झूठी धारणाओं से भरा यदि मन, झूठे सम्बन्धों से भर जाएगा जीवन

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‘तुम अपने थे, अब पराये हो गए हो’, ऐसा कोई क्यों बोलता है?

वो ‘पराया’ है, इसलिए बोलता है!

पहले छुपा-छुपा परायापन था, अब दिखा-दिखा परायापन है। जो पहले परोक्ष था, अब समक्ष है, प्रत्यक्ष है। परायापन सदा से था, अपनेपन का पर्दा था, अपनेपन का भ्रम था। कई बार ढोंग था। अब बात ज़रा खुल गयी है। अब बात ज़रा परदे से बाहर आ गयी है। पहले स्वांग दोनों पक्षों की ओर से चलता था। पहला पक्ष भी बोलता था, ‘तुम मेरे हो’, दूसरा पक्ष भी बोलता था, ‘तुम मेरे हो’; था कोई कभी किसी का नहीं, कभी भी नहीं था। स्वार्थवश और मोहवश जुड़ाव था; स्वार्थ हट गए, मोह घट गया, जुड़ाव ख़त्म हो जाता है। पर अगर जुड़ाव ऐसे ख़त्म हुआ, तो स्वार्थ जब दोबारा आयेंगे, और मोह जब दोबारा उत्पन्न होगा, तो जुड़ाव फ़िर से आजायेगा।

एक दूसरा भी कारण होता है, जिसमें ये जो झूठा अपनापन होता है, ये हटता है। झूठा अपनापन तब भी हटता है जब आपके भीतर जो कुछ झूठा है वो हटे। झूठा अपनापन आपके संबंधों में तभी तक रहेगा जबतक आपके भीतर बहुत कुछ झूठा विद्यमान हो; जब आपका मन ही झूठ से भरा हुआ हो। जिसके जीवन से वो सब कुछ चला गया जो झूठा था, उसके सम्बन्धों से वो अपनापन भी चला जाएगा जो झूठा था। और तब ज़मीन तैयार होती है वास्तविक अपनापन लाने की, और तब संभावना पैदा होती है कि जो असली है वो उतर सके।

पर जो असली है वो आपके लिए बड़ा अपरिचित है, उसे आप जानते नहीं, आपकी परिभाषाओं में वो अपनापन कहलाता नहीं। आप जिसे प्रेम कहते हो, वैसा वो दिखता नहीं। वास्तविक अपनापन जब आपके सामने आयेगा तो वो आपको बड़ा पराया सा लगेगा। बड़ी हास्यास्पद बात है, पर बड़े दुःख की भी बात है। जो वास्तव में आपका अपना है, वो आपको बहुत पराया लगेगा क्योंकि जितने झूठे और पराये हैं उनको आपने अपना समझ रखा है, और वही आपकी परिभाषा बन चुकी है अपनेपन की; और परायेपन की परिभाषा भी अपनेपन की परिभाषा पर ही तो निर्भर होती है।

मैं दोहरा रहा हूँ, झूठे लोग आपकी ज़िन्दगी में इसीलिए मौजूद हैं, आपके सारे सम्बन्धों में झूठ इसीलिए मौजूद है क्योंकि आपके मन में लगातार झूठ ही झूठ मौजूद है। झूठ क्या है? संसार झूठ है, वही पहला और आख़िरी झूठ है – संसार। जिसके मन में संसार के लिए जितना ज़्यादा महत्व, जगह और सम्मान रहेगा, वो उतना ज़्यादा झूठ में जिएगा। जो अभी इस बोध में नहीं जी रहा कि संसार हल्की, सतही, बाहरी चीज़ है, और इससे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण कुछ और है, वास्तव में है, उसके जीवन में झूठ भरे ही रहेंगे।

जब तक संसार को आप गंभीरता से ले रहे हो, तबतक आपकी ज़िन्दगी में सब कुछ झूठा रहेगा; सब कुछ !

देखिये, आप जिसे अपना कहते हो, उसको ‘अपना’ कहने का कारण सिर्फ़ संसार है।

संसार क्या? जो इंद्रियों से दिखाई देता हो और मन जिसके बारे में सोच पाता हो। ठीक है न? ‘अपना’ शब्द की शुरुआत ही कैसे होती है आपके जीवन में? बच्चा सबसे पहले ‘अपना’ किसको बोलता है? माँ को। और माँ को क्यों ‘अपना’ बोलता है? क्योंकि शरीर मिला है माँ से। और माँ के शरीर की बहुत कीमत है बच्चे के लिए।

बात समझ रहे हो?

माँ का अर्थ ही है ‘संसार’। तो ‘अपने’ की परिभाषा ही यही हो जाती है आपकी कि जिनसे आपका शरीर का रिश्ता हो। और संसार कुछ नहीं है, शरीर ही तो है; शरीर माने पदार्थ, वस्तुएं, जो आपको दिखाई पड़ती है, जिन्हें आप छू सकते हो। और माँ का अर्थ ही यही होता है जिसने आपको शरीर दिया। अपनेपन की आपकी परिभाषा ही ‘माँ’ से होकर गुज़रती है। पिता आप किसको बोलते हो? जो आपकी माँ का पति है, आपके सारे रिश्ते माँ से होकर गुज़रते हैं, और ‘माँ’ माने ‘शरीर’, ‘माँ’ माने ‘संसार’।

अपनेपन की आपकी पूरी परिभाषा शरीर-केन्द्रित और संसार-केन्द्रित है।

आपका कोई ऐसा रिश्ता है अपनापे का जो शरीर-केन्द्रित न हो?

आप तो सबसे पहले यही कहते हो न कि घरवाले अपने होते हैं, सगे-सम्बन्धी अपने होते हैं। आपका अपनापन जब तक शरीर-केन्द्रित रहेगा, जब तक आप ये कहते रहोगे कि मेरे अपने वो हैं जिनसे मेरा शरीर का रिश्ता है, चाहे वो माँ-बाप हों, चाहे पति-पत्नी, और चाहे बच्चे, इन सबके साथ आपका शरीर का रिश्ता है, तब तक आप कभी जान नहीं पाओगे कि वास्तव में आपका ‘अपना’ क्या है; कभी जान नहीं पाओगे!

‘अपना ’ वो होता है, जिससे आपका शरीर का नहीं, मित्रता का, और प्रेम का, आत्मा का रिश्ता होता है ; सिर्फ़ वो आपका अपना है।

बाकि सारे रिश्ते संसार के हैं, और शरीर के हैं, और पदार्थ के हैं, और झूठे हैं! वो इन्द्रयों के रिश्ते हैं, वो मानसिक हैं।

बात समझ में आ रही है?

‘अपना’ आप किसको बोल रहे हो? जब तक आप शरीर से जुड़े रिश्तों को ‘अपना’ बोल रहे हो, तब तक आप ये कह रहे हो कि मेरा ‘अपना’ शरीर ही तो है। अगर शरीर से जुड़े रिश्तों में अपनापा है, तो आपका ‘अपना’ क्या हुआ सर्वप्रथम? शरीर।

तो फ़िर आपकी परिभाषा क्या हुई:

मैं कौन ?

मैं देह ! 

और अगर आप देह हो, तो आप कष्ट से बच सकते कैसे हो?

ब्रह्मचर्य की आप बातें करते हो आशुतोष जी (श्रोता को संबोधित करते हुए), ब्रह्मचारी वही नहीं होता जो औरतों से दूर रहे। ब्रह्मचारी वो होता है जो शरीर से जुड़े हुए सारे रिश्तों से दूर रहे। जिसके सारे रिश्ते मित्रता के हों, प्रेम के हों, आत्मा के हों। अगर आप अपने कुटुंब-कबीलों को ही ‘अपना’ मानते हैं, तो आप ब्रह्मचारी कहाँ से हो सकते हैं?

ब्रह्मचारी तो मात्र ब्रह्म को ‘अपना’ मानता है। और अगर आपकी आँखों के सामने दिन-रात वही लोग हैं जिनसे आपका रक्त का और मॉस-मज्जा का रिश्ता है तो आपको दिन-रात याद भी क्या आएगा? कि मैं शरीर हूँ, और क्या!

स्त्री आपको सदा क्या याद दिलाती है? यही न कि तुम पुरुष हो, शरीर हो! और माँ-बाप भी सदा तुम्हें यही याद दिलाते हैं कि तुम शरीर ही तो हो। ये किस्से तो आपने खूब सुने होंगे कि संसारी घर में रहता है और सन्यासी घर से बाहर रहता है। और घर से बाहर होने का अर्थ आपने बस इतना ही लगा लिया है कि जो सन्यासी होता है वो औरतों से दूर रहता है। और आपने ये कभी नहीं देखा कि सन्यासी औरतों भर से ही दूर नहीं रहता, वो अपने कुटुम्ब-कबीलों से भी दूर रहता है, क्योकि कुटुंब-कबीलों से भी उसका रिश्ता है तो शरीर और मांस का ही न।

‘अपना’ आप किसको बोल रहे हो, ध्यान से देखना। जो भी कुछ आपको संसार से मिला है — और संसार सर्वप्रथम देह है — वो नहीं है आपका ‘अपना’, वो पराया ही है। भले ही वो अभी पराया उद्घोषित हुआ हो चाहे न हुआ हो। आज नहीं हुआ है तो कल हो जाएगा!

ज़रा ऐसों की संगत कीजिये जिनसे आपका रक्त का और देह का रिश्ता नहीं है। ज़रा ऐसों की संगत कीजिए जो आपको देह के पार किसी की याद दिलाते हों, मैं खुलकर कह रहा हूँ कि दिन-रात अगर आपको आपनी पत्नी और बच्चे की शक्ल दिखाई देती है तो आपको दिन-रात अपने बारे में भी क्या याद दिलाया जा रहा है? शक्ल ही तो याद दिलाई जा रही है कि तुम देह ही तो हो। और एक बात और समझिएगा, जिन लोगों से आपका देह का रिश्ता है, वो यही चाहेंगे कि आपके देह के दूसरे रिश्ते सघन हों, इसीलिए माँ हमेशा ये चाहती है कि बेटा शादी कर ले; क्योंकि माँ का बेटे से देह का रिश्ता है। वो तुरंत ये चाहती है कि बेटा देह के एक और रिश्ते में उतर जाए। माँ ये कभी नहीं चाहती कि बेटा परम-सत्य को जानने में उत्सुक हो। तुम अपने घरों में जाकर बताओ कि मेरी देह में नहीं, सत्य में रुचि है — तुम्हारी माँ थर्रा जायेगी; तुम्हारा पति थर्रा जाएगा; जितने भी लोगों का तुम्हारे से देह का रिश्ता है, वो काँप उठेंगे जब तुम उन्हें  बताओगे कि तुम्हारी देह में नहीं, सत्य में रुचि है। उनका स्वार्थ ही इसी में है कि तुम देह से ही लगे रह जाओ।

‘अपने’ और ‘पराये’ का वास्तविक अर्थ समझिये। जब आप समझेंगे तो आप अपनेआप को उचित माहौल दे पायेंगे। तब आप परेशान नहीं होंगे। आपके सवाल में परेशानी झलक रही है। आपके ऊपर कटाक्ष किये जा रहे हैं और उनसे आप चोट खा रहे हैं, आपको बुरा लग रहा है। कोई आपसे आकर कह देता है कि ‘तुम अपने थे’ और अब ‘पराये हो गए हो’, और आप इस बात से घायल हो जाते हैं, द्रवित हो जाते हैं क्योंकि आप समझ भी नहीं रहे हैं कि ‘अपना’ वास्तव में क्या है और क्या-क्या है जो ‘पराया’ है।

किसकी शक्ल देख रहे हो दिन-रात, जिनसे देह का रिश्ता है?

बहुत कष्ट में रहोगे!

इन्द्रियों से दिन-रात यही सूचना दी जा रही है तुम्हें, दिन-रात उन्हीं की शक्ल देख रहे हो न, वही जा रहे हैं आँखों के माध्यम से — देह! देह! देह! — बहुत कष्ट में रहोगे!

देखो, तुम अश्लील चित्र देखते हो, अश्लील मूवी देखते हो, उसको बुरा माना जाता है, क्यों बुरा माना जाता है समझो बात को: क्योंकि उसको देखकर तुम्हारे भीतर ये भाव खड़ा होता है कि तुम ‘देह’ हो। और वही भाव तो तुम्हारे घरों और परिवारों में भी खड़ा किया जाता है न तुम्हारे ऊपर, वो उतना ही बुरा है।

वो उतना ही बुरा है। मैं तलाश में हूँ कि ऐसे माँ-बाप मिलें तो जिनमें इतनी सद्बुद्धि हो कि कह सकें कि बेटा वास्तव में तू माँ का नहीं परमात्मा का बेटा है। ऐसी माँ मिलनी मुश्किल है! और ऐसी मेरी पूरी कोशिश है कि ऐसी माँएं हो सकें, जो अपने बेटे से अपना दावा छोड़ सकें कि तू हमारा नहीं परमात्मा का बेटा है। मैं खोज रहा हूँ कि ऐसे पति मिल सकें कि जो कह सकें अपनी पत्नियों से कि तू हमारी पत्नी नहीं है, तू तो सिर्फ़ परम की प्रेमिका हो सकती है।

ऐसे मिलते नहीं न!

आपका तो आपके स्वजनों पर दावा इतना गहरा है कि अगर स्वयं परमात्मा आपसे आपके स्वजन को मांगने आयें तो आप परमात्मा से लड़ जाओगे। आप कहोगे कि ये मेरा पहले है, तुम्हारा बाद में है। आपको ख़ुशी नहीं होगी कि मेरे प्रियजन को सत्य मिला, परम-पद मिला, आपको बड़ा दुःख होगा कि मेरा कुछ छिना।

“अपना क्या? पराया क्या?” — ये अति गूढ़ प्रश्न हैं। इनपर मनन करें, इनपर ध्यान करें, आहत हो जाने से कुछ नहीं होगा।


‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: झूठी धारणाओं से भरा यदि मन, झूठे सम्बन्धों से भर जाएगा जीवन

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: मैं मन का गुलाम क्यों? (Why am I such a slave of the mind?)

लेख २:  मन के बहुतक रंग हैं (This flickering mind)

लेख ३: गया न मन का फेर (This deceptive mind)

सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

 

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2 टिप्पणियाँ

    • Dear Prashant,

      Blessings from Acharya Ji!

      We are glad to share that now seekers from all over the world can get connected with the Master through various initiatives by the volunteers of PrashantAdvait Foundation.

      1. Advait Learning Camps:

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      For more details or queries, you may call: Sh. Anshu Sharma: +91-8376055661

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      To join in, send your application to requests@prashantadvait.com
      or contact: Sh. Apaar: +91-9818591240

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      Clarity sessions with Acharya-Ji are like the runways from where one takes-off to the camps. These sessions are famously known as Clarity Sessions and have been attracting genuine seekers of Truth since last one decade.
      They happen twice a week in Delhi-NCR. On all Sundays at 11:00 am and on all Wednesdays at 06:30 pm.

      For those who cannot attend Shabda-Yoga sessions physically, the foundation does online streaming of these sessions via Skype or Webinar. Known as Blessings from Beyond (BFB), this facility helps seekers from across the globe listen to Acharya-Ji while being where they are.

      To receive the blessing, send your application to requests@prashantadvait.com
      or contact: Smt. Anoushka Jain: +91-9818585917

      4. Meet the Master:

      Meet the Master aka MTM is an opportunity to meet Acharya Prashant personally, either in person or online via Skype.

      To meet the Master, send your application to requests@prashantadvait.com
      Or contact: Smt. Anoushka Jain: +91-9818585917

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