सुनने का वास्तविक अर्थ

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सुणिए हाथ होवै असगाहु

जपुजी (नितनेम)

वक्ता: जो हासिल किया नहीं जा सकता, जो बात दुष्प्राप्य है, वो भी सुनने से हाथ आ जाता है।  जो तुम्हें अन्यथा कतई न मिलता, वो सुनने से मिल जाता है।  क्या आशय है?

श्रोता1: सुनने से कुछ मिलेगा की जगह इसको ऐसे करें कि जो भारीपन है, वो जाता नहीं है।  अगर हम ऐसे मान लें कि हर सेकंड एक ग्राम भारीपन बढ़ ही रहा है, तो जिसको हम सत्संग कहते हैं सत्य का संग तो उसमें आप कुछ सुनते नहीं हो, कुछ और एक ग्राम बढ़ता नहीं है और जो बाहर से आम तौर पर एक ग्राम बढ़ रहा था, वो भी नहीं बढ़ता है। तो एक तरीके की सफ़ाई होती रहती है, जिसमें कि बढ़ौत्री नहीं होती।  तो वो एक तरीके से क्लीनर का काम करता है।

श्रोता 2: हमारा जो रोज़ का सुनना है, उसमें कर्ता भाव भी होता है। उसमें चयन होता है कि क्या सुनें। लेकिन असली सुनना जो होगा, वो निर्विकल्प होगा।  

श्रोता3: आपने कई बार कहा है कि, ‘’साइलेंस इज़ द साउंड्स बिहाइंड आल साउंड्स। ’’

वक्ता: बहुत बढ़िया।  कल कोई पूछ रहा था कि कबीर ने कहा है कि, ‘ही इज़ इन द ब्रेथ ऑफ़ आल ब्रेथ्स। तो वो वही है।  न काबे कैलास में, मैं सांसन की साँस में। ’ ‘’मैं सांसन की साँस में हूँ, और मैं हर आवाज़ के पीछे हूँ। ’’

एक बात अच्छे से पकड़ लो। विचार, विचार को पकड़ता है और मौन, मौन से जुड़ता है। मन शब्दों के अलावा कुछ सुन नहीं सकता, मौन को मौन ही सुनेगा। कीमत सिर्फ़ मौन की है। सुनने का अर्थ है इधर के मौन ने, उधर के मौन से एका कर लिया। मौन, मौन से जुड़ गया; अनंतता, अनंतता से मिल गई। सुनने का अर्थ है: ‘’मैं, मैं न रहा, तू तू न रहा; मैं भी खाली, तू भी खाली।’’ खाली, खाली से मिल गया; पूर्ण पूर्ण से मिल गया। अपूर्ण कभी पूर्ण से नहीं मिल पाएगा।  अपूर्ण और पूर्ण तो आयाम ही अलग-अलग हैं, उनका कोई मिलन नहीं होता। पूर्ण से मिलने के लिए, पूर्ण ही होना पड़ता है। मौन को सुनने के लिए, मौन ही होना पड़ता है।

मैं अभी बोल रहा हूं तो दो तल पर घटना घट रही है। एक तल पर मेरे शब्द हैं, और एक तल पर मेरा मौन है। और तुम सब दो तलों पर बैठे हो अभी। जिनका मन सक्रिय है, वो अभी मेरे शब्द सुन रहे हैं, दूसरे जो मौन में हैं, वो आत्मा से जुड़ गए, वो मौन से जुड़ गए। विचार, विचार से जुड़ता है; मौन, मौन से जुड़ता है। जो जैसा है, वो उसी से जुड़ता है। जो जिस तल पर है, वो उसी से तो जुड़ेगा न! विचार के तल पर सिर्फ़ विचार है। विचार और विचार, जैसे दो मुर्दा चीज़ें हैं, जैसे रेत से रेत मिला हो एसा जुड़ना है उनका।  

जैसे पानी से पानी मिला हो, ऐसे मिलता है मौन से मौन। जैसे सागर से सागर मिल गया हो। रेत से रेत मिल कर भी कभी, एक नहीं हो पाती। कितनी भी लगे कि इकट्ठा है, पर वो अपना मौजूद कायम रखती है। एक-एक कण अपना प्रथक अस्तित्व कायम रखता है। और जब पानी से पानी मिलता है, तो पूरा एक हो जाता है।  अलग-अलग नहीं कर पाओगे अब।  विचार कितना भी सूक्ष्म हो, सूक्ष्मतम रेत का दाना बन जाएगा। पर उसमें उसकी जड़ता, उसकी ठसक, उसकी रिजिडिटी  कायम रहती ही है, वही तो अहंकार है। वो कभी अपनेआप को गलने नहीं देगा। इसीलिए शब्दों को सुनना, सुनना है ही नहीं।  

समझ रहे हैं न बात को?

शब्दों को कौन सुनेगा? आप ही सुनेंगे। जब आप कहते हो कि, ‘’मैं शब्दों को सुन रहा हूँ,’’ तो इसका मतलब कि मन सक्रिय है। और जब आप मौन को सुनते हो, तो उसका अर्थ इतना ही है कि आप भी मौन हो गए हो। मौन हो, तो मौन ही सुनाई देगा। वही असली मिलन है। अपूर्ण और अपूर्ण का मिलन लगता है कि हो गया, पर कभी होता नहीं। होता भी है, तो एक भ्रम की तरह, दुःख देता है बस क्यूँकी अपेक्षाएँ टूटती हैं। तुमने जो सोचा होता है कि मिलकर के मिल जाएगा, वो कभी होता नहीं। अपूर्ण, अपूर्ण का ऐसा मिलन। और पूर्ण पूर्ण का मिलन, कल्पना मात्र है। तुम कल्पना कर सकते हो कि, ‘’मेरा योग हो गया।’’ और बहुत घूम रहे हैं जिन्होंने कल्पना बाँध रखी है कि, ‘’मुझे तो मोक्ष हो गया है। ’’        

वो यही कर रहे हैं: अपूर्ण हैं और दावा यह है कि पूर्ण से मिलन हो गया है।  पति-पत्नी का समझ लो ऐसा सम्बन्ध है कि अपूर्ण और अपूर्ण मिले। तुम्हारे ये जो योगी-सन्यासी घूम रहे हैं, इनका ऐसा सम्बन्ध है कि जैसे अपूर्ण से पूर्ण मिले।  जब पति कहता है कि पत्नी से मिल गया, तो वो इतना ही कहता है कि अपूर्ण से अपूर्ण मिले। पर ये जो तथाकथित सन्यासी कहते हैं कि, ‘’मुझे परम मिल गया,’’ तो ये कहते हैं कि अपूर्ण को पूर्ण मिल गया।  ये दोनों ही बेवकूफियां हैं और सन्यासी की बेवकूफियां ज़्यादा बड़ी बात है।  

मिलन तो मात्र पूर्ण से पूर्ण का होता है। मौन से मौन मिला। चुप तुम रहो, चुप हम रहे, खामोशी को खामोशी से बात करने दो।  


 आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

  • अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  •   आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com  या

 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

  •    जागृति माह

    जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर।         जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

     सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

  •  आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

  संपर्क करें:  सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917


  सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  
https://goo.gl/fS0zHf

      

 

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2 टिप्पणियाँ

    • नमस्कार,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है |

      बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:
      _______________________________________________

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।

      इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर:
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं।

      इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।

      सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।

      सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर
      या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917
      _______________________________________________

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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