मन के बहुतक रंग हैं

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2वक्ता: कमरे के भीतर क्या है- वो विक्षिप्त मन जो बस यहीं भटकता रहता है, टहलता रहता है। कमरे के बाहर क्या है? समझ, बोध। समझ रहे हो? उसको ही इंटेलिजेंस कहते हैं। वहाँ पर वो होता है जिसे इनोवेशन कहते हैं, जिसे सृजनात्मकता कहते हैं। वो इस कमरे के भीतर नहीं होती। इस कमरे के भीतर जो होती है उसे कहते हैं- ‘पुनर्चक्रण’ कि जो पुराना था उसी को एक नया रूप दे कर के प्रस्तुत कर दिया|

जैसे कई बार घर में होता है न कि कल की 3 सब्जियाँ बच गयीं, तो गृहणियाँ क्या करती हैं अक्सर? उन्हीं तीन को मिलाया, उसमें कुछ थोड़ा बहुत और डाला और ऐसा लगने लग जाता है कि कोई नया पकवान तैयार हो गया। पर क्या वो वास्तव में नया है? वो नया तो नहीं है न? तो जब भी कभी आप अतीत में रह कर के कुछ नया करने की सोचते भी हैं तो बस एक तरह की रीसाइक्लिंग होती है, उस में कुछ नया नहीं होता|

श्रोता: सर, हम कुछ नया सोच तो सकते हैं..

वक्ता: सोच नहीं सकते, हमने कहा न? जो नया है वो सोच के दायरे से बाहर है, कमरे से बाहर है। कमरे से बाहर है वो। उसे समझ कहते हैं। सोचने में और समझने में अंतर है। सोच हमेशा बासी होगी और समझ सदा नयी होगी। आ गयी बात समझ में? सोच सदा पुरानी होगी, अतीत से आएगी, बासी होगी और समझ जो होगी वो हमेशा नयी होगी। यह अंतर समझ में आया?सभी श्रोता: हाँ, सर|

श्रोता: सर, आर्यभट्ट ने जो शून्य की खोज की थी, वो उनकी सोच थी या समझ?

वक्ता: छोड़ दो, न तुम आर्यभट्ट को जानते हो न उनकी खोज को जानते हो; अपनी बात करो।

नहीं जान पाओगे, यह उदाहरण तुम्हें कहीं लेकर के नहीं जा पाएगा। क्यूँकी यह तुम किसी ऑब्जेक्ट के बारे में बात कर रहे हो जिससे तुम्हारा कोई रिश्ता-नाता नहीं है। तुम आर्यभट्ट का क्या जानते हो- कुछ भी नहीं जानते न? यह बहुत दूर की बात कर रहे हो और तुम्हें बात करनी है अपने बहुत समीप की|

तुम्हें बात करनी चाहिए अपने समीप की, जो तुम हो और तुम बहुत दूर का उदाहरण उठा रहे हो। कुछ जान नहीं पाओगे|

श्रोता: सर, हम अपने आप की पहचान कैसे कर सकते हैं?

वक्ता: नंदनी (श्रोता कि ओर ईशारा करते हुए) अगर तुम हो, तभी तो कोई सवाल पूछ रहा है न? अगर तुम हो न तो कोई यह सवाल पूछ सकता है? बहुत साधारण सा प्रश्न है। नंदनी अगर इस कमरे में ही नहीं है तो क्या कोई यह सवाल पूछ सकता है? नंदनी कितनी भी खोई हुई हो, यह सवाल इस बात का द्योतक है कि नंदनी है तो ज़रूर। न होती तो सवाल कौन पूछता? तो कोई न कोई पूछ तो ज़रूर रहा है?

कौन पूछ रहा है- उसे पकड़ लो|

कोई पूछ रहा है। कोई जान रहा है कि सवाल पूछा जा रहा है। यह सब चल रहा है न? तुम जान रही हो कि तुमने सवाल पूछा है कि नहीं जान रही?

श्रोता: हाँ, सर|

वक्ता: तो कोई पूछने वाला भी है, कोई जानने वाला भी है। नंदनी है तो ज़रूर। जो जानने वाला है न नंदनी- वो तुम हो। जो यह जानता है कि क्या सब हो रहा है, वो तुम हो। लेकिन तुमने अपने आप को उस पूछने वाले के साथ संयुक्त कर दिया है। जानने वाले के साथ तुम्हारी कोई पहचान नहीं है|

तुम सोचती हो कि जो सवाल पूछ रही है, जो नंदनी है, जो विद्यार्थी है, जिसका नाम नंदनी है, जो एक लड़की है, जो किसी की बेटी है, जो इंजीनियरिंग की छात्रा है; तुम सोचती हो कि वो मैं हूँ। और एक दूसरी भी इकाई है जो नंदनी को यह सब करते हुए जान रही है।अभी यहाँ दो नंदनी हैं- एक ने सवाल पूछा और एक वो भी है न जो जान रही है?

ऐसे समझो यहाँ पर अगर तुम सोई हुई हो तो कितने भी सवाल पूछे जाते रहें, क्या तुम्हें पता चलेगा कि सवाल पूछे गए? यानि कि पूछने वाला और जानने वाला दो अलग-अलग इकाईयाँ हैं। पूछा जा सकता है बिना जाने कि पूछा गया? स्लीप-वॉकर होते हैं जो रात में नींद में चलते हैं? वो चल लेते हैं बिना जाने कि चला गया। यानि कि चलने वाला और जानने वाला, दो अलग-अलग हैं। तभी तो चला जा सकता है बिना जाने कि मैं चल रहा हूँ। होता है कि नहीं होता है? जान नहीं रहे हो कि चल रहे हो पर रात में चल रहे हो। यानि कि चलने वाला और जानने वाला दोनों अलग अलग हैं, हैं न?

श्रोता: सर, हम ज़्यादातर नकारात्मक क्यों सोचते हैं?

वक्ता: तुम किसे नकारात्मक बोलते हो और किसे सकारात्मक बोलते हो? तुम सकारात्मक उसे बोलते हो, जब तुम कोई लक्ष्य बना कर उसके पीछे भाग रहे हो, है न? जब तुम्हारे मन में आशा ही आशा भरी हो, और तुम उसे नाम क्या देते हो? तुम कहते हो कि यह सकारात्मक सोच है। यही होता है न? अगर कोई और आए तो उसके दृष्टिकोण से, यही बड़ा नकारात्मक है। ग्रंथों में लिखा हुआ है- ‘आशा हि पर्मों दुखम‘|

तुम जिसको सकारात्मक सोच बोलते हो, शास्त्र उसको कहते हैं कि परम दुःख वही है। उनकी दृष्टि में वो नकारात्मक हो गया। सकारात्मक-नकारात्मक तो बिलकुल वैसा ही है जैसे किसी ने सवाल पूछा था कि ‘सही और गलत क्या है?’। यह तो समाज से आई हुई धारणाएँ हैं। कोई समाज किसी सोच को सकारात्मक मान लेता है, दूसरा समाज उसी सोच को नकारात्मक मानेगा। बड़ी-बड़ी आक्रामक जातियाँ हैं, आक्रामक लोग हैं, समाज हैं। वहाँ पर इस बात को बड़ा सकारात्मक माना जाएगा कि किसी ने तुम्हें एक मारा, तुम पलट के दो मारो उसको|

दूसरी ओर जैनों के भी समाज हैं, बौद्धों के हैं और भी कई हैं। वहाँ पर तुम यही काम कर दो तो इसे बड़ा नकारात्मक समझा जाएगा कि बड़ी हीन द्रष्टि से देखा जाएगा। अरे! तूने हिंसा कर दी, किसी ने तुझे मारा और तूने भी पलट के मार दिया? किसको सकारात्मक बोलोगे, किसको नकारात्मक बोलोगे?

तुमने सकारात्मक का जो ख़याल मन में बना रखा है न वो एक आयादित ख़याल है। समाज ने तुम्हारे भीतर भर दिया है कि तुम इस-इस तरीके से करो तो सकारात्मक है और यह सब कर रहे हो तो नकारात्मक है| न कुछ सकारात्मक है, न कुछ नकारात्मक है। जो समझ गए बस वह ही सही है। समझना ही है|

 दुनिया में सकारात्मक-नकारात्मक नहीं होते, बस दो चीज़ें होती हैं- समझ और नासमझी|

बात समझ में आ रही है- न सकारात्मक, न नकारात्मक; बस समझ और नासमझी|

जिसको तुम सकारात्मक भी समझते हो वो अंत में तुम्हें गढ्ढे में ही गिराएगा। तुम द्वैत में जीते हो। जो चीज़ तुम्हें सुख देती है उसे तुम सकारात्मक का नाम दे देते हो। जो चीज़ तुम्हें दुःख देती है तुम उसको नाम दे देते हो नकारात्मक का|

एक किताब तुम्हारे सामने रखी है, दो लोग हैं। दोनों नहीं जानते उस किताब में क्या लिखा है। एक बड़ी उम्मीदें बाँधे हुए हैं। मैं कहता हूँ इस किताब में लिखा हुआ है कि दुनिया भर के खजाने कहाँ गड़े हुए हैं। वो नाचने लग गया किताब को देख कर के, तुम बोलोगे सकारात्मक सोचता है। और दूसरा, वो भी नहीं जानता किताब में क्या लिखा है, वो उस किताब को देख रहा है और रो रहा है ज़ोर-ज़ोर से। ‘’ज़रूर इस किताब में लिखा है कि मेरी मौत की तरीख़ पास आ रही है। ज़रूर इस किताब में जो अनहोनी घटनाएँ मेरे साथ होने वाली हैं उनका ज़िक्र है और वो रो रहा है|’’ तुम इन दोनों ही लोगों को क्या कहोगे? दोनों ही कैसे हैं? दोनों ही नहीं जानते कि किताब में क्या लिखा है, दोनों ही किताब को समझने की कोशिश नहीं कर रहे। एक बैठ कर के नाच रहा है कि- वाह! वाह! वाह!; एक बैठ कर के रो रहा है और जानते दोनों नहीं हैं कि क्या है; तो दोनों को क्या कहोगे? दोनों में कोई अंतर है? दोनों बेवक़ूफ़ है न? दोनों नासमझ हैं?

फिर एक तीसरा आदमी आता है जो न सकारात्मक है न नकारात्मक है। वो कह रहा है- क्या सकारात्मक, क्या नकारात्मक; मैं जानूँ, मुझे जानना चाहिए। वो जानता है। अब उसे सकारात्मक या नकारात्मक होने की कोई ज़रूरत है क्या? सकारात्मक-नकारात्मक तो तुम्हारी मनोदशाएँ हैं, जो तुम पहले से बना कर के रखे हुए हो|

क्या सकारात्मक, क्या नकारात्मक?

बात को समझो|

श्रोता: सर, हम अन्धविश्वास को क्यूँ मानते हैं?

वक्ता: कह भी रहे हो कि अन्धविश्वास है और मान भी रहे हो?

 श्रोता: सर, मानते तो हैं|

 वक्ता: तो क्यूँ मान रहे हो, तुम बताओ। मैं कैसे बताऊँ, मैं तो नहीं मानता न? जब अंध, ‘अंध माने क्या?’

 सभी श्रोता: अँधा

 वक्ता: जब अंधविशवास है, तो उस पर अंधे ही तो विश्वास करेंगे। आँख खोलो, नहीं मानोगे। और जब तक तुम अंधे हो, तुम्हें विश्वास करना ही पड़ेगा। एक तरीके से देखो तो हर विश्वास अंधविश्वास है। एक तरीके से अगर देखो तो प्रत्येक विश्वास अंधविश्वास ही है|

अगर यहाँ पर एक अँधा है, अंध शब्द है इसीलिए अंधे को ले लेते हैं। अगर यहाँ पर कोई अँधा है तो उसको यह विश्वास करने की ज़रूरत पड़ेगी कि इधर दरवाज़ा है। वो विश्वास पर चलेगा। वो कहेगा थोड़ी दूर ऐसे जाना है, फिर बाएँ को मुड़ लेना है, फिर दरवाज़ा आ जाएगा। उसे विश्वास ही करना पड़ेगा|

अगर तुम्हारे पास आँखें हैं, तुम अंधे नहीं हो; तो क्या तुम्हें विश्वास करने की ज़रूरत है? तुम क्या करोगे? तुम जानोगे, तुम देख लोगे स्पष्ट। तुम विश्वास पर क्यूँ चलोगे? हम विश्वास इसीलिए करते हैं क्यूँकी हमने अपनी आँखें बंद कर रखी हैं, उसी का नाम अंधविश्वास है|

श्रोता: सर, जब रात में सोने जाते हैं तो दिनभर जो सारे काम किए वो अपने आप दिमाग में आने लगते हैं या फिर बहुत सारे विचार आने लगते हैं। सोना चाहते हैं पर सो भी नहीं पाते|

वक्ता: सवाल है कि जब सोने जाते हैं तो दिन भर जो किया है, जो हुआ था, सब उस चीज़ का बारीक से बारीक विश्लेषण चालु हो जाता है। इसी को बोलते है छत्रांगवेषण। छोटे-छोटे जो छेद हैं, उन पर देखना, बाल की खाल निकालना, इधर-उधर दिमाग का भटकना, तो नींद नहीं आती है। तो विचारों को कैसे रोकें कि नींद आ जाए?

विचारों को रोकने से नींद का कोई संबंध नहीं है। जब नींद न आ रही हो तो जा कर तीन मील दौड़ आओ! फिर सब विचार रुक जाएँगे, बहुत जोर की नींद आएगी। नींद शारीरिक प्रक्रिया है, उसको एनफोर्स करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि परात मैं नींद लेकर आऊँगा। नींद नहीं आ रही- चल नींद तुझे आना पड़ेगा!

नींद हमारी एक स्वाभाविक सहज क्रिया है जो तभी आएगी जब उसे आना होगा। तुम उसे क्यूँ ज़बरदस्ती लाना चाहते हो? नहीं आ रही तो बैठ जाओ, कुछ और कर लो। जब थक जाओगे अपने आप आएगी। एक थके आदमी को यह सोचना पड़ता है कि नींद क्यूँ नहीं आ रही? तुम्हें नींद इसलिए नहीं आ रही क्यूँकी अभी तुम्हारा वक़्त नहीं हुआ। तुम क्यूँ कोशिश कर रहे हो सोने की? कुछ पढ़ लो अच्छा, कुछ सुन लो, नाच लो, दौड़ लो, जो भी कर सकते हो करो|

श्रोता: सर, जब नींद नहीं आएगी। कॉलेज के समय पर ही नींद आएगी|

वक्ता: जब कॉलेज के समय नींद आएगी, सो तो पाओगे नहीं। नतीजा यह होगा कि शाम को जब घर पहुचोगे तो खूब बढ़िया नींद आएगी|

श्रोता: शाम को कॉलेज का होमवर्क करना होता है, रात को उसी समय में सोना चाहती हूँ|

वक्ता: ये सब चाहिए-वाहिए कुछ नहीं होता न शरीर के साथ। यह फिर तुम वही कोशिश कर रही हो कि एक नियम बना लिया जाए क्यूँकी बचपन से तुम्हें बता दिया गया है कि जो इतने बजे सोतीं हैं वो अच्छी बच्चियाँ होती हैं। जो प्रातः काल, ब्रह्म-मुहूर्त में उठ कर के पढ़ती हैं वो अच्छी लड़कियाँ कहलाती हैं, तो यही सब तुम करने की कोशिश कर रहे हो|

यह सब बेकार की बातें हैं। सब के शरीर का अपना चक्र होता है, उसके ऊपर कोई ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए। नींद नहीं आ रही तो नहीं आ रही। जब आएगी तो आएगी|

श्रोता: सर, मेरी सबसे बड़ी परेशानी है कि गुस्सा बहुत आता है। इसे कैसे काबू में रखें?

वक्ता: मैंने कुछ उल्टा-सीधा जवाब दे दिया तो मारोगे मुझे फिर!? जब ऐसी परेशानी है गुस्से की तो फिर तो यही होगा। कहाँ है तुम्हें गुस्से की परेशानी? अगर गुस्से की परेशानी होती तो अभी तो तुम गुस्सा होती न, सवाल नहीं पूछती। वहाँ से कुछ फेंक कर मारती|

श्रोता: नहीं सर, बहुत जल्दी आ जाता है। हर छोटी-छोटी बात पर।

वक्ता: अभी है गुस्सा? अभी नहीं है न? अभी क्यूँ नहीं है? अभी इसलिए नहीं है क्यूँकी अभी तुम ध्यान में हो। आदमी जब भी डूबा होता है इस वर्तमान क्षण में, तो यह दिमाग के जितने भी विचलन होते हैं न जिनमें गुस्सा, शोभ, सब जो ऊट-पटांग दिमाग में होती है उस सब के लिए कोई जगह नहीं बचती|

अभी तुम ध्यान से सुन रही हो इसलिए गुस्से का सवाल ही पैदा नहीं होता। हाँ, अभी यह यहाँ पर एक सिनेमा हॉल हो और यहाँ हू-हाहल्लड़, यह सब हो रहा हो, बगल वाला बैठ कर तुमको परेशान कर रहा हो, फिर देखो गुस्सा; क्यूँकी तब ध्यान का सवाल पैदा नहीं होता न। तब तो सिर्फ विचलन ही विचलन है। इधर-उधर, डिस्ट्रैकशंस, परेशानियाँ; किसी एक चीज़ में तुम डूबे ही नहीं हुए हो|

तुम बहुत डूब कर के गणित का एक सवाल कर रहे हो। गुस्सा आ सकता है उस समय पर? न गुस्सा रहता, न शांति रहती। सिर्फ वो तन्मयता रहती है; सिर्फ वो डूबा हुआ होना होता है। ठीक है न?

श्रोता: हाँ, सर|

वक्ता: ऐसा भी नहीं है कि गणित का एक सवाल लगा रहे हो और मन में बहुत करुणा उठती है। ऐसा होता है क्या? वो भी नहीं होता। सिर्फ वो सवाल होता है। ये सारी बातें कि गुस्सा आता है, यह सब इसीलिए होती हैं क्यूँकी जो हो रहा होता है उसमें तुम होते नहीं|

जो भी वर्तमान में चल रहा है, जैसे अभी सुन रही हो न? अगर इसी तरीके से ऐसे ही ध्यानमग्न रहो हमेशा जो भी हो रहा हो उसके प्रति। मैं गंभीर होने की बात नहीं कह रहा, मैं जागरुक होने की बात कह रहा हूँ। जो भी हो रहा है उसके प्रति जागरुक हो तो गुस्से की जो क्षमता है, वो एकदम कम हो जाएगी। जब तुम सब-कुछ के प्रति जागरुक होगी तो ‘गुस्सा आ रहा है’, इसके प्रति भी जागरुक होगी। गुस्सा चढ़ता जा रहा है, इसके प्रति भी जागरुक हो जाओगी और जब इसके प्रति तुम जागरुक हो गयीं तो बहुत ज़्यादा फिर चढ़ेगा नहीं। गुस्सा सिर्फ तब ही चढ़ सकता है जब तुम्हें अपन कोई होश ही न हो। तो गुस्से की और कोई दवा नहीं है।

गुस्सा क्या, किसी भी मानसिक बीमारी की कोई और दवा नहीं है। एक ही दवा है- ध्यान, जागरूकता, होश|

श्रोता: सर, हैज़िटेशन को कैसे हटा सकते हैं और आत्मविश्वास को कैसे बढ़ा सकते हैं?

 वक्ता: इतने सारे लोग यहाँ बैठे हुए थे जो सवाल पूछ के चले गए। अब यह गिने-चुने बैठें हैं लोग, उनमें तुम भी रुके। दो-ढाई घंटे से ऊपर हो गया है, रुके हुए हो। इन सब लोगों के बीच भी तुम हाथ उठा कर कह रहे थे कि मुझे सवाल पूछना है। अभी तुम ज़ोर-ज़ोर से बोल रहे थे सर, सर। क्या नाम है तुम्हारा?

श्रोता: राज|

वक्ता: कितने लोगों को लगता है कि अभी राज हैज़िटेशन दिखा रहा है? क्या यह हैज़िटेशन दिखा रहा है?

सभी श्रोता: नहीं, सर|

वक्ता: पर सवाल देखो क्या है उसका, ‘हैज़िटेशन कैसे दूर करें?’ हैज़िटेशन क्या अभी है? तो हैज़िटेशन फिर कहाँ है? हैज़िटेशन कहाँ है? उसके मन में है न; एक कल्पना है। अभी जब तुम ध्यान से सवाल पूछ रहे हो बेटा तो हैज़िटेशन है कहाँ? है कहीं हैज़िटेशन? दिखाओ? पकड़ कर दिखाओ? और हैज़िटेशन होता तो क्या तुम सवाल पूछ पाते क्या?

जिनको हैज़िटेशन था वो चुप ही बैठे रह गए। रह गए कि नहीं रह गए? यह तो खड़ा हुआ है बिलकुल और बोल भी रहा है और ज़ोर से आवाज़ लगा कर बोला, ‘सर, सवाल पूछना है’। यह हैज़िटेशन है इसको क्या? कहीं दिखा रहा है? हैज़िटेशन है, इसके मन की कल्पना में। वो कल्पना छोड़ दो|

तुमने अपनी एक छवि बना रखी है। तुम्हारे मन में तुम्हारी एक पहचान है। उस पहचान में तुम्हें हैजीटेंट नज़र आती है। वो झूठी है। उसको त्याग दो। उसका झूठ जब दिख जाएगा तब वो स्वतः ही हट जानी है, प्यार हो ही जाना है। तुम कहीं हैज़िटेंट नहीं हो। बिलकुल भी नहीं हो। बस एक खयाल है। यह जान लो कि बस एक खयाल है और वो गया|


 ‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: मन के बहुतक रंग हैं (This flickering mind)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: विश्वास क्या है? (What is trust?)

लेख २:जानना ही मुक्ति 

लेख ३: न रोने में, न हँसने में


सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

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