गगन घटा गहरानी रे

New Microsoft Office PowerPoint Presentationअवधूता गगन घटा गहरानी रे।।

पच्छम दिसा से उलटी बादली, रुमझुम बरसे मेहा,

उठो ज्ञानी खेत संभारो, बह निसरेगा पानी।।१।।

निरत सूरत के बेल बनावो, बीजा बोवो निज धानी,

दुबध्या डूब जन्म नहीं पावे, बोवो नाम की धानी।।२।।

चारों कोनें चार रखवाले, चुग न जावे मृग धानी,

काटया खेत मींड़ा घर ल्यावे, जा की पूरन किसानी।।३।।

पांच सखी मिल करे रसोई, जिहमें, मुनि और ज्ञानी,

कहें कबीर सुनो भई साधो, बोवो नाम की धानी।।४।।

 

वक्ता: ‘अवधूता गगन घटा गहरानी रे’

भारतीय परंपरा में अवधूत, ऋषि, साधू, संत, इन सब के संदृश्य नहीं, इनसे ऊँची अवस्था है।

अवधूत वो है, जो पूरे तरीके से संसार का हो गया है। अवधूत वो है जिसके कोई भ्रम शेष नहीं है।

और इसीलिए अवधूत के लिए कहा गया है कि वो पृथ्वी के चेहरे पर ऐसा घूमता है, ऐसे लोटता है जैसे कोई बच्चा। कहीं ठहरता नहीं है। चलते रहना उसका स्वभाव है। जहाँ भी जाता है, अपना घर ही पाता है। ऐसे अवधूत को सम्भोदित कर रहे हैं कबीर-“गगन घटा गहरानी”, मन का जो आकाश है, उस पर अब बादल छा रहे हैं। कबीर आवाज़ दे रहे हैं कि अवधूत, देख जो प्रकृति का नियम है, वही हो रहा है। मन के आकाश पर बादल छा रहे हैं।  ये चित्त का आकाश है, इस पर विचारों के, संकल्पों के, बादल आ रहे हैं।

‘पच्छम दिसा से उलटी बादली, रुमझुम बरसे मेहा’

एक दिशा से, और एक दिशा से क्या, अनेकों दिशा से संसार अब तेरे भीतर पुनः विकृत रूप में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा है। माया अपना आकर्षक नाच फिर शुरू कर रही है और ये सब दिखने में बड़ा मधुर लगेगा। दिखने में बड़ा चित्त आकर्षक लगेगा। बादल आए हैं, हल्की रिम-झूम फुहार है। “ऐसा हो सकता है अवधूत कि, तू भी बहक जाए। तो कहते हैं कि “उठो ज्ञानी खेत संभारो, बह निसरेगा पानी।”-इस समय पर यदि तूने अपने मन की देख भाल नहीं की, तो जो कुछ भी तूने जाना है, अर्जित किया है, वो सब खतरे में पड़ जाएगा। तू फिर उसी माया के शिकंजे में आ जाएगा, जिससे आज़ाद हो करके तू अवधूत हुआ था। “निरत सुरत के बेल बनावो”, “निरत” माने निवृत्ति। निवृत्ति मतलब छोड़ दिया, छूट गए। “सुरत” मतलब सुरति। सुरति मतलब याद करना। लगातार उसी के साथ रहना। “निरत सुरत के बेल बनाओ।” बेल माने रस्सी। इनकी रस्सियाँ बनाओ। इन रस्सियों से जो तुम्हारा खेत है, जो तुम्हारा मन है, इसकी बाड़ तैयार की जाएगी। बाड़ को बाँधने के लिए इन रस्सियों का इस्तेमाल करेंगे, निरत और सुरत की। “निरत सूरत के बेल बनावो, बीजा बो निज धानी।”- और इसमें जो बीज डाले, तुम्हारे खेत में, वो एक ही रहे। तुम्हारी समझ का, तुम्हारे जानने का, तुम्हारे ध्यान का बीज रहे। सन्देश जा रहा है कबीर का कि –अवधूत, बादल छा चुके हैं, वर्षा होगी, तूने लाख बार ये लड़ाई जीती हो, लेकिन इस बार भी तुझे अपने खेत की रक्षा करनी ही पड़ेगी।

 दुबध्या डूब जन्म नहीं पावे, बोवो नाम की धानी- इस क्षण पर शंकित मत हो जाना। दुविधा में मत डूब जाना। “नाम की धानी बोओ”, जिस बीज की बात कर रहे थे। हरि नाम की, राम नाम की धानी बोओ। वही है, जो तुमको कैसे भी आकर्षण से, कैसे भी आक्रमण से बचाकर रखेगी। हल्के मत पड़ जाना। आ रहे होंगे चारों तरफ़ से चित्त को खींचने वाले प्रभाव, तुम बहक मत जाना।

“चारों कोनें चार रखवाले, चुग न जावे मृग धानी।” – जो भी कुछ तुमने बोया है, ये कहीं वृत्तियों रूपी, संसार रूपी, आकर्षण रूपी, माया रूपी मृग आ करके चुग न जाए। इसके लिए खेत के चार कोनों पर, चार रखवाले आसीन करो। पारंपरिक रूप से विवेक, वैराग्य, षड्संपत, और मुमुक्षा, इनको बड़ा महत्व दिया गया है। उपनिषद् में इनको साधना चतुष्ठे के नाम से जाना जाता है। कबीर इन्हीं की बात कर रहे हैं कि इन चारों को अपने चार रखवालों की तरह प्रयोग करो। “विवेक, वैराग्य, षड्संपत, और मुमुक्षा।”

श्रोता: षड..?

वक्ता: षड्संपत । उसमें षम, दम, उप्रत्ति, तितिक्षा, ये सब आते हैं।

तो इनको अपनी खेत के रखवालों की तरह इस्तेमाल करो। ताकि चाहे बादल बरसें, चाहे मृग और दूसरे जानवर आ करके तुम्हारे खेत पर आकर हमला करें, तुम्हारी ये जो फ़सल है, ये खराब न हो जाए। तुमने ये जो नाम की धानी बोई है, ये उजड़ न जाए।

“चारों कोनें चार रखवाले, चुग न जावे मृग धानी, काट्या खेत मींड़ा घर ल्यावे, जा की पूरन किसानी।”

जब कबीर खेत की बात कर रहे हैं, तो वहाँ पर कृष्ण का ध्यान आ जाना स्वभाविक है, जहाँ उन्होंने क्षेत्र-क्षेत्र के विभाग वियोग में यही बात करी है। कबीर ने खेत की और अवधूत की छवि ली है, और करीब-करीब ये ही कृष्ण ने भी ली है। तुम क्षेत्रज्ञ हो, और संसार तुम्हारा क्षेत्र है। वही यहाँ पर कबीर छवि उठा रहे हैं। जो अच्छा किसान होता है, वो अपनी फसल कांट करके घर ला पाता है। और जो नहीं होता, लापरवाह होता है, उसका यही होता है कि कभी पानी, वर्षा उसका खेत तबाह करती है, कभी जानवर आकर के उसका खेत चर जाते हैं। अंततः उसके हाथ कुछ नहीं लगता। वो यही पाता है कि जन्म वृथा गंवाया। ‘जन्म वृथा गंवाया।’ फसल हो सकती थी, लाभ हो सकता था, परम की प्राप्ति उसको हो सकती थी, पर हुआ कुछ नहीं। मेहनत भी करी, पर लापरवाही खूब रही, बोध नहीं रहा। चार जो रखवाले थे, वो उसको उपलब्ध नहीं थे, या जो उसने उसमें फसल बोई, वो “नाम” की धानी नहीं थी, उसने कुछ और ही बो दिया उसमें। इधर, उधर की झाड़ , पतवार बो दी। तो अंततः कोई लाभ नहीं मिला।

लाभ मिले उसके लिए क्या करना है? कबीर चेताय दे रहे हैं अवधूत को।

“पांच सखी मिल करे रसोई, जिहमें, मुनि और ज्ञानी।”- जिसने ये सारी सावधानियाँ बरत ली, वो ऐसा क्षेत्रज्ञ हो जाता है, वो ऐसा मालिक हो जाता है कि ये जो पाँचों इन्द्रियाँ हैं, अब ये उसकी परिचारिकाएँ हो जाती हैं। ये उसकी रसोईं कर रही हैं। ये कबीर की दुनिया है। यहाँ पर ऐसे कथन खूब मिलेंगे आपको कि, ‘’ये तो छोड़ दो कि तुम पाँचों माया का रूप रखके मुझे ठगने आई हो। मैं ऐसा मालिक बना हूँ तुम्हारा कि अब तुम पाँचों मेरी नौकरानी हो, और मेरे घर में रसोई पकाती हो।’’ और उस रसोई को जीम कौन रहा है? जीमें, मुनि और ज्ञानी। तुम खाना पकाती हो, और मुनि और ज्ञानी पंगत में बैठे हैं, वो भोजन करते हैं। वो ऐश करते हैं। तो इन्द्रियों का, और इन्द्रियों से आने वाले संसार का, त्याग नहीं है। अवधूत त्यागी नहीं हैं। अवधूत त्यागी नहीं हैं। वो तो कह रहा है, “आँखों, भोजन पकाओ। हम खाएंगे। कानों, सुन्दर से सुन्दर संगीत लेकर आओ, हम सुनेंगे। बताओ क्या सपर्श करना है? हम करेंगे। सब कुछ सपर्श करने में, बड़ा सुन्दर है, बड़ा आनंदपूर्ण है।” पांच सखी मिल करे रसोई, जीमें, मुनि और ज्ञानी। कहें कबीर सुनो भई साधो, बोवो नाम की धानी।” नाम की धानी बोओ। फिर..? आनंद ही आनंद है। समझ रहे हैं?

खेत में क्या करते हैं कि जानवरों से बचाने के लिए लकड़ियाँ, उसकी जो सीमा होती है, जो, उसमें गाढ़ते हैं। जब आप लकडियाँ गाधोगे, तो लकड़ियों को आपस में बाँधने के लिए भी कुछ चाहिए होगा न? तो वो कह रहे हैं कि, ‘निरत सुरत की बेल बनाओ।’ “निरत”-निवृति। निवृति मतलब? हो गया। खत्म। “आइ ऍम डन।” कुछ अधूरा नहीं है। कुछ पाने के लिए नहीं है। कुछ पाने के लिए नहीं है। निवृत है। वृत्ति से निवृति हो गई। निरत सुरत की बेल बनाओ। और सुरति। सुरति का मतलब..? “रति” का अर्थ है पास जाना, संलग्न हो जाना।

सुरति का अर्थ है: उसके पास जाना; राम के पास जाना। उनसे जुड़ जाना, सुरति।

 तो  निरत सुरत की बेल बनाओ, बीजा बोओ, निजधानी।


शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर: गगन घटा गहरानी रे

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १:  त्याग -छोड़ना नहीं, जगना

लेख २: अमूल्य से निकटता ही मूल्यहीन का त्याग है

लेख ३:  गहरी वृत्ति को जानना ही है त्याग 


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़नhttp://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट https://goo.gl/fS0zHf

 

Advertisements

2 टिप्पणियाँ

    • कृपया इस उत्तर को ध्यान से पढ़ें | आचार्य जी से जुड़ने के निम्नलिखित माध्यम हैं:

      १: आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से रूबरू होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
      इस अद्भुत अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      २: अद्वैत बोध शिविर:
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर हैं। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग अपने जीवन से चार दिन निकालकर प्रकृति की गोद में शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, मुक्त होकर घूमते हैं, खेलते हैं, और आचार्य जी से प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिकता अपने जीवन में देखते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, रानीखेत, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नयनाभिराम स्थानों पर आयोजित पचासों बोध शिविरों में हज़ारों लोग कृतार्थ हुए हैं।
      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु एक अभिभावक-बालक बोध शिविर का आयोजन भी करते हैं।
      शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      ३. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
      सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      ४. जागृति माह:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
      सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      ५.पार से उपहार:
      प्रशांत-अद्वैत फाउंडेशन की ओर से आयोजित किया जाने वाला यह मासिक कार्यक्रम जन सामान्य को एक अनोखा अवसर देता है, गुरु की जीवनशैली को देख लाभान्वित होने का। चंद सौभाग्यशालियों को आचार्य जी के साथ शनिवार और इतवार का पूरा दिन बिताने का मौका मिलता है। न सिर्फ़ ग्रंथों का अध्ययन, अपितु विषय-चर्चा, भ्रमण, गायन, व ध्यान के अनूठे तरीकों से जीवन में शान्ति व सहजता लाने का अनुपम अवसर ।
      स्थान: अद्वैत बोधस्थल, ग्रेटर नॉएडा
      भागीदारी हेतु ई-मेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनु बत्रा: +91-9555554772

      ६. त्रियोग:
      त्रियोग तीन योग विधियों का एक अनूठा संगम है | रोज़ सुबह दो घंटे तीन योगों का लाभ: हठ योग, भक्ति योग एवं ज्ञान योग | आचार्य जी द्वारा प्रेरित तीन विधियों का यह मेल पूरे दिन को, और फिर पूरे जीवन को निर्मल निश्चिन्त रखता है |
      आवेदन हेतु ईमेल करे: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
      स्थान: अद्वैत बोधस्थल, ग्रेटर नोएडा

      यह चैनल प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उन्हीं से आ रहा है |

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      Like

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s