मन का मंथन

सागर मंथन हुआ, तो उसमें से बहुत सारा ज़हर निकला और ज़हर इतना कटु, इतना तीव्र था कि उसके होने मात्र से, प्रलय जैसी स्थिति आने लगी| विकराल ज़हर, बड़ी मात्रा में| तो समस्या उठी कि इस ज़हर का किया क्या जाए? देवताओं ने और दानवों ने मिल कर के सागर मंथन किया था| अब समस्या उठी कि इतना जो ज़हर निकल आया है, इसका किया क्या जाए?

जब भी सागर मंथन होगा, उसमें से अमृत से पहले ज़हर निकलेगा| ये जो सागर है, ये हमारे मन का सूचक होता है| मन को जब भी मथोगे, उसमें अमृत आखिर में निकलेगा क्यूंकि आत्मा आखिरी है|

पहले तो ज़हर ही निकलेगा, बिलकुल, हलाहल ज़हर| तो ज़हर निकला, इसका क्या किया जाए? बात पूरी सांकेतिक है, समझो| मन को मथा, ज़हर निकला, क्या किया जाए? कहीं तो इसको रखना पड़ेगा| जहाँ रखें, वहीँ खतरा क्यूंकि जहाँ रखो, वहीँ उस ज़हर से प्रलय आ जाएगी| अंततः वो उस ज़हर को लेकर के शिव के पास गए|

शिव वो, जिसने उस ज़हर को पी लिया| कहा लाओ ठीक है|‘’ तुम लोग कुछ नहीं कर पा रहे, मुझे दे दो, मैं पी लूँगा|’’ पी लिया और ऐसा पिया कि, ‘’पी भी लूँ और मुझे कोई असर भी न हो|” तो वो जो पूरा ज़हर था, उसे अपने गले में रख लिया| तो वो नीलकंठ कहलाते हैं| ज़हर से उनका गला नीला हो गया|


पूरा लेख पढ़ें: http://tinyurl.com/heyy7wf

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