धीरज है सच की धारणा, दिखता न हो तब भी मानना

 

श्रोता: जब रूमी पेशेंस  की बात करते हैं। या जब भी पेशेंस  शब्द दिमाग में आता है, तो लगता है कि यह कुछ समय से जुड़ी बात है। तो पेशेंस  से उनका मतलब क्या होता है?

वक्ता: पेशेंस  का अर्थ होता है कि जब मन को वो नहीं भी मिल रहा हो, नहीं भी दिख रहा हो, नहीं भी अनुभव में आ रहा हो, जो सत्य है, तब भी मन यह न कह दे कि चूँकि अभी नहीं है इसलिए है ही नहीं।

तुम रेलवे प्लेटफ़ॉर्म  पर खड़े होते हो। तुम कहते हो पेशेंस  रखा हुआ है, धीरज, ट्रेन आएगी। यही कहते हो ना? कि धीरज रखो, ट्रेन आएगी। इसी को तुम धैर्य का नाम देते हो। थम जा भई, आ रही है। यही कहते हो ना? देखो क्या होता है, जिसे तुम धैर्य बोलते हो उसकी प्रक्रिया क्या है। है नहीं, पर भरोसा है कि है। दिख नहीं रही है। इन्द्रियों को उसकी कोई अनुभूति नहीं है। दिख नहीं रही है पर फिर भी भरोसा है कि ‘है और मिलेगी’।

यही बात जब सत्य के सम्बन्ध में कि जाती है, तो धीरज शब्द, पेशेंस  शब्द अपना असली अर्थ लेता है। आँखों को नहीं दिख रहा। आँखों को भ्रम ही भ्रम, माया ही माया दिख रही है। आँखों को संसार ही संसार दिख रहा है। और संसार यही कह रहा है कि नहीं है। पर फिर भी हमें भरोसा है कि ‘है और मिलेगा’। ट्रेन (के सन्दर्भ) में तो कहते हो कि मिलेगा। आध्यात्मिकता (के सन्दर्भ) में कहा जाता है कि है और मिला ही हुआ है, भले ही प्रतीत यह हो रहा है कि नहीं मिला हुआ है। यही धैर्य है।

धैर्य, और पतंजलि ने धारणा शब्द का प्रयोग किया है। यह बिलकुल एक हैं, धारणा माने मानना, कुछ धारण करना, कुछ ले लेना। धैर्य भी यही है। आम धारणा और आध्यात्मिक धारणा में अंतर समझना। वरना फिर क्या होता है कि योग में जिस धारणा की बात की जाती है, हम उसको संसारी धारणा बना देते हैं। संसार में जब कुछ धारण किया जाता है, तो वो रूप है, क्रत्रिम रूप, बाहर से लिया हुआ; आयतित रूप। वो तुम धारण कर लेते हो। कपड़ा, यह धारण किया। मुखौटा, यह धारण किया। काजल, यह धारण किया है। विचार, संस्कृति, संस्कार, यह सब धारण किये हैं। यह संसारिक धारणा है।

योग जब धारणा की बात करता है, तो उसका अर्थ होता है स्वः रूप को धारण करना। रूप को नहीं, स्वः रूप को। जो तुम हो ही, उसको धारण करना। संसारी धारणा है- ‘बाहर से ले लेना’। और योगिक धारणा है, आध्यात्मिक धारणा है- ‘जो तुम हो ही, उसको पुनः धारण कर लेना’। जो तुम हो ही, उसके साथ जीना, उसी को मानना। वही धैर्य है। कि वही मानेंगे, जो हम है, भले ही आँखों से कुछ और दिखता है। आँखें भले ही बोलती हों कि नहीं है। पर हम यही मानेंगे कि है।

यह धारणा है। यही धैर्य है। यही योग है।

अब वो बड़े विकृत रूप में आ चुका है। तमाम योग शास्त्री आजकल फैले हुए हैं, जो धारण का अर्थ यह बताते हैं कि कल्पना करो। वो धारणा फिर दूसरी धारणा हो गयी। वो धारणा का बड़ा तद्भव रूप हो गया; बनावटी।

उस दिन कह रहा था न तुमसे (एक श्रोता की ओर देखते हुए) कि सच के बारे में बुरा समाचार भी मिले, तो उसे मानना नहीं है। यही धारणा है। संसार के बारे में बड़ी बढ़ियां खबर आये, तो वो नहीं माननी है। पर सत्य के बारे में यह खबर भी आ जाए कि सत्य की मौत हो गयी (मुस्कराते हुए), तो माननी नहीं है। यही श्रद्धा है। यही धारणा का असली अर्थ है कि सत्य को धारण कर रखा है, अब चाहें दिखे ना दिखे।

श्रोता १: सर, जैसे रेल नहीं दिख रही और वो कह रहा है कि आएगी , उसका हम भरोसा कर रहे हैं। और एक वैज्ञानिक जब पत्थर को कहता है कि यह है, उसे हम अज़मप्शन  कह रहे हैं उसका। ऐसा क्यों?

वक्ता: दोनों एक हैं। मैं कह रहा था कि तुम कब कहते हो कि धैर्य है। वहाँ से समझाने की कोशिश कर रहा था। रेल आएगी, इसके पीछे तुम्हारे पास तर्क है और वजह है और कारण है, तब कहते हो ना। अभी कोई घोषणा कर दे कि ट्रेन नहीं आएगी, तो तुम क्या मान लोगे? कि नहीं आएगी। तुम्हारा अब धीरज काम नहीं आएगा। रेल आएगी इसलिए कह पाते हो क्योंकि रेल का तुम्हें पुराना अनुभव है।

आध्यात्मिक धारणा में- न तो तुम पुराने अनुभव की वजह से धैर्य रखे हो, न तुम इसलिए धैर्य रखे हो क्योंकि किसी उद्घोषक ने उद्घोषणा की है ट्रेन थोड़ी देर में आने वाली है। वहाँ पर तुम्हें कुछ पता नहीं है। फिर भी तुमने धैर्य रखा हुआ है। तो वो तुम्हें सिर्फ समझाने के लिए बोला था कि धैर्य किस अर्थ में इस्तेमाल करते हो। उस पर अगर गौर करोगे, तो समझ जाओगे कि धैर्य का वास्तविक अर्थ क्या है।

जो ट्रेन के लिए धीरज धरे है, उसका धीरज कोई असली धीरज नहीं है। हालांकि, तुम धीरज शब्द इस्तेमाल करते हो। उसका धीरज तो शर्तिया है, कंडीशनल है। हाँ? धीरज तुरंत ख़त्म हो जायेगा कि नहीं अगर अभी घोषणा हो जाए कि नहीं आएगी? या तब भी खड़े रहोगे क्या कि आएगी?

जो श्रद्धालू होता है, उसका धीरज एक दूसरी गुणवत्ता का होता है। वहाँ तुम लाख घोषणाएं करते रहो कि नहीं है। वो (श्रद्धालू) तब भी कहेगा कि है। वहाँ तुम उससे लाख कहते रहो कि पहले कभी अनुभव था। वो बोलेगा नहीं, अनुभव की चीज ही नहीं है। तो तुम उसको समझाते रहो कि जब पहले तुझे अनुभव नहीं, पहले कभी हुआ नहीं, तो फिर क्यों माने बैठा है कि है और होगा? वो कहेगा नहीं।

न देखा है, न जाना है, न सुना है फिर भी पता है कि है। रूप-रंग उसका होता नहीं। दिखाई वो देता नहीं। छू उसे सकते नहीं। फिर भी कहते हैं कि है।यही श्रद्धा है। और यही धीरज है।


शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: धीरज है सच की धारणा, दिखता न हो तब भी मानना 

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: निजता कहाँ से आती है?

लेख २: प्रेम बेहोशी का सम्बन्ध नहीं 

लेख ३: सम्बन्ध कैसे?


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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फ्लिप्कार्ट https://goo.gl/fS0zHf

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