एकांत नहीं है कोना निर्जन, कैवल्य नहीं कोरा सूनापन

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2वक्ता: सवाल यह है कि अपने आप को एकांत में वियुक्त कैसे रखें कि हम शान्ति और खामोशी महसूस कर सकें?

अधिकांश समय जब हम अकेले होते हैं तो हम वास्तव में अकेले नहीं होते। मन तो हमेशा किसी के संग में ही रहता है, मन को तो कोई दूसरा ही चाहिए। मन को तो कोई दूसरा चाहिए ही चाहिए साथ रहने के लिए और वो कोई दूसरा खोज निकालेगा, ये पक्का समझ लीजिए। वो बहुत बेसब्रा है और बहुत ताकतवर भी है। कुछ न कुछ वो खोज निकालेगा साथ के लिए। किसी न किसी के साथ होना है उसको। इसी बात को हम विचार कहते हैं, इसी को वस्तु कहते हैं, इसी को व्यक्ति कहते हैं। मन को कुछ न कुछ चाहिए। अकेला वो रह नहीं सकता। आप उसको अगर बिलकुल ही काट देंगे सबसे तो वो अपने ही दो हिस्से कर लेगा ताकि कोई मिल जाए साथ रहने के लिए। वो इतना बेसब्रा है। समझ रहे हैं?

एक ही तरीका है आपके पास, अगर आप ये कह रहे हैं कि कैसे हम वास्तव में एकांत पा सकते हैं। एकांत में होने का मतलब समझते हैं? एकांत में होने का मतलब ये नहीं है कि मेरे आस-पास में कोई नहीं है। एकांत में होने का मतलब है कि मैं समझ गया हूँ कि आस-पास तो हमेशा कुछ न कुछ रहेगा ही, कोई न कोई परिस्थिति तो होगी ही होगी और मन जैसी भी परिस्थिति होगी, उसी में उलझ जाना चाहता है।

वास्तविक एकांत इस बात का स्वीकार है कि हमेशा आपके आस-पास कुछ न कुछ चलता ही रहेगा लाख कोशिशों के बाद भी।

मैं जितना भी कोशिश कर लूँ कि परिस्तिथियाँ ठीक रहें, अनुकूल रहें, शांत रहें पर जीवन ऐसा है कि उसमें कुछ न कुछ उठता ही रहेगा, चलता ही रहेगा। एकांत का मतलब हुआ कि मैं समझूँ कि जो कुछ भी चल रहा है उसमें ‘वही’ चल रहा है। एकांत का मतलब है ’दैट अलोन इज़’,  जो भी हो रहा है, वही हो रहा है।

तो ये कोशिश कोई होशियारी की कोशिश नहीं है कि मैं चाहूँ कि परिस्तिथियाँ ठीक हो जाएँ, मैं चाहूँ कि परिस्तिथियाँ अच्छी हो जाएँ। इस कोशिश में कुछ नहीं रखा है।

श्रोता: सर, जैसे कि मैं यात्रा बहुत करता हूँ पर यात्रा करने के दौरान कभी एकांत नहीं पा पाता। हमेशा कोई न कोई विचार छाए रहते हैं याँ फिर कोई किताब पढ़ने लग जाता हूँ तो तब भी विचार आते रहते हैं कि जहाँ जाना है, वहाँ सब कैसा होगा या और कुछ भी।

वक्ता: तो आप जो ये कोशिश कर रहें हैं न किताब पढ़ने की और ये-वो करने की, वो सारी कोशिशें इसलिए हैं कि मैं परिस्तिथियाँ बदल दूँ। शोर बहुत है मैं किताब की शरण में चला जाऊँ। ये एकांत नहीं कहलाता।

एकांत का अर्थ होता है कि जो भी परिस्तिथि है उसमें मैं उस ‘अच्छे’ को खोज लूँ।

आपकी कोशिश है परिस्तिथियों को अच्छा बना दूँ पर एकांत का अर्थ होता है कि परिस्तिथि जो भी है उसमें ‘वही अच्छा’ बैठा हुआ है।

अन्तर समझिएगा, पहली जो कोशिश है वो हमेशा हारेगी, उसे हारना ही पड़ेगा क्यूँकी आप परिस्थिति को कब तक अच्छा बना पाओगे? आप सीमित हो और आपकी कोशिशें भी सीमित ही हैं। आप परिस्तिथियों से बहुत नहीं लड़ सकते। परिस्थितियाँ जैसी भी हैं, मुझे वही नज़र आता है उसमें। आँख जिधर भी देखती है सिर्फ़ वही-वही है।

तो मन को अकेला करने की कोशिश व्यर्थ है क्यूँकी मन तो संग खोज लेता है और संग उसे परिस्तिथियों से मिलता है। मन को अकेला करने की कोशिश नहीं कर रहे, मन तो हमारा ऐसा हो गया है कि उसे परम संगी मिल गया है। मन को क्या चाहिए था? संग, उसे संग मिल गया और ऐसा प्यारा संग मिला है उसे, कि अब नहीं भागता। आपकी कोशिश यह है कि मैं मन को असंग कर दूँ। वो बहुत बाद की बात है, वो परम आखरी बात है असंग हो जाना। आप बहुत जल्दी उसकी कोशिश कर रहे हो। मन को असंग मत करिए, मन को उसका संग दे दीजिए। मन को उसका संग मिल गया तो फिर उसे और कोई संग चाहिए नहीं होगा। समझ रहे हैं बात को?

ये सब मक्खी-मच्छर, कीड़े-मकौड़े, इन पर ध्यान तब जाता है जब प्रेमी साथ नहीं होता। चूँकि वो साथ में नहीं है इसलिए दुनियाभर से बहुत शिकायतें हो जाती हैं। आप झुंझलाए से रहते हो, आप कटुता से भरे हुए रहते हो और आप कटुता से भरे हुए हो ही इसीलिए क्यूँकी जीवन में प्रेम नहीं है। वो जो ऊँचा प्रेमी उपलब्ध हो सकता था, वो आपको मिला नहीं हुआ है। जब वो नहीं मिला होता है तो दुनिया भर की बेमतलब की चीज़ें जीवन में आ जाती है क्यूँकी जगह खाली है न। जिस आसन पर परम को विराजमान होना था वो आसन खाली है तो उसपर इधर-उधर से आकर के कुछ भी कचरा जमा होगा। फिर आप शिकायत करोगे कि ‘’कचरा बहुत इकठ्ठा हो गया है जी, इसे हटाएँ कैसे?’’ हटाते रहो। जो कुर्सी खाली होती है, उसे रोज़ साफ़ करते रहो तो भी अगले दिन उसपर धूल जम ही जाती है।

यही हो रहा है हमारे साथ। हमारी कोशिश है धूल को बार-बार हटाने की। आपको जीवन इसलिए मिला है कि आप धूल झाड़ते रहो? अपनी कोशिश की व्यर्थता तो देखिए न। सामने कुर्सी है जिस पर प्रेमी को विराजमान होना था, प्रेमी तो है नहीं और आपकी ज़िन्दगी क्या करते बीत रही है? कुर्सी झाड़ते, और आप यहाँ पूछ रहे हो कि ‘’कुर्सी झाड़ने के और बेहतर उपाय क्या हो सकते हैं।’’ बस एक काम आप नहीं करोगे, क्या? कि उस पर उस ‘प्यारे’ को लाकर के बैठा दो क्यूँकी उसमें अहंकार को चोट लगती है। घर आपका खाली का खाली रहेगा और आप उस घर को झाड़ते रहोगे। ‘उसको’ बुला करके, आमंत्रिक करके, वो तैयार है आने को पर आपका अहंकार बाधा है। उसको वहाँ लाकर के बैठाओगे नहीं।

‘उसका’ संग पा लो फिर आपको कोई और संग नहीं चाहिए होगा।

इसी स्थिति को कहते हैं असंग। आत्मा असंग है। जो यह एकांत शब्द आपने प्रयोग किया है इसके लिए दो शब्द हैं – ‘कैवल्य’ और ‘असंग’। पर समझिएगा कि वो असंग सीधे नहीं आता, वो असंग परम के संग से आता है। जब ‘उसका’ संग मिल जाता है तो आप असंगी हो गए। अब आपको किसी और का संग नहीं चाहिए।

खाली बैठे हों, विचार मन में आ रहे हों तो उसी का विचार कर लीजिए। बड़ी मन की तमन्ना है कि विचार में रहना है, सोचना है तो उसी के बारे में सोच लीजिए, और उसके बारे में सोचने का मतलब किसी छवि के बारे में नहीं सोचना है, उसके बारे में सोचने का मतलब है-अस्तित्व के बारे में सोचना क्यूँकी आप और किस बारे में सोचोगे? उतर जाइए गहन विचार में, अब आप हो गए उसके साथ। आप रेलगाड़ी में बैठे हैं, आपको पहाड़, प्लेटफार्म, लोग, पत्थर, पत्ते दिखाई दे रहे हैं। ज़रा गहराई से देखिए उनको। उसका संग ऐसे ही मिलता है, वो कोई इंसान थोड़े ही है जो आकर के कुर्सी पर बैठ जाएगा। वो तो पूर्ण है।

पूर्ण में डूब जाया करिए और पूर्ण क्या? जो अभी उपस्थित है, वही पूर्ण। डूब जाया करिए, आपको मिल गया उसका संग। उसके अलावा आपको पता भी नहीं चलेगा कि गर्मी है कि सर्दी है, कि धुआँ तो नहीं उड़ रहा ज़्यादा, जो मेरा नीचे बक्सा रखा है उसमें ठीक से ज़ंजीर बंधी है कि नहीं, पीछे घर पर क्या चल रहा होगा, मैं जहाँ जा रहा हूँ वहाँ कल क्या होगा, ये सारे ख़याल ही नहीं आएँगे। आप इन ख्यालों के पार किसी और ख़याल में डूब चुके हो। इन छोटी-मोटी चीज़ों से बेफिक्र हो गए आप। समझ रहे हैं? ये कोशिश न करिए कि तुरंत ही निर्विचार हो जाऊँ, वो आप कर नहीं पाएँगे क्यूँकी मन विचार खोज निकालेगा। निर्विचार होने की कोशिश मत करिए।

एक बढ़िया गाना है जो कुछ दिन से मैं सुन रहा हूँ, उसमें वो बड़ा मजेदार है कि – ‘उसे तकते-तकते उमर गुज़ारूँ, कोई और ख़याल जो आए, झट से उतारूँ’।’’ ये नहीं कह रहा है वो कि कोई ख़याल ही नहीं आने दूँगा बल्कि कोई और ख़याल नहीं आने दूँगा। तेरा ख़याल आता है ठीक बढ़िया। तेरा ख़याल आ रहा है तो ठीक है और उसका ख़याल क्या होता है? उसका कोई ख्याल हो नहीं सकता।

 वो तो अचिंत है उसका ख़याल कैसे करोगे आप? उसके ख़्याल का मतलब यही हुआ – समष्टि का ख़याल। जो है उसमें डूबना, समझने की कोशिश करना, करिए। लोगों को देखिए, उनके चेहरे पढ़िए, उनकी पीड़ाओं को समझिए, वो हँस भी रहे हैं तो जानिए कि वास्तव में क्या हो रहा है। कितना कुछ है जो आपके चारों ओर चल रहा है। दुनिया को जानेंगे तो अपने मन को जान पाएँगे और पक्का समझिएगा कि जब आप अहंकार रहित विचार में डूबते हैं तो जल्दी ही आप पाते हैं कि आप मौन हो गए। गूढ़ विचार जल्दी ही आपको निर्विचार में ले जाएगा। उसका संग आपको असंग कर देगा।


‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant: एकांत नहीं है कोना निर्जन, कैवल्य नहीं कोरा सूनापन (Detachment is not desolation)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १:  मौन और एकांत कोई समस्या नहीं 

लेख २:  जहाँ मन आत्मस्थ हो जाए, मात्र वही जगह मंदिर कहलाए 

लेख ३:  शान्ति कैसे पाएँ?


सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

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