मुक्ति माने क्या?

 

 

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)कल्पों के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और कल्पों के आदि में मैं उनको रचता हूँ

~ भगवद्गीता ; अध्याय ९ श्लोक ७

वक्ता:  कल्प क्या है? उनके आदि और अंत से क्या अर्थ है?

कल्प का अर्थ है मन।

कल्पों के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ।

कल्प का अर्थ समय की कोई विशेष अवधि न लिया जाये। ये बहुधा किया गया है, और ये बात बड़े मूलभूत अज्ञान की है।

जब कृष्ण बोलते हैं तो वहाँ पर चाहे वो कल्पों की बात करें और चाहे कहें युगे-युगे, उनका अर्थ समय की कोई विशेष अवधि नहीं है। उनका अर्थ समय मात्र है  और समय अर्थात मन, कल्प माने मन। इतना ही कह रहे हैं कृष्ण कि, ‘’ये पूरा संसार मन का फैलाव है। मन फैला है, तो संसार है और मन जब सिमटता है तो संसार भी सिमट जाता है और मैं उसको पुनः रच देता हूँ, मैं उसको पुनः रच देता हूँ। मन के पीछे मैं हूँ, संसार के पीछे मैं हूँ। संसार-मेरा; माया-मेरी।’’

विराट मन में, ये जो अनंत अहंकार के बिंदु हैं, जिनका नाम जीव है, जिन्हें हम कहते है व्यक्ति और सारे पशु-पक्षी और पौधे, ये क्या हैं? ये विराट मन में, अस्तित्गत्व मन में, अहम के छोटे-छोटे बिंदु हैं और इन सब छोटे-छोटे बिन्दुओं का अपना-अपना व्यक्तिगत मन होता है। ये सारे छोटे बिंदु संसार की ओर भागते हैं क्योंकि संसार पर छाप है उसकी, जिससे संसार आया है।

मन माया की ओर आकर्षित होता है क्योंकि माया पर छाप है उसकी जिससे माया आयी है ।

माया को कृष्ण का ज़रा सा सौन्दर्य मिला हुआ है, माया को कृष्ण की ज़रा सी सुगंध मिली हुई है, आयी उन्हीं से है न! तो मन भागता है उनकी ओर, मन भागता है उनकी ओर। ये तो कर नहीं पाता कि सीधे-सीधे वापस मुड़ कर अपने ही स्रोत को देख ले, तो बाहर तलाशता है कृष्ण को, और उसके पास जो वजह है तलाशने की, वो गैर-वाजिब नहीं है। बाहर जो कुछ है, है तो कृष्णमय ही, कृष्ण ने छुआ है उसको, कृष्ण से ही उद्भूत है और क्रष्ण में ही वापस जाएगा। तो मन का बाहर को भागना एक तरीके से स्वाभाविक है। कृष्ण का ही तो फैलाव है, कृष्ण का ही विस्तार है और फिर यूँ  ही खेल चलता है, मन बाहर को भागता है, कृष्ण को यहाँ-वहाँ तलाशता है, और फिर जैसे खेल के संयोग बने, जैसी कृष्ण की मर्ज़ी बनी, जैसी कृष्ण की अनुकम्पा बनी, कभी भीतर को भी मुड़ जाता है। बाहर ढूंढते-ढूंढते अंततः, अपने तक पहुँच जाता है, कब-कैसे उसका कोई नियम नहीं है।

कृष्ण तक पहुँचने के यदि नियम हो सकते, फिर तो नियम कृष्ण से बड़े ही हो जाते।

जिस जगह तक पहुँचने का रास्ता तुम तैयार कर लो, वो जगह भी तुम्हारे ही द्वारा तैयार की गई होगी। वो जगह भी तुमसे कुछ ख़ास अलग नहीं हो सकती।

 तुम्हारे ही तल की होगी वो जगह, जिस जगह तक तुम ही अपने बनाये रास्तो द्वारा पहुँच जाओ।

कृष्ण तक पहुँचने का नियम या रास्ता, कृष्ण ही जाने लेकिन ये पक्का है कि मन फैलता है; फैलता है और अंततः कृष्ण में समा जाता है और वो भी अंत नहीं होता क्योंकि कृष्ण तो खिलाड़ी हैं, वो खेल फिर फैला दते हैं, उन्हें तो खेलना है।

कल्पों के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं ।’’ 

मन के अंत में, माया के अंत में, कल्पना के अंत में, सब जीव मुक्ति को प्राप्त होते हैं परन्तु जैसे मन और माया असली नहीं थे, वैसे ही ये मुक्ति भी असली नहीं होती, असली तो मात्र कृष्ण है।

जब माया नकली थी तो माया से मुक्ति असली कैसे हो सकती है? तुम सपने में बंधन में थे, तो तुम्हारी मुक्ति असली कैसे हो सकती है ?

और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ ।’’

 जब रच दिया तभी आदि, कल्पों का आदि पहले नहीं आता। कृष्ण की मर्ज़ी से मन जब दोबारा फैल गया तब संसार फिर शुरू, एक नई कहानी, एक नया फैलाव, एक नया संसार, गया पुराना, नया आ गया। इसका ये अर्थ नहीं है  कि पुराना संसार गया था, पुराना व्यक्ति भी गया था। नया व्यक्ति आ गया, उसका नया संसार, इसको हम जीवन-मरण बोल देते हैं, इसको हम समय का आगे बढ़ना बोल देते हैं, ये सब कुछ नहीं है।

केंद्र पर है कृष्ण, समय में और स्थान में उन्होंने मन का विस्तार कर रखा है, वही प्रथम आकाश है, मन का विस्तार। उस विस्तार में अहंता के अनंत छोटे-छोटे दीप-तारे टिमटिमा रहे हैं, वो हम हैं।

कभी रात के आकाश को देखा है? कभी कोई तारा टिमटिमाता है, फिर अचानक बुझ सा जाता है, थोड़ी देर में कोई और टिमटिमाने लगता है और तारे बनते-बिगड़ते रहते हैं, मिटते रहते हैं, नये तारों का जन्म होता है । ये बनना-बिगड़ना, टिमटिमाना, बुझ जाना – ये खेल है जीवन मृत्यु का। मन के अनंत विस्तार में इस तरह के छोटे-मोटे खेल चलते रहते हैं।

तारो को यूँ समझ लीजिये कि घनीभूत चेतना या जैसे सांख्य योग कहता हैअसंख्य पुरुष, सांख्य में किसी एक पुरुष की अवधारणा नहीं है। प्रकृति तो अनंत है हीउसमें तो तमाम तरह की विविधता है ही, पुरुष भी अनंत हैंजैसे आकाश में छाए तारे अनंत हैं, अनंत पुरुष, और ये सब कृष्ण ने फैला रखे हैं। पुरुषों को वो कहते हैं, ‘’ये मेरी परा-प्रकृति है’’ और जो जड़ प्रकृति है, उसको वो कहते हैं, ‘’ये मेरी अ-परा-प्रकृति है।’’

हर तारे को अपने होने का गुमान है, अहंता ही तो तारा है। हर तारा अपनेआप को आकाश में स्थित देखता है। आकाश उसका संसार है, हर तारा अपनेआप को कुछ मानता है, फिर एक दिन तारा जग जाता है, जिस दिन तारा जग जाता है, उस दिन तारा मिट जाता है। वो वापस अपनी शून्यता की तरफ लौट जाता है।

ब्रह्माण्ड में भी ऐसा ही होता है, जिसको आप मैटर  बोलते हैं, वो सब कुछ है थोड़े ही, एक खालीपन है जो प्रतीत होता है; पदार्थनुमा। रहता है, रहता है, प्रतीत होता रहता है और एक दिन विलुप्त हो जाता है। पदार्थ नहीं विलुप्त हुआ, उसका प्रतीत होना विलुप्त हुआ, पदार्थ था कहाँ कि विलुप्त हो जाए? प्रतीत सा होता था, विलुप्त हो गया । ठीक उसी तरीके से अहंकार प्रतीत ही होता था, एक दिन विलुप्त हो जाता है, अपने प्रथम शून्य में लौट जाता है।

कल्पों के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं । 

भ्रम के अंत में, अहंकार शून्यता को प्राप्त होता है, इसको ऐसे पढ़ो।  

और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ  

‘’और करूँ क्या? यूँ ही थोड़ी मुझे नटखट बांसुरी वाला कहा गया है? नटखट हूँ, खेलना है । तुम लौट-लौट आते हो मेरे पास और मैं बार-बार तुमको बाहर भेज देता हूँ, तुम जाने को राज़ी न हो, तो छुप जाता हूँ।’’  तुम लौट-लौट सब शून्य कर देना चाहते हो क्योंकि कुछ है तो तभी तक, जब अलग-अलग है। अलग-अलग नहीं है तो है कहाँ?

तुम्हारी इच्छा तो यही रहती है कि तुम परम शांति को उपलब्ध हो जाओ, उपर-उपर से ये लगता है कि तुम्हारी हज़ार इच्छाएँ हैं, पर गहरी इच्छा तुम्हारी यही है कि तुम कृष्ण में जा कर मिल जाओ, तुम्हारी इच्छा तो यही रहती है। पर सब जब जाकर के वापस कृष्ण में ही मिल जाता है, तो कृष्ण खुद को ही खुद से अलग करके, तुम्हें फिर निर्मित कर देते हैं।

और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ 

 जब निराकार मैंसे अनंत साकार और भिन्न-भिन्न मैंकी रचना होती है, उसका नाम है कल्पों का आदि। निराकार से साकार उद्भूत हो गया; कुछ नहीं से, बहुत कुछ उद्भूत हो गया। कृष्ण से माया फूट पड़ी और कृष्ण ने स्वयं को ही स्वयं से निष्कासित कर दिया। जाओ तुम, बिखर जाओ संसार में, अब तुम नन्हे-नन्हे जीव पैदा हो गए । अब ये सारे नन्हे जीव, अपना जीवन कृष्ण को खोजने में बिताएंगे, और जब कृष्ण को पायेंगे, तो पायेंगे कि ये तो हमेशा से कृष्ण ही थे।


        

सत्र देखें: आचार्य प्रशांत,श्री कृष्ण पर: मुक्ति माने क्या? (What is meant by freedom?)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १:  माया नहीं दीवार ही, माया सत्य का द्वार भी 

लेख २:  देह का हर रिश्ता नष्ट ही हो जाएगा, क्या है जिसे काल छू नहीं पाएगा?

लेख ३:  कृष्ण को चुनने दो कि कृष्ण का संदेश कौन सुनेगा


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

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एक टिप्पणी

  1. नमस्कार प्रियंका जी,

    यह वेबसाइट प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित है एवं यह उत्तर भी उन्हीं से ही आ रहा है|

    बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रही हैं और आपके मन में जो विभिन्न प्रश्न उठ रहे हैं, आप उनका जवाब जानने के लिए उत्सुक हैं।

    फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से, लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

    1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
    यह एक अभूतपूर्व अवसर है, आचार्य जी के सम्मुख होकर, उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
    इस अनूठे अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
    सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

    2: अद्वैत बोध शिविर:
    प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर, आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने काअनूठा अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। निःसंदेह यह शिविर खुद को जानने का सुनहरा अवसर है।

    ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित 31 बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
    इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
    श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

    3. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
    आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से, साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
    सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
    श्री अपार: +91-9818591240

    4. जागरुकता का महीना:
    फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।

    सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें:
    सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

    आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगी।

    सप्रेम,
    प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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