अभिभावकों से स्वस्थ सम्बन्ध

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वक्ता: तुम जो कुछ भी कर रहे हो तुम देखना उसको कि ये मैं सतह पर कर रहा हूँ या स्रोत पर कर रहा हूँ? सतही काम क्या होता है?

श्रोता: जो बाहर से आ रहा हो।

वक्ता: जो बाहरी घटनाओं से प्रभावित होकर आ रहा हो। जो स्रोत से निकल रहा हो उसकी क्या पहचान है?

श्रोता: समय का पता नहीं लगेगा जब कर रहे होंगे।

वक्ता: एक तो समय का पता नहीं लगेगा और दूसरा कि उसे मैं अच्छे तरीके से समझता होऊँगा। उसको मैं ऐसा समझता होऊँगा कि फिर कोई मुझसे लाख तर्क कर ले, मैं तब भी हिलूँगा नहीं। वो बात मैंने किसी से ली नहीं होगी, वो बात मेरी अपनी होगी।

श्रोता: सर, पर जो बड़े बोलते हैं वो भी तो करना पड़ेगा।

वक्ता: बेटा अब तुम भी बड़े हो। एक कहावत है कि जब बाप का जूता बेटे को आने लगे तो बड़े-छोटे का कोई भेद नहीं रह जाता, वो दोस्त हो जाते हैं। अब तुम कोई बारह साल के थोड़े ही हो कि तुम कहो कि बड़े कह रहे हैं तो करना ही है। तुम्हारी तो अब वो हालत है कि तुम उन बड़ो को सहारा दो। तुम न अब दो साल के हो, न बारह साल के हो, तुम बाईस साल के हो। तुम्हें अब ये थोड़े ही कहना है कि मुझे बड़ों का सहारा लेना है, तुम्हें तो उनको सहारा देना है।

श्रोतापर उनकी मर्ज़ी के बिना?

वक्ता: तुम्हारी मर्ज़ी के बिना भी तो कुछ नहीं हो सकता या तुम्हारी मर्ज़ी बेकार है? जब तुम बात करते हो मर्ज़ी की तो समझना जिसको हम अपनी मर्ज़ी कहते हैं वो क्या होता है? वो बाहर से आई हुई एक मान्यता होती है। तो उनकी भी अपनी कोई मर्ज़ी नहीं है, उन्होंने भी किसी से सुन लिया है। जैसे तुम आज कह रहे हो ना कि बड़ों के सामने क्या करें? वैसे ही उनके पास भी बड़े थे, उन्होंने भी यही मज़बूरी अनुभव की थी कि बड़ों के सामने क्या करें। उनके पास भी अपनी कोई मर्ज़ी नहीं है, उन्होंने भी कहीं से सुन रखा है और अगर तुम्हें उनसे प्रेम है तो प्रेम का ये दायित्व है कि तुम उनको भी सच दिखाओ, तुम उनकी मदद करो। तुम ये न कहो कि मैं तो अभी बच्चा हूँ, तुम कहो कि मैं जवान हूँ, बड़ा हूँ, अपने पाँव पर खड़ा हूँ, मुझे कुछ दिखाई दे रहा है और मैं चाहता हूँ कि आप भी वो देखें।

श्रोतापर बड़े तो हमेशा ही बड़े रहेंगे ना।

वक्ता: किस आशय में बड़े रहेंगे?

वक्ता: अनुभव में।

श्रोता: उम्र में; तुम ये कहना चाहते हो कि उनकी उम्र तो हमसे हमेशा ही ज्यादा रहेगी।

वक्ता: सर, उम्र की बात नहीं है।

श्रोता: अनुभव तो उम्र ही है। क्या तुम कभी ये कहते हो कि कम उम्र के बन्दे को ज्यादा अनुभव है?

बेटा, उम्र से कुछ नहीं हो जाता। उम्र और अनुभव दोनों ही बिलकुल व्यर्थ बातें हैं। एक बात बताओ मुझे कि तुम पचास साल तक सोते रहो तो उससे तुममे बड़ा ज्ञान उठ जाएगा? समय तो बीता, पचास साल तो बीते, पर तुमने देखा क्या है? तुम तो सोते ही रह गए। तुम्हारी आँखें तो बंद ही रहीं, तुम मान्यताओं में ही घिरे रहे। उम्र के बढ़ने से क्या हो जाता है? जानते हो दुनिया के आम आदमी की औसत मानसिक उम्र कितनी है? तेरह साल। आदमी का शारीरिक विकास तो हो रहा होता है पर उसका दिमाग ठस पड़ा होता है। एक बात गौर से समझ लो कि उम्र को और अनुभव को बिलकुल महत्व मत देना। न उम्र का महत्व है, न अनुभव का महत्व है। महत्व है बोध का, महत्व है तुम्हारी जाग्रति का और जाग्रति समय की मोहताज नहीं होती है।

तुम जिस भूमि पर बैठे हो, वहाँ तो उम्र को बिलकुल ही महत्व नहीं दिया गया। बुद्ध के पिता आ कर बुद्ध के चरण स्पर्श करते हैं। गीता है अष्टावक्र की जिसमें अष्टावक्र राजा जनक को उपदेश दे रहे हैं और अष्टावक्र की उम्र उस समय मुश्किल से ग्यारह-बारह साल की है। उम्र की क्या कीमत है? जिस भूमि पर तुम बैठे हो ना, इसने उम्र को कभी कोई कीमत नहीं दी, इसने बोध को कीमत दी है।

श्रोता:  कई बार हमें अपने माँ-बाप के फैसलों के आगे झुकना पड़ता है, चाहे हमारा फैसला सही ही हो।

वक्ता: तुम्हें झुकना इसीलिए पड़ता है क्योंकि तुम्हारे मन में लालच और स्वार्थ है, अन्यथा तुम्हें कौन झुका सकता है। तुम कुछ सुविधाओं के मोहताज हो और तुम नहीं चाहते कि तुमसे वो सुविधाएँ छीन जाएँ; इस कारण तुम झुकते हो। बिना तुम्हारी सहमति के तुम्हें कोई झुका नहीं सकता। तुम्हारी सहमति है उस झुकने में। कौन तुम्हें गुलाम बना सकता है बिना तुम्हारी रजामंदी के? तुम्हें दो-चार छोटी-मोटी चीजें मिल रही हैं और उन चीजों की खातिर तुम अपनी स्वतंत्रता बेच देते हो। झुकने का और कोई कारण नहीं है। कोई तुम्हें मार-पीट कर झुकाता है? तुम खुद ही तो झुकते हो ना? तुम झुकते इसिलए हो ताकि तुम्हारी सुविधाएँ न छीन जाएँ, ताकि तुम्हारे सहारे न छीन जाएँ। तुमने अपनेआप को छोटा और कमज़ोर मान रखा है इसीलिए तुम झुकते हो। अन्यथा कोई कारण नहीं है झुकने का और जब मैं कह रहा हूँ कि झुको नहीं तो मैं ये नहीं कह रहा कि लड़ जाओ। मैं कह रहा हूँ कि सत्य पर अडिग रहो। मैं हिंसात्मक हो जाने के लिए नहीं कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ कि सत्य से मत हटो।

श्रोता: दूसरा नहीं मान रहा तो?

वक्ता: तुम दूसरे को मनवा भी नहीं रहे। तुम बस अपनी जगह पर कायम रहो।

श्रोता: तो उससे तो कुछ मिलेगा ही नहीं।

वक्ता: यही तो बात है कि तुम मुनाफे की तलाश में हो।

श्रोता: सर, मेरे बारहवीं में 85% आए थे। तो मुझे नॉएडा पढ़ना था, पर घरवालों ने दाखिला नहीं दिलवाया, कोई पैसों की दिक्कत नहीं थी, कुछ नहीं था फिर भी नहीं दिलवाया। उन्होंने कहा की मुरादाबाद ही पढ़ना है।

वक्ता: क्यों?

श्रोता: उन्होंने घर से दुर नहीं जाने देना था।

वक्ता: तुम अगर घर से निकलते कि मैं जा रहा हूँ नॉएडा की ओर, तो निकल जाते, कौन रोक सकता था। हाईवे है, बस चलती हैं, तुम बैठ गए, पहुँच गए। तुम्हें दाखिला मिल गया है ना?

श्रोता: हाँ।

वक्ता: तुम्हें दाखिला मिल गया है तो कौन रोक सकता था? तुमने ये क्यों नहीं किया?

श्रोता: माँ-बाप का साथ नहीं था।

वक्ता: अरे! साथ का क्या मतलब है। तुम्हें जाके बैठना है और पढ़ना है। यहाँ माँ-बाप बैठे हैं क्या साथ में? तुम घर से निकलते, आते और पढ़ने लग जाते। तुम्हें कौन रोक सकता था?

श्रोता: दो लाख फीस कौन देता?

वक्ता: उसके लिए बैंक है। मैं आई.आई.टी और आई.आई.एम में पढ़ा हूँ और वहाँ जिन बच्चों का दाखिला होता है, उनके माँ-बाप हँसते – हँसते दो लाख क्या, २० लाख दे दे, पर मेरे पुरे बैच  में शायद ही कोई रहा हो जिसने माँ-बाप से पैसे लिए हो पढाई के। सबने बैंक लोन लिया था क्योंकि वो अपनी खुद्दारी थी, उनकी अपनी आज़ादी की बात थी। घर से आसानी से पैसे मिल रहे थे, पर सबने बैंक लोन लिया। मुझे ये देख के बड़ा ताजुब होता है की आई.आई.टी और आई.आई.एम वाले बैंक लोन लेके पढ़ते हैं और यहाँ आता हूँ तो लोग बोलते हैं की घर से पैसे नहीं लूँगा तो पढूंगा कैसे? अच्छी यूनिवर्सिटी है ना जिसमे पढ़ना चाहते थे। उन यूनिवर्सिटीज में पढने के लिए तो तुम्हें तुरंत बैंक लोन मिल जाता। पता है बैंक वाले कैंपस में आके अपनी कैनोपी लगाते हैं की यहाँ से ही लोन ले लो और अगर जहाँ तुम्हें दाखिला मिला है वहाँ का अच्छा रिकॉर्ड है तो सिक्यूरिटी भी नहीं मांगते हैं। तुमने क्यों नहीं की पढाई?

तुम्हारी मर्ज़ी के बिना किसी ने नहीं रोका है। तुम खुद रुकना चाहते थे। मैं अपना उदाहरण देता हूँ। मैंने 17 की उम्र से 24 की उम्र तक पढाई की है और मैंने घर से एक पैसा नहीं लिया। ऐसा नहीं की मेरी घरवालों से लड़ाई थी। मेरी माँ को प्यार था मुझसे तो वो मेरे सूटकेस  में, मेरी जेबों में 500 के नोट डाल देती थी कि ऐसे सीधे देंगे तो लेगा नहीं इसीलिए इसके कपड़ों में रख दो, पर मैंने नहीं लिए। मैं आई.आई.एम में पढ़ रहा था जहाँ सोने तक का समय नहीं मिलता और उसके साथ जाके में ट्यूशन पढाया करता। तुम तो तीसरे साल में हो, मैं जब पहली साल में था तब से अपना कमा रहा था। IIT के पास एक जगह है कालु सराए, वहाँ पर फिटज़ी जैसे कोचिंग सेंटर हैं, वो एक कॉपी चेक करने का पांच या दस रुपये दिया करते थे। हम लोग पुरे के पुरे बंडल उनके पास से ले आते थे, चेक करते थे और पैसे लेते थे। तुम क्यों नहीं कर रहे हो? तुम ट्यूशन  क्यों नहीं पढ़ा सकते हो? तब तो इन्टरनेट भी नहीं था, फिर भी हम रास्ता ढूंड लेते थे क्योंकि चाहते थे। वही स्रोत वाली बात। तुम क्यों नहीं रास्ता ढूंड लेते? तुम क्यों राज़ी हो जाते हो। तुम इतने गये-गुज़रे हो की तुम गणित नहीं पढ़ा सकते 6-8 के बच्चों को?

श्रोता: सर अगर उनके फैसले को नहीं मानेंगे तो हम अलग नहीं हो जाएंगे उनसे?

वक्ता: अलग होने का क्या अर्थ है? प्रेम में, मैं हूँ, तुम हो, हममे आपस में प्यार है, ये प्यार कोई बंदिश तो नहीं है कि मैंने जो कह दिया तझे मानना ही पड़ेगा। ये प्यार जो शर्तें लगाए की मैंने जो कहा तू मान और तू नहीं मानता तो मेरा और तेरा कोई रिश्ता नहीं। तो ये तो प्यार है ही नहीं, ये तो फिर व्यापर है। प्यार तो मुक्ति देता है जो कहता है जा अपने हिसाब से जी, अपने पंखों से उड़। ये कौनसा प्यार है जो कहता है की हमारे हिसाब से चल? ये प्यार है ही नहीं।

श्रोता: इसका मतलब माँ-बाप प्यार ही नहीं करते?

वक्ता: वो तुम जानो। साफ़-साफ़ देखो। लेकिन इतना मुझे पक्का है की प्यार में शर्तें नहीं हो सकती। जहाँ शर्ते होती हैं वहाँ तो व्यापार चल रहा है की हमने तेरे उपर इतना खर्चा किया है, हमने तझे पैदा किया है तो अब हमारी बात मान। तेरी हिम्मत कैसे हो गयी हमारे विरुद्ध जाने की, हम मालिक हैं तेरे।

श्रोता: सर फ़र्ज़ भी तो बनता है हमारा कुछ उनकी तरफ।

वक्ता: फ़र्ज़ क्या है? मेरा तुमसे प्यार है अगर तो मेरा फ़र्ज़ क्या है? मेरा फ़र्ज़ ये है कि मैं तुम्हें होश में लाने में मदद  करूँ। मेरा फ़र्ज़ ये ही कि मुझे रौशनी मिली है तो मैं तुम्हें भी दूँ।

श्रोता: फिर ये तो स्वार्थ है।

वक्ता: ये स्वार्थ नहीं है। ये परम-प्रेम है। धितराष्ट्र हैं वो अंधे हैं, पत्नी आती है, वो भी पट्टी बांध लेती है। ये प्रेम है? या प्रेम वो होता की मैं अपनी आँखें खुली रखूंगी ताकि मैं तुम्हें भी चालने में सहारा दे सकू? अब मिया-बीवी दोनों अंधे हो गए और अब दोनों साथ-साथ ठोकर खा कर गिर रहे हैं। ये प्रेम है? या प्रेम वो होता ही की तुम अंधे हो और आओ हम तुम्हें सहारा देंगे और हम कोशिश करेंगे की किसी तरह तुम्हारी ज्योति भी वापस आ सके। ये प्रेम होता है। प्रेम रोशिनी देता है या अँधेरा बांटता है?

प्रेम का एक मात्र फ़र्ज़ होता है — जाग्रति।

प्रेम ये नहीं होता की तुम अपनी मानसिकता की कोठरी में कैद हो और हम उसी में कैद रहने देंगे। प्रेम कहता है की भले हमारे-तुम्हारे संबंधों में तनाव आ जाए लेकिन मैं तुम्हें भी मुक्त करके रहूँगा क्योंकि मैंने मुक्ति जानी है और मुक्ति बड़ी आनंदपूर्ण है। तो भले तुम्हें बुरा लगे, फिर भी मैं तुम्हारी साहयता करूँगा। एक-दुसरे को बंधन में डालने का नाम थोड़े ही प्रेम है। कैसी बातें कर रहे हो?

फिर जब तुम माँ-बाप की बात करते हो तो उनके साथ थोड़ा सा रियायत बरता करो। तुम लोग बड़ा अन्याय भी करते हो माँ-बाप के साथ। मैंने अभी कहा की तुम खुब बड़े हो गए हो, खुब जवान हो गए हो।  तुम्ही यहाँ बैठे हो, हो सकता था तुम्ही माँ-बाप होते। अब तुम अच्छे से जानते हो अपने आप को कि तुम हमेशा संदेह में घिरे रहते हो, जीवन का तुम्हें कुछ पता नहीं, दुर्बलताएँ तुमपे हावी रहती हैं, ऐसा ही है न? चलो अपने आप को नहीं देख सकते तो अपने पडोसी को देखो, उसकी यही हालत रहती है? अब तुम्हारा पडोसी कल को बाप बन जाए और अपने बच्चों को बोले कि मैं भगवान हूँ, मैं जो कह रहा हूँ वो बिलकुल ठीक है, मेरी आज्ञा मानना तेरा फ़र्ज़ है, तो ये बेवकूफ़ी की बात हुई या नहीं हुई और ऐसे ही तुम्हारे जैसे ही लोग होते हैं जो माँ-बाप बन जाते हैं। वो भगवान कहाँ से हो गए, उनकी आज्ञा में क्या दम हो गया।

तुम अपने आप को देखो ना कि तुम्हारा एक छोटा सा बच्चा हो और तुम उसे सिखा रहे हो की मैं भगवान हूँ, मेरी आज्ञा मान, मैं देवी हूँ मेरी आज्ञा मान। तुम्हारे ही दोस्त का बच्चा अगर ये सब कर रहा होगा तो तुम कहोगे की पागल है क्या, ये भगवान दिखता है तुझे? ये क्या है मैं बताता हूँ, इसकी असलियत में जानता हूँ, पर क्योंकि परम्परा चली आ रही है तो हर माँ-बाप गलती कर जाता है और अपने बच्चों को ये बता देता है की माँ-बाप की आज्ञा शिरोधार्य है। ये बड़ी बेवकूफ़ी की बात है। अपने बच्चों को तुम कभी ये शिक्षा मत दे देना कि हम भगवान हैं। अपने बच्चों को ये मत बोल देना कि हम जो बोल रहे हैं वो ठीक है, हमारी बात माना कर क्योंकि तुम अच्छे से जानते हो कि तुम खुद कितने परेशान हो, तुम अच्छे से जानते हो की तुम्हें जीवन की खुद कोई समझ नहीं है। जब तुम्हें जीवन की समझ नहीं है तो तुम्हें हक़ क्या है अपने बच्चों पर अपनी बात थोपने का, पर दुनिया का हर माँ-बाप खुद जीवन को कुछ नहीं जानता पर बच्चों पर आज्ञा ज़रूर चालता है।

बच्चा हो तो उससे प्यार करो और प्यार का अर्थ होता है उसको ऐसी काबिलियत देना कि वो मुक्त जीवन जी सके। ये प्यार है। प्यार ज़ंजीरों का नाम नहीं है। प्यार किसी पे मालकियत करने का नाम नहीं है। बात समझ में आ रही है या नहीं आ रही है? और नहीं आ रही है तो अपने पडोसी की ओर देखो और सोचो कि वो अपने बच्चे से बोल रहा ही की मैं भगवान हूँ, मेरी हर आज्ञा माना कर। जैसे तुम हो, वैसे ही दुनिया के सारे माँ-बाप हैं। दुनिया भर में भले तुम्हारी कोई हैसीयत न हो, जीवन के सामने भले तुमने घुटने टेक रखे हो, पर अपने बच्चों पर तुम चढ़ जाते हो कि हम जो बोल रहे हैं वो परम सत्य है और इसी पर चल। ये अन्याय है।

श्रोता: पर सर उन्होंने हमे बड़ा किया है, इतना कुछ किया है तो हमारी ज़िम्मेदारी बनती है की हम उनके लिए कुछ करें।

वक्ता: हाँ बिलकुल ठीक है। ये मानवता का तकाजा है कि किसी ने तुम्हारे उपर रूपया खर्च किया, पैसा खर्च किया, तुम्हारी देखभाल कि तो तुम कहो कि आज तक आपने दिया, अब हम आपको देंगे और इसीलिए नहीं देंगे कि हम कोई उधार लौटा रहे हैं, इसीलिए देंगे क्योंकि हमे आपसे प्यार है। आज तक आपने हमारी देखभाल करी, अब आप हमे भी तो मौका दीजिए कि हम आपको सहारा दे सकें। जब हमें क, ख, ग नहीं आता था तो आपने मुझे रौशनी दिखाई, अब मुझे कुछ दिख रहा है तो मैं भी तो आपको कुछ दिखाऊ और जब मुझे क, ख, ग नहीं आता था और आप मुझे सिखाते थे तो मैं रोता भी था, चिल्लाता भी था और आपकी बात नहीं मानता था।

जब माँ-बाप बच्चे को सिखा रहे होते हैं तो बच्चा उसका विरोध करता है कि नहीं करता? तो माँ-बाप का क्या फ़र्ज़ होता है उस समय। माँ-बाप का फ़र्ज़ होता है की हर तरीके से उसे सिखाएँ। तो तुम्हारा भी यही फ़र्ज़ है कि तुम्हें कोई बात ऐसी समझ में आ रही है जो माँ-बाप को नहीं पता तो तुम भी हर संभव तरीके से उनको सिखाओ। जैसे उन्होंने तुम्हें सिखाया, वैसे ही तुम उन्हें सिखाओ। ये थोड़ी ही कि हम दबे बैठे हैं, हम मुह कैसे खोल दें और एक बात ध्यान रखना कि हर माँ-बाप के लिए सबसे ख़ुशी का दिन वही होता है जिस दिन उनकी संतान इस काबिल हो जाती है कि उन्हें कुछ सिखा सके। अगर वो तुमसे सही में प्यार करते हैं ना तो बड़ा आनंद मिलेगा उन्हें अगर तुम उन्हें ऐसी बात बताओगे जो उन्हें आज तक दिखाई नहीं दी थी।


शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: अभिभावकों से स्वस्थ सम्बन्ध (Healthy relationship with parents)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: स्वस्थ सामाजिक सम्बन्ध सम्भव हैँ?

लेख २: प्रेम बेहोशी का सम्बन्ध नहीं 

लेख ३: सम्बन्ध कैसे?


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट https://goo.gl/fS0zHf

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