इन्द्रियों के पीछे की इन्द्रिय है मन

 

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वक्ता: आनंद साहिब से है कि:

उसने शरीर के वाद्य यंत्र में सांस फूंकी और नौ द्वार खोल दिए लेकिन दसवें को छुपा के रखा।

प्रश्न है कि दसवां द्वार कौन सा है? कौन सा हो सकता है दसवां द्वार?

मन का है। नौ द्वार हैं शरीर के जो बाहर की ओर खुलते हैं। हम सब जानते हैं। ठीक है न? जिनको आप कर्मेन्द्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ बोलते हो। नौ द्वार हैं, जो बाहर की ओर खुलते हैं। एक दसवां दरवाज़ा भी है, जो भीतर की ओर खुलता है, जो छुपा रहता है। बस इतनी बात कह रहे हैं। शरीर में जो कुछ है, वो शरीर के होने का आभास कराता है। वो नौ दरवाज़े हैं जो बाहर की ओर खुलते हैं।

शरीर क्या हैशरीर वो, जो संसार के होने का आभास कराए।

शरीर का हर दरवाज़ा संसार से संयुक्त है। आँखे, ज़बान, नाक, हाथ, जनेंद्रियाँ, त्वचा, सब कुछ। ये क्या करते हैं? ये संसार के रिसेप्टर्स  हैं, एंटेना हैं ये। कि संसार से सिग्नल आ रहे हैं, और यें। अब संसार से सिग्नल आ नहीं रहे हैं। ये संसार रचते करते हैं। हमारी चूक ये होती है कि हम ये कहते हैं कि जैसे संसार है, उसका कोई वस्तुनिष्ठ अस्तित्व है। और उससे जो सन्देश आते हैं वो आँखें पकड़ती हैं। हमें यही लगता है न कि आँखे बंद भी कर लो, तो भी दुनिया तो है ही है। और सब कुछ इसी बात की गवाही देता है कि आँख न भी रहे, तो भी दुनिया रहेगी। बात बिलकुल झूठी है। आँखें न रहें तो दुनिया नहीं रहेगी क्योंकि दुनिया जैसी कोई चीज़ नहीं है।

दुनिया क्या है? कुछ है नहीं। जो आँखें दिखाती हैं, उसका नाम दुनिया है। ये न कहिये कि आँखे दुनिया को दिखाती हैं। सूक्ष्म अंतर है। समझियेगा।

आँखे दुनिया नहीं दिखाती। जो आँखे दिखाती हैवो दुनिया है।

नहीं समझे? आँखे दुनिया नहीं दिखाती। जो आँखे दिखाती है, वो दुनिया है। आँखे न रहें, तो दुनिया नहीं रहेगी। कईं बार यहाँ कह चुका हूँ कि दुनिया में कोई न रहे देखने वाला, तो सूरज नहीं उगेगा। ये बात प्रतिवाद लगती है, बहुत अजीब लगती है कि ऐसा कैसे हो जाएगा? देखने वाला अगर नहीं रहेगा, तो सूरज नहीं उगेगा?” हाँ, भाई! नहीं उगेगा क्योंकि सूरज है ही नहीं। सूरज जैसी कोई चीज़ नहीं है।

सूरज क्या है? जो आँखें दिखाती हैं, वो सूरज है। सूरज का अपना कोई अनाश्रित अस्तित्व नहीं है। उसका कोई अपना ऑब्जेक्टिव फ्री, स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। पर ये बात बहुत भयानक लगती है।

श्रोता: सर, पाँच इन्द्रियाँ तो पता हैं, लेकिन बाकी चार इन्द्रियाँ कौन सी हैं?

वक्ता: जब ज़बान का इस्तेमाल करते हो स्वाद के लिए, तब तुम उसको बोलते हो कि ये कर्मेन्द्रिय है। जब ज़बान का इस्तेमाल करते हो बोलने के लिए, तब वो दूसरी इन्द्रिय बन जाती है। उसके अलावा तुम फिर मलोत्सर्जन का बिंदु, प्रजनन का बिंदु, इनको भी जोड़ देते हो। तो ऐसे करके चार और जुड़ जाती हैं। जब तुम अपनी पाँच इन्द्रियों की बात करते हो, तो उसमें तुम इनको नहीं जोड़ते हो। जब इनको भी जोड़ देते हो तो नौ बन जाती हैं।

सवाल इन इन्द्रियों की गिनती का नहीं है। सवाल इस बात पर ज़्यादा ध्यान दे रहा है कि शरीर के पास एक मशीन की तरह, वो सब कुछ है जो कि दुनिया से जुड़ा हुआ है। आप आठ गिन सकते हैं, या ग्यारह। उससे फ़र्क नहीं पड़ता। आठ या ग्यारह, वो सब कुछ दुनिया के सन्दर्भ में ही है, दुनिया की वस्तुओं के संदर्भ में ही है। लेकिन केवल एक ही इन्द्रिय अंदर की ओर मुड़ती है।

आनंद साहब में कहा जा रहा है, उसको उन्होंने छुपा दिया| “दसवां गुपत रखाईया।नौ दिखा दिए हैं, दसवां गुप्त है। तो सन्यासी कौन है? जिसने इस गुप्त को खोज निकाला। नौ तक तो सभी जाते हैं। पैदा होते ही नौ तक सब चले जाते हैं। दसवें तक जो पहुँच गया, उसने सत्य को जान लिया। दसवें तक जो पहुँच गया, उसने जान लिया सत्य को।

श्रोता: उसने मन को भी जान लिया?

वक्ता: उसने मन को जान लिया। ये नौ ही मन है। दसवां वो बिंदु है, जहाँ से तुम मन को देखते हो। वो साक्षित्व हो गया। ये जो नौ हैं, ये मन है। और दसवां? वो बिंदु है जहाँ से मन को देखते हो। साक्षी होने का मतलब होता है राजा हो जाना क्योंकि, ‘’अब मैं जान गया हूँ तुझे’ (मन)। अब तेरा गुलाम नहीं रह सकता।‘’ ओशो बार-बार जो कहते हैं, “संन्यास भोग की कला है”, बहुत बहतरीन वक्तव्य है। सन्यासी के आलावा और कौन भोग सकता है? हमारी हालत तो वो रहती है न वो जो भ्रतिहरी का भेजा था। कि तुम भोग को नहीं भोगते, भोग तुम्हें भोगता है।

संसारी कौनजिसे भोग भोग ले।

और सन्यासी कौनजो भोग को भोगले।

बस यही अंतर है दोनों में। सन्यासी और संसारी में। भोगते दोनों है। संसारी वो जिसे भोग भोग ले। समझ रहे हो बात कोशिकारी खुद यहाँ शिकार हो गया। और सन्यासी कौनजो भोग को भोग ले। यही अंतर है।

जान जाता है पूरा हिसाब-किताब।


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  सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

 

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय प्रत्यक्ष जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है |

      बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:
      _______________________________________________

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।

      इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर:
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं।

      इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।

      सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।

      सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर
      या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917
      _______________________________________________

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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