प्रेम उम्मीद नहीं रखता

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2श्रोता: सर, मैं देखती हूँ कभी-कभी कि कोई मेरे बारे में कुछ बोल देता है तो चोट लग जाती है। ये क्यूँ होता है?

वक्ता: उम्मीद रहती है तुम्हें कि कुछ अच्छा-अच्छा बोल देंगे, जब बुरा-बुरा बोल देते हैं तो बुरा लग जाता है। जो बात है वो तो बड़ी ही सीधी है। जिसको अच्छा सुनने पर अच्छा नहीं लगेगा, उसे बुरा सुनने पर?

(सभी श्रोतागण): बुरा भी नहीं लगेगा।

वक्ता: अगर बुरा सुनने पर बुरा लग रहा है तो सीधा अर्थ है कि अच्छा सुनने पर बड़े मज़े लूटती हो!

अब इच्छा तो तुम्हारी यह है कि सब अच्छा-अच्छा बोलें, इसको हिंदी में बड़ा सीधा-सीधा कहते हैं कि, ‘मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कड़वा..? थू’। अच्छा-अच्छा बोलो तो हम स्वीकार कर लेंगे। मैं आकर बोलूँ, ‘कितनी सुन्दर है’।

(श्रोता की तरफ इशारा करते हुए) क्या नाम है तुम्हारा?

श्रोता: सोनल।

वक्ता: ‘सोनल से ज़्यादा ख़ूबसूरत और होशियार लड़की न हुई थी, न होगी’। अब सोनल कहेगी, ‘यह पहला आदमी मिला है’। ‘जिसमें कुछ अक्ल है,बाक़ी तो आसपास ये गधे-घोड़े हैं’, इनके बीच में हीरा बैठा हुआ है, कद्र ही नहीं की इन्होंने’ और अभी यहाँ से बोल दें कि, ‘’सोनल, कैसी हो रही हो? उदास, मायूस। कोई रंग-ढंग नहीं है, कोई सुन्दरता नहीं दिखाई पड़ रही है,’’ तो कहोगी, “चले आते हैं, समय ख़राब कर दिया। ज़बरदस्ती सवाल पुछवाते हैं, अरे! नहीं पूछना था। दस बार बोला मैं भी झांसे में आ गई मैंने भी पूछ दिया। पहले तो सवाल पूछो फिर बेईज्ज़ती करवाओ”!

अब मैं तुमसे बात कर रहा हूँ, मैं अगर उम्मीद करने लग जाऊँ कि तुम बड़ी तालियाँ बजाओगे तो मुझे बड़ा अफ़सोस होगा, जब तुम तालियाँ नहीं बजाओगे। अभी एक सुबह संवाद हुआ उसमें इन लोगों ने फीडबैक फॉर्म  बाँट दिए, अब उसमें लड़कों ने लिखा होगा नौ-दस, वही जो लिखा जाता है, तो एक दो जो थे उन्होंने जो भी लिखा था उसके आगे माइनस  लगा दिया!

अब अपनी समझ से उन्होंने यह कोशिश की थी कि ये सब देख के मुझे बड़ी चोट पहुंचेगी, मैं कष्ट से मर जाऊंगा, दूसरा संवाद होगा ही नहीं। ऐसी शक्ल बना दी उस फीडबैक फॉर्म  की, कि पूछो मत। ऐसा हो भी जाता अगर मैं उम्मीद लेकर आया होता कि मुझे अच्छा-अच्छा कहेंगे। जिसको अच्छे की उम्मीद होगी उसे बुरे से बहुत बुरा लगेगा, बहुत बुरा लगेगा। जिसे कोई भी उम्मीद होगी उसको मायूस होना ही पड़ेगा, सोनल। मायूसी से बचना है, तो उम्मीदों को देखो कि कितनी झूठी होती हैं।

 हर उम्मीद उपजती भी मायूसी से है और अंत भी उसका मायूसी में ही होता है।

मैं दो बातें कह रहा हूँ- तुम उम्मीद करोगी नहीं, अगर अभी जो हो रहा है उसमें तुम्हें बहुत मज़ा आ रहा है। अभी जो चल रहा है, अगर ये बिल्कुल मस्त चीज़ है तो आगे की उम्मीद करनी किसे है? तो उम्मीद का जन्म भी मायूसी से होता है और उम्मीद का अंत भी मायूसी में होता है क्योंकि आज तक किसी की उम्मीदें पूरी हुई नहीं, तुम अपवाद नहीं हो सकतीं। आज तक किसी की उम्मीदें पूरी नहीं हुई हैं। जो खुश रहे हैं, उन्होंने बस एक राज़ जान लिया है-

उम्मीदें दुख का इंतज़ाम हैं; दुःख से ही उठती हैं और दुःख में ही गिरती हैं।

 जो दुखी नहीं है वो उम्मीद करेगा ही नहीं और जो उम्मीद कर रहा है वो और दुखी हो जाएगा। अगर अभी तुम मस्त हो तो क्या उम्मीद करते हो आगे की? तुम बैठे हो और तुम्हारे सामने, तुम्हारा सबसे पसंदीदा खाना रखा हुआ है, तुम खा रहे हो, खाने में बिल्कुल मग्न हो गए। उस वक़्त उम्मीद करते हो कि कल भी यही मिले और परसों भी यही मिले? करते हो क्या? जब एक क्षण पूरा होता है तो उसमें मौज होती है, आनंद, तो आगे की उम्मीद आदमी करता है नहीं। कैसी भी उम्मीद, न ये उम्मीद कि कोई मुझ पर टिप्पणी करेगा न ये उम्मीद कि कोई मुझ पर टिप्पणी नहीं करेगा। अरे! कर दिया तो उसकी मर्ज़ी, नहीं करा तो ये भी उसकी मर्ज़ी। हम मौज में हैं, तुम कर दो तो भी अच्छी बात और न करो तो और भी अच्छी बात, हम मौज में हैं।

श्रोता: सर, मैं आपसे बिलकुल सहमत हूँ ,लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि ये मानव का स्वभाव है?

वक्ता: नहीं, उसको स्वभाव मत बोलो, आदत है। आदत को स्वभाव मत बोलो। तुम कोई आदत बना लो क्योंकि पिछला बीस-बाईस साल का जीवन एक प्रकार का रहा है, तो वो आदत तुम्हारा स्वभाव नहीं हो गई। उसको स्वभाव मत बोलो, स्वभाव माने स्वभाव, स्व-भाव – अपना भाव। आदत बाहर से आती है, उसमें स्व कहाँ है? अब कोई आदत बना ले गाली देने की और फिर बोले ये तो मेरा स्वभाव है, तो गलत बोल रहा है न। इसमें स्वभाव जैसा कुछ नहीं है, ये तुमने सीख लिया है। जो सीखा जाए वो स्वभाव नहीं, वो आदत हो सकती है।

स्वभाव होता है जो तुम हो ही, जो तुमने सीखा नहीं है, जो तुम हो ही, वो स्वभाव होता है। तो उम्मीद करना, अपेक्षा रखना, इसमें स्वभाव नहीं है। बच्चा अपेक्षा नहीं रखता; अपेक्षा हमेशा भविष्य की होती है। जब तुम भी बच्ची थीं तो कल के बारे में नहीं सोच रहीं थीं, अभी में जी रहीं थीं। यह कल की सोचना, उम्मीदें रखना, यह सब तुमने सीख लिया है। तुमने देख लिया है कि दोस्त होते हैं और अंग्रेजी में वो कहावत पढ़ ली तुमने, फ्रेंड इन नीड इज़ फ्रेंड’?

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): इन्डीड।

वक्ता: अब तुमने कहा ”ठीक, मतलब कि जो मेरी ज़रूरत में मदद करे, वो मेरा दोस्त है।’’ अब तुम उम्मीद करोगे कि? ‘’जब भी मुझे ज़रूरत होगी तो सामने वाला मेरी मदद करेगा, क्योंकि तुम्हारी अंग्रेज़ी टीचर  ने सिखा दिया था कि, ‘ फ्रेंड इन नीड, इज़ फ्रेंड इनडीड। ये तुमने सीख लिया है और सीखने के कारण तुम्हारी उम्मीदें उठ गई हैं, सीखा न होता तो उम्मीद भी न करते। जैसे ही तुम ये बात जानोगे कि ये जो मेरी उम्मीदें हैं, ये एक बाहरी प्रभाव के कारण उठती हैं। जब भी समझोगी इस बात को तो फिर उम्मीद का जो ज़ोर होता है वो कम हो जाएगा। फिर, तुम उतनी ज़ोर से उम्मीद कर ही नहीं पाओगी।

अभी पिछली बार ही संवाद में एक आया, बोलता है, ‘’सब समझ में आ गया, बहुत अच्छा था पर ये भी पता है कि उस दरवाज़े के बाहर सब गायब हो जाएगा। अभी यहाँ पर सब समझ में आ रहा है, एक-एक बात ठीक लग रही है पर जैसे ही उस दरवाज़े से बाहर निकलूंगा, फिर खत्म। क्या करूँ?’’ मैंने कहा तुम जानो, तुम्हारी ज़िन्दगी है। यहाँ पर तुम्हें एक माहौल मैंने दिया, मैं तुम्हारे साथ चौबीस घंटे नहीं रह सकता, आगे तुमको अपने लिए माहौल खुद बनाना है। अगर तुम ऐसे लोगों के साथ हो हर समय, जो तुम्हारे दिमाग में उम्मीदें ही उम्मीदें भर रहे हैं, तो निश्चित बात है कि तुम्हारा दिमाग भी कूड़ा होकर के रहेगा।

बचो, सावधान हो जाओ, जब भी उम्मीदों की बात उठे सतर्क हो जाओ कि आ रहा है है कूड़ा, आया कूड़ा, आया और बच गए, निकल गया कूड़ा। तुम्हारी ओर पत्थर आता है तो क्या करते हो? अभी पत्थर फेंक के मारूं तो क्या करोगे? एकदम से बचोगे। तो बिल्कुल ऐसे ही सतर्क रहो कि आया उम्मीदों का कूड़ा और आया नहीं कि सट जाओ दाएं, और अगर मन में करुणा है तो ये भी करो कि वो कूड़ा जहां भी जाकर गिरा है उसको साफ़ भी करदो कि किसी और को न मिल जाए। पर दूसरे को बचाओ उससे पहले खुद को बचाना तो ज़रूरी है ही। और अक्सर तुमसे उम्मीदें बड़े अच्छे क्षणों में बिठाई जाती है, तुम्हें लगता है ये तो प्रेम है।

भारत में आधी शादियाँ होती ही इसीलिए हैं क्योंकि तुम्हें किसी की उम्मीदें पूरी करनी हैं। और सारे के सारे बच्चे इसीलिए पैदा होते हैं क्योंकि तुम्हें किसी की उम्मीदें पूरी करनी हैं। बड़ा भयानक किस्म का मामला चल रहा है, दो लोग बच्चे पैदा कर रहे हैं किसी तीसरे की उम्मीद पूरी करने के लिए।

हँसो मत। मैंने कहा ज़्यादातर बच्चे पैदा ही ऐसे होते हैं, ज़्यादातर का अर्थ समझते हो?

(सभी श्रोतागण की तरफ इशारा करते हुए) ज़्यादातर ।

दुनिया को आपसे उम्मीदें हैं, शादी हो गई, तीन चार साल हो गए अब घर भर जाना चाहिए। और दुनिया को नहीं, तो तुम्हें अपने आप से उम्मीदें हैं। अब यह आपकी उम्मीद है और आप अपनी उम्मीद को पूरा करना चाहते हैं। बचो! जब भी देखो कि ये सब हो रहा है, तो तुरंत तुम्हारे कान सतर्क हो जाएं, गड़बड़। यहीं पर मामला गड़बड़ाएगा, अगर बच लिए तो बच लिए नहीं तो फिर फँस गए और गए। तुम दूसरों की उम्मीदें इसलिए पूरी करना चाहते हो न कि उन्हें सुख मिले, उन्हें ख़ुशी हो? उन्हें ख़ुशी तभी दे पाओगे — एक बिल्कुल आधारभूत नियम समझ लो — दूसरे को ख़ुशी तभी दे पाओगी, जब ख़ुद खुश हो। जब अपनी ऐसी हालत है कि अपना कोई रस बचा ही नहीं, तो तुम दूसरों को कैसे रसपूर्ण करोगे? जब खुद रसपूर्ण हो जाओगे तो दूसरों को भी दे सकते हो।

श्रोता: सर, रसपूर्ण तो दूसरों की वजह से हैं।

वक्ता: रसपूर्ण तुम दूसरी वजह से नहीं हो।

श्रोता: सर, जब बच्चा पैदा होता है और उसके माँ-बाप उसकी मदद न करें तो वो कैसे रसपूर्ण होगा?

वक्ता: बच्चे को जो कुछ बाहरी दिया जाता है, वो बाहरी ही है। जो असली है वो कोई बाहरी आदमी नहीं दे सकता। माँ-बाप शब्द दे सकते हैं, मैं भी यहाँ बैठ कर तुम्हें शब्द दे रहा हूँ, पर उनको समझ कौन रहा है? तुम। समझने की ताकत कोई माँ-बाप नहीं दे सकता; और वही असली है, वही वो कीमती चीज़ है जो तुम्हारी है वरना इतने शब्द इस माइक  को दे रहा हूँ, क्या हुआ इसके साथ? बड़ा हो गया क्या यह?

श्रोता: सर, हम सबको एक दूसरे की मदद की ज़रूरत है।

वक्ता: बेटा! मदद किन मामलों में? मदद इस मामले में तो की जा सकती है कि तुमको ज्ञान दे दिया जाए पर मदद इस मामले में नहीं की जा सकती है कि तुमको आतंरिक विश्वास दिया जाए; मदद इस मामले में नहीं की जा सकती कि तुमको आँख दे दी जाए, वो तुम्हारे पास हैं। दिमाग का तत्त्व तुमको दिया जा सकता है पर तुम्हें दिमाग नहीं दिया जा सकता। दिमाग का तत्त्व, उसमें भरा क्या है? यह तो कोई बाहरवाला दे सकता है पर जो असली चीज़ है वो है दिमाग, वो तुम्हें कोई नहीं देता, वो तुम्हारा अपना है, वो चेतना तुम्हारी अपनी है। बिल्कुल इस दबाव में मत रहना कि तुम्हारा जीवन किसी ने बक्शा है या उधार दिया है।

जिन्होंने जाना है, उन्होंने हमेशा से जाना है कि बच्चे माँ-बाप के माध्यम से आते हैं, माँ-बाप के नहीं होते। दुनिया के एक-एक समझदार आदमी ने यही कहा है, ‘योर चिल्रेन कम थ्रू यू, बट दे आर नॉट योर्स ।’ जो भी समझदार माँ-बाप हों, वो अपने बच्चों को अपना न मान लें — अपना का मतलब दावेदारी, मालकीयत, ये न समझ लें। तुमसे उनका शरीर आ गया है, वो भी तुम्हारे सुख के क्षण थे, तुम्हारे सुख के क्षणों में जब तुम सुख मना रहे थे, उन सुख के क्षणों में उस बच्चे का शरीर आ गया। उस बच्चे का जो तत्व है वो कोई नहीं देता उसको, कोई भी नहीं दे सकता तो इस आधार के तले दबे मत रहना कि ‘’मेरे कंधों पर तो बहुत बड़ा उधार है।’’

प्रेम का रिश्ता हो बहुत अच्छी बात है; प्रेम के कारण अगर तुम किसी के लिए कुछ करना चाहो, इससे सुन्दर कुछ नहीं हो सकता पर उधार चुकाने के लिए कुछ मत करना कभी। जो करना प्रेम के कारण करना, वो सब बातें नहीं कि, ‘’उधार चुकाना है, किसी ने मेरे लिए कुछ किया उसके लिए भी करना है’’। नहीं, क्योंकि जब तुम उधार चुकाते हो न, तो उसमें बड़ी हिंसा होती है, उसमें प्रेम बिल्कुल होता ही नहीं। ‘जब मैं उधार चुकाऊंगा तो इतना ही चुकाऊंगा जितना लिया है और जब मैं प्रेम में देता हूँ तो असीमित देता हूँ’। उधार किसी से अगर दस रूपये लिए हैं, तो बारह चुका दोगे, थोड़ा ब्याज़ भी दे दिया।

प्रेम में दिया जाता है तो असीमित दिया जाता है।

हममें से ज़्यादातर लोग उधार वाली मानसिकता में जीते हैं। उधार का अर्थ ही यही है कि, ‘किसी ने मेरे लिए इतना कुछ किया है, तो मैं भी उसके लिए करूँ’। ये लेनदेन है, व्यापार है, यह प्यार नहीं है कि ‘तुमने मेरे लिए इतना किया अब मैं भी तुम्हारे लिए कर रहा हूं’, ये व्यापार में होता है। प्रेम बिल्कुल ही दूसरी चीज़ है, उसको हम जानते ही नहीं, उसको हम बिल्कुल नहीं जानते फिर इसीलिए हालत मुरझाई रहती है।

श्रोता: सर, उम्मीदें बढ़ जाती हैं कि मैंने उसके लिए इतना किया और उसने कुछ नहीं किया।

वक्ता: ये भी देखो उम्मीदों का खेल, कि ‘’मैंने तेरे लिए इतना कुछ किया, अब तू चुका।’’ और एक बात ध्यान में रखना जब तुम किसी से उम्मीद में रहते हो कि,‘‘तुम्हारे लिए इतना कर रहा हूँ,’’ तो हमेशा तुम उससे वापिस मांगोगे ही मांगोगे, और वो नहीं देगा तो तुम उसको सौ तरह के ताने भी दोगे। तुम बुरा भी अनुभव करोगे कि ‘इसके लिए इतना कुछ करा और इससे कुछ मिल नहीं रहा है’।

अभी सुबह एक श्रोता ने कहा कि उसका गाँव है, वहाँ अभी एक घटना हुई है कि एक बाप ने अपनी बीस साल की लड़की का गला काट दिया सोते समय क्योंकि वो अपनी मर्ज़ी से कहीं पर जाना चाहती थी। पूछा, ‘सर, ये कैसे है? बाप-बेटी में तो प्रेम होना चाहिए और बड़ी भयानक घटना घटी है।’ मैंने कहा कि ‘’भयानक वो घटना नहीं जो उस रात को हुई, भयानक है उस लड़की का बीस साल का जीवन। जो बाप ये काम कर रहा है उसने कभी प्रेम जाना ही नहीं, अच्छा हुआ उस रात मर गई वरना बीस साल से वो जी कैसे रही थी।

मैं बताता हूँ कैसे जी रही थी, उसको बाप ने लगातर यही सोच के बड़ा किया था कि, ‘ये है, इसको पैदा मैंने किया, इसको पैसे मैंने दिए, इसको खिलाया-पिलाया मैंने, इसको शिक्षा मैंने दी। तो अब ये ज़िन्दगी जीएगी मेरी मर्ज़ी से’’- ये होता है, उधार की ज़िन्दगी में। ये होता है जब तुम कहते हो कि (हाथ जोड़ते हुए) ‘एहसान है आपका’।

तुम एहसान मान रहे हो और सामने वाला एहसान चढ़ा रहा है, और फिर जब तुम अपने हिसाब से एक मुक्त जीवन जीने की कोशिश करोगे, तो सामने वाला इतना झल्ला जाएगा कि कुछ भी कर सकता है। ‘’मैंने तुम में इतना निवेश करा है, मुझे उसकी वसूली चाहिए न!‘’ प्रेम में ऐसा नहीं होता, संबंध प्रेम के रहें, उनमें गिनती नहीं करी जाती कि, ‘तुम्हें कितना दे दिया और तुमसे मुझे कितना मिल गया’, वो लेनदेन नहीं होता। फिर उसमें चेहरा मुरझाया हुआ नहीं रहता, फिर तुम उसमें किसी की उम्मीदें नहीं पूरी कर रहे होते।

सही बात तो यह है कि प्रेम में उम्मीदें हो ही नहीं सकतीं। अगर कोई तुमसे वाकई प्रेम करता है तो वो तुमसे उम्मीद नहीं करेगा, वो तुम्हें मुक्त छोड़ेगा कि ‘’अपने हिसाब से अब जीयो जैसे जीना है।’ प्रेम का यही तकाज़ा है, वो उम्मीदें नहीं रखता, उम्मीदें तो आदमी अपनी गाय से रखता है कि इतना चारा खिलाया है तो अब इतने लीटर दूध दे दो।’ गाय बनना है? कि ‘’चारा खाया है, तो अब दूध दूंगी।” उम्मीदें आदमी अपनी गाड़ी से रखता है कि, ‘दस लाख की गाड़ी खरीदी है, तो इस तरीके से चलना चाहिए’ और नहीं चलेगी तो तुम्हें बड़ा गुस्सा आएगा। ‘दस लाख लगाए और चल नहीं रही है ठीक से, धोखा हो गया।’

प्रेम में उम्मीदें नहीं रखी जातीं, बेशर्त होता है, पहली बात ही यही है कि बेशर्त होता है।


‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: प्रेम उम्मीद नहीं रखता (Love hopes not)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: सम्बन्ध लाभ-आधारित, तो प्रेम-रहित 

लेख २:  प्रेम बेगार नहीं है 

लेख ३:  प्रेम क्या है और क्या नहीं 

सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट https://goo.gl/fS0zHf


Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s