जन्म व्यर्थ गंवाया

जब कबीर खेत की बात कर रहे हैं, तो वहाँ पर कृष्ण का ध्यान आ जाना स्वभाविक है, जहाँ उन्होंने क्षेत्र-क्षेत्र के विभाग वियोग में यही बात की है।

कबीर ने खेत की, और अवधूत की छवि ली है, और करीब-करीब ये ही कृष्ण ने भी ली है। तुम क्षेत्रज्ञ हो, और संसार तुम्हारा क्षेत्र है। वही यहाँ पर कबीर छवि उठा रहे हैं। जो अच्छा किसान होता है, वो अपनी फसल कांट करके घर ला पाता है। और जो नहीं होता — लापरवाह होता है — उसका यही होता है कि कभी पानी, वर्षा उसका खेत तबाह करती है, कभी जानवर आकर के उसका खेत चर जाते हैं।

अंततः उसके हाथ कुछ नहीं लगता। वो यही पाता है कि जन्म वृथा गंवाया। ‘जन्म वृथा गंवाया।’ फसल हो सकती थी, लाभ हो सकता था, परम की प्राप्ति उसको हो सकती थी, पर हुआ कुछ नहीं। मेहनत भी करी, पर लापरवाही खूब रही, बोध नहीं रहा।

चार जो रखवाले थे, वो उसको उपलब्ध नहीं थे, या जो उसने उसमें फसल बोई, वो “नाम” की धानी नहीं थी, उसने कुछ और ही बो दिया उसमें। इधर, उधर की झाड़, पतवार बो दी। तो अंततः कोई लाभ नहीं मिला।

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s