योग का क्या अर्थ है?

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2प्रश्न: योग का अर्थ क्या है?

वक्ता: योग का अर्थ इतना ही है कि जो दो हिस्से मैंने कर रखे होते हैं- अच्छा और बुरा, ये दोनों एक हो गए, इनका योग हो गया क्यूँकी योग होने के लिए और कोई दो होते नहीं है। योग तो तभी होगा न जब दो हिस्से होंगे। ये दोनों मिलकर एक हो गए, मिलकर एक कैसे हो गए? कि इन दोनों का जो एक मूल तत्व है, वो उजागर हो गया। मूल तत्व दोनों का एक है ये बात समझ में आ गई, यही योग है।

योग के लिए कुछ पाना नहीं है। जिस ‘एक’ पर आप बैठे थे उसके साथ-साथ ‘दूसरे’ को भी देख लेना है। योग का अर्थ समझिए, योग का अर्थ है- आप पुण्य पर बैठे हो, तो आप योगी नहीं हो सकते, क्यूँ? क्यूँकी पाप वहाँ दूर बैठा है और वो आपकी दुनिया से निष्कासित है। ठीक? आप योगी नहीं हो सकते। योगी होने का अर्थ है- मैं पुण्य पर बैठा हूँ और एक काबीलियत है मुझमें कि मैं पाप पर भी चला जाऊँ, बिलकुल करीब चला जाऊँ उसके, बिल्कुल, बिल्कुल करीब। इतना करीब कि पापी कहला ही जाऊँ और वहाँ जा करके साफ़-साफ़ मैं ये देख लूँ कि पाप का तत्व भी वही है जो पुण्य का तत्व है- ये योग है। रंग अलग-अलग है दोनों के पर तत्व एक हैं। यही योग है। अब दोनों एक हैं। समझ में आ रही है बात?

तो हम में से जो लोग किसी भी द्वैत के एक सिरे पर बैठें हों उनको दूसरे सिरे के करीब जाना पड़ेगा अगर उन्हें योग में प्रतिष्ठापित होना है तो। जिन चीज़ों को आज तक आपने महत्वपूर्ण बोला है, ये द्वैत का एक सिरा है कि ये महत्वपूर्ण है और द्वैत का दूसरा सिरा क्या होता है?

श्रोता: ये महत्वपूर्ण नहीं है।

वक्ता: ये ‘महत्वहीन’ है। जिन बातों को आप ने आज तक महत्वपूर्ण बोला है उनको आपको जागरुक होकर ‘महत्वहीन’ कहना पड़ेगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि कुछ महत्वपूर्ण होता है और कुछ महत्वहीन होता है।

 न कुछ महत्वपूर्ण होता है और न कुछ महत्वहीन होता है, जो होता है, बस होता है।

 लेकिन चूँकि आप कुछ बातों को बहुत महत्व देते आए हो इसीलिए अब आपके लिए आवश्यक हो जाएगा कि आप उनको जान-बूझ कर महत्व देना छोड़ो या उनके विपरीतों को महत्व देना शुरु करो। तो, मैं ये कहता हूँ कि चमक-धमक को, रूपए-पैसे के प्रदर्शन को, भोग को, बड़ा महत्व दिया है न तो अब जाकर के किसी शॉपिंग मॉल के सामने खड़े हो जाओ और ये सीखो कि ध्यान से देखूँगा सब और फिर ज़ोर से कहूँगा अपने-आप से कि ये सब झूठ है क्यूँकी आज तक तुमने उसी शौपिंग मॉल में, उस सुनार की दुकान को देख करके, उस फ़ूड कोर्ट को देख करके, उस कपड़े की दुकान को देख करके अपने आप से यही कहा है कि ये सब कुछ असली है और महत्वपूर्ण है। तो अब बहुत ज़रूरी है कि तुम वहाँ पर जाओ और खड़े हो और ज़ोर से अपने आप को ही घोषणा करो कि ‘’ये सब कुछ झूठा है और नकली है।’’

पद को, प्रतिष्ठा को और ताकत को तुमने बहुत महत्व दिया है, आज तक। तो अब बहुत ज़रूरी है कि सड़क से जब वो लाल बत्ती वाला काफ़िला गुज़र रहा हो तो उसको देखो और बजाए इसके कि हैरान हो जाओ- कि अरे! एक आदमी के पीछे बीस गाड़ियाँ और सौ गुंडे। वहाँ खड़े हो जाओ, ध्यान से देखो और कहो- ‘’झूठ है ये सब।’’ यही योग है, कि एक सिरे पर बैठे थे और उसको ही सच मान लिया था, उसी से अपनी पहचान बना ली थी, उसी से जुड़ गए थे, पर अब हम जा रहें हैं दूसरे पर भी।

इसका अर्थ यह नहीं है कि एक सिरे से उठ कर दूसरे सिरे पर बैठ जाना है, गलत मत समझ लेना। ये नहीं कहा जा रहा है कि पहले चिल्लाते थे ‘महत्वपूर्ण-महत्वपूर्ण’ और अब चिल्लाओ ‘महत्वहीन-महत्वहीन’। ये नहीं कहा जा रहा है कि पहले तुम वो सारे काम करते थे जो पुण्य कहलाते हैं और अब तुम वो सारे काम करने लगो जो पाप कहलाते हैं। कहा ये जा रहा है कि जब तक तुम पाप के करीब नहीं जाओगे, तुम जानोगे कैसे कि पाप का तत्व वही है जो पुण्य का है। तो तुम्हारा योग कभी सधेगा नहीं अगर तुम पाप से दूर ही दूर रहे। इसलिए जो लोग बड़ा स्वछतापूर्ण जीवन बिताते हैं वो बड़े अधूरे-अधूरे से रह जाते हैं। लगता तो ऐसा ही है कि जीवन इनका बड़ा साफ़ रहा, कभी इन्होंने कोई बुरा काम नहीं करा पर उनका जीवन फिर खिल भी नहीं पाता क्यूँकी जो बुराई के करीब ही नहीं गया, जिसको बुरा कहा जाता है उसके करीब ही नहीं गया तो उसको जानेगा कैसे? और भूलना नहीं कि जिसको तुम बुरा कहते हो उसका कर्ता भी वही परमात्मा है। तुम अगर बुराई को ठुकरा रहे हो, तो तुम उस परमात्मा को भी ठुकरा रहे हो।

योगी की आँख को पाप में भी, ह्त्या में भी, चोरी और डकैती में भी, निकृष्ट से निकृष्ट कर्म में भी वही तत्व दिखाई देता है जो उसे किसी मंदिर में दिखाई देता है।

 तब आप योगी हुए। योग का अर्थ ही यही है कि मेरी आँख को अब दो दिखते ही नहीं, एक ही नज़र आता है। अब ये बड़ी असुविधा की स्थिति है कि बड़ी मुश्किल से तो हमने संयम साधा है, बड़ी मुश्किल से तो हमने अच्छा वाला आचरण साधा है और अब ये हमसे कह रहें हैं कि जो अच्छा वाला साध लिया है वही तुम्हारा बंधन है। तो तुम अब बुरे हो जाओ। बुरे हो नहीं जाओ, उसके बहुत करीब जाओ, उसे देखना पड़ेगा। जैसे अच्छे नहीं हो जाओ वैसे ही बुरे भी हो नहीं जाओ।

श्रोता: सर, करीब जाने से क्या तात्पर्य है आपका?

वक्ता: कैसे जानोगे कि क्रोध क्या है अगर उसके करीब नहीं गए? जिन बातों को पाप की संज्ञा दे दी है, उनको समझोगे कैसे अगर उनमें कभी उतरे ही नहीं।

श्रोता: सर, एक बार सब कुछ कोशिश कर सकते हैं।

वक्ता: तुम बचोगे सब कुछ कोशिश करने के लिए? कह तो ऐसे रहे हो जैसे तुम परम पुरुष हो। अब इन्होंने जो कहा उसमें कितनी मान्यताएँ छुपी बैठी है, इसको समझना। ये समझ रहें है कि ये जो यहाँ बैठे हुए हैं ये ‘ए’ हैं। ये सोच रहें है कि ‘ए’ एक कर्म करेगा फिर दूसरा कर्म करेगा फिर तीसरा करेगा और ‘ए’ सब कुछ करेगा, जो इन्होंने कहा कि सब कुछ कोशिश करें। ‘ए’ सब कुछ करेगा लेकिन फिर भी ‘ए’ ही रहेगा। अरे! तुम पहला ही कर्म करोगे तो क्या तुम ‘ए+’ या ‘ए-‘ हो जाने वाले हो? वो ‘ए’ बचेगा कहाँ सब कुछ कोशिश करने के लिए और सब कुछ कर-कर के भी ‘ए’ ही बचा रह रहा है तो ‘ए’ कुछ कर ही नहीं रहा। ‘ए’ फिर एक ही काम कर रहा है कि वो अपने आप को बचा रहा है।

जीवन की जो मूल मान्यताएँ है उनको देखो न। तुम मानते हो कि मैं वही रहूँगा? तुम अभी दो घंटे पहले जो थे वो अब नहीं हो। तुम एक गहरे कर्म में उतरोगे जो तुमने आज तक नहीं किया उसके बाद तुम वही रह जाओगे, जो तुम पहले थे? मैं कह रहा हूँ जीवन से तुमने जिन बातों को निष्कासित कर रखा है ज़रा उनके करीब जाओ और उनके करीब जाने के बाद तुम बचोगे क्या? तुम्हारा पूरा व्यक्तित्व हिल जाएगा, तुम्हारी पूरी हस्ती घुल सी जानी है। ये सवाल भी कि सब कुछ कोशिश करें, ये ‘ए’ पूछ रहा है। ‘ए’‘ थोड़ा ज़्यादा समझदार होगा, वो ये पूछेगा ही नहीं।


 ‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant: योग का क्या अर्थ है? (What is the meaning of Yoga?)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १:  सीमाओं से बंधे नहीं न तोड़ने की तलब,सीमाओं की बात क्या हमें असीम से मतलब

लेख २: ध्यान का फल है भक्ति 

लेख ३:   माया छोड़नी नहीं, सत्य पाना है 


25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है। 

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु  requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।


सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

Advertisements

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय भारद्वाज जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      Like

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s