तुम्हारा प्रतिरोध व्यर्थ है

 

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)बिरहिन ओदी लाकड़ीसकुचे और धुन्धाये 
छुटी पड़ी यह बिरह सेजो सगरी जली जाये ।।

~ संत कबीर

वक्ता: नियति तो उसकी जलना ही है। और नहीं जलेगी तो इतना ही करेगी किखूब धुआं देगी। कोई रोशनी नहींकोई ऊष्मा नहींसिर्फ़ धुआं। गंदगी फैलाएगी। जलेगीजलेगी तब भी। पर तिल-तिल कर जलेगी। कोई तरीका नहीं है जलने से बचने का पर घुट-घुट कर जलेगी। प्रतिरोध दे-दे कर जलेगी। कष्ट का जो समय हैविरह का जो समय हैउसे और लम्बा कर-कर के जलेगी। जो प्रक्रिया आनंद के साथउल्लास के साथप्रकाश के साथथोड़े ही समय में पूरी हो जाती, उसको वो खूब खींच देगी। बच नहीं जाएगी खींचकर के। उसकी नियति है जल जाना। पर एक गन्दा सा दृश्य रहेगा कि अपनेआप को बचाने की पूरी कोशिश भी कर रहे होबच भी नहीं पा रहे हो; दुःख में भी होकाला गंदा धुँआ फैल रहा हैकोई ज्योती नहीं निकल रही है। और ऐसा सा जीवन है।

कबीर कह रहे हैंथोड़ा तो ध्यान दो। थोड़ा तो गौर करोकि तुम्हारी नियति क्या है। वही होवहीं से आए होवहीं को वापस जाना है। तो क्यों अपने ही रास्ते की बाधा बनते होक्यों जलने से इनकार करते होजिधर जाना है अंततःउधर चले ही जाओ। जो तुम हो, उसी में वापस समा जाओ। नहीं। लेकिनरूप ले लेने काआकार ले लेने कामाया का खेल ही यही है कि एक बार रूप ले लियातो उसके बाद अरूप हो जाने में भय लगता है। भले ही सारे रूप अरूप से ही जनमते हो लेकिन रूप को दुबारा अरूप हो जाने में बड़ा भय लगता है।

दूसरी जगह पर कबीर ही कहते हैं कि :

वहाँ से आया पता लिखायातृष्णा तूने बुझानी।

अमृत छोड़-छोड़ विषय को धावेउलटी आस फसानी।।

आये वहीं से होपर अब वहीं वापस जाने से इनकार करते हो।

प्रतिरोध अच्छा लगता है अहंकार को। कबीर आपसे कह रहे हैं रेसिस्टेंस इज़ फ्युटाइल। जानते तो हो तुम भी।

श्रोता: क्या हम मूल को पा ही लेंगे?

वक्ता: तुम उसे नहीं पा लोगेवो तुम्हें खींच ही लेगा।

श्रोता: अच्छा।

वक्ता: तुम्हारे बस की है पानापर भाषा देखो अपनी। ‘’मैं पा लूंगा।‘’ वही मेंढकआज उसकी कहानी बदल गई है। आज वो अपनी चड्डी को खुद लेके घूम रहा हैकह रहा है, ‘मैं इसमें हाथी को घुसेड़ ही दूंगा।आज ज़बरदस्त कर्ताभाव जागा है उसमें। कह रहा है, ‘हाथी माने ना माने, आज अपनी चड्डी में हाथी को घुसेड़ कर ही मानूंगा। वैसे ही ये, ‘मैं मूल को पा ही लूंगा। तुम नहीं पा लोगे बेटा उसको। वो तुम्हें पा लेगा।

और जब, जानने ही लग जाते होजब हल्की आहटें मिलनी शुरू हो जाएजब दूर से रोशनी दिखनी शुरू हो जाएतो फिर बेवकूफ़ी नहीं करनी चाहिए। उसकी ओर कदम बढ़ रहे हैं तो बढ़ने दोबाधा मत बनो। प्रतिरोध मत करोरेज़िस्ट मत करो। जब पुकार सी आने ही लग जाएजब झलक मिलने ही लग जाएतो फिर अड़ना नहीं चाहिए। अड़ना व्यर्थ है। फिर तो कदम जिधर को ले जा रहे होंउन्हें चलने दो। तर्क मत करो। तर्क करोगे, तो तर्क हज़ार मिल जाएँगे। कारण खोजोगेकारण हज़ार मिल जाएँगे। ब्रह्मसूत्र है, ‘तर्क प्रतिष्ठानात। कहते हैंकोई इज्ज़त ही नहीं दी जा सकती तर्कों को क्योंकि वो तो वृत्ति के गुलाम हैं। जो तुम्हारी वृत्ति का आदेश है, उसके अनुरूप तुम एक तर्क खोज निकालोगे।

सीधी सपाट बात है, कि हाँसमझ में तो आया। अब जब समझ में आ गया तो बईमानी मत करो।

जाता हूँबोलता हूँसंवाद वगैरह मेंवहाँ पर अड़चन ये नहीं है कि जो बोला जा रहा है वो समझ में नहीं आ रहा। खूब समझ में आ रहा है। साफ़ से साफ़ तरीके से बोला गया हैऔर जिन्होंने सुना है वो भीइतने मूर्ख नहीं है कि उनके पल्ले कुछ ना पड़ेसमझ में खूब आ रहा है। पर प्रतिरोध है। बईमानी है। समझ में आ भी गया है तो क्या कहेंगे?

श्रोता: सर 9० प्रतिशत लड़के यही बोलते हैं कि लागु करना असल ज़िंदगी में मुश्किल है।

वक्ता:  इस मुश्किल का अर्थ समझते हो क्या हैकीमत देने को तैयार नहीं है। बात तो ठीक है लेकिनकीमत देने को हम तैयार नहीं है। किसी दूसरे संदर्भ में कहा गया थापर एक शायर ने कहा है ना कि होश में आये भी तो कह देंगे होश नहीं। बिल्कुल यही होता है। होश में तो आ जाते हैंपर कह देते हैं, ‘‘नहीं-नहीं हम नहीं आए होश में।‘’ अब बड़ा मुश्किल है। कोई बेहोश हो, तो उसे होश में लाया जा सकता है। पर जो आ गया होश में पर फिर भी इनकार कर रहा है, कि होश में आए भी तो कह देंगे कि होश नहीं। पूरा है कि,

 हम तेरी मस्त निगाही का भरम रख लेंगेहोश में आए भी तो कह देंगे की होश नहीं।

माया के लिए ही कहा गया है। हम तेरी मस्त निगाही का भरम रख लेंगेहोश में आए भी तो कह देंगे कि होश नहीं। ठीक यही काम हम करते हैंयही काम वो बिरहिन लकड़ी  कर रही है।

समझ में आ भी गया तो कह देंगेहमें कहाँ आया समझ में! क्योंकि यदि ये स्वीकारा कि बात आ गई समझ मेंतो उस राह चलना भी पड़ेगा। चलना शुरू में तो कष्ट देता ही है। पहले कुछ कदमो में तो पीड़ा होती ही है। तुम वो कीमत देने को तैयार नहीं हो। सब खूब समझते होकुछ नहीं। ये ओदी लकड़ी खूब समझती है कि इसे जलना तो पड़ेगा हीऐसा नहीं है कि ये सोचती है कि लड़ सकती है अपनी तक़दीर सेनहीं। इसे पता खूब है। पर मूर्खता इसी का तो नाम है ना कि जो तय हैजो आखिरी हैजो सत्य हैजो अचल सत्य हैहिल ही नहीं सकतातुम उसके विरुद्ध भी खड़े हो। तुम किसका विरोध कर रहे होउसकाजिसका कोई विरोध हो ही नहीं सकता! तुम किससे लड़ रहे होवो जो तुम्हारे भीतर भी हैतुम्हारे बाहर भी है? मूर्खता और किसको कहते हैं?

श्रोता: यहाँ पर चलने का क्या मतलब है?

वक्ता: चलने माने?

श्रोता: जैसे पहले बोल रहे थे कि चलना तो हमेशा दूर ही ले जाता है।

वक्ता: तुम किससे दूर होने की कोशिश कर रहे हो?

श्रोता: नहींआपने कहा ना कि चल पड़े हैं इस राह परशुरू के कदम तो…

वक्ता: हाँवो घरवापसी के कदम हैं। वो इमारत में वापस अंदर आने के कदम हैं। पर जब आँखे खूब अनुरक्त हो गई हों कि बाहर बड़ा अच्छा-अच्छा दिखाई दे रहा हैउधर को चलेंगे। तो वापस घर की ओर देखना थोड़ा बुरा सा लगता है।

हम टालते हैं – ‘नहीं, आगे कर लेंगे। और किसको टालते हैंजो अटल है। जो टल नहीं सकताहम उसके साथ टाल-मटोल कर रहे हैं। सारा खेल टाल-मटोल का है। अस्वीकार कोई नहीं कर रहा है। अस्वीकार कोई नहीं कर रहा। सबका दावा बस ये है कि अभी हमारा वक्त नहीं आयाअभी नहीं। अभी नहीं। थोड़ा सा और आगे स्थगित कर दीजिये।

श्रोता: सर, अगर ये रोलर-कोस्टर राइड चलती ही रहे तो प्रॉब्लम क्या है?

वक्ता: प्रॉब्लम ये है कि जो बैठे ही रहते हैं रोलर-कोस्टर मेंवो रोलर-कोस्टर में ही फिर टट्टी करेंगेउल्टी करेंगेसब वहीं पर; पूरा कैसा माहौल इकट्ठा कर लेंगेसोचो। चलती ही रहे तो छोड़ दो। तुम्हें दो घंटा भी बैठा दिया जाए रोलर-कोस्टर में तो किस दशा में उतरोगेअब चीख रहे हैंचिल्ला रहे हैं कि रोको-रोको-रोको। पर उतरने को तैयार नहीं हैं। और दुर्गन्ध उठ रही है, जहाँ बैठे हुए हो उस एरिया से।

श्रोता: सर, उतर ही नहीं रहेतो इसका मतलब मज़ा आ ही रहा है।

वक्ता: मज़ा नहीं आ रहा है। बुद्धि ख़राब है। कष्ट की आदत लग गई है। माया इसी को कहते हैं कि वो तुम्हें आदतो में डालती है और आदत ये भी हो सकती है कि कष्ट झेलना ही झेलना है। तब सुख बड़ा धोखा लगता है। बड़ा धोखा लगता है। ये बर्दाश्त नहीं होगा। जिसको आदत लग गई हो, उसको बड़ा धोखा लगता है। जिसको एक बार आदत लग गई गंदा खाने की, उसके सामने तुम सात्विक खाना रख दो, उससे खाया नहीं जाएगा।

मछुवारे वाली तो कहानी सबने सुनी ही है। कि एक मछुवारा थातो एक बार वोपरफ्यूम मार्किटइत्र के बाज़ार पहुंच गया। वहाँ उसको दौरा आ गयावो गिर पड़ाछटपटा रहा है। लोगों ने कहा क्या हो गयातो जो दुकानदार लोग थे उनमें से, कुछ लोगों के पास मेडिसिनल परफ्यूम्स भी थी। वो कह रहे है ये सुंघाओवो सुंघाओये ठीक हो जाएगा। और जितना उसको सुंघा रहे हैं, वो उतना और बुरी तरह छटपटा रहा है। फिर तभी वहाँ दूसरा आया मछुवाराउसने कहा, ‘अरे ये क्या कर रहे होजान लेके मानोगे क्या उसकी?’ वो एक सड़ी मरी हुई मछली लायाउसकी नाक में घुसेड़ दीवो बिलकुल चंगा होकर बैठ गया।

तुम्हारे लिए इससे बड़ा कष्ट हो नहीं सकता कि तुम्हें कह दिया जाए कि दो घंटे शांति से बैठो। सोचियेगा ज़रा इस बात को। आप कहोगे मुझे सौ जूते मार लो, पर ये मत करना। ध्यान से, मौन में, स्थिर होकर शांत बैठ जाना, इससे बड़ा कष्ट नहीं हो सकता।

श्रोता: सर! वो मैंने कर के देखा था तो सर झंनाने लगा था। यानि, दो-तीन घंटे हो गए थेऔर उसके बाद…

वक्ता: दो-तीन घंटे तुमने झेला कैसे, पता नहीं।

श्रोता : सर वो बहुत अजीब सा..अच्छा नहीं लगतायानि के..ब्लिस्फुल सी फीलिंग नहीं होतीवो..

वक्ता: बिल्कुल नहीं होगी क्योंकि रोलर-कोस्टर की आदत लग गई है। जिसको एक बार उसकी आदत लगीकभी ड्रग एडिक्ट को देखा हैतुम उसे ना दो, दो दिनफिर उसकी हालत देखो। लोग परम को पाने के लिए क्या तड़पते हैं। मीरा उतना नहीं तड़पी होंगी कृष्ण के लियेजितना वो तड़पता है एल.एस.डी. के लिए। आदत।

श्रोता: सर, जो रोज़ ज़्यादा देर तक शांत बैठे, तो कुछ फर्क पड़ेगा?

वक्ता: रोज दो घंटे शांत बैठने की आदत लग जाएगी (सभी हँसते है)।

रोज़ दो घंटे शांत बैठा नहीं जाता। मन ऐसा हो जाता है कि चाहे आधा घंटाचाहे पाँच घंटेउसको शांत बैठने में कुछ आपत्ति नहीं है। उसने इस बात को अपनी दिनचर्या का हिस्सा नहीं बना लिया है कि मुझे इतने बजे से इतने बजे तक शांत बैठना है। अब उसे कोई आपत्ति नहीं है। शांत हो जाना उसके लिए बड़ी सहज बात हो गई है। वो बस में बैठा है, वो शांत रहेगा। वो यहाँ बैठा है, वो शांत रहेगा। ये उसके लिए अब कोई कर्म नहीं है।

श्रोता: सर समझ नहीं आया।

वक्ता: बहुत लोग हैं जो इस बात को भी साध लेते हैं कि दो घंटे शांत बैठना हैबहुत लोग हैं। और उससे उनके जीवन में कोई बदलाव नहीं आता। क्योंकि वो शांत बैठने से पहले और शांति से उठने के बाददोबारा ठीक वैसे ही हो जाते हैं, जैसे वो थे। उन्होंने उस शांत बैठने के दरमियान को भी, अपनी दिनचर्या का हिस्सा भर बना लिया है।

श्रोता: वो मौजूद हैचेंज नहीं हुए।

वक्ता: बहुत लोग हैं तुम देखना। सुबह सात से आठ बजे तक योगाभ्यास करते हैं। जीवन, वैसे का वैसा ही है। शाम को सात से आठपूजाप्रार्थनाआरती करते हैं। जीवन वैसा का वैसा ही है। और इस बात की खूब सलाहें दी जातीं हैं। और आपको बहुत अच्छा लगेगाजब आपसे कोई कहेगा देखिये आप दिन भर जो कर रहे हैं, सो करिये। दिन भर आप दुकान पर बैठकर मिलावट करते हैंकरिये। शाम को एक घंटा बैठ करज़रा ध्यान किया करिये। और आप कहेंगेवाह! ये हुई ना बात। दिन भर गला काटोऔर शाम को आधे घंटे ध्यान करिये,फिर देखिये कि आपको कितना अच्छा लगेगा। और अच्छा लगता भी है। बहुत बढ़िया! गुरूजी महान हैं।

और अब यही गुरूजी बता दें कि बेटा जब तक तुम दिन भर दुकान में ये काटा-पीटी कर रहे होतब तक तुम्हारे जीवन में शांति कहाँ से आ जाएगीतब आप गुरूजी की ही बात नहीं सुनोगे। तो इसीलिए ये खूब चलता है। टेलीविज़न पर आएगाआप देखोगे कि सुबह पंद्रह मिनटमात्र पंद्रह मिनट के लिए आप प्राणायाम कर लीजियेदेखिये दिन कितना अच्छा बीतता है। पंद्रह मिनट के प्राणायम से क्या हो जाएगाअगर तुम्हारा दिन पूरे तरीके से भ्रष्ट हैतुम दोबारा उसी दफ्तर में जा रहे हो और तुम्हें दोबारा वही सारे अपने काम करने हैं, तो तुम प्राणायाम करो, चाहे कोई आयाम कर लोक्या हो जाना हैएक नई आदत बन जाएगी बस।

शारीरिक आदतें कई तरीके की होती हैं। जो बाकी आदतें होती हैं उनको तो आप कह देते हो ये गंदी आदतें हैंइनसे पीछा छुड़ाओ। ये भी एक प्रकार की आदत ही है। कोई सर नीचा करके शीर्षासन कर रहे हैं; ये गंदी आदत है और कुछ नहीं है। उसको मारो बोलो तुझे गंदी आदत लग गई है। छोटे बच्चे होते हैं, वो नाक में ऊँगली डाल के बैठे रहते हैतो उनको क्या करते होकहते हो ना आदत छुड़ाओ। एक शारीरिक मुद्रा पकड़ लेने की आदत लग गई है इसको। ठीक उसी तरीके से ये सब भी आदते हैंअगर तुम पकड़लो इनको। एक से एक देखोगेचले जाओहरिद्वारऋषिकेशआश्रमों में। एक से एक कुत्सित और काले मन वाले लोग घुसे मिलेंगे। हाँआसन बहुत अच्छा मारते हैं वो।

श्रोता: सर, तो एक्सरसाइज़  करना तोयानी आदमी के मेंटल स्टेट को बढ़िया ही करेगा?

वक्ता: जिम जाओ और वहाँ देखो कि ज़्यादातर कौन लोग हैं जो एक्सरसाइज़  करके शरीर फुला रहे हैंकभी जिम जाके देखो कि वहाँ 8० प्रतिशत कौन लोग आते हैं? 8० प्रतिशत लोग कौन हैं जो जिमिंग कर रहे हैंवो वो हैं जिन्हें…

श्रोता ४: जिन्हें शरीर से बहुत प्यार है।

वक्ता: शरीर से प्यार नहीं है उन्हेंशरीर को तो वो बुरी तरह नष्ट करते हैं। शरीर को तो.. । जहाँ मैं जाता हूँ, वहाँ पर चेंज रूम में बैठकेलगातारउन्हें अच्छे से पता है ये चीज़ उनके शरीर को नष्ट करेगी। फिर भी कर रहे हैंउन्हें शरीर से प्यार नहीं है। उनमें से ज़्यादातर का तो ये है कि किसी की शादी होने वाली है। किसी को लड़कियों को आकर्षित करना है। तुमसे किसने कह दिया कि शरीर को कुछ कर लेने सेजिम की आदत पाल लेने सेतुम्हारे जीवन मेंतुम्हारे मन में कोई अंतर आ जाना है?

श्रोता: सर, अगर हम एक्सरसाइज़  करते हैं…

वक्ता: अगर-बगर मत करोजिम चलना और वहाँ देखनावहाँ जो लोग मौजूद हैं, ये क्यों कर रहें हैं?

श्रोता: सर जिम के बाहर भी तो एक्सरसाइज़  होती हैज़रूरी थोड़ी ना है..

वक्ता: कहीं भी जो लोग कर रहें हैंउनको देखना कि इनके कारण क्या हैंकारण क्या हैंमन वैसे का वैसा ही है तो तुम कितनी कूद-फांद कर लोउससे क्या हो जाएगा बेटा? बल्कि, वो मन ही है, जो तुमसे कूद-फांद करा रहा है। लड़कियों की शादी होने वाली होती हैउससे पहले वो ज़बरदस्त रूप से जिम्मिंग करती हैं । क्यों करती हैंताकि उस खास रात, मैं बिलकुल मायावी दिखूं। कोई तुम वज़न कम कर लेने से मोक्ष पा लोगे?

श्रोता: लेकिन एक तंदरुस्त मेंटल स्टेट  में होनाएक कदम पास तो मेरे को ले ही आएगासही तरीके के…

वक्ता: बेटा सब कुछ हो सकता हैअगर उसके पीछे का मन ठीक है। सब हो सकता है अगर उसके पीछे जो मन हैजो करवा रहा है वो ठीक है। जब उसके पीछे की मूलभूत प्रेरणा ही गंदी हैतो फिर क्या होना हैकुछ नहीं। जब उसके पीछे की प्रेरणा ही गंदी हैतो फिर क्या होगाहोने को तो सब हो सकता है।


सत्र देखें : आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर: तुम्हारा प्रतिरोध व्यर्थ है (Your resistance is futile)


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सम्पादकीय टिप्पणी :

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय दानिश जी,

      यह वेबसाइट प्रशान्त अद्वैत फाउन्डेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित है एवं यह उत्तर भी उन्हीं से आ रहा है।

      बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|
      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से, लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:
      आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है, आचार्य जी के सम्मुख होकर, उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर, आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। निःसंदेह यह शिविर खुद को जानने का सुनहरा अवसर है।

      ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित 31 बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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      सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें:
      सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917
      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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