आंतरिक बीमारी ही बाहर से आकर्षक नकली दवाई बनकर बीमारी को कायम रखती है

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2वक्ता: मुक्ति से बचने के लिए, सच से बचने के लिए आपके पास कोई बहाना नहीं हो सकता; क्यूँकी सच तो सच है। तो फिर एक ही तरीका रह जाता है उससे बचने का, वो होता है कि आप कोई झूठा सच आविष्क्रित कर लें। झूठा सच, नकली सत्य, नकली गुरु; ये सब बहुत ज़रूरी हैं, ताकि आप असली के पास न जा सकें। आप को वही रहे आना है जो आप हैं, लेकिन जो आप हैं, उसमें आपको कष्ट भी खूब है। तो अपने ही आप को, आपको ये दिलासा भी देनी है कि “मैं कुछ तो कर रहा हूँ अपनी स्थिति से निजाद पाने के लिए।” तो फिर आप झूठी दवाई खाते हैं। ऐसी विद्रुप स्थिति है हमारी।

कोई बीमार हो, जिसको बीमारी से मोह हो गया हो। वो बीमारी से छूटना भी चाहता है और नहीं भी छूटना चाहता है। तो फिर वो नकली दवाई खाता है, अपने आप को यह बताने के लिए कि “देखो मैं तो सब कुछ कर रहा हूँ, अब बीमारी ही ढीट है, नहीं जाती तो मैं क्या करूँ?” यह सब नकली दवाईयाँ हैं जो हम जान बूझ कर लेते हैं और नकली दवाईयाँ असली को विस्थापित कर देती हैं। “ले तो रहा हूँ दवाई, ले तो रहा हूँ दवाई।” कोई आपके पास आता भी है असली गोली ले कर, तो आप कहते हो “मैं ले तो रहा हूँ दवाई।” जैसे आप कहते हो न “मुझे अभी कोई और काम है।” “क्यों नहीं आते रविवार को?” – “मुझे कोई और काम है। ले तो रहा हूँ दवाई।” कैंसर के रोगी हो, किसको बेवकूफ बना रहे हो नकली दवाई ले कर? “मुझे और काम हैं।”

ऐसा समझ लीजिए कि आपकी बीमारी ही नकली दवाई बन कर आपके सामने आती है। आप बीमार हो इसी कारण आप नकली दवाई लेते हो। जो आंतरिक है वही तो बाहरी है न। बीमारी अन्दर से आपको छेदती है बीमारी बन के और बाहर से घेरती है नकली दवाई बन के।

माया भीतर से घेरती है संस्कार बन के और बाहर से घेरती है नकली गुरु बन के।

 जो भीतरी है, वो बाहरी है। अन्यथा सत्य तो सार्वभौम है, सम्मुख है। वो तो तत्काल पकड़ लेगा आपको। कोने-कोने में, कण-कण में मौजूद है। वो आपको पकड़ इसलिए नहीं पाता क्यूँकी आपने चारों ओर नकली दवाइयों की लक्ष्मण रेखा खींच रखी है।

 जिन्होंने आपको भीतर से संस्कारित किया है, ये बात दोहरा रहा हूँ, समझिएगा, उन्होंने ही आपको बाहर नकली धारणाएँ, नकली शिक्षक, नकली गुरु दे दिए हैं। जो नकली गुरु है वो समाज द्वारा प्रदक्त होता है। वो समाज का एजेंट  होता है। वो, वो सब कुछ आपसे करवा रहा होता है, जो समाज आपसे करवाना चाहता है। इसका प्रमाण यह है कि वो आपको पूरी-पूरी सामाजिकता में रखेगा। वो बिल्कुल नहीं कहेगा कि “अपने नकलीपन से बाज आओ”। वो बिल्कुल नहीं कहेगा कि “तुम्हारी ज़िन्दगी झूठी है।” वो कहेगा कि “तुम्हारी ज़िन्दगी जैसी चल रही है उसी को ज़रा सा और सुकून भरा बनाने के यह-यह नुस्ख़े हैं। तो तनाव ज़्यादा रहता है तो चलो साँस अंदर बाहर कर लिया करो। घर में, दफ्तर में मौत जैसा माहौल है, तो चलो सुबह उठते ही ये क्रिया कर लिया करो, ऐसा आसन बिठा लिया करो।” वो तुम से बिल्कुल नहीं कहेगा कि “अगर घर में और दफ्तर में ऐसा माहौल है तो बाहर आओ न, ऐसे घर और ऐसे दफ्तर से, छोड़ो।” वो बिल्कुल नहीं कहेगा। क्यूँकी वो समाज का ही तो एजेंट है, रिप्रेसेंटेटिव है।

वो आपसे ऐसा कुछ कैसे करा देगा जिससे समाज की हानि होती हो? उसको समाज ने ही खड़ा करा है ताकि तुम सामाजिक संस्कारों को कभी तोड़ न पाओ। कबीर जो कहते हैं, वो आपके तथाकथित गुरु कभी नहीं कहेंगे। दत्तात्रेय जो कहते हैं, उपनिषद जो कहते हैं, अवधूत जो कहते हैं, वो तो आपके गुरु बिल्कुल ही नहीं कहेंगे बल्कि उनके बिल्कुल विपरीत बात बोलेंगे। दत्तात्रेय की रुची इसमें है कि जो कुछ भी नकली है वो सब जल के गिर जाए। जले यह व्यवस्था, जले यह आडम्बर, जले यह षड्यंत्र। तुम्हारे गुरुओं की रुचि इसमें है कि यह व्यवस्था चलती रहे। इसके पहियों में थोड़ा-थोड़ा तेल डालते रहो। इसके इंजन को, भले ही वो सड़ा-गला इंजन है, भले ही धुँआ मारता है, आवाज़ करता है, पर उसमें थोड़ा-थोड़ा इंधन देते रहो। व्यवस्था गिरनी नहीं चाहिए, व्यवस्था रुकनी नहीं चाहिए।

श्रोता: सर, एक व्यवस्था में जो बात कर रहे हैं वो व्यवस्था गिर जाने पर एक नई व्यवस्था का बनना है, या कोई व्यवस्था नहीं है?

वक्ता: क्या करना है हमें इससे?

श्रोता: क्यूँकी कोई भी हम समाज की बात करते हैं, उस समाज के बाहर भी एक समाज होता है।

वक्ता: कैसे पता?

श्रोता: जैसे मैं किसी कक्षा में हूँ, मैं प्रथम वर्ष में हूँ तो मैं द्वितीय वर्ष वालों को गाली देता हूँ या मैं उनको बेवकूफ कहता हूँ किसी और ब्रांच वालों को। तो मैं हमेशा अपने आप को इन ग्रुप और आउट ग्रुप में डिवाइड करता हूँ।

वक्ता: ऐसा आपने करा न और आप कौन हो?

श्रोता: मैं भी उसी ग्रुप का हिस्सा हूँ।

वक्ता: आप वो हो जो उसी व्यवस्था से निकल कर आए हो। आप उसी व्यवस्था की पैदाइश हो। तो व्यवस्था तो जब भी देखेगी तो अपने से आगे तो नहीं देख पाएगी न।

श्रोता: मैं उस व्यवस्था से निकलता भी हूँ तो उसी जैसी व्यवस्था में..

वक्ता: आप उस व्यवस्था से यदि पूर्णतया निकलते हो तो आप अपने आप से ही निकल जाते हो। अगर आप एक व्यवस्था से निकल के दूसरे की माँग करने लगते हो तो इसका अर्थ यह है कि आप वही हो जो थे, कपड़े बदल रहे हो बस। एक रिश्ता आपका टूटता है, एक स्त्री आपकी ज़िन्दगी से जाती है और आप तुरंत दूसरे की माँग करना शुरू कर देते हो, दूसरे से रिश्ता जोड़ लेते हो। तो आप तो वही हो जो आप थे, चेहरा बदल गया है। आप वही हो।

एक दूसरा भी टूटना होता है, जहाँ आप अब वो ही नहीं रहे। आप जो कि व्यवस्था की पैदाइश हो, आप तो यही चाहोगे न कि यदि एक व्यवस्था जाए तो दूसरी आ जाए, पर आपका एक दूसरा होना भी है जिसमें इन व्यवस्थाओं की कोई आवश्कता नहीं है, क्यूँकी आदमी जो व्यवस्थाएँ बनाता है उनके अलावा और भी व्यवस्था है और उसके बारे में सोचना नहीं पड़ता, उसकी योजना नहीं बनानी पड़ती। आप जब तक व्यवस्थाओं वाला मन लेकर के चल रहे हो, तब तक आप एक छोड़ोगे, दूसरी पकड़ोगे। असल में दूसरी का भरोसा हुए बिना आप पहली छोड़ोगे भी नहीं। आप कहोगे “ठीक है, इस व्यवस्था को छोड़ देंगे, बताओ इसके बाद वाली कौन सी है? वो बेहतर लगेगी तो ये पुरानी त्याद देंगे।”

एक त्यागना ऐसा भी होता है कि “हम नहीं जानते आगे क्या है? पर यह तो छोड़ेंगे। हमें जानना ही नहीं आगे क्या होगा, कोई रुचि नहीं हमारी जानने में, पर जो अभी है, यह तो नहीं चलेगा। यह तो जाएगा। हमें आगे के लिए कोई आश्वासन, कोई गारंटी चाहिए नहीं। अगला कैसा होगा हमें नहीं मतलब; तुम नहीं चलोगे। अगला कौन मिलेगा– नहीं जानते। कोई न मिले, कोई बात नहीं, पर आपको नमस्कार।” बात समझ में आ रही है? और तभी वास्तविक बदलाव आया है, जब तुमने ये पूछना छोड़ दिया है कि “अब मेरा क्या होगा? अब आगे क्या होगा?”

श्रोता: सर, उसी व्यवस्था में रह कर बिना आसक्ति के साथ नहीं रहा जा सकता?

वक्ता: समझाइए?

श्रोता: सर, मेरा मतलब है कि भौतिक रूप से एक परिवेश से दूसरी परिवेश में चला गया व्यक्ति और मानसिकता वही है। जैसे कोई योगी है उसने सब त्याग कर दिया और ऋषिकेश चला गया पर वहाँ राजनीती करे और अपनी एक व्यवस्था बना ले। तो उससे अच्छा यह नहीं है कि वो जहाँ पर है वहाँ पर रहते हुए अपने आप को पहले ठीक करे, उसके बाद फिर त्यागे।

वक्ता: इसमें बाकी सब बातें ठीक हैं पर इसमें आपका जो ज़ोर है, वहीं रहने पर जहाँ आप हैं वो कहाँ से आ रहा है?

श्रोता: सर, जैसे अभी हम लोग विचार-विमर्श कर रहे थे..

वक्ता: आप कह रहे हैं “मैं जहाँ हूँ वहीं रहूँ, मेरा भौतिक परिवेश न बदले और मुझ में कोई आंतरिक परिवर्तन आ जाए। मैं भीतर से योगी बन जाऊँ, बाहर जो चल रह है भोग-वोग वो चलता रहे।” बाहरी को कायम रखने पर इतना ज़ोर क्यूँ है?

श्रोता: उस दशा अगर हम ले आए हैं और सिर्फ स्थिति बदल दी है..

वक्ता: मैं बिल्कुल आपकी मानता हूँ, कि जो भीतरी परिवर्तन है, जिसकी आप बात कर रहे हैं वो बड़ी महत्वपूर्ण चीज़ हैं, पर बाहरी को न बदलने पर इतना ज़ोर क्यूँ है?

श्रोता: ध्यान है अन्दर से बदलने में।

वक्ता: ठीक है। बाहरी अगर बदले तो?

श्रोता: तो..

वक्ता: तो उसकी बात क्यूँ करते हैं बार-बार कि “जहाँ हैं वहीं रहते हुए?” आपका तो ध्यान यह है कि “जहाँ हैं, वहीं रहते हुए” वो बात केन्द्रीय है आपके लिए। तो यानि कि आपका जो मूल ज़ोर है वो किस पर है?

श्रोता: बाहरी।

वक्ता: बाहरी को?

श्रोता: बचाए रखने पर।

वक्ता: तो यानि कि जो पूरा वक्तव्य था वो मात्र आसक्ति का वक्तव्य था। कि “किसी तरीके से बाहर-बाहर जो मैंने पकड़ रखा है वो पकड़ न छूटने पाए। अब भीतर कुछ बदले तो बदले, न बदले तो न बदले; बाहर कुछ नहीं बदलना चाहिए।” आप देख नहीं रहे हैं कि आपकी मूल माँग क्या है? आपकी मूल माँग यह है कि बाहरी माने जो इन्द्रियों को बाहर-बाहर दिखाई देता है, आपकी मूल माँग यह है कि “संसार में मैंने जो कुछ भी रिश्त्ते-नाते बना रखे हैं, जैसे-जैसे अपनी व्यवस्था फैला रखी है, जैसे-जैसे अपने स्वार्थ बिठा रखे हैं, जैसे-जैसे अपना मोह जोड़ रखा है वो सब अक्षुण्य रहे। वो सब यथावत रहते हुए, भीतर-भीतर कुछ अगर कर सकते हो तो कर दो, बाहर का हिला मत देना। खतरनाक जो बाहर का ज़रा भी हिला, फिर गुरु-वुरु हम सब भुला देंगे। हमारा सतगुरु कैसा हो? – जो रहने दे, जो जैसा हो।”

सतगुरु की परिभाषा ही यही है, कि जो सब कुछ वैसा ही रहने दे जैसा है और साथ ही साथ आपको ये गर्व भी दे दे कि आप आध्यात्मिक हैं, कि आप कुछ बदलाव ला रहे हैं। सब कुछ वैसा ही चले और साथ ही साथ आप भक्त शिरोमणि भी कहला जाए। आध्यात्मिकता, आग होती है। अन्दर-बाहर एक है। जब अन्दर बदलता है न तो बाहर भी वैसा नही रह जाता, जैसा है। ये एक मूलभूत सिद्धांत है इसको जानिए, अन्दर बाहर एक होता है।

 जब आपा बदलता है तो संसार भी बदलता है।

जब मन बदल गया तो आपके कर्म वैसे ही कैसे रह जाएंगे? जब संस्कारों से मुक्ति मिली, तो रिश्तों से नहीं मिलेगी? जब अन्दर बदलेगा तो बाहर भी बदलेगा। मैं नहीं कह रहा हूँ कि आप बाहर से शुरुआत करें, आप बेशक भीतर से करें। पर भीतर की आग जब बाहर फैलने लगे तो डर मत जाइएगा। भीतर जब लगेगी, तो फैलेगी तो बाहर भी। मैं आपको कोई झूठी सांत्वना नहीं देना चाहता। ‘जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।‘

कबीर के भीतर जब लगी, तो बनारस भर में फैली, फिर देश भर में फैली, फिर दुनिया भर में फैली, अभी तक फैली हुई है, हम सब जले जा रहे हैं, उसी में। तो ठीक है आपकी बात, वहाँ तक बिल्कुल ठीक कि शुरुआत भीतर से हो, बिल्कुल ठीक, पर जब भीतर से उठे तो बाहर फैलने दीजिएगा, ये ईमानदारी का तकाज़ा है। अब तो जैसे भीतर हैं, बाहर से भी वैसा ही परिलक्षित हो। अन्दर बाहर एक समान।

श्रोता: सर, अभी आपने ज़ोर की बात कही थी कि भीतरी ज़ोर संस्कारों से बना होता है और बाहरी ज़ोर मुक्ति से। तो मेरे दिमाग में एक बात आ रही है कि एक ज़ोर ऐसा भी होता है कि अगर सही के साथ है कोई तो उससे छुटा देता है। सवाल भी मेरा उससे सम्बंधित है, कि ये जो ज़ोर है, वो ये ऐसा कैसे कर सकता है कि जैसे अगर हम असली के साथ हैं, हमें जहाँ तक लगता है, तो ये उसी से हमें दूर ले जाता है?

वक्ता: वो भीतर का है?

श्रोता: जो ज़ोर है, जो हटा देता है, मूलतः व्यवस्था बनाए रखने को कहता है।

वक्ता: बाहर जो व्यवस्था के रूप में, व्यक्तियों के रूप में है या भीतर जो संस्कार के रूप में है, किस ज़ोर की बात कर रहे हो?

श्रोता: बाहर वाले।

वक्ता: ठीक।

श्रोता: बाहर वाले में दो तरीके हैं, या तो नकली के पास ले जाए, या असली से दूर ले जाए।

वक्ता: असली से दूर ले जाने का कोई तरीका नहीं होता। यही होता है, नकली के पास ले जाओ। असली से दूर जाना कुछ होता ही नहीं क्यूँकी असली कोई वस्तु है क्या कि उससे दूर चले जाओगे? असली कहीं बैठा है क्या कि उससे दूर चले जाओगे? असली कोई चीज़ है क्या, उससे दूर जाने का अर्थ क्या है? नकली के पास जाना ही असली से दूर जाना है। ये कोई भिन्न घटनाएँ नहीं हैं। असली कुछ है थोड़े ही, तुम क्या पकड़ना चाहते हो? तुम ब्रह्म को क्या मानते हो, पानी है, गिलास है, कटोरा है? क्या करोगे उसका? असली माने क्या? असली माने कुछ नहीं। नकली बहुत कुछ है, नकली को समझो, नकली को जानो। दिमाग चलाओ नकली को जानने में, असली की फ़िक्र बिल्कुल छोड़ दो, असली का नाम ही मत लिया करो।

असली का नाम ही मत लिया करो, बस नकली के प्रति सजग रहो।

श्रोता: सर, नकली चीज़ें इतनी सारी होती हैं कि एक के बाद एक आती रहती हैं, तो कभी मन देख ही नहीं पाता है कि ये नकली है, ये नकली है। जब तक वो उसको देख पाता है तब तक दूसरी नकली चीज़ आ जाती है।

वक्ता: तो चीज़ों को बार-बार बार-बार नकली कहो, उससे कहीं ज़्यादा सरल है कि एक ही झटके में उस देखने वाले उपकरण को ही कह दो, कि “ये जो कुछ देखेगा, वो नकली।” अब तुम्हारी गाड़ी में स्पीडोमीटर लगा है, वो ख़राब है, वो जो कुछ भी दिखा रहा है वो क्या है?

श्रोता: गलत।

वक्ता: गलत है। अब तुम बार बार बोलो, “60 भी गलत है, 70 भी गलत है, 80 भी गलत है, 20 भी गलत है, पच्चीस भी गलत है।” उससे अच्छा क्या ये नहीं है कि कह दो कि?

श्रोता: स्पीडोमीटर ही गलत हैं।

वक्ता: स्पीडोमीटर गलत है। अरे! ये जो करेगा वही गलत हो। बस बात ख़त्म। अगर दिखता है तो?

श्रोता: गलत ही है।

वक्ता: सुनाई पड़ता है तो?

श्रोता: गलत है।

वक्ता: छुआ जाता है तो?

श्रोता: गलत है।

वक्ता: बस हो गया, बात ख़त्म। अब क्या छू रहे हो इससे क्या लेना देना कि लाल छुआ, पीला छुआ, मुलायम छुआ कि कड़ा छुआ? जो छुआ, है तो वो छूने की चीज़ ही। बस बात ख़त्म। पर उम्मीद रह ही जाती है न? लाल ज़हर पी लिया, पीला पी लिया, नीला पी लिया, नारंगी पी लिया, इस बार काला वाला। क्या पता ये कम ज़हरीला हो। उम्मीद रह ही जाती है। “नहीं इस बार तो कर ही डालेंगे।”

जब कहा जाता है कि बुद्ध को अपने पुराने सारे जन्म याद थे, उसका आशय यही है। उन्हें याद है कि सारे ज़हर एक हैं। “सात, आठ, दस, बीस, पचास तरह के ज़हरों से गुज़रा हूँ, अब कोई उम्मीद नहीं बची। अब कोई नया ज़हर दिखाओगे तो मैं कहूँगा न, गुजर चुके हैं।” हम भूल जाते हैं। वही-वही गलतियाँ दोहराते हैं। बुद्ध वो जिसे अपनी गलतियाँ याद हैं। वो बात-बात में बोलते थे कि पता है एक जन्म में, मैं ये भी था, एक जन्म में मैं एक शेर था, एक जन्म में हिरण था, एक जन्म में साधक ब्राह्मण था। उनको याद है कि इन सब से गुजर चुका हूँ, अब दुबारा नहीं गुजरना, कर तो चुके हैं।” ये सवाल पूछा जा चुका है पहले, ये उत्तर मिल चुका है पहले। ये भूल मैंने पहले भी की थी। मैं पहले भी भागा हूँ। मैंने पहले भी अनसुना करा है। बुद्ध में और तुममें इतना ही अंतर है, तुम्हें याद नहीं रहता। तुम दोहराते हो, तुम चक्र में फँसे रह जाते हो।

कुछ भी ऐसा नहीं है जो आज तुम्हें कष्ट देता हो और पहले तुम्हें कष्ट न दे चुका हो। तुम्हारा कोई कष्ट नया है ही नहीं। क्यूँ उसको पुनः पुनः भुगतते हो? कोई तुमसे भूल ऐसी होती नहीं, जो तुमने पहले न की हो। तुम पहले भी प्रेम में पड़े थे, तुमने पहले भी धोखा खाया था। तुमने पहले भी लालच किया था, तुम पहले भी रोए थे, तुम पहले भी मोह, घृणा, द्वेष इन में बँधे थे और ठोकरें खाई थी। याद करो, सब याद आएगा। तुम पहले भी पैदा हुए थे, तुम पहले भी मरे थे। तुम पहले भी स्वयं शिशु रह चुके हो और तुमने पहले भी शिशु पैदा किये हैं। याद तो रखा करो। हर बार तुमने एक ही कसम खाई है “दुबारा नहीं करूँगा।” कसम तोड़ने की सज़ा भुगत रहे हो बस, कसम से।

हर बार कसम खाते हो, हर बार अपनी ही कसम तोड़ते हो। कसम जानते हो न कैसे खाते हो? (सर के ऊपर हाथ रख के) “कसम खा के कहता हूँ कि आगे से नहीं करूँगा।” अब समझ में आ रहा है, इतने दुःख में क्यूँ हो? अपनी ही कसम तोड़ते हो। कुछ आ रहा है याद? खाई थी कसम पहले?

श्रोता: सर, वो कसम जब तोड़ी थी, उस कसम को तोड़ने के बाद तो बड़ा माजा आया कि “बड़ा मजा आ रहा है” लेकिन फिर जब दिक्कत आने लग गयी उस दिन याद आता है कि “बेटा कसम जो खाई थी, वो सही थी।”

श्रोता: सर, ये बार-बार जो भूल जाते हैं, भुला देना जो होता है, ये जान बूझ कर नहीं करते, ये स्वाभाविक है। मतलब अगर जैसे समझिए अगर जन्म -पुनर्जन्म होते हैं तो वो हमें नहीं याद रहते, वो कोई हमने भुलाए नहीं हैं, वो प्रकृति से ही ऐसा होता है कि मिटा दी जाती है। ये स्वाभाविक चीज़ है, तो ये क्यूँ बोला?

वक्ता: उतना पीछे मत जाइए, कल जो कसम खाई थी वो आज क्यूँ भुलाई? क्या इतना स्वाभाविक था, स्वभाव को भुला देना? फिर पूछ रहा हूँ क्या इतना स्वाभाविक था स्वभाव को भुला देना? आपके आनंद स्वभाव ने आपको कसम खिलाई थी कि अब दुबारा सुख मत चाहना, वो कसम आपके स्वभाव से आई थी; आनंद स्वभाव है आपका सुख नहीं। स्वभाव वश हो कर के, स्वभावानुकूल कसम खाई थी आपने, “कि अब सुख नहीं माँगूगा।” अब आप कह रहे हैं कि स्वभाविक ही है कि मैंने कसम भुला दी। स्वभाव को भुलाना स्वाभाविक है? कल जो कसम खाई उसे आज भुलाना स्वाभाविक है? उतना पीछे मत जाइए कि “पिछले जन्मों में जो कसमें खाई थी वो अब याद क्यूँ नहीं रहती?” दो घंटे पहले जो खाई थी वो क्यूँ नहीं याद है?


‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant: आंतरिक बीमारी ही बाहर से आकर्षक नकली दवाई बनकर बीमारी को कायम रखती है

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: समाज नहीं,सामाजिकता है रोग

लेख २: गुरु से मन हुआ दूर, बुद्धि पर माया भरपूर 

लेख ३:  अस्तित्व की इच्छा 


सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

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