न चिंता न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)वक्ताबताइये? क्या गा रहे थे?

श्रोताकबीर गा रहे थे।

वक्ता: तो क्या कह रहे थे कबीर?

श्रोताजिनको कुछ नहीं चाहिए, वो शाहों के शाह।

वक्ताक्या मतलब है इस बात का, “जिन को कुछ नहीं चाहिए, वो शाहन के शाह?” क्या हुआ अभिप्राय इसका? आपने कहा, “अगर हम कुछ नहीं चाहेंगे, तो हम आज़ाद हैं। तो आज़ादी पहले आएगी या न-चाहना’?

श्रोतागणन चाहना।

वक्तापूर्णता पहले आएगी या वैराग्य पहले आएगा? पेट पहले भरेगा या पहले ये कहोगे कि खाना नहीं चाहिए? तो वो फिर हम पूंछ आगे कर रहे हैं और मूंह पीछे। अगर हम कह रहे हैं कि न चाहने से आदमी बादशाह हो जाता है, तो बात ज़रा उल्टी हो गई है।  कबीर ने कहा जिनको कुछ नहीं चाहिए, वो शाहन के शाह। इसका अर्थ ये मत लगा लीजियेगा कि न चाह करके आप शाह बन जाएंगे। जो शाह होता है, उसे कुछ नहीं चाहिए। क्यों नहीं चाहिए? इसलिए कि वो सन्यासी है, वैरागी है?

श्रोताक्योंकि उसके पास सब कुछ है।

वक्ताकरेगा क्या चाह के? और चाहेगा तो क्या चाहेगा? बचा क्या है? शाह के लिए आप कहोगे-उसके पास पाने को बचा क्या है? योगी के लिए कहोगे- कि उसके बाहर क्या है जो चाहे? उसको अच्छे से पता है कि बाहर और अन्दर जैसा कुछ होता नहीं। तो वो फिर सारी इच्छाओं को अपने भीतर ही देख लेता है। उठती हैं। पर इस भ्रम में नहीं रहता कि बाहर के किसी विषय के प्रति उठ रही हैं, उठती हैं। इच्छाओं को वैसा ही समझता है जैसा कि आप कहें कि एक जेब से निकाल करके दूसरी जेब में रख देना है। रख लीजिये, कोई बड़ी बात नहीं हो गई। पर उसमें फिर कुछ हासिल करने का भाव नहीं है।  उसमें ये नहीं है कि अपने से बाहर एक संसार है और उस संसार में जा करके किसी तरह की कोई उपलब्धि करनी है। जिनको कुछ न चाहिए वो शाहन के शाह।न चाहना सिर्फ प्रमाण है, कारण नहीं है।  न चाहना लक्षण है, कारण नहीं है।  न चाहना फल है,  मूल नहीं है।  न चाहने का कोई अभ्यास नहीं किया जा सकता।  कि आप कहें कि न चाह-चाह  के आप शाह हो जाएँगे। ऐसे नहीं होता।  

जो शाह होते हैं, वो नहीं चाहते। अब शाह कैसे हुआ जाए? वो कबीर कुछ बताते नहीं कभी।  वो कभी कोई नहीं बताता। क्यों नहीं बताता? क्योंकि मूर्खता की बात है। जो शाह है ही, उसे क्या बताया जाए कि शाह कैसे हुआ जाए? तो पागल हैं क्या कि बताएंगे? अगर आपको कोई आज तक नहीं बताता कि शाह कैसे हुआ जाए, तो बात सीधी है कि बात बताने की है ही नहीं। शाह कैसा दिखता है, ये बता दिया जाएगा। कैसा चलता है, ये बता दिया जाएगा। उसके साथ क्या घटनाएं होती हैं, और नहीं होती हैं, इसके बारे में भी कुछ कह दिया जाएगा। पर कोई आपको उपदिष्ट नहीं करेगा कि शाह बनने की विधि क्या है? नहीं बताएंगे कबीर। ये वैसी ही बात है कि कोई जा करके रमण महर्षि से पूछे कि आत्मा कैसे बना जाए? वो चुप रह जाएंगे, मौन। या मात्र मुस्कुरा देंगे हल्के से। सवाल बड़ा अज्ञान-मूलक है, “आत्मा कैसे बना जाए? शाह कैसे हुआ जाए?” कोई नहीं बताएगा।  कैसे बताए? जो तुम हो ही, वो बनने की क्या विधि दी जाए तुमको? और अगर कोई विधि दे दी गई, तो ये पक्का है कि तुम जो हो, उससे हट करके अपनेआप को कुछ समझाना शुरू कर दोगे।

चाह गई, चिंता मिटी,” इसका अर्थ ये नहीं है कि चाह का दमन कर देना है।  या चिंताओं को कहीं छोड़ आना है।  चाह गई, चिंता मिटी,” कुछ हुआ उसके बाद ये हुआ। सिर्फ़ वर्णन है, वर्णन कि ऐसा हो गया। कैसे हुआ? वो नहीं बताएंगे।  हाँ, ये ज़रूर बताया जा सकता है कि आई कहाँ से थी। ये ज़रूर बताया जा सकता है कि जब थी, तो कैसा नरक था? और ये भी बताया जा सकता है कि जाने के बाद, कैसा हल्का आनंद है।  कैसे जाती है, इसकी कोई विधि नहीं।  विधि यही है कि देख लो, जब रहती है तब क्या होता है। जब देख लोगे कि उसके रहने पर कैसा अनुभव होता है, तब यदि वो अनुभव तुम्हारे स्वभाव से मेल नहीं खाता होगा, तो अपनेआप जाने दोगे। तब यदि वो अनुभव तुम्हारे स्वभाव के प्रतिकूल पड़ेगा, तो अपनेआप तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा।

आ रही है बात समझ में?

इसीलिए कहा जाता है बार-बार कि देखने में बड़ा बल है।अपनी वर्त्तमान स्थिति को देख भर लो। कुछ बातें स्वभावगत होती हैं। बंधन तुम्हारा स्वभाव नहीं है। खुला रहना, मुक्त रहना स्वभाव है। अपनी वर्तमान स्थिति को देखोगे, और उसमें बंधन पाओगे तो आगे तुम्हें कुछ करना नहीं है, अपनेआप एक आत्मिक असंतोष उठेगा, जो तुम्हें बदल डालेगा।  देखना है कि चाहतों में फँसे हुए हो, चिंता से दबे हुए हो और इतना देखना काफ़ी है।  

आईने में और कुछ नहीं, अपनी पार्थिव शक्ल को ही ध्यान से देख लो।  इसी चेहरे को।  आँखों को अपनी, चेहरे के भाव को, हम सब बोध रूप हैं।  हम सब में जानने की शक्ति है। अपनी ही शक्ल को देखोगे, तो समझ जाओगे ऐसा होना तो नियति नहीं थी। और ज्यों ही साफ़-साफ़ दिखाई पड़ता है कि आवश्यक तो नहीं था कि ऐसा होऊँ, पर हो गया हूँ, त्यों ही उसमें से प्रखर कर्म उठता है।  आप उसका निर्धारण नहीं कर सकतेअपनेआप होगा। 

 और फिर वो चाहत को और चिंता को जला देगा। फिर आप गा सकते हो- चाह गई, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह। 

बेपरवाही आती है, परवाह के अवलोकन से। देखो कितनी परवाहों में घिरे हुए हो। देखो, कितनी चीजें सर में डाल रखी हैं। जैसे कोई कूली हो। जिसने पांच कूलियों का भोज उठा रखा हो। कुछ और नहीं, तो आइना ही देख लो। हम आइना भी ध्यान से नहीं देखते। आइने में बाल देख लेते हैं, आँख देख लेते हैं, होठ देख लेते हैं, गाल देख लेते हैं, अपनेआप को कभी नहीं देखते। आइने में अपनी शक्ल को देखो, पूरा देखो।  कुछ भला सा नहीं लगेगा।  

कोई फूल कुम्हलाया हुआ तो पैदा नहीं होता।  पत्ते की किस्मत तो नहीं होती कि गलागलापीलापीलाधुल से अच्छादित ही दिखाई दे।  

दिखने में क्या ताकत है, दोहरा रहा हूँ। जो दिखता है, यदि वो तुम्हारे स्वभाव से मेल नहीं खाता, तो अपनेआप हट जाता है। उसकी सफाई हो जाती है। अब देखना भी तुम्हारा स्वभाव है और जो देख करके दिखे, उसका स्वभाव से समायोजन भी तुम्हारा स्वभाव है।  

पर देखो।  वही एक मात्र ज़रिया है।  वही अकेला पुल है।  उसी देखने को ही ध्यान कहते हैं।  ध्यान ये नहीं है कि दिन में कुछ समय के लिए बैठ गए, किसी विशेष मुद्रा, आसन में, और किन्हीं विशेष क्रियाओं को दोहरा लिया। न, बिलकुल भी नहीं।  यदि तुम किसी विशेष आसन में बैठे हो, किसी क्रिया को दोहरा रहे हो, तो उस वक़्त यदि तुम देख सकते हो, तो उस क्रिया को ही देख सकते हो। अपने रोज़ मर्रा के जीवन को नहीं देख पाओगे। ये तो क्षय, ऐसी है जिसको तभी देखा जा सकता है, जब वो उपस्थित होती हो। हवा को कब अनुभव करोगे? जब हवा बह रही हो। तारों को कब देखोगे? जब तारें आसमान में हों। अब तुम बैठ गये हो और कोई मन्त्र दोहरा रहे हो, कि माला फेर रहे हो, उस वक़्त यदि तुम अधिक से अधिक देख भी सकते हो, तो क्या देख सकते हो? माला ही तो देख सकते हो न? ये थोड़ी ही देख पाओगे कि दफ्तर में क्या हाल रहता है तुम्हारा? ये थोड़ी ही देख पाओगे कि पत्नी से क्या सम्बन्ध है तुम्हारा? ये थोड़ी ही देख पाओगे कि मंदिर किस कारण जाते हो तुम? मंदिर किस कारण जाते हो, और वहाँ क्या घट रहा है, ये कब देखा जा सकता है? जब तुम मंदिर में हो और मंदिर जा रहे हो – ये ध्यान है। कि अपने बोझिल क़दमों को तभी देखना, जब वो बोझिल हों।  

चाहत को तब देखना जब चाहत हो। चिंता को तब देखना, जब चिंता हो – ये ध्यान है। सुबह बीस मिनट बैठ जाना, ये ध्यान नहीं है। अरे! जब बिल्ली सामने है नहीं, तब बिल्ली तुमने देख कैसे ली? कल्पना कर सकते हो तुम। कि बिल्ली की कल्पना कर रहे हैं। कल्पना से तो अब कल्पना की बिल्ली ही दिखेगी; असली वाली नहीं दिखेगी। सारी आध्यात्मिकता यही है। असली बिल्ली देखो! जिसने ये सूत्र समझ लिया, वो पार हो गया।

जब होजहाँ होजीवन तब ही है और तहां ही है। उसको वहीँ और वैसे देखना है। यही सहज योग है। यही स्पष्टसरलप्रस्तुत आध्यात्मिकता है। और कहे देता हूँ कि दिखेगातो जो अनावश्यक है, वो जाएगा।  ये हो नहीं सकता कि आपने देखाऔर उसके बाद भी आप रुघ्ड रह गए।  ये बीमारी ऐसी है, जो दृष्टिपात से साफ़ हो जाती है।  आपकी दृष्टि ही औषधि है।  देखने भर से उपचार।  कितना सरल है।  

बाबा जी के पास ऐसी कोई विधि नहीं है क्योंकि कोई विश्विद्यालय पढ़ाती नहीं। एम.बी.बी.एस हों, ऍम.डी हों, कोई फ़र्क नहीं पड़ता।  देखने भर से उपचार; ऐसा नज़र का चमत्कार। देखिये!  देखिये तो सही!  फिर गा सकते हो-

चाह गईचिंता मिटीमनवा बेपरवाह  

जिनको कुछ नहीं चाहिएवो शाहन के शाह 

शाह बनोगे नहीं, शाह हो। और शाह में ऐसी ताकत कि कोई बीमारी, कोई परेशानी, क्या टिकेंगी उसके सामने? ध्यान की यही एक मात्र विधि है। जब जो है, जैसा है उसको वहीँ जान लो। और उसमें कोई तनाव नहीं है।  उसमें बस तुम्हारी उपस्थिति है। और अगर ये नहीं कर रहे हो, तो फिर गाते रहो कबीर को। काम नहीं आएँगे। फिसलने के बाद देखा कि, “अरे! कीचड़ था। तो क्या देखा? कब देखना है? जब है। और कदम बस जा रहा है उसके करीब। यदि पहले से ये कल्पना कर ली कि कीचड़ होगा, तो व्यर्थ। हो न हो। और अभी कल्पना है, जब कीचड़ सामने है, तब कोई और ख्याल आ जाए, तो पहले की कल्पना काम नहीं आएगी। राह में आगे कीचड़ है और आप उसका पूर्ण अनुमान लगाते रहें, वो पूर्ण अनुमान आपके काम नहीं आएगा क्योंकि मन में ख्यालों का आना जाना लगा रहेगा। जब तक आप वहाँ पहुंचेंगे, तब तक समा बदल चुका होता है। हो सकता है आप, आप ना हों, और हो सकता है, वहाँ कीचड़ ही न हो। और यदि फिसलने के बाद आपने कीचड़ को स्मृति रूप में पकड़ा, तो भी काम नहीं आएगा। अब तो चदरिया हो गई मैली।  

अब करते रहो याद कि कीचड़ आया और हम गिरे और सब गंदा हो गया। अब तो यही होगा कि ज़्यादा याद करोगे, तो ज़्यादा साफ़ करो। ज़्यादा साफ़ करो, और दुबारा गिरो क्योंकि चाल-चलन तो वैसा ही है तुम्हारा।  

ध्यान है कि जब कीचड़ सामने आए, दिखे।  ठीक तब दिखे। और तब नहीं दिखा, तो कभी नहीं दिखा। ठीक तब। ठीक अभी और कभी नहीं – यही ध्यान है। बाकी सब तो मनोरंजन है।  

आध्यात्मिक मनोरंजन। करते रहो मनोरंजन, हज़ारों विधियाँ हैं।  पेड़ पर चढ़ जाओ, नदी में घुस जाओ।  किसी पेड़ की जड़ खोद के खा लो।  किसी गुफा में छुप जाओ।  करते रहो, क्या हो गया? गुफ़ा में चमगादड़ होंगे, फालतू उन्हें परेशान करोगे और कुछ भी नहीं।  लोग शान्ति की तलाश में पहाड़ों पर जाते हैं। उन्हें तो शान्ति भले ही न मिली हो, नहीं ही मिली, पहाड़ ज़रूर खराब हो गये। ये बड़ा फैशन है। पहाड़ पर जा करके पहाड़ तोड़ करके लाएंगे।  कोई ख़ास पेड़ है पहाड़ों पर?  उसकी छठी डाल पर जो चौथा फल लगता है, वो ध्यान का फल होता है।  

जीवन यदि लगातार है, तो ध्यान भी लगातार। और देखोगे तो यही दिखाई देंगे, चाह और चिंताएं।  इसके अलावा कुछ नहीं दिखाई देगा। ये जो लटका-लटका चेहरा है, इसकी और कोई वजह है ही नहीं। ये जो तुम इतना भारी-भारी, और इतनी गुरु-गंभीरता के साथ चलते हो, कि उफ़! पूछो मत।

पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई।  इक पल जैसे एक युग बीता।

शक्ल पर वही लिखा है– “पूछो  कैसे मैंने रैन बिताई?” तुम कब तक बचा पाओगे नकली को। जो नकली है, उसे जाना होगा।  उसकी किस्मत है जाना। तुम होते कौन हो उसे रोकने वाले? जो नहीं होना चाहिएवो नहीं रह सकता। और जिसे होना हैउसे कोई हिला नहीं सकता। तुम क्यों ज़बरदस्ती प्रारब्ध से संघर्ष कर रहे हो? हारना तुम्हें है ही। पिटपिट कर क्यों हारना चाहते हो? समर्पण कर दो।  

तुम्हारी हालत ऐसी है कि दिख रहा है कि सामने वाली ताकत बहुत बड़ी है लेकिन कह रहे हो कि हमें मारो, पीटो, छोड़ेंगे हम तभी, जब बेहोश हो जाएँगे।  हमें इतना पीटो कि बिलकुल जान निकल जाए हमारी, लहुलुहान हो जाएं, चिथड़े-चिथड़े हो जाएँ। तब छोड़ेंगे। और हो यही रहा है फिर।  

एक होता है पिटाईहोना और एक होता है कुटाईहोना।  कुटाई हो रही हो, शक्ल पर लिखा हुआ है कि कूटे जाते हो। और पकड़ क्या रखा है? चाह और चिंता। जो तुम्हें पीट रहा है, वो तुम्हारी बंध मुट्ठी में से चाह और चिंता छुड़ा लेना चाहता है। और तुम उसको किसी हटी बच्चे की तरह उसको ऐसे जकड़ कर बैठे हुए हो कि, “मैं तो नहीं छोडूंगा।  ये मेरा प्रेम है। ये तुम्हारा प्रेम नहीं है, ये तुम्हारा नर्क है।  मैं तो नहीं छोडूंगा। छूट तो जाना ही है। स्वेछा से छोड़ दो। नर्क तुम्हारा स्थायी आवास नहीं है। परमानेंट आवासमें मत लिखा करो। तुम्हारा असली अड्डा कुछ और है।  तुम कहीं और के निवासी हो। गलत जगह पर बैठे हो। वहाँ से कोई न कोई तुम्हें उठा ही देगा। और नहीं उठोगे तो,..? पिटोगे।  अब धोखे से बैठ गए कहीं गलत जगह, क्यों इतना लजाते हो? उठ जाओ।  क्यों बोलते हो कि न! अब यहाँ पर हमने अपना आसन रख दिया है।  इसको गरम कर दिया है।  अब ये गद्दी मेरी ब्याहता है।  छोड़ कैसे दूँ?” अरे भाई! संयोग था।  कहीं रख दिए कदम।  इंसान हो, कभी बहक गए।  फिसल गए, गिर गये कीचड़ में।  अब लोटे ही जाओगे वहाँ? कि नहीं।  ये तो देश है मेरा।  यही स्थायी पता है।”  

चाह और चिंता यूँ ही नहीं आती।  आती ही नहीं हैं, तुम पकड़ते हो।  पूरा अस्तित्व लगा हुआ है।  उसका अनुग्रह तुम्हें उपलब्ध है। वो चाहता है कि तुम छोड़ो वो सब, और उठो।  अपने स्वभाव अनुकूल जियो।  तुम कहते हो नहीं-नहीं!तुम्हें उसके ज़ोर का कुछ पता है? जो तुम्हें आज हौले से, आहिस्ता से, मुस्कुरा के समझा रहा है, तुम्हें उसके बल का कुछ पता है? तुम्हारी सारी ऐंठ तोड़ देगा। वो परम अनुरागी तो है ही लेकिन परम बलशाली भी है। उसके बच्चे हो तुम। उसके हिस्से हो।  पहले तो प्यार से ही समझाता है। पर जब देखता है कि प्यार से नहीं मान रहे हो, तो तुम्हारी खातिर, तुम्हारे हित में, फिर तुम्हारी सारी ऐंठ तोड़ देता है। और टूटती हैं न? रोज़ ही तो टूटती है।

जिन चिंताओं में घिरे रहते हो, उनकी चिंता करके, उन विषयों की चिंता करके क्या पा लेते हो? और जब नहीं पा लेते हो, तब तो फिर भी गनिमत, जब पा लेते हो तब क्या हालत होती है? एक साहब आए, “ अरे! बड़ी बुरी नौकरी है।  छोड़ना बहुत ज़रूरी है। मैंने कहा, छह महीने पहले तुम इसको पाने के लिए भाग रहे थे, लोगों को पार्टी वगैरह दे रहे थे कि नौकरी लग गई।  शनिवार को यहाँ तुम लोगों ने नुक्कड़-नाटक किया, अमनदीप नहीं आए उसमें। क्यों? किसी नौकरी की तलाश में थे। और उसके बाद जब आए, तो बोले कि, “बड़े बेहूदा लोग थे।  और मैं तो गुस्सा होकर के वहाँ से उठ कर के चला आया, जब वो सब कुछ बता रहे थे।  बड़ा काम कराएँगे।”  ये तब नहीं सूझा था जब ये निर्णय लिया था कि उनकी बात सुनने की खातिर, नाटक में भाग नहीं लोगे।  तब कहा जाता, “मत लो भाग।  प्यार से कहा जाता।  छोड़ो न, कहाँ तुम वहाँ जा करके समय खराब करोगे।  आओ।  नाटक में आओ। बड़ा उल्लास है, बड़ा उत्सव है।  मज़ा आएगा।  तो कहते, “नहीं-नहीं! बड़ी महत्वपूर्ण घटना घट रही है कॉलेज में। बड़ी मल्टीनेशनल आ रही है।  बैठना ज़रूरी है। और बैठने के बाद, अब क्यों मुंह लटका करके घूम रहे हो?

ये जो मुंह का लटकाना हैइसको समझलो ये सज़ा है।  कोई  कोई तो रहा होगा जिसने प्रेम से समझाया होगा। कहीं से तो आवाज़ आई होगी कि मान जाओ। ” जब नहीं मानेकरली अपनीतो फिर मिलती है सज़ा।  और उससे बच तो पाते नहीं।  कोई व्यक्ति मारता हैतो शिकायत भी कर पाते होपरिस्थितियाँ ऐसा थपेड़ा देती हैं कि शिकायत भी नहीं कर पाते।  पर उनके पंजों के निशान गाल पर ज़रूर नज़र आते हैं।  अब किसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराओगेअब बस यही बोल पाते हो, “अरेकिसमत खराब है।  मैं क्या करूँमेरे साथ ऐसा हो गया। 

दोहरा रहा हूँ, जिस भी चीज़ को तुमने चाह और चिंता रूप में पकड़ रखा है, वो चीज़ पकड़ने काबिल नहीं है।  देखो न, कैसा आनंद होता है कि जब वो चीज़ जीवन से जाती है, तो फिर गाने लग जाते हो।  क्या गा रहे थे?

श्रोतागण: “चाह गई, चिंता मिटी।

वक्ताअब चाह और चिंता थोड़ी ही कुछ होती हैं? चिंता किसी विषय की होती हैं न? और चाहते तुम किसी वस्तु को, व्यक्ति को हो। तो चाह गई, चिंता गई,” इसका क्या अर्थ है? कि जीवन से क्या गया? वो वस्तु गई, वो व्यक्ति गया, वो विचार गया।  और उनको पकड़ने के लिए कैसे लालाहित थे।  जान दिए पड़े थे कि कहीं डार्लिंगदाएं-बाएँ न हो जाएँ।  फिर गा क्यों रहे हो अब? अब क्यों मगन हो कि-  “चाह गई, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह। ये होता है।  चाहऔर चिंता।  क्या ये कहता हो कि मुझे बहुत चाहत है? किसी चीज़ की चाहत होती है न? देखो उस चीज़ के जाने में कितना आनंद है? “भला हुआ मोरी मटकी फूटी। और जिन भी चीजों को पकड़ते हो, ज़रा और भी आगे जाओगे, तो समझ में आएगा कि सबसे ज़्यादा और पकड़ने के केंद्र में तुम्हारा अहंकार है।  सबसे ज़्यादा उसी को पकड़ते हो।  जो भी चाहते हो, अपने को बचाए रखने के खातिर ही चाहते हो।  इतना डरे हुए हो।  

सबसे ज्यादा गंभीर तुम अपने ही विषय में हो। डार्लिंग को भी चाहते हो तो डार्लिंग किसके लिए? तुम्हारे लिए है न? जो पड़ौसी के लिए डार्लिंग है, उसको थोड़ी ही चाहते हो तुम? हाँ, वो तुम्हारी डार्लिंग बन जाए, तो अलग बात है।  तो ये सारी गंभीरता किसके लिए है

श्रोतागणअपने लिए।

वक्ताऔर देखो कैसा उत्सव है इस गंभीरता के गल जाने में! मनवा बेपरवाह” रो थोड़ी ही रहे हैं कि मनवा बेपरवाह। गा रहे हैं-मनवा बेपरवाह।भला हुआ छाती का भोज तरा। बड़ी मेंटेनेंस करनी पड़ती थी। भला हुआ चोरी हो गई ऐसी गाड़ी की। ऐसी गाड़ियां देखी हैं, जो हर दूसरे दिन उनको गैराज ले जाओ, और लिपिस्टिक लगवाओ, और टायर बदलवाओ, पेंट करवाओ, गद्दी बदलवाओ, और माइलेज भी बड़ा कम देती हैं।  पेट्रोल पिए जा रही हैं, क्रेडिट कार्ड का बिल बढ़ा जा रहा है।  हॉर्न भर मरती हैं-पों,पों। भला हो चोरी ही हो जाए।  

श्रोतसर, कितना अजीब है कि लोग बोलते हैं कि हम तुम्हारी परवाह करते हैं। इसी लिए कह रहे हैं। तुम्हारी परवाह किये बिना न तुम खुश, न हम खुश।

वक्ताहम खुश नहीं है, ये जानना ज़रूरी है।  इसी को कहा कि अपने गमों को ज़रा साफ़ नज़र से देखो। गम को हटाने या दबाने के लिए नहीं कह रहा। मैं उसके किसी तरह के उन्मूलन की बात नहीं कर रहा। मैं सिर्फ़ उस पर दृष्टिपात करने की बात कर रहा हूँ। स्वीकार तो करो कि गंभीर हो।  पर डरते हो।  तुम्हें ऐसा सा लगता है कि अगर मान लिया कि गमहीन हैं, तो गम बढ़ जाएगा। ऐसे लोग डरते हैं कि अगर कब्र खोद दी, तो मुर्दा कहीं जिंदा न हो जाए। ये जितनी भूत-प्रेत की कहानियाँ होती हैं, उनमें ये बात मुझे हमेशा बड़ी विचित्र लगती थी। कि जो मर ही गया ससुरा, अब उसको खोद काहे को रहे हो? अगर उसमें ज़रा भी जान होती, तो वो ज़मीन के नीचे क्या कर रहा होता? जिसमें इतनी सामर्थ्य नहीं था कि अपनेआप को ज़मीन के नीचे जाने से बचा सके, वो अब तुम्हारा क्या बिगाड़ लेगा? पर डरते ऐसे हैं कि, “नहीं! उसको दबाए रखो। उसको अगर ज़रा सी हवा मिल गई, तो साँस लेने लगेगा।अरे! जब हवा मिल रही थी, तब तो साँस ले नहीं पाया। तब हमने, तुमने कितनी कोशिश की थी कि इसकी सांस रुके नहीं। तब तो मर गया झक्की। वैनटिलेटर पर डाला था, दस दिन रहा था, तब भी मर गया। अब वो साँस लेगा? ले सकता, तो तब ले ली होती।  

पर हमारा कुछ ऐसा ही है कि अपने डरों को देखेंगे, तो डर बढ़ जाएंगे। मुर्दों को देखने से मुर्दे जी नहीं उठते। मुर्दे को देखने से ये आश्वस्ति हो जाती है कि मुर्दा, मुर्दा ही है और सड़ा हुआ है। मत डरो मुर्दों को देखने से। देखो उन्हें साफ़-साफ़। जो कुछ भी तुम छुपा के रखते हो, वो छुपाए रखने के कारण ही भयानक प्रतीत होता है, अन्यथा उसमें ज़रा सी जान नहीं।  

श्रोता: ये जो देखना है, इसमें और विचारने में अंतर क्या है?

वक्ताविचार के लिए समय चाहिए। देखना उसी क्षण होता है।  विचार हमेशा आगे या पीछे होगा।  

श्रोतासर, उस विचारने से क्या कहीं भी मेरे देखने की शक्ति में प्रभाव पड़ता है?

वक्ताजितना ज़्यादा आगे-पीछे देखोगे, उतना ज़्यादा विचार महत्वहीन रहेगा। पर यदि तुम घटना और विचार के बीच के समय को न्यूनतम रख सको, तो उसमें से किसी प्रकार के अलाप की थोड़ी गुंजाइश है। पर वो अलाप कुछ भी नहीं होगा, अपेक्षाकृत उस अलाप के, जो तत्काल देखने पर होता है। और उस तत्काल देखने में बड़ा आनंद है। पकड़ा’, बिलकुल ऐसे ही होता है, ‘पकड़ा।  आगे-पीछे देखने में तो तुम ये कह पाते हो कि, “उफ़! ज़रा सा चूके। ये तो तुमको ज़रा सा शोकाकुल कर देता है।  अरे! एक क्षण पहले पकड़ लिया होता, तो मुंह से ये शब्द ना निकलता। एक पल पहले पकड़ लिया होता, तो पिस्तौल का ट्रिगर न दबाते।अब तो दब गया। ट्रिगर दबाने के एक पल बाद भी अगर तुमने पकड़ा कि गलती हो गई, तो भी..? ट्रिगर तो दब गया। गोली तो चल गई। अब वो लौट के तो नहीं आ गई। तब पकड़ो, जब दबने जा रहा हो, ‘पकड़ा!

श्रोताइतनी गोलियां तो पहले ही चल चुकी हैं।

वक्तावो गईं। वो लग गईं जिन्हें लगनी थी।  

श्रोतातो उन गोलियों के चलने की वजह से,..

वक्तातुम उन गोलियों पर गौर करो, जो चलने को तैयार बैठी हैं। तुमने जो चलाई हैं, वो तो चलाई ही हैं। तुम अभी और चलाने को तैयार बैठे हो। उनका ख्याल करो।  

श्रोतासर, दिमाग हमेशा क्यों चाहता कि विचार रहें?

वक्तानहीं, दिमाग ऐसा नहीं चाहता। मन जब भी ऐसा रहता है, विचारों से आच्छादित, तो उसको उसमें कोई सुख नहीं मिलता है। इस चूक में मत रहना कि हम चाहते ही हैं कि हम चिंतित रहें, और किसी न किसी उहा-पोह में, उधेड़-भुन में लगें रहें। मन का स्वभाव नहीं है व्यग्रता। हाँ, तुमने आदत डाल दी हो, तो अलग बात है। तुम कैसी भी आदतें डाल सकते हो। पर हम अक्सर इस तरह की बातें करते हैं कि, “नहीं, मुझे तो अच्छा ही लगता है कि मैं ज़रा सोचता रहूँ, मुझे तो अच्छा ही लगता है कि भीतर एक शोर सा मचा रहे।नहीं, ऐसा नहीं है। किसी को भी ये अच्छा नहीं लगता। और इसका प्रमाण तुम्हें तब मिलेगा जब चाह गई, चिंता मिटी। जब वो नहीं रहेगा न, तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम किस जंजाल में फँसे हुए थे और कितने व्यर्थ ही फँसे हुए थे।

श्रोता: सर, जैसे एक स्थिति ऐसी है जिसमें शान्ति है और एक स्थिति ऐसी है जिसमें कोलाहल मचा हुआ है। अबी इसके बीच मीन एक और स्थिति आई है, तीसरी, ये स्थिति शांति कि है या शोर कि ये तो तुलना से ही पता चलेगा न?  

वक्ताउसकी वजह ये है कि वास्तविक शांति हमें कभी उपलब्ध हुई नहीं। हमने सिर्फ़ शोर के अलग-अलग तल देखे हैं। जब हमारी पीड़ा ज़रा कम हो जाती है, तो हम उसको सुख बोलना शुरू कर देते हैं। जब शोर ज़रा कम हो जाता है, तो हम उसको शान्ति कहना शुरू कर देते हैं। पर हमने वास्तविक शान्ति अभी देखी नहीं है। जिसने एक बार वास्तविक शान्ति देख ली, उसके मन में फिर शोर के लिए कोई आकर्षण नहीं रह जाएगा। बीज ही जल जाएगा। उसी को फिर निर्बीज समाधि कहते हैं कि अब दुबारा तुम वैसे ही नहीं हो पाओगे जैसे कि तुम थे।  

श्रोतातो इसका मतलब ये है कि जब भी मन शान्ति का अनुभव करता है, तो वो हमेशा शोर के सन्दर्भ में ही करता है। और क्योंकि हमने पहले सुना है कि शांतिहोती है, तो जब भी मन को शांतिजैसा कुछ अनुभव होता है, तो हम उसको टेस्ट करते हैं कि क्या ये वोहै?

वक्ता:  जैसे ये सवाल पूछते हो कि, “क्या ये वो है?” वैसे ही जवाब दे लिया करो, “नहीं, ये वो नहीं है।

श्रोतासर, ये कैसे पता लगाएं कि ये वो नहीं है?

वक्ताबिना पता लगे ही बोल दो। तुम्हें बाकी कुछ पता है क्या? ज़िन्दगी में तुमने इतनी बातों के इतने जवाब दिए, कुछ पता था? जैसे बिना पता लगे, इतने जवाब दे लेते हो, वैसे ही बिना पता लगे ये भी जवाब दे लो कि, ‘’नहीं, ये वो नहीं है।’’ इस जवाब में एक ईमानदारी तो है। क्या? कि बिना पता लगे तुम ये कह रहे हो कि मुझे पता नहीं है। तो ठीक ही तो कह रहे हो। जिसे पता नहीं है, उसे नहीं पता है। पर उसे इतना तो पता है कि उसे नहीं पता है। तो वो यही तो कह रह है कि, “नहीं! ये वो नहीं है। मैं नहीं जानता।तो ठीक ही तो कह रहे हो। प्रमाण ये है कि जब पता होता है, तो उस पता होने में इस प्रश्न के लिए कोई जगह नहीं होती कि क्या ये वो है?” अरे! तुम पल-पल जियोगे या ये सवाल पूछते फिरोगे कि क्या ये वो है?” मैं तुमसे बात कर रहा हूँ, मैं कोई जांच थोड़ी रहा हूँ अपने शब्दों को? कि क्या ये वो है?” क्या ये मौन की उच्चतम अभिव्यक्ति है? जांचने की आवश्यकता नहीं।  हाँ, जब वो नहीं होता, तब शक ज़रूर होता है। तब व्यक्ति जांचता है। अन्यथा क्यों जांचेगा? चाह गई, चिंता मिटी। क्यों चिंता करनी कि ये वो है कि नहीं है, कि क्या है? हो तो ठीक, न हो तो भी ठीक। होने में भी वही है, न होने में भी वही है। क्या जांचना है?

श्रोता: ज़िम्मेदारी और चिंता करने में क्या फ़र्क है?

वक्ताहम जैसे हैं, हमारे लिए तो एक ही है। हमारे लिए तो ज़िम्मेदारी का अर्थ ही है चिंता। हम जैसे हैं, हमारे लिए ज़िम्मेदारी का अर्थ ही है चिंता। और हम ऐसे ज़िम्मेदार लोग हैं कि चिंता न करें, तो बड़ी ग्लानी होती है। अरे! छह घन्टे से चिंता नहीं करी। लालत है तुम पर। नर्क के भागी हो गए तुम। पिछले छह घन्टे से तुम शांत, सहज, मुक्त बैठे हो। चिंता नहीं करी तुमने।और कितना आपको सम्मान मिलता है, जब आपके चेहरे पर घोर चिंता होती है, कंधे झुके झुके से होते हैं, पूरा व्यक्तित्व ही बोझिल होता है। देखे हैं ना ऐसे लोग, उनका पूरा व्यक्तित्व ही बोझिल होता है। वो चलते भी हैं, तो ऐसा लगता है कि पाँव में पत्थर बंधे हों। देखते हैं तो ऐसा लगता है कि पलकों में पत्थर बंधे हो, तो बड़ी मुश्किल से एहसान कर रहे हैं आपको देख करके वो। साँस भी ऐसे लेते हैं कि उफ़!देखा है, भारी सांसे? “उफ़! ये तो संसार को अभी हमारी ज़रूरत है, नहीं तो हमने साँस लेना कब का छोड़ दिया होता,” “उफ़! ये ज़िम्मेदारी। बेटा, हम तो तुम्हारे लिए ही जीते हैं। नहीं तो अब हमारी ज़िन्दगी में क्या रखा है? हमने तो जो किया बेटा, तुम्हारे लिए ही किया।” ‘’जब मैं नहीं था, तब भी तुम काफ़ी कुछ कर रहे थे। वो भी मेरे लिए ही कर रहे थे? और कर कर के तुमने मुझे कर दिया। मुझे मेरे लिए किया था?’’ पर ये ज़िम्मेदार लोगों का फसाना है। बेटा! हम बड़े ज़िम्मेदार लोग हैं।  

ज़िम्मेदारी दूसरी चीज़ होती है। अस्तित्व में  कोई ज़िम्मेदार नहीं है दूसरे के प्रति क्योंकि वहाँ दूसरेपनका भाव नहीं होता है। आप स्वस्थ हैं, आप स्वकेंद्रित हैं, पूरी व्यवस्था अपनेआप सुचारु चलती है। आपको ज़िम्मेदारी लेने की ज़रूरत क्या है? ज़िम्मेदारी तो बीमारों की ली जाती है। और ज़िम्मेदारी में यदि आपको बहुत रस आता होगा, तो ज़ाहिर सी बात है आपको बीमारी में भी बहुत रस आएगा। आपको अच्छा ही नहीं लगेगा कि सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा है। आप कहेंगे अब ज़िम्मेदारी किस की लूँ। अरे! कुछ गड़बड़ हो ज़रा, तो हम भी दिखाएँ अपनी उपयोगिता। आई थी खबर एक बार कि अग्निशामक दल ने कहीं जाके आग लगवा दी।  

(श्रोतागण हँसते हुए)

हाँ। क्योंकि शहर का मेयर वगैरह इस नतीजे पर पहुँचने वाले थे कि इतना बड़ा अग्निशमन विभाग रखने की ज़रूरत ही नहीं है। यहाँ से लोग कम करो। इनके संसाधन, इनका बजट कम करो क्योंकि आग तो कहीं लगती नहीं है, तो ये पचास लोग हमने किस लिए रखे हुए हैं? इन्हें तनख्वा क्यों दी जाती है? तो खुद ही आग लगा आए। ऐसी होती है ज़िम्मेदारी। देखा है? बहुत लोगों के साथ ऐसा होता है। हो सकता है आप के साथ भी होता हो। कोई बीमार हो गया, ये मौका होता है उनके पास कि दिखाएँ कि. देखो! प्रेमी इधर है।आपके आनंद के क्षणों में वो आपके न हो पाए। वो आपसे प्रेम से कभी नहीं जुड़ पाए पर वो आपसे वाइरस द्वारा ज़रूर जुड़ गए।  यही उस रिश्ते की बुनियाद है, ‘बैक्टीरिया’ बैक्टीरिया जितना बढ़ेगा, रिश्ता उतना सघन होगा।  

श्रोताक्या बहरी वातावरण हमें शांति की ओर लेकर जा सकता है?

वक्ताकुछ भी कर सकता है। शांत भी कर सकता है; अशांत भी कर सकता है। शांत करे, तो जानो की शांत कर रहा है, अच्छी बात है। उस माहौल के प्रति अनुग्रह व्यक्त करोगे। उस माहौल में और रहना चाहोगे। और यदि अशांत करे, तो जानो कि अशांत कर रहा है। उस माहौल से या तो हटोगेया उसे बदलोगे। और यही ज़िम्मेदारी कहलाती है। ज़िम्मेदारी के मूल में बोध है। जाने बिना क्या निर्वाह करोगे ज़िम्मेदारी का? जिसे पता ही नहीं कि चल क्या रहा है, उसे कैसे पता कि करना क्या चाहिए?

श्रोताअगर मन का स्वभाव नहीं है चिंतित होना, तो हुआ क्यूँ?

वक्तामन का स्वभाव वो भी नहीं है, जो अभी तुम्हारे में चेहरे पर परिलक्षित हो रहा है। आनंद से पूछो, तो कुछ बोलूँगा। आध्यात्मिकता का अर्थ आंसू नहीं होते। आंसू तो बस यही दिखाते हैं कि बीमारी से बड़ा प्यार है तुम्हें। आनंद में आओ, उसमें मैं शरीक हो सकता हूँ। सहज रहो, आराम से, ये क्या टेढ़ी-टपड़ी शक्ल बना करके सवाल पूछती हो। इसमें कोई आध्यात्मिकता नहीं है। इससे कहीं से तुम्हारी सफ़ाई या सच्चाई प्रस्तुत नहीं होती।  

श्रोतासर, जब वाकई दिखता है तो उसमें सारी वृत्तियाँ नाश हो जाती हैं?

वक्तावृत्तियाँ वास्तव में कुछ होती नहीं है। बेहोशी में आपके साथ बहुत कुछ चल रहा होता है।  बेहोशी वृत्ति है। आप पूछें जागने के बाद सपने का क्या होता है? तो इसका क्या उत्तर है? होश आने के बाद आपके तमाम दुस्वपनों का क्या हुआ, इसका क्या उत्तर है? तो दिखने के बाद वृत्ति का क्या हुआ, इसका क्या उत्तर है? वो थी ही नहीं।  

श्रोताकहीं न कहीं तो थी।

वक्ताजहाँ थी, फिर उसको वहीँ ढूंढो।  

श्रोताकई बार एक ही सपना बार-बार भी आता है।

वक्तातो अब तुम बार-बार सोओगे, तो क्या होगा? फिर-फिर आएगा। और कोई सपना यदि बार-बार आ रहा है, तो मतलब यही है कि पकड़ कर रखा हुआ है। वो सुना है न वो कि साहब सो रहे थे, तो सोते-सोते किसी से सौदा हो रहा था। जिससे कर रहे थे, वो मांग रहा था सौ।  ये देने क तैयार थे अस्सी। मामला 90-95 पर निपटा जाता था, तभी किसी ने जगा दिया।  तो फिर आंख बंद करके बोल रहे हैं, “अच्छा ठीक है! 92 ले लो।फिर आँख बंद करके बोल रहे हैं, “पिच्चानवे में मान जा यार।एक सो पांच तक चले गए आँख बंद करके।

 जब रस होता है सपने मेंतो तुम सपनों को बुलाते हो।  

श्रोतासर, आप व्यग्रता से बोल रहे हैं कि शांत हो जाओ?

वक्ताव्यग्रता कुछ होती नहीं।  व्यग्रता सवाल नहीं पूछती। फिर व्र्य्गता सवाल के रूप में कोई और चाल चल रही होती है। सवाल पूछने का मतलब होता है वास्तविक जिज्ञासा, मुमुक्षा, सच्ची अभिलाषा जानने की। व्यग्रता होती ही नकली है। वो सच्ची अभिलाषा कैसे कर लेगी? यदि व्यग्रता सवाल पूछती हुई दिखाई दे, तो साफ़ समझ लो कि कोई कुटिल चाल चल रही है। कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना,’ क्योंकि उसे कुछ जानना नहीं है। व्र्य्गता का तो एक ही प्रयोजन है – अपने झूठ को बचाके रखना। वो कुछ जानना क्यों चाहेगी? जानने का तो अर्थ है: सत्य जानना। झूठ ये कहेगा कि मुझे सत्य को जानना है? न। तो यदि व्यग्रता सवाल पूछ रही है, तब तो उस सवाल से बचना ही होगा।  

श्रोता:  ये सपने से आसक्ति कैसे छोड़ी जाए?

वक्ताएक सौ पांच को एक सौ दस करो, एक सौ बीस करो, सौदा पूरा करके बाहर निकल आओ।  

(श्रोतागण हँसते हुए)

रस इसी लिए है न कि चीज़ बढ़िया है, मिल रही है सस्ते में। तो खरीद लो।   

श्रोताजब मिल जाएगी तो सोचेंगे कि काहे के लिए मिल गई?

वक्ता:  पहले पा लो। आज तक तो किसी को मिली नहीं। तुम्हें कैसे मिलेगी? हो सकता है मिल ही जाए। तुम्हें मिल जाए, तो मेरे पास भी ले आना। मैं भी आंख बंद करके कहूँगा, “एक सौ पच्चास।

आदमी हो न? पता है कि अब नहीं मिलेगी। दो बार, चार बार कर ली कोशिश, अब गई। जब गई तो फिर क्यों सवाल पूछ रहे हो कि, “सपने से रस कैसे तोड़ें?” टूट ही जाएगा न जब जान जाओगे कि अब नहीं मिलेगा। बस छूट गई। अब छूट गई तो छूट गई। दौड़ लगाओ।

श्रोतासर, जो देखने की बात हुई थी, तो देखें कैसे? पकड़ें कैसे?

वक्ताअभी जैसे बोल रहा हूँ, तो बात आ रही है न समझ में?

श्रोताहाँ।  

वक्ताइसी को पकड़ना कहते हैं।  

श्रोताऔर जैसे मैं कुछ कर रही हूँ। और करते करते दिख जाए कि अच्छा..

वक्तावही है।

श्रोतातो ये दिख जाना फिसलना नहीं है?

वक्तानहीं।  ये फिसलना नहीं।  मैं फिसल रही हूँहै।  

श्रोतातो ये जो फिसलना है, ये कुछ होने के फलस्वरूप आया है..

वक्ताहमेशा ही कुछ न कुछ घटित होता रहता है। कब कुछ घटित नहीं होता?

श्रोताये साफ़ देखना कैसे होता है?

वक्तासाफ़ सुनना कैसा है?

श्रोताबहुत अच्छा।

वक्तातो बस ऐसा ही होता है बिलकुल।  

श्रोताक्योंकि जब बोलते हैं कि, ‘’मैं फिसला’’ तो लगता है कि कुछ गलत हो रहा है।

वक्तानहींगलत नहीं। देखो, जब पकड़ते हैं न, उस समय पर इतना भी समय नहीं होता कि तुम उसको नाम दे सको। अब अभी बात कर रहे हैं तो मैंने कह दिया कि, “मैं फिसल रही हूँ। वरना उस समय पर नाम देने भर की भी गुंजाइश होती नहीं है। वो बस तत्काल, और उसमें ऐसा भी नहीं है कि तुम बड़े कोई आह्लादित हो जाओगे। हल्का सा, सूक्ष्म उसका आनंद होता है बस। ऐसा नहीं है कि तुम उछल पड़ोगी, पकड़ा…। ऐसा कुछ नहीं है। कितना उछलोगी? अब तो प्रतिपल पकड़ना है।  अब सोचो कोई खड़े है, उछले ही जा रहे है; पकड़ा, पकड़ा, पकड़ा।  थोड़ी देर मैं उन्हें पकड़ने की जरूरत पड़ जाएगी।  

श्रोता: आपने जब पकड़ लिया, तो आपको आनंद का एहसास होता है थोड़ा सा?

वक्ता: आगे बढ़ जाते हो।

श्रोता: तो अब आप उसको परिभाषित चाहते हैं?

वक्ता:  आगे बढ़ जाते हो ना। फिर आ गया, दोबारा पकड़ो। आ तो गया। अब जो तुम चाहते हो, यह चाहना तुम्हारे सामने खड़ा है, अब इसे पकड़ो। अब जो चाहते हो, इस पल में, वो चाहत तुम्हारे सामने खड़ी है; पकड़ो उसको पकड़ो। खेल लगातार चल रहा है, उसमें कोई विराम नहीं है, यह नहीं होता। फिर से पकड़ो। देखा है ना वो, जो बाज़ीगर होते हैं, वो एक गेंद पकड़तें है, उतनी देर में  दूसरी आ जाती है। दूसरी पकड़तें है, उतनी देर में…

श्रोता: तीसरी आ जाती है।

वक्ता: अब वो बेचारा पार्टी कब देगा कि पकड़ा? कभी नहीं, करते रहो यह। मज़ा है इसी का।

श्रोता:  सर, यह कभी-कभी होता है कि उस क्षण में नहीं पकड़ पाते।

वक्ता: पकड़ो इसको। बाद में।  समय बीत गया ना। बाद में दिखाई दिया, इस बात को पकड़ो कि बात में दिखाई दिया, अभी मुझे कैसा लग रहा है। तुम्हारे साथ लगातार कुछ हो रहा है कि नहीं हो रहा है? जो हो रहा है उसके पीछे होंगे अनन्य कारण होंगे, बहुत। पर जो कुछ हो रहा है, वो हो रहा है ना। अब गेंद कैसे आ रही है उसके हाँथ में, इसके पीछे कार्यकरण की होगी, एक अनंत श्रृंखला होगी, पर अभी तो गेंद आ रही है ना, तो अभी आ रही है तो….. पकड़ो।  

श्रोता: जैसे सर शुरू-शुरू में, जो ढर्रा चला आ रहा है , उसको पकड़ना आसान नहीं है पर जको सूक्ष्म है उसको पकड़ा जा सकता है।

वक्ता: अभी ही देख लो, अपने शब्दों को ही देख लो। कहीं से भी शुरू करो सब कुछ उपलब्ध है। गेंदे ही गेंदे उछल रही हैं, कुछ तो पकड़ो। अभी तो हालत यह है कि युहीं हाथ बढ़ा दोगे, तो भी हाथ में गेंद आ जाएगी।  

श्रोता: सर, इसको पकड़ने के लिए अपने मन को कैसे संवेदनशील करा जा सकता है क्योंकि अभी तो ऐसा है कि जैसा होता ही नहीं।

वक्ता: तुम छोड़ते कैसे हो पहले यह बताओ क्योंकि यदि अभी सुन पा रहे हो मुझे, तो इसका मतलब पकड़ते तो हो ही। पकड़ने की ताकत भी है, पकड़ रहे भी हो, ये बताओ छोड़ते कैसे हो? उस छोड़ने को पकड़ो।  कैसे छोड़ देते हो?

श्रोता: कोई और चीज़ ऐसी दिख जाती है कि ….

वक्ता: तो पकड़ लिया। छोड़ने को पकड़ लिया।  

श्रोता: तो की अकिसी खेल में गेंद पकड़ने जैस अहै कि जितन अभ्यास करोगे उतना ज़्यादा अच्छे से पकड़ पाओगे या सिर्फ़ उस क्षण के सतर्कता की बात है?

वक्ता: अभ्यास मदद करता है। अभ्यास करो। पर बात अभ्यास से आगे की भी है। अभ्यास से तो मदद मिलेगी ही। जितना पकड़ोगे, उतना बात बनेगी पर कोई ये ना समझे कि दोहरा-दोहरा करके, इसमें प्रवीणता आ जानी है। ऐसे नहीं आती। पर तुम करो, अभ्यास करो। अच्छी बात है। इसलिए कह रहा हूँ कि अभ्यास करो क्योंकि अभ्यास करने में एक बार तो पकड़ोगे। अभ्यास से ऐसा लगता है कि जैसे कोई कह रहा हो कि बार-बार पकड़ो। एक तरफ़ से तो तुम कह रहे हो कि पकड़ना आता नहीं और दूसरी ओर कह रहे हो कि अभ्यास करना है। अभ्यास का क्या मतलब होता है? बार-बार पकड़ना। बार-बार करने के लिए एक बार तो करोगे? पहला तो एक बार ही होगा। तो एक बार करो। वो एक बार भी क्या पकड़ोगे? जो अभी हो रहा होगा। ज़िन्दगी में ऐसा थोड़ी होता है कि नैट्स  है और वास्तविक मैच  है। कि अभी तो रिहर्सल  चल रही है, या प्रैक्टिस  चल रही है और वास्तविक मैच है। अगर तुम्हें प्रैक्टिस भी करनी है, अभ्यास भी करना है, तो तुम्हें कब पकड़ना होगारियल टाइम, रियल लाइफ़।  ज़िन्दगी में ही। तो तुम अभ्यास ही करो। किसी भी नाम से पकड़ो, पकड़ो। कोई ये कह के पकड़ेगा, “जी, ये तो असली मैच चल रहा है, उसमें पकड़ा। कोई ये कह के पकड़ेगा कि ये तो हमने अभी नैट प्रैक्टिस  में पकड़ा। पर जब भी पकड़ा, जीवन को ही पकड़ा न? वो तो हर समय मैच ही चल रहा है और वो असली मैच है, पकड़ो।  


सत्र देखें : आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर: न चिंता न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत (Is worrying your nature?)


आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

  • अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

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आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

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    जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

     सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

  •  आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

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सम्पादकीय टिप्पणी :

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2 टिप्पणियाँ

    • नमस्कार,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है |

      बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं और अपने मन में उठ रहे प्रश्नों का जवाब जानने हेतु उत्सुक हैं |

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:
      _______________________________________________

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।

      इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर:
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं।

      इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।

      सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।

      सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर
      या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917
      _______________________________________________

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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