चदरिया झीनी रे झीनी

झीनी-झीनी बीनी चदरिया


 काहे कै ताना, काहै कै भरनी,

कौन तार से बीनी चदरिया।

इंगला पिंगला ताना भरनी,

सुखमन तार से बीनी चदरिया।।

आठ कँवल दल चरखा डोलै,

पाँच तत्त गुन तीनी चदरिया।

साँई को सियत मास दस लागै,

ठोक-ठोक कै बीनी चदरिया।।

सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी,

ओढ़ी कै मैली कीनी चदरिया।

दास ‘कबीर’ जतन से ओढ़ी,

ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया।।

संत कबीर

 

प्रश्न: सर, पूरे जतन से ओढ़ी, फ़िर क्यों ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया?

वक्ता: सवाल उठता है कि “पूरे जतन से ओढ़ने के बाद वैसे का वैसा ही कैसे रह सकते हैं?” नहीं, ऐसा कुछ नहीं है कि यह समय की श्रंखला है, कि पहले ओढ़ी और फ़िर रख दी। सुनने में ऐसा लग सकता है कि चदरिया ओढ़ी, पहने रहे, फ़िर रख दी; ऐसा हो नहीं रहा। इसका अर्थ बस यही है कि जब पहन भी रखी है, तब भी पहन नहीं रखी है। यह कोई श्रंखलाबद्ध काम नहीं हो रहा है, ये एक के बाद एक नहीं आ रहे हैं; यह एक साथ ही हो रहा है।

यह समय की धारा का काम नहीं है। असल में सुनो इसको तो प्रतीत ऐसा होता है कि जैसे कहा जा रहा है कि जीवन भर मन को धारण किया और मृत्यु के क्षण में भी मन ऐसा था कि, साफ़, निर्दोष। सुनने में ऐसा लगता है कि “दास कबीर जतन कर ओढ़ी”  और फ़िर “ज्यों की त्यों धर दीनी”, उस पर कोई धब्बा नहीं लगा था। नहीं, ऐसा नहीं कह रहे हैं कबीर, क्योंकि कबीर जैसा आदमी अच्छे तरीके से जनता है कि समय अपने आपमें सत्य नहीं है। मृत्यु से अन्त होने वाला और जन्म से शुरू होने वाला जीवन अपने आपमें सत्य नहीं है। तो कबीर ये बिल्कुल नहीं कह रहें हैं कि जन्म के समय तुम्हें कोई चदरिया मिल जाती है जिसको तुम्हें मृत्यु के समय भी ज्यों की त्यों लौटा देना है, बेदाग़। नहीं, यह कबीर का आशय नहीं है। कबीर अच्छे से जानते हैं कि जन्म होता नहीं है। कबीर का आशय यही है कि जब प्रतीत भी हो कि मन है, विचार हैं, शरीर है, उस समय भी तुम आत्मभाव में स्थापित रहो।

जब चादर ‘है’, ऐसा लगे भी तो भी तुम चादर के साथ संयुक्त मत हो जाना; तुम वही रहना जो तुम हो। चादर गन्दी होती ही ऐसे है कि तुम चादर से जुड़ जाते हो अन्यथा चादर गन्दी नहीं होती। चादर को बाहर की धूल नहीं गन्दा करती, तुम्हारा तादात्मय गन्दा करता है। सच तो यही है कि चादर है ही नहीं कुछ तुम्हारे तादात्मय के अलवा। तादात्म्य हटा दो, चादर कहीं रहेगी ही नहीं।

कबीर जिस चदरिया की बात कर रहे हैं वो पारमार्थिक नहीं है; कोई चादर है ही नहीं। किस चादर की बात कर रहे हो? चादर जैसा कुछ है ही नहीं! कहाँ है चादर?

बस लगती  है कि ‘है’, है नहीं।

जिस क्षण तुम्हें लगने लग जाए कि चादर वास्तव में है, चादर गन्दी हो गई। बात समझ रहे हैं क्या बोल रहा हूँ? जिस क्षण तुम अपनी मानसिक कल्पनाओं को ही सत्य समझने लगो, जिस क्षण तुमने विचारों को और सोच को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया, उन्हें सच मान लिया, वही क्षण होता है चादर पर दाग लगने का।

बात को समझें।

यदि निरंतर यह बोध बना ही रहे कि यह सब कुछ जो है, ठीक है, पर ये ‘वो’ नहीं है। ये उसका तो है, पर ‘वो’ नहीं है। कृष्ण बोलते हैं न: ‘मम् माया’, तुम्हारी तो है, पर तुम नहीं हो। हम कुछ ऐसे हैं कि उससे भर नहीं मानेंगे जो तुम्हारा है, हमें तो सीधे-सीधे ‘तुम’ चाहिए। हम तुम्हारी चादर से नहीं संतुष्ट हो जाने वाले। हमें कौन चाहिए? हम तुम्हारी परछाई से नहीं संतुष्ट होने वाले, हालांकि तुम्हारी ही परछाई है, तो ख़ूबसूरत है। हम लड़ नहीं रहे तुम्हारी परछाई से, पर तुम्हारी परछाई की ख़ूबसूरती, तुम्हारी चादर की निर्दोषता, हमें और याद दिलाती है कि यदि परछाई इतनी ख़ूबसूरत है, यदि चादर इतनी उजली है, तो तुम कैसे होगे। तो इस कारण हम चादर पर रुकते ही नहीं; हम तो सीधे तुम्हारे पास आते हैं। हम पागल ही होंगे अगर तुम्हारी परछाई से लिपट जायें! परछाई से क्यों लिपट जायें? तुम तो हो न!

कबीर कह रहे हैं: “मुझे सीधे तुम्हारे पास आना है। मैं तुम में स्थित हूँ। मैं लगातार तुम्हारे साथ हूँ।” — फ़िर चादर गन्दी नहीं होती। सीधे-सीधे तो कहते हैं न उसके आगे: ‘मैली चदरिया आत्मा मोरी, मैल है माया जाल’,  मैल क्या है?  – ‘माया’। जो ‘नहीं है’, जब वो प्रतीत हो कि ‘है’, इसी को कहते हैं ‘मैल’।

मैल है माया जाल”

मेरा सच को सच न जान पाना ही चादर को गन्दा कर देता है — बस यही है, अन्यथा चादर नहीं गन्दी होगी।


शब्द योग सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, कबीर पर: चदरिया झीनी रे झीनी 

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: आचार्य प्रशांत, कबीर पर: न रोने में, न हँसने में (Neither in tears, nor in smiles)

लेख २: आचार्य प्रशांत, कबीर पर: सूरा के मैदान में,कायर फंसिया आए(The trouble is inside,why run outside?)

लेख ३: आचार्य प्रशांत, कबीर पर: शान्ति का प्रयास ही अशांति है (Noise is the effort to be silent)

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2 टिप्पणियाँ

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      स्थान: अद्वैत बोधस्थल, ग्रेटर नोएडा

      यह चैनल प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उन्हीं से आ रहा है |

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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