ छीन नहीं सकता,जो आकर्षक है वो कुछ दे नहीं सकता

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2प्रश्न: जिस व्यक्ति के जीवन में चैन नहीं है, उत्तेजना बहुत ज़्यादा है। इसका मतलब ये है कि वो पदार्थों के तल पर ही जी रहा है। सर, प्रश्न ये है कि उसको अगर शिफ्ट करना है तो कैसे करें?

वक्ता: जाँच करें, थोड़ा प्रयोग करें। जो कुछ बहुत कीमती लगता है, उससे अपने आप को ज़रा सा दूर करें। जो कुछ बहुत डरावना लगता है उसके ज़रा नज़दीक आएँ और देखें कि क्या हो जाता है। क्या वास्तव में उतना फायदा या उतना नुकसान है, जितने की कल्पना कर रखी है? क्या मिल जाता है? क्या खो जाता है? आप जब किसी चीज़ को महत्वपूर्ण बना लेते हैं तो आप उस पर किसी भी तरह का प्रश्न उठाना छोड़ ही देते हो। आप कहते हो “ऐसा तो है ही।’’ आप ये जाँचना ही छोड़ देते हो कि क्या वास्तव में ऐसा है?

आप ये प्रयोग करके देख लीजिएगा। जिसे आप कीमती समझते हो वो आपके अनुमान से बहुत कम कीमती है। और जिसे आप भयावह समझते हो वो आपकी आशंका से बहुत कम डरावना है। प्रयोग करके देख लीजिए।

आप जिसकी अपेक्षा में जी रहे हो, उससे आपको आपके अनुमान से कहीं कम लाभ होने वाला है और आप जिससे दूर भाग रहे हो, उससे आपको आपके अनुमान से कहीं कम हानि होने वाली है।

 ये तथ्य ज्यों ही सामने आता है, त्यों ही वो सब कुछ जो आपके लिए महत्वपूर्ण था; और महत्वपूर्ण माने या तो आकर्षक था या भयानक था, दोनों में से किसी भी तरीके से महत्वपूर्ण था, उसकी महत्ता कम हो जाती है।

कोई तीसरी चीज़ आपके लिए महत्वपूर्ण होती भी नहीं है। दो ही चीज़ें हैं जो आपके लिए महत्वपूर्ण हैं, एक वो जिनसे आकर्षण का रिश्ता है, खींचती हैं; दूसरा, जिनसे विकर्षण का रिश्ता है, जिनसे बचते हो, दूर भागते हो। दोनों में ही दिख जाएगा कि उतना ज़ोर ही नहीं, उतनी खासियत ही नहीं, जितना मैं इन्हें महत्व, ऊर्जा, ख्याल देता था। जिसको दिन रात पाने के बारे में सोच रहा हूँ, ध्यान देता हूँ तो पता चलता है कि वो मिल भी जाएगा तो कुछ मिला नहीं, और जिसको दिन रात बचा रहा हूँ कि खो न जाए, ध्यान देता हूँ तो पाता हूँ कि अगर वो खो भी गया तो कुछ खोया नहीं। तो अब बताओ कि महत्वपूर्ण क्या बचा? जब महत्वपूर्ण कुछ बचा नहीं तब नज़र साफ़ रहती है, तब साफ़-साफ़ दिखाई पड़ता है, क्या? कुछ भी नहीं क्यूँकी दिखता तो आपको वही सब कुछ था जो आपके लिए महत्वपूर्ण था। तो क्या दिखाई पड़ता है? कुछ भी नहीं।

जब कुछ भी न दिखे, तो समझो देखा। अँधा कौन? जिसे बहुत कुछ दिखाई देता है। पागल कौन? जो ऐसी-ऐसी चीज़ें देख रहा है जो आप कभी देख ही नहीं सकते। जिसने सत्य का दर्शन किया, वो ‘वो’ है, जिसे अब दिखाई देना बंद हो गया। उसे अब दिखाई ही नहीं देता।

संसारी, साधक और समाधिस्त में यही तो मूल अंतर है। संसारी को चारों तरफ़ वैविध्य ही वैविध्य दिखाई देता है, सब कुछ अलग अलग-अलग। साधक को बस दो दिखाई देते हैं, सत्य और असत्य और समाधिस्त को बस एक दिखाई देता है, सत्य। आप तो चारों ओर देखते हैं तो आपको हज़ारों चीज़ें दिखाई देती हैं हज़ारों, “ये है, ये है,।” जो उन्नत साधक होता है उसे बस दो दिखाई देते हैं, वो कहेगा “सत्य है और माया है। सत्य है और असत्य है।” उसे दो दिखाई दे रहे हैं। और जो वास्तव में सत्य तक पहुँच गया, जो समाधि के आसन पर बैठ गया, उसे फिर दो भी नहीं दिखाई देते, उसे बस एक दिखाई देता है। तो उसे दिखाई देना ही बंद हो जाता है, इसीलिए कह रहा हूँ जिसकी आँखे खुलती हैं उसे दिखना ही बंद हो जाता है।

दिखने का तो अर्थ ही यही है न, अलग-अलग दिखें, बहुत सारी चीज़ें दिखें। वो दिख ही नहीं रहा, वो तो जिधर देख रहा है उधर बस एक प्रगाड़ शून्यता, ‘जित देखूँ, तित तू।’ अब जिधर देख रहे हो, एक ही चीज़ दिखाई दे रही है, तो फिर दिख क्या रहा है? कुछ नहीं दिख रहा। इस कुछ नहीं दिखने को ही वास्तविक दृष्टि कहा जाता है। अब, ‘देखा’ तुमने। यही सरलता है।

जीवन बड़ा हल्का हो जाता है। आपको कदम-कदम पर सावधान नहीं रहना पड़ता, आपको कदम कदम पर चुनाव और विश्लेशण नहीं करना पड़ता। आपके निर्णय बड़े आसान हो जाते हैं, आप कहते हो “दो ही तो हैं। सत्य को चुन लो; असत्य को छोड़ दो” और जब और आगे बढ़ते हो तो आप कहते हो “चुनने की ज़रा भी ज़रूरत क्या है, जो ही आएगा सत्य ही होगा।” हाँ, जो संसारी है उसे बहुत चुनना पड़ता है “ऐसा करेंगे तो ऐसा हो जाएगा, ऐसा होगा तो ऐसा हो जाएगा, ऐसा तो ऐसा करें, फिर ये करें, फिर वो करें, यहाँ ये ऊँच है, यहाँ ये नीच है, दाएँ चलें, कि बाएँ चलें, फिर थोड़ा सा मुड़ लें, इससे भी पूछ लें, ये खरीदें कि न खरीदें, ये बेंचे कि क्या करें?” उसको हज़ार तरीके के दंद-फंद और पचास तरीके के विचार करने पड़ते हैं। तमाम शक रहेंगे, छुपे रहेंगे, “ये है तो ये है, देखो ऐसा है।” वो ज़िन्दगी को बिंदास नहीं जी पाएगा। वो ऐसे नहीं जी पाएगा, “ठीक। ‘’हो गया ठीक चलो, आगे बढ़ो” ये भाव ही नहीं रहेगा, ‘आगे बढ़ो’।


‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant: जो भयानक है वो कुछ छीन नहीं सकता,जो आकर्षक है वो कुछ दे नहीं सकता

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १:  अतीत- कीमती भी, कचरा भी 

लेख २: न तुम ज़रूरी, न तुम्हारा श्रम 

लेख ३:   मात्र इन्द्रियाँ ही शरीर व संसार का प्रमाण


25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है। 

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु  requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।


सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

 

 

 

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2 टिप्पणियाँ

  1. आप जिसकी अपेक्षा में जी रहे हो, उससे आपको आपके अनुमान से कहीं कम लाभ होने वाला है और आप जिससे दूर भाग रहे हो, उससे आपको आपके अनुमान से कहीं कम हानि होने वाली है।

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    • प्रिय राजकुमार जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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