आओ, डूबो, बाकी सब भूलो

श्रोता १: परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्म प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता।

वक्ता: बड़े से बड़ा दुःख कब तुम्हें विचलित नहीं करेगा, जब वो बड़ा हो ही ना। बड़े से बड़ा दुःख, अरे तुम्हें लगता होगा, मेंरे लिए वो बड़ा है ही नहीं। समझ में आई बात? दृष्टि को थोड़ा साफ़ करो, तुम बड़े से बड़े दुःख से ऐसे नहीं जीतोगे कि तुमने बड़ी ताकत इकट्ठी कर ली है, या तुमने कोई सुरक्षा कवच तैयार कर लिया है जो दुखों से तुम्हारी रक्षा करेगा, बड़े से बड़े दुःख से तब जीता जाता है जब वो…

सभी एक साथ: बड़ा लगे ही ना।

वक्ता: इसमें है क्या? और वो कब छोटा लगने लगता है जब, तुम्हें वो मिल जाता है जो वास्तव में बड़ा है। जो वास्तव में बड़ा है जब वो मिल जाता है तो बाकि सबकुछ छोटा ही छोटा तो है। संत यदि कोई हो यहाँ पर तो कहेगा नहीं ये भी बात बनी नहीं, आप कहते हो कि जब वो बड़ा मिल जाता है, तो बाकि सब कुछ छोटा हो जाता है, हम तो कुछ और कह रहे है, मैं पूछुंगा क्या? तो कहेंगे, हम कह रहे है कि जब वो मिल जाता है तो बाकि कुछ बचता ही नहीं, तो छोटा भी अब क्या रहा? प्रभु दुःख रूप आये, हम ये नहीं कह रहे है कि दुःख छोटी बात है, हम कह रहे है कि दुःख भी तुम ही हो। हम यह नहीं कह रहे है कि इतना बड़ा मिल गया कि बाकि सब छोटा हो गया, हम कह रहे है कि तुम्हारे अलावा और कुछ है ही नहीं तो दुःख भी तुम ही हो, हमें तो दिख रहा है कि दुःख भी तुम ही हो, तो दुःख का स्वागत है, पूरा-पूरा स्वागत है। कौन गाएगा? हमें सुख दे या दुःख… कौन सुनाएगा?

सभी एक साथ: चाहें ख़ुशी दे या गम, चाहें ख़ुशी दे या गम, हमको दोनों ही पसंद, हमको दोनों ही पसंद, दाता किसी भी दिशा में ले चल जिंदगी की नाव, दाता किसी भी दिशा में ले चल जिंदगी की नाव, तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटो से भी प्यार, तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटो से भी प्यार, दाता किसी भी दिशा में ले चल जिंदगी की नाव, दाता किसी भी दिशा में ले चल जिंदगी की नाव, चाहें खुशी भरा संसार, चाहें आँसुओ की धार, चाहें खुशी भरा संसार, चाहें आँसुओ की धार, दाता किसी भी दिशा में ले चल जिंदगी की नाव, किसी भी दिशा में ले चल जिंदगी की नाव, तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटो से भी प्यार, तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटो से भी प्यार, दाता किसी भी दिशा में ले चल जिंदगी कि नाव।

वक्ता: देख रहे हो ना काँटे-काँटे है ही नहीं, ये नहीं है कि हम कुछ खास हो गए है जो अब काँटो को भी बर्दाश्त कर लेते है। काँटे क्या है?

सभी श्रोता एक साथ: अनुकम्पा।

वक्ता: बहुत-बहुत धन्यवाद। तुम चुभे, धन्यवाद। काँटा जब तक काँटा है तब तक तो वो बुरा ही लगेगा। अब काँटा काँटा..

सभी श्रोता एक साथ: नहीं रहा।

श्रोता १: और ना ही फूल-फूल रहा।

श्रोता २: कूल  हो गया वो। (सभी हँसने लगे)

श्रोता ३: वो दिये वाला उदाहरण, मतलब सिर्फ़ इशारे कि तरह इस्तेमाल करना है, ये नहीं कि…

वक्ता: दिये पर ध्यान दीजिये। हवाओ को छोड़िये। हवाओ को छोड़िये। दिये पर ध्यान दीजिये। वो श्लोक दिखाईएगा।

श्रोता ४: जो दुःख रूप संसार के संयोग से रहित है, तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिये। वह योग ना उकताए हुए, अर्थात धैर्ये और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।

वक्ता: पहले तो जो योग की दी है सिर्फ़ उतने को बोलो।

श्रोता ४: जो दुःख रूप संसार के संयोग से रहित है, तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिये।

वक्ता: किसी ने इस बात को बड़ी खूबसूरती से रखते हुए कहा है कि जीवन में जो आकस्मिक है, संयोगिक है और जो आवश्यक है, उनको जिसने जान लिया, ये भेद जिसने समझ लिया उसने सब जान लिया। जीवन या तो संयोग पर चलेगा, या योग में रहेगा। योग है आवश्यक और संयोग हुआ आकस्मिक हमें देखना होगा हमारे जीवन में क्या है जो मात्र संयोगवश आया, और क्या है जो योग का फल है। और दोनों में अंतर करना आना चाहिए हमको। जी रहे है हम उसमें से कितना है जो बस संयोग से मिल गया, क्या-क्या है जो संयोग से मिल गया है?

श्रोता १: जन्म।

वक्ता: ठीक है जन्म।

श्रोता २: नाम।

श्रोता ३: परिवार।

श्रोता ४: धर्म।

श्रोता ५: जात।

वक्ता: ठीक है।

श्रोता ६: रुपया पैसा।

वक्ता: ठीक रुपया पैसा, काफ़ी हद तक।

श्रोता ७: शक्ल।

वक्ता: हाँ, बहुत बढ़िया रूप, लिंग और क्या है? जो संयोग नहीं है अपितु योग का फल है?

श्रोता १: ज्ञान।

श्रोता २: कि हम यहाँ पर बैठे है।

वक्ता: हो सकता है। और वही कीमती है। जो योग फलित है, वो असली जीवन है और जो बस संयोगवश जिए जा रहे है, वो पाएंगे कि उन्हें कुछ मिला नहीं। कोई बहुत ज़ोर का संदेश देना चाहते है (सभी मुस्कुराते है), सुन सकते है तो सुन लीजिये।

श्रोता १: अपनी हामी भर रहे है और क्या।

वक्ता: तो आगे बढ़ो।

श्रोता १: वह योग ना उकताए हुए, अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।

वक्ता: पहले वाले में एक चीज़ छूट गयी थी उसको ले लेता हूँ। जहाँ संयोग की बात करी थी वहाँ दुःख की भी बात करी थी। ठीक है ना, दुःख रूप संसार।

संसार दुःख नहीं है, यदि आप योगी है।

संसार योग का फल भी हो सकता है, संसार में कोई बुराई नहीं है, कोई सज़ा नहीं है संसार।

श्रोता २: यदि आप योगी है।

वक्ता: यदि आप योगी है। पर यदि योग की जगह जीवन संयोग में बीत रहा है, तो वही संसार क्या बन जाएगा?

श्रोता ३: दुःख।

वक्ता: दुःख बन जायेगा।

श्रोता ४: सज़ा।

वक्ता: सज़ा हो जाएगी।

श्रोता ५: नर्क  हो जायेगा, नर्क

वक्ता: ये सीखिए। ये सीखिए। यही मूल्य कहलाता है। मूल्य देना जानिए, कि क्या है जो मूल्यवान है, जो योग्जनित है। और क्या है जो बस यू ही है, आकस्मिक बस एक तरह कि दुर्घटना, आकस्मिक है।

श्रोता ७: सर, पर आपने एक बार यह भी बोला है कि जो कीमती है वो तुम्हें आकस्मिक ही मिलेगा।

वक्ता: वो घटनाए हमेशा हो ही रही है हर समय, पर क्या तुम योगी हो? तुम क्या सोचते हो संयोग कभी-कभी होता है? पर तुम उसे होने तब ही दोगे जब तुम खुद एक योगी हो, संयोग तो हमेशा होना ही चाहता है।

श्रोता १: वह योग ना उकताए हुए, अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।

वक्ता: कर्तव्य शब्द के साथ बढ़िया खेल रहे है। कह रहे है बाकि सारे कर्तव्य की छोड़ो, एकमात्र कर्तव्य है तुम्हारा; योग। एक दूसरे मौके पर अर्जुन से कहते है सारे धर्मो को छोड़ो, एकमात्र धर्म है तुम्हारा, मेरे पास आ जाना। तो कर्तव्य भी दे रहे है धर्म भी दे रहे है। कह रहे है, बाकि कर्तव्यों का पालन ना करना ही तुम्हारा कर्तव्य है। और धर्म क्या है?

धर्मो का पालन ना करना  ही असली धर्म है।

श्रोता २: वही है, योगी हो जाओ।

वक्ता: ‘सर्व धर्म परित्याज मामेंकम शरणम ब्रज’। सारे धर्मो का परित्याग कर दो, धर्मो का परित्याग करो, धार्मिक हो जाओ। धर्मो को छोड़ो, धार्मिक हो जाओ। बात समझ में आ रही है? और धार्मिक वही हो सकता है, जिसने धर्मो को छोड़ दिया। ठीक वही बात यहाँ पर कह रहे है, कर्तव्यो को छोड़ो, और जो एकमात्र कर्तव्य है, जो तुम्हारा एकमात्र दायित्व है उसको पूरा करो, तुम्हारा एकमात्र दायित्व है? योग। मुझमें आकर मिल जाना, मुझमें लीन हो जाओ इसके अलावा तुम्हारा कोई कर्तव्य ही नहीं है। भूल जाओ कि तुम पत्नी हो, बच्चो का ख्याल रखना है, कोई कर्तव्य नहीं है तुम्हारा, एक कर्तव्य है बस। मेरे पास आ जाओ। धर्मो को छोड़ो धार्मिक हो जाओ, कर्तव्यों को छोड़ो, कर्तव्य को पा लो।

धर्मो पर एक बड़ी मज़ेदार कहानी है, वही आप उसको कर्तव्यों पर भी ले सकते है। एक बार, झाँकिया निकल रही थी, धर्मो की। उसमें सबसे पहले जीज़स  की झाँकी निकली। दो अरब लोग नाच रहे है उनके आसपास। दो अरब लोग। दो अरब से ज्यादा इसाई है अब दुनिया में, नाच रहे है, जीज़स  की झाँकी जा रही है। उसके बाद मोहम्मद की झाँकी निकली, डेढ़ अरब लोग नाच रहे है, मुस्लमान है। समझ रहे है? राम की झाँकी निकली, वहा भी एक अरब से ज्यादा लोग नाच रहे है, हिंदु है। उसके बाद एक झाँकी और निकली छोटी सी, वहाँ कोई पूछने वाला नहीं है। पता चला वो परमात्मा की झाँकी है।

धर्मो से इतना जुड़ गए कि धर्म भूल गया। 

जीज़स  से, राम से, मोहम्मद से इतना जुड़ गए कि परमात्मा भूल गया। क्रिस्चिएनीटी  याद है, क्राइस्ट  गया।

श्रोता १: बुद्धिज़्म याद है, बुद्ध गए।

वक्ता: हाँ। बौद्ध बहुत सारे है, बुद्ध कहाँ गए? इस्लाम ही इस्लाम है, कोई अल्लाह के पास भी पहुचेगा? इस्लाम तो ठीक, अल्लाह कहाँ है? वही है यहाँ पर।

श्रोता २: रास्ते पर ही अटक गए, अब जाना भूल गए, जहाँ जाना है।

वक्ता: हाँ अगला।

श्रोता ३: ‘युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दू:खहा।।’ दुखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मो में यथायोग्य चेष्ठा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सब कुछ है।

वक्ता: इसको उल्टा पढ़ो सब समझ में आ जाएगा, जो योगी हो गया उसका सब कुछ वही होता है जो यथायोग्य है। ये ना सोचना कि तुम कोई ख़ास आहार-विहार करके योग को पा लोगे, ये ना सोचना कि दिन के इतने ही घंटे सोऊंगा, ये करके तुम योग को पा लोगे।

श्रोता ४: (मुस्कुराते हुए) अब रात को जागूँगा।

वक्ता: ऐसा ही है, उसकी दुनिया में बिलकुल ऐसा ही है। ये मत सोचना कि, जो संतुलित जीवन जीते है उन्हें योग मिल गया, योग का फल है एक प्यारा जीवन, योग का फल है। देखो कृष्ण की दुनिया ऐसी ही है, वहाँ योग हमेशा पहले आता है, बाकि सब फल है, वहाँ साधना और विधि कभी है ही नहीं, तुमने सुना ही नहीं होगा कि कृष्ण साधना कर रहे है, तपस्वी कृष्ण, सुना है? की कृष्ण ने इतने वर्ष एक पाँव पर खड़े होकर साधना करी। कृष्ण की दुनिया में योग सबसे पहले है, कह रहे है सबसे पहले तो तुम मिल जाओ, पहले तो तुम ये रूठना बंद करो, पहले तुम जाकर के गले लग जाओ, उसके बाद जो होगा अच्छा ही होगा। जो होगा अच्छा होगा।

तुम्हारा सोना-जागना ठीक हो जायेगा, तुम्हें कर्मो में चुनाव नहीं करना पड़ेगा, तुम्हारे कर्म ठीक हो जायेंगे, तुम्हारा खाना-पीना ठीक हो जायेगा, सब ठीक हो जायेगा, जा के पहले गले मिलो, ऐसे है कृष्ण। वहा साधना के लिए कोई जगह ही नहीं है, वहाँ पर विधियों के लिए कोई जगह ही नहीं है। कोई ज़रा विधि बता दो कि कृष्ण की ये विधि है, क्या विधि है? रासलीला विधि है? कृष्ण की कोई विधि है ही नहीं, वहा तो सहज योग है, सामने, अभी। जाओ और डूब जाओ। फिर सब ठीक हो जायेगा। समस्त साधना का जो अंतिम परिणाम होता है, कृष्ण कहते है वो अंतिम नहीं है, मुझे बात अच्छी नहीं लग रही, कि इतना कुछ कर-करके, कर-करके, कर-करके फिर सिद्धि मिलनी है, वो कहते है छोड़ो ना, सिद्धि पहले है, अब उसके बाद खूब करेंगे और मज़े लेंगे। साधना तो कष्ट है, साधना का अर्थ ही है कि सिद्धि अभी मिली नहीं, अभी तो कोशिश ज़ारी है, अभी तो दम लगा के हईशा चल रहा है, जैसे नाक में फस गया हो और ज़ोर-ज़ोर से सुड़क रहे हो की नाक बाहर आ जाये, साधना ऐसी ही होती है, कुछ फँसा सा हुआ है, बाहर नहीं आ रहा, कृष्ण को ये सब सुहाता नहीं है, कि ये क्या ज़ोर लगा रहे हो, अरे में तुम्हें मिला ही हुआ हू, आओ, सामने हूँ।


सत्र देखें: आओ, डूबो, बाकी सब भूलो

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १:अतीत की स्मृतियों को भूल क्यों नहीं पाता हूँ? 

लेख २:  मन के बहुतक रंग हैं 


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़नhttp://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट https://goo.gl/fS0zHf

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