साक्षित्व का वास्तविक अर्थ

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)श्रोता: सर, आखिरी बात होती है जब हम बदलते हुए को देख लें, तब हम उसके साथ हैं, जो नहीं बदल रहा है। तो जैसे अगर अभी सिचुएसन्स  को देखते हैं कि फिज़िकली चीजें चेन्ज हो रही हैं, और मानसिकता भी हो रही हैं और वो समझ में उतर रहा है। तो मैं उसके साथ हूँ जो बदल रहा है लेकिन मैं ये भी देख रहा हूँ कि मैं उसके साथ हूँ जो नहीं बदल रहा है, तो ये जो देख रहा है ये तो बदल रहा है ना।

वक्ता: देखने का मतलब सोचना नहीं होता। देखने का प्रमाण सिर्फ़ शांति होता है। आमतौर पर जब तुम कहते हो, ‘’मैं देख रहा हूँ कि चीजें बदल रही हैं,’’ तो तुम सिर्फ़ उनके बारे में सोच रहे होते हो। तो वास्तविक रूप से जब तुम बदलाव के साक्षी होते हो, तो तुम्हें ये ख्याल आता नहीं है कि चीज़ें बदल रही हैं, और मैं देखने वाला हूँ। साक्षित्व का एक मात्र चिन्ह ये ही है कि तुम उस पूरे बदलाव के मध्य शांत हो। समझ रहे हो? हमारे साथ स्थिति ये है कि हम पूरी ही तरह से विचारो में जीते हैं। तो जब कहा भी जाता है देखो, तो तुम देखते नहीं, देखने के बारे में विचार करते हो।

तुमसे कहा जाता है प्रेम, तो तुम प्रेम में उतरते नहीं, तुम प्रेम के बारे में विचार करते हो और बहुत लोग उन्हें ये गहरा भ्रम होता है कि प्रेम का अर्थ ही है, प्रेम के बारे में विचार। और ये भ्रम बहुत दूर तक जा सकता है। बहुत दूर तक जा सकता है, आपको ऐसा लग सकता है कि आप मुक्त तब हैं, जब आप सोचें कि आप मुक्त हैं। और बहुत सारे लोग सोच-सोच कर ही अपनेआप को ये प्रमाणित भी कर लेते हैं कि हम मुक्त हैं। सुना होगा तुमने इस तरह की बातें कि, ‘’मुझे अभी बहुत मुक्त अनुभव हो रहा है।’’ सुना है?

श्रोता: जी सर।

वक्ता: अब वो कोई मुक्त हो नहीं गये हैं, वो सोच रहे हैं कि वो मुक्त हो गये हैं और उनके लिये मुक्ति का अर्थ ही यही है। ये प्रेम अब कब मानेंगे कि प्रेम है? जब आपने कोई विषय पकड़ लिया हो, कोई प्रेमी पकड़ लिया हो, और आप उसके बारे में प्रेम पूर्वक सोचते हों। आप उसके बारे में वो सारे ख्याल रखते हों जो कि किसी प्रेमी के बारे में रखने चाहिये। ‘’तुम्हारा भला हो जाये, तुम हमारे साथ रहो, तुम बड़े खूबसूरत हो,’’ फिर इसको हम प्रेम कहेंगे। तो ये जो पूरा प्रेम है ये क्या है? ये विचारों की खिचड़ी है। और आप कब कहते हो कि प्रेम टूट गया? जब आप ये सब सोचना बंद कर दो।

तो ज़ाहिर सी बात है कि ऐसा प्रेम ख्यालों के साथ आता है, और खयालो के साथ चला जाता है। और ख्याल तो बदलते रहते हैं, तो ऐसे प्रेम की भी क्या गति होनी है? बदल ही जायेगा। फिर आप कहते हो ये देखो, आरोप लगाते हो कि तुम बदल गये। साक्षित्व की बात मैंने कर दी भले ही कि जो बदल रहा है, तुम उसको देख रहे हो, पर उस देखने को वैसा देखना मत समझ लेना जैसा आँखों से देखा जाता है। उस देखने को वैसा देखना भी मत समझ लेना, जैसा मन से विचार किया जाता है। उस देखने का बस एक ही अर्थ है कि उस पूरे बदलाव के मध्य, तुम शांत हो और तुम विचार भी नहीं कर रहे कि तुम शांत हो। कोई और आ के तुम्हें बता दे, तो बता दे, तुम्हें पता भी नहीं चल रहा कि तुम शांत हो क्यूंकि जिसको आप पता लगना कहते हो, वो स्वयं एक विचार है।

जो वास्तव में शांत हो गया, उसे पता कैसे चलेगा कि वो शांत है? जिसे वास्तव में प्रेम है, उसे तो बहुत समय लगेगा उस प्रेम को प्रेम शब्द से जोड़ने में। कोई और आके बतायेगा, तो वो शायद कहे, ‘’अच्छा! तो इसको प्रेम कहते हैं। हमने तो कभी सोचा नहीं कि ये प्रेम है। हमारे लिए तो ये बस एक सहज स्वस्थ सम्बन्ध था। अब तुम कहते हो कि यही प्रेम है, तो हम माने लेते हैं’’ लेकिन ऐसा भी मुश्किल से होगा, क्यूंकि कोई आ के आपको बता दे कि ये प्रेम है, इसके लिये सर्वप्रथम उसे प्रेमी होना चाहिए और ऐसा कोई मिल जाए इसकी संभावना शून्य है। तो एक बड़ी अजीब और गरीब घटना घटेगी, जहाँ आपका प्रेम वास्तव में है, वहाँ आपको कभी पता ही नहीं चलेगा कि प्रेम है और जहाँ-जहाँ आप दावा करते हो कि प्रेम का सम्बन्ध है, वहाँ पक्का है कि कोई प्रेम है ही नहीं।

ऐसा नहीं है कि आपकी जिंदगी में प्रेम मौजूद नहीं है। आप बड़े गहरे आशिक हो। लेकिन आपको किससे प्रेम है, और आपका दिल किसकी धुन दिन रात गा रहा है, ये आप कभी जान नहीं पाओगे क्यूंकि जानना क्या है? विचार। और प्रेम विचार तो होता नहीं। तो जिसके प्रेम में पागल हो, ये तो छोड़ ही दो कि तुम्हें कभी उसका पता नहीं चलेगा, तुम्हें कभी ये भी पता नहीं चलेगा कि तुम प्यार में हो। और जिससे प्यार के दावे करते हो, उससे तुम प्यार करते ही नहीं हो, तभी तो दावे करते हो। कोई आ के बोले, ‘’आई लव यू,’’ तो बस यही जवाब देना कि करते होते, तो कह कैसे देते। यदि प्यार में होते, तो तुम्हें पता कैसे चलता? तो तूने तो आ कर यही सिद्ध कर दिया कि तुझे प्यार-व्यार नहीं है, भाग यहाँ से।

‘आई लव यू’ कहने का तो अर्थ ही यही है कि प्यार नहीं करते। ऐसा ही लाओ तजु ने कहा है जब प्यार नहीं रहता, तो प्यार का शब्द प्रचलन में आ जाता है, जब सत्य नहीं रहता, तो सत्य का शब्द प्रचलन में आ जाता है हमारी त्रासदी देखो ना हमारे पास जो कुछ कीमती है, वो हमें पता भी नहीं कि है, और जो कुछ हमारे पास नहीं है, मैल है, घटिया है, उसको लेकर के हम फुले-फुले फिरते हैं। जैसे कि तुम्हारे पास दो बैंक अकाउंट हो एक में अरबों भरे हुए हैं, और एक में नेगेटिव बैलेंस चल रहा हो, ओवर ड्राफ्ट। (सब हँसते है) और तुम दिन रात लॉग इन किसमें करते हो?

श्रोता: ओवर ड्राफ्ट।

वक्ता: ओवर ड्राफ्ट वाले में जिसमें हमेशा माइनस में दिखायी देता है। जिसमें अरबों भरे हुए हैं, उसका तुम पास्वर्ड ही भूल गये।(सब जोर से हँसते हैं) पास्वर्ड छोड़ो, तुम ये भी भूल गये कि वो अकाउंट तुम्हारे पास है भी। तो ऐसे हैं हम। जहाँ असली प्रेम है, उसका हमे नहीं पता और वो है, और वो ऐसा नहीं है कि खोजने जाना पडेगा कि, ‘’मैं कहाँ खोजू? कहाँ पाऊं तुझे?’’ वो है, पर भूल गये हो कि है, और ये जो घटिया वाला, नकली वाला, इसमें रोज लॉग इन करते हो, और तनाव में रहते हो। उफ़ कहाँ से लाऊंगा, ये देखो नकली अकाउंट में लॉग इन करना बंद करो। खाता ही बंद करा दो, वो बैंक ही घटिया है।

श्रोता2: सर, दिमाग में बहुत प्रश्न आ रहे हैं। पहला तो इस क्लास से पहले तो, ‘’मैं ये सोचता था कि अगर कपडा साफ़ है, यानि बर्ताव अच्छा है, तो ठीक है। अब यहाँ पर आ के पता चला है कपड़ा ही हटा देना है, इस ‘मैं’ को, पहचान को ही हटा देना है। तो अगर यही हट जायेगा, फिर जो व्यक्ति है, वो क्या कहलायेगा? क्या रह जायेगा वो?

वक्ता: उसका पासवर्ड बता दूँ ताकि आप नेट-बैंकिंग के द्वारा उसका सारा इसमें दाल दे! (सब जोर-जोर से हँसते है) भाई! हमे परमत्मा क्यों चाहिये होता है? ताकि हमारे रोज़ के काम-धंधो में मदद मिल सके। चोर भी चोरी करने से पहले बोलता होगा, “भगवन मदद करना”। तो आपको वो वाला अकाउंट भी इसीलिये चाहिये ताकि आप अपने इस वाले अकाउंट को भर सको, ठीक कह रहा हूँ ना मैं? व्यक्ति शेष नहीं रह जायेगा। ठीक बात है मन गया, मैल गयी, व्यक्ति शेष नहीं रह जायेगा लेकिन व्यक्ति के शेष रह जाने की कामना, व्यकित के शेष ना रह जाने की चिंता किसको हो रही? अपार ज्योति को हो रही है या व्यक्ति को हो रही है?

श्रोता: व्यक्ति को

वक्ता: और व्यक्ति शेष और ये चिंता शेष??

श्रोता: नहीं रहेगा।

वक्ता: ये चिंता भी आपको कब तक हो रही है?

श्रोता: जब तक व्यक्ति शेष है।

वक्ता: बात बहुत सीधी है। आप, आप हो कैसे? आवरण युक्त, मलिन इसलिये आपको चिंता हो रही है। ये जो चिंता हो रही है, मैल को हो रही है, मलिनता को हो रही है। जब मैल ही नहीं रही, तो चिंता किसको होगी? आप थोड़ी चिंता कर रहे हो, कौन चिंता कर रहा है?

श्रोता: कपडा।

वक्ता: और कपड़ा माने?

श्रोता: मैल।

वक्ता: ठीक, मैल। ना मैल रही, ना कपडा रहा, ना ‘आई’ रहा, तो चिंता करने वाला कौन रहा? अब आपको चिंता ये हो रही है कि वहाँ पर बचेगा कौन? ये भी चिंता करने वाला कौन रहा? जो बचेगा, सो बचेगा इसीलिये साधना के पथ पर आगे का विचार बहुत व्यर्थ होता है। ना सिर्फ़ व्यर्थ होता है, बल्कि हानिकारक होता है। क्यूंकि आप जो हो, वो होते हुए आप आगे का विचार कर नहीं सकते। आप आगे का जो भी विचार करोगे, वो मात्र आपके होने का प्रक्षेपण होगा। आप जैसे हो, उसी के अनुसार आगे का कुछ विचार कर लोगे। तो फिर साधक ये सवाल पूछता है कि जब मुझे ये पता लग ही नहीं सकता कि, ‘’मैं  क्या हो जाऊंगा, ठीक है मैं नष्ट हो जाऊंगा, विगलित हो जाऊंगा, मैं नहीं बचूंगा और मुझे नहीं पता कि उसके बाद जो शेष रहेगा वो क्या है, तो फिर मैं किस प्रेरणा से आगे बढूँ?’’

‘’आप जिस रास्ते पर मुझे आगे बढ़ा रहे हो, मुझ ये पता ही नहीं कि उसमें आगे क्या है और पता चल ही नहीं सकता, तो फिर मैं आगे बढूँ क्यों?’’ ये सवाल अकसर सताता है, तो इसका उत्तर बहुत सीधा है। आप आगे इसलिये नहीं बढ़ते कि आगे कोई उज्जवल भविष्य है, आप कपड़ा इसलिए उतारते हो, क्यूंकि आपको समझ आता है कि वो कपड़ा आपको चुभ रहा है, कष्ट दे रहा है, गंदा है उसमें से दुर्गन्ध उठ रही है, इसलिये उतारो। कपड़ा उतारने के बाद आप ज्योति रूप हो, ये अभी आपको पता नहीं लग सकता है लेकिन इतना तो आपको पता चल सकता है ना कि आप जिस कपड़े को पकड़े हुए हो, उस पकड़ने में कितना कष्ट है या ये भी नहीं पता चल रहा? तो इस अर्थ में गुरु का काम होता है कि आपको आपके ही कष्ट से रूबरू करा देना। कष्ट में, तो हम सब ही जी रहे हैं, पर हमें ये पता भी नहीं होता कि हम कितने ज़्यादा त्रस्त है। हम अपने ही प्रति असंवेदनशील होते हैं, और हम अपनी ही स्थिति के प्रति झूठे होते हैं।

हम ये मानने को तैयार नहीं होते कि हम कष्ट मे हैं। कारण सीधा है और ये चिंता शेष? कोई भी कष्ट यूंही नहीं आ गया होता। हमारा सारा जो कष्ट है, वो अहंकार जनित होता है, हमारे ही कर्मों से होता है। अगर मैं ये मानू कि मैं बहुत कष्ट में हूँ, तो मुझे ये भी मानना पड़ेगा कि मैं जिन ढर्रों पर चल रहा था, वो मेरे लिये ही हानिकारक थे। अहंकार को ये मानने में बहुत कष्ट होता है। समझ रहे हो बात को? जैसे कि तुमने ही कोई व्यंजन तैयार किया हो, कोई दिशा, तुमने ही तैयार की और फिर तुम उसे खाओ, और चार लोगों को परोसो। तुम्हें कष्ट होगा ये स्वीकार करने में कि खाना बहुत घटिया है। अगर घटिया है, तो बनाया किसने? घटिया है तो बनाया किसने? तुमने। तो इसे अच्छा है कि कह दो कि नहीं खाना ठीक है, अच्छा है, बढ़िया है। इसीलिये अपनी वर्तमान स्थिति की विषमता को हम स्वीकार ही नहीं करते। हम मानते ही नहीं है कि हम बहुत गहरे दुःख में है। हम दुःख बर्दाश्त कर लेते हैं, पर दुःख के तथ्य को स्वीकार नहीं करते है। चुप-चाप झेले जाओ, कहीं कोने में जा के रो लो, बाहर इधर-उधर दुनिया के लोग मिलें, तो उनको एक झूठा हँसता हुआ चेहरा दिखा दो।

ऐसा अभिनय करो, जैसे सब ठीक है। “होर जी सब बढ़िया? ओ सब भड़िया” उसको रोक के पूंछो ये जो आते हैं ना, ‘’होर जी, सब बढ़िया है?’’ वास्तव में सब बढ़िया है? या लो आइना और शक्ल देखो अपनी, सब बढ़िया? सब बढ़िया होता, तो ऐसे होते तुम? किसको धोखा दे रहे हो, सब बढ़िया? इतना ही काफ़ी है, अपनी स्थिति को देख लेना ही काफ़ी है। बदलाव हो जायेगा, आपको किसी और प्रेरणा की ज़रूरत नहीं है। लोग आते हैं, कहते हैं नहीं, “ये तो बताइए कि हमें मिलेगा क्या?” कुछ नहीं मिलेगा, जो तुम पहले से लिए बैठे हो, उससे मुक्त हो जाओगे और उतना काफ़ी है। हालत अपनी देख नहीं रहे हो? स्वांग ऐसा कर रहे हो, जैसे कि सब कुछ ठीक है तुम्हारे साथ और तुम कह रहे हो कि अभी तक तो सब बढ़िया है, आप बताइए क्या मिलेगा मुझे?

और तुमसे भी लोग सवाल करते होंगे कि, ये जो कर रहे हो, इसे तुम्हें मिलेगा क्या? कुछ ना भी मिले बस उससे मुक्ति मिlल जाए, जो तुम्हारी अवस्था है अभी की, तो तुम्हें अरबों मिल गये। हालत वैसी ही है जिसे हो कैंसर, टी.बी, एड्स सब एक साथ हो और वो डॉक्टर से पूंछ रहा है, “नहीं, ये सब आप जो ट्रीटमेंट वगैरा आप बता रहे हैं, ये मैं करवा भी लूँ तो नहीं मुझे खास क्या मिलेगा?” ( सब हँसते है) अरे! ख़ास कुछ नहीं मिलेगा, बस जो तुझे मिला ही हुआ है, उससे मुक्ति मिल जाएगी। ये जो तू दिन- रात धो रहा है, इसे मुक्ति मिल जाएगी और तुझे ख़ास क्या चाहिए। वो कह रहा है, “नहीं बताइए ना कुछ पंख-वंख आ जायेंगे मेरे कुछ ख़ास होना चाहिए, वरना तो मैं ठीक हूँ”। तुझे पंख चाहिये?

नहीं, हमारी ऐसी ही स्थिति रहती है। और ये सवाल कोई यहाँ ऐसा नहीं है जिसके मन में ना उठा हो और अगर तुम्हारे मन नहीं उठा होगा तो दूसरों ने तुमसे पूंछा होगा कि, “ये सब कर के क्या मिल जायेगा?” ना, कुछ मिलेगा कि नहीं, ये हम नहीं जानते, कुछ और मिलेगा नहीं मिलेगा, ये हम नहीं जानते पर हमारे लिये इतना ही काफ़ी है, जिस नर्क में जी रहे हैं, उससे मुक्ति मिल जाएगी और इतना काफ़ी है। ऐसे भी कह सकते हो कि कुछ मिलेगा नहीं, पर कुछ खो देंगे। खोने के लिए जाते हैं, पाने के लिए नहीं जाते, पाने के लिए नहीं जाते खोने के लिये जाते है। क्या खोने के लिए जाते हैं? वही जो हमारे पास है। और हमारे पास क्या है? मैं, चिंता, तनाव, कलह, ईर्ष्या, द्वेष, मकसद, उसी से भरे हुए हैं, वो खोने के लिए जाते हैं, काफ़ी है ठीक।

तो जहाँ कही भी आप लुभाने वाले वचन सुने, ज़रा सतर्क हो जाइयेगा। आपको बहुत सारी किताबें मिलेंगी और बहुत सारे लोग मिलेंगे, जो आपको इस प्रकार आकर्षित करेंगे कि, ‘आओ! आओ! आओ! आध्यात्म के पथ पर, तुम्हें बड़ा सुख मिलेगा, तुम्हारी बड़ी कामनाएँ पूरी हो जायेंगी, तुम जो चाहते हो तुम्हें मिल जायेगा।’ ज़रा सतर्क हो जाइयेगा। वहाँ धोखा है क्यूंकि ये पथ और पाने का, और संग्रहित कर लेने का नहीं है। ये पथ खोने का पथ है, विगलित होने का पथ है। अंतर समझ रहे हो ना? जो ग्रंथ तुमसे ये कहता हो, जो गुरु तुमसे ये कहता हो कि, ‘आओ, पढ़ो, जानो, बैठो, सुनो’ इससे तुम्हें कुछ मिल जायेगा, वो गुरु खुद अज्ञानी है, और उसे शायद खुद कुछ पाने की अभी लालसा है क्यूंकि जिसे पाने की लालसा होगी, वो ही उस लालसा का उपयोग करेगा दूसरो को भी रिझाने के लिये।

मैं तुमसे कह रहा हूँ बात साफ़, कुछ नहीं मिलेगा। कोई उम्मीद ही ना रखे कि कुछ मिलेगा। हाँ, इतना ज़रुर होगा कि खो दोगे ,और ये काफ़ी होना चाहिये। अब जैसे आशुतोष जी हैं, सर पर बोझ है, जो उतरता नहीं है, अब मैं एक और बड़ा वाला हैट दे दूँ? (सब हँसते है)  जो अभी पहने हुए हैं, वो उतरता नहीं उसको उन्होंने अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना लिया है। यही काफी नहीं होगा कि यही उतर जाए? अब हम लोग यहाँ बैठे हुए हैं, कई लोगो के माथो पर पसीना थोड़ा सा छलक रह है अब। मौसम बदल रहा है, गर्मी बढ़ रही है तो ये नहीं है कि यहाँ आओगे तो काऊ बॉय हैट मिल जायेगा, ये होगा कि ये टोपी भी उतर जायेगी।

ये है साधना, जो लेकर आये थे, वो छोड़ के चल दिये और एक दिन ऐसा होगा कि, ‘’आओ भी सब कुछ पहन के वापिस पूर्णत: नग्न जाओगे।’’ (सब जोर जोर से हँसते है)

आध्यात्म का अर्थ ही है अपनी नैसर्गिक नग्नता को पुनः पाना।

जो तुम्हारी विशुद्ध नग्नता है, उसको दुबारा हासिल कर लेना – यही आध्यात्मिकता है। उसमें ये टोपी, और ये और वो उतारो व्यर्थ, ये ले के आये थे? ये टोपी कोई छोटा सा कपड़ा ही भर नहीं है, जो आपने सर पर धारण कर रखा है। ये टोपी सर के उपर नहीं है। ये टोपी वास्तव में सर के भीतर है, और यही आपके सर का बोझ है। सर के भीतर यदि टोपी ना रहे, तो सर के ऊपर पहन भी लीजिये तो कोई नुकसान नहीं हो गया। लेकिन आपको ईमानदारी से पूछना पड़ेगा कि आपकी टोपी सर के ऊपर है, या सर के अंदर।

नग्नता का अर्थ है: सर के अंदर जितने कपड़े पहन रखे हैं, उन्हें उतारो फिर ऊपर-ऊपर चाहे पहन लो, कोई बुराई नहीं। ठण्ड है, कपडे पहन लिये, पर अंदर जितने कपड़े है, उन्हें उतार दो। नग्नता का ये अर्थ है। नग्नता का वो नहीं है कि जा के बीच पर नंगे हो के लेट आये, तो हो गया हमारा।

श्रोता3: सर, कई बार बीमारी होती है, तो दवा ली जाती है, लेकिन कई बार फिर दवा भी प्रॉब्लम  बन जाती है। जब ज़रूरत नहीं है, तो कहते है कांटे से निकाल के, कांटे को फिर फेंक देना चाहिए तो ऑब्जरवेशन  जो है, इज ए मेंटल प्रोसेस अब उसके आगे की बात कही जाती है – जिज्ञासा जो है, वो एक मेंटल फेनोमेना  नहीं है, तो उसमे कहा जा रहा है कि बस देखा जा रहा है। तो ये तो ऑब्जरवेशन से आगे की बात हुई तो फिर ऑब्जरवेशन भी कई बार काँटा बन जाता है?

वक्ता: ऑब्जरवेशन यदि वास्तव में हो रहा है तो वो आब्जर्वर को बदल देगा। कृष्णमूर्ति ने आपसे कहा दा आब्जर्वर इज दा ओब्सेर्वेड उसे आगे की एक बात और समझिए दा ऑब्जरवेशन इफ इट इज एक्चुअली ऑब्जरवेशन, इफ इट इज ऑनेस्ट ऑब्जरवेशन, चेनजीस दा आब्जर्वर। दा आब्जर्वर इज दा ओब्सेर्वेद बट ऑब्जरवेशन चेनजीस दा आब्जर्वर। अगर वास्तव में ओब्सर्वे किया जा रहा है, तो जो ओब्सेर्वे करने वाला है वो थोड़ा-थोड़ा बदलता रहेगा। देखने से पहले, और देखने के साथ आप एक ही  नहीं होते। आप बदल जाते हो और क्या ये आपने अनुभव नहीं किया है। तो ऑब्जरवेशन ही आपको ये ताकत भी दे देगा कि आप समझ जाए कि अब ऑब्जरवेशन  से आगे कुछ और है।

ऑब्जरवेशन — समझिये बात को — आप शुरू करते हो, और आपको हक है कि आप उसका श्रेय भी ले लो। आप अपने कर्ताभाव को ततृप्त रख सकते हो, आप कह सकते हो कि, ‘’मैंने ऑब्जरवेशन शुरू किया, ठीक है।’’ आप कर सकते हो शुरू और ऑब्जरवेशन आपसे शुरू भी करवाया जा सकता है। कोई आकर के आपको सीधे-सीधे नियम थमा सकता है कि ओब्सर्वे करो। लेकिन वो ऑब्जरवेशन  कब गहरा कर के साक्षित्व बन जायेगा, ये आपके हाथ में नहीं है। ये तो ऐसा ही होता है आप चलना शुर करते हो, और चलते-चलते आप खुद ही कमतर होते जा रहे हो।

अवलोकन आपके हाथ में, साक्षित्व आपके हाथ में नहीं है।

वहाँ आपका कर्ता भाव नहीं चलेगा। लेकिन साक्षित्व को आप एक झटके से पाओ, इसकी सम्भावना ज़रा कम है तो इसलिये विधि के तौर पर ऑब्जरवेशन क्या है विधि, ऑब्जरवेशन में अपनेआप में कुछ नहीं रखा है। ऑब्जरवेशन का मज़ा ही यही है कि वो शुरू तो विचार रूप में होता है, मानसिक गतिविधि के रूप में होता है। उसकी शुरुआत कैसे होती है? मानसिक गतिविधि, लेकिन वो मानसिक गतिविधि क्षीण  होती जाती है, होती जाती है, होती जाती है और कुछ ही समय बाद वो ऑब्जरवेशन, ऑब्जरवेशन बचता ही नहीं, आब्जर्वर, आब्जर्वर बचता ही नहीं, मात्र देखना बचता है। देखने वाला नहीं बचता, मात्र देखना बचता है।

हमारे लिये इसका क्या महत्व है? क्या उपयोगिता है? हमारे लिये उपयोगिता है कि हम जब ओब्सर्वे  करे तो इधर-उधर का ख्याल छोड़ दे कि आगे क्या होगा पीछे क्या होगा। ओब्सर्वे करना हमारे हाथ में है, उसके आगे क्या होगा वो हमारे हाथ में बिलकुल नहीं है। उसका यदि आप ख्याल करेंगे तो बाधा पहुँचा देंगे। वो ऐसा ही है जैसे आप मिट्टी में बीज डालो। बीज डालना आप ही के हाथ में है, पर तुम बार-बार ख्याल करो कि बीज में से जड़ निकली की नहीं निकली और तुम रोज जांचो कि मैंने बीज डाला था अभी जड़ निकली की नहीं। तो जो जड़ निकल भी रही होगी उसमे तुम बाधा पहुंचा दोगे। तुम तो इतना ही कर लो कि बीज डाल दो। आगे का काम अपने आप हो जाता है तुम्हें नहीं करना पड़ता है।

श्रोता3: सर, इसका मतलब ऑब्जरवेशन एनालिसिस  नहीं करनी चाहिये।

वक्ता: बिलकुल भी नहीं, लेकिन इसमें एक बात और समझिएगा हमारा जैसा मन होता है ना, उसमें जब शुरुआत करोगे, तो सब हो जाता है। ऑब्जरवेशन के नाम पर हम सब कर देते हैं, लेकिन घबराना नहीं चाहिये क्यूंकि देखिये हमारे पास विकल्प क्या है? हम किसी को कह भी दे या अपने आप को भी कह दे कि देखो भाई ऑब्जरवेशन का मतलब विश्लेष्ण, एनालिसिस, काट-छांट, बाल की खाल निकलना ये सब नहीं होता है। हम अपने आप को ये सब समझा भी दे तो भी हम जैसे हैं तो हम ऑब्जरवेशन के नाम पे क्या करेंगे?

श्रोता: एनालिसिस।

वक्ता: क्या करेंगे? ये सब हम कर के ही मानेंगे। ये सब चल भी रहा हो, तो भी आप कदम पीछे मत खींचिए। ठीक है ना, आप सबके वाट्स एप ग्रुप बने हुए हैं, उस पर देखा है ना कैसे-कैसे ऑब्जरवेशन आते हैं “आई ऍम ओब्सर्विंग देट दा इंडियन क्रिकेट टीम, इज शोर्ट ऑफ़ कॉन्फिडेंस” (सब जोर से हँसते हैं) ये ऑब्जरवेशन लिखे जा रहे हैं, और ये तो कुछ भी नहीं है अभी तुम उठाओ और पढ़ो तो देखो ऑब्जरवेशन कैसे-कैसे हैं।

श्रोता4: सर, जब हम ओब्सेर्वे करते हैं, तो टेनडेंनसी स्टॉप  हो जाती है, जब ऑब्जरवेशन स्टार्ट हो जाती है। जब अकेले में सोचने बैठो तो उस समय सारी टेनडेंनसी रुक जाती है, और फिर जब आप वापस अपनी चीजों में लग जाते हैं, तो फिर वो टेनडेंनसी वापस आ जाती है, उस समय ऑब्ज़रवेशन नहीं हो पाती, पर जब आप शांत होते हैं, तबी ऑब्ज़रवेशन हो जाती है।

वक्ता: बेटा, आप जो भी कुछ करोगे, वो तो आपने तय करके किया ना आपने तय किया था कि अभी ज़रा ऑब्जरवेशन करना है, और अभी ज़रा उस बारे में लिखना है। दस मिनट बाद आप ही तय कर सकते हो कि अब कुछ और करने का समय आ गया है। अब बाज़ार जा के ज़रा बैंगन खरीदने हैं, तो अब बैंगन महत्वपूर्ण हो गया, ऑब्जरवेशन गया क्यूंकि ये आपने तय किया था ना कि ऑब्जरवेशन  करना है। जो काम आपके तय करने से शुरू हो रहा है, वो आप ही के तय करने से ख़त्म भी हो जायेगा। साक्षित्व इसीलिये बड़ी मजेदार चीज है। वो ना आपके चाहने से शुरू होती है, ना आपके चाहने से ख़त्म होती है। वो परमात्मा की तरह है: ना आता है, ना जाता है। लेकिन आप जैसे भी हैं, जहाँ भी हैं, आप वही करिये, जो आपके बस में है।

आपका ऑब्जरवेशन, आपके पूर्वाग्रहों से रंजित है, उधडा-चिथड़ा है, कोई फ़र्क नहीं पड़ता, आप तब भी ओब्सर्वे करिये। आप ऑब्जरवेशन के नाम पर सिर्फ़ ताका-झांकी करते हैं, कोई बात नहीं आप तब भी ओब्सर्वे करिये। भाई, आप नहाना सीखने जाते हो स्विमिंग, तैरना सीखने जाते हो, क्या आपसे ये कहा जाए जब एक्सपर्ट तैराक बन जाना, तभी गोता मारना और बाकी बाहर-बाहर सूखे में रिहर्सल करो! (सब हँसते है) जैसे हो, जैसा भी हाथ पाँव मारते हो तुम कूदो, लगेगा दो महिना, आठ महिना और तुम बहुत ही नालायक हो, तो हो सकता है पाँच साल पर कूदते-कूदते, कूदते-कूदते, घटना घट जाएगी। जैसे हैं, जहाँ है, जो भी आपकी स्थिति है, जिस भी मुकाम पर खड़े हैं आपके लिये कोई विकल्प नहीं है। आपको वहीँ पर शुरू करना है। वही पर आपकी सम्भावना है, वही में आपकी मुक्ति है। बाकी आप बात करे कि कुछ और हो जायेगा मैं तब कुछ और करूँगा तो कब हो जायेगा? कैसे हो जायेगा? आपका तथ्य तो वही है, जो है।

श्रोता4: सर, मैं कपडा इज़ दा पैटर्न, तो यही सवाल मन में आ रहा है कि उस कपड़े को कपड़ा ही देख रहा है, तो वो क्या देख रहा है? या क्या कर रहा है? अभी आपने कहा कि हो सकता है, उसे पाँच साल भी लग जायेंगे, पर वो क्या देखा रहा है? क्या देखना है उसको? ऑब्जरवेशन क्या होता है?

वक्ता: जो भी होता है, आपके पास विकल्प क्या है? आपकी ऑंखें यदि दिखाती है कि ये दीवार एक रंग की है, कोई विकल्प है आपके पास? आप कोशिश करिये कि इसको आप सुनहरे रंग का देख ले या काले रंग का देख ले, देख सकते है क्या? आपकी तो जैसी वृति है, आपकी तो जैसी इन्द्रियाँ, है और आपके तो जैसे संस्कार हैं, आपको तो दुनिया वैसी ही दिखेगी। आप कोशिश कर के कुछ बदल सकते है क्या? तो हो सकता है कि आपको रंग अन्धता हो, कलर ब्लाइंडनेस। ठीक है, और आपको ये दिखायी पड़ रही हो कि इसमें कोई रंग ही नहीं है। तो आप ऑब्ज़रवेशन करिये और उसमें लिखिए “आई ओब्सर्वेड देट द वाल इज कलरलेस”। दुनिया हँसेंगी, हँसने दीजिये हो सकता है बौद्धिक रूप से आपको भी पता हो कि जो आपने लिखा, वो बात गलत है कोई बात नहीं, आपके पास क्या विकल्प है? आपको क्या दिखा कि यहाँ पर कोई रंग नहीं है, तो लिखिए ये रंगहीन दीवार, ठीक।

और ये परवाह मत करिये कि, ‘’मैं तो खुद जो देखने वाला है, वो भी तो पूरी तरह संस्कारित है। वो जो देख रहा है, गलत देखेगा। अरे! भाई तुमने आज तक सही देखा ही क्या है जो अब तुम्हें इतना चिंता सताती है कि, ‘’मैं ओब्सर्वे करूंगा, तो कहीं गलत ना देख लूँ?’’ जैसे कि कभी तुमने कुछ सही भी देखा हो। गलत ही देखते हो ना, तो बेशर्म हो के गलत देखो। ऑब्जरवेशन का मतलब ही यही होता है बताना कि, ‘’मैं क्या-क्या गलत देखता हूँ।’’ तुम्हारे ऑब्जरवेशन में क्या कुछ सही होता है कभी? किस भ्रम में बैठे हो? अपनी ओर से तुम बहुत सज़ा के और रंग रोगन करके अपने ऑब्जरवेशन भेजते हो कि, ‘’मैंने ये भेजा, मैंने वो भेजा, तुम्हें क्या लगता है उसमें कोई भी जान होती है? तुम अपने भ्रमो पर रंग-रोगन करके भेज देते हो। किसी के ज़रा ज्यादा चहकते हुए भ्रम हैं, और किसी के थोड़े ज़्यादा महकते हुए भ्रम हैं। कोई चहक रहा हो, कोई महक रहा हो; भ्रम तो भ्रम हैं।’’

साफ़-साफ़ जान के लिखिए कि, ‘’मैं जो लिख रहा हूँ वही बकवास है,’’ बिलकुल साफ़ जानकर लिखिये और बिलकुल बेख़ौफ़ हो के लिखिए कि, ‘’मैं बकवास के अलावा लिख भी क्या सकता हूँ? तो जो लिख सकता हूँ, वो लिख रहा हूँ’’ और उसमें कोई ग्लानि या शर्म की बात नहीं है। जब आपको ग्लानि या शर्म नहीं होती, तब आप वो होते जो ज़िम्मेदार नहीं होता, उस सारी गंदगी के लिये। समझिये इस बात को, शर्म किसे आती है? जो ज़िम्मेदार होता है, जिसने वो किया होता है। शर्म उसे आती है, जो अपने ऊपर उस कर्म का कर्ताभाव ले रहा होता है। “अरे! मैंने किया ही नहीं, मेरे संस्कारो ने करवया, तो मैं कहे जो फ़ालतू जिम्मेदारी लूँ अपने ऊपर मैं तो साफ़-साफ़ लिख दूँगा कि जैसे मुझे संस्कार दिए गये हैं, उनके कारण आज मैं चोरी कर आया और दो को छेड़ आया और एक को गाली दे आया” ठीक, बिलकुल बेख़ौफ़ हो के लिख दीजिये और कहिये कि बस देखो ऐसा।

इसीलिये कहीं-कहीं पर कहा जाता है कि जब ऑब्जरवेशन  करो, तो सिर्फ़ दुनिया को ही मत कहो कि उसने ऐसा किया, उसने ऐसा किया उसने ऐसा किया। अपनेआप को भी ‘मैं’ कह के ना सम्भोदित करो। ऐसे कहो कि मंजीत ये कर रहा था, गगन ये कर रहा था और आशुतोष ये कर रहा था वास्तविक ऑब्जरवेशन में ‘मैं’ का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये। ‘मैं’ का प्रयोग करेंगे, तो कर्ता भाव आयेगा, ग्लानि भी आयेगी, शर्म भी आएगी, और आपको फिर झूठ लिखना पड़ेगा। जब शर्म आती है ना, तो आप ऑब्जरवेशन  साफ़-साफ़ बयान नहीं कर पाते हो। आपको लगता है कि पोल खुल गयी है। भाई, आप देखते हैं ना आप ऑब्जरवेशन करते हैं, तो कितनी आसानी से लिख देते हैं कि दुनिया बेवकूफ़ है, पर मैं बेवकूफ़ हूँ लिखने में ज़रा कष्ट होता है। (एक श्रोता से पूछते है) क्यों आयुष होता है ना?

श्रोता: जी सर।

वक्ता: ‘’मैं बेवकूफ हूँ,’’ ये लिखना कष्टप्रद भी है, और झूठ भी है। क्यूंकि आप वास्तव में जो हो, वो बेवकूफ़ है नहीं। आप तो परम, असीम, अनंत सत्ता हो, आप बेवकूफ नहीं हो। (एक श्रोता की तरफ इशारा करते हुए) आशुतोष बेवकूफ़ है। अरे! महाबेवकूफ़ है लिखिये आप थोड़ी हो आशुतोष आप क्यों अपने ऊपर उसके कर्मो का बोझ लेते हो? छोड़ो उसे।

श्रोता5: साक्षी भाव के लिये उपनिषदों में जो वर्णन किया है कि एक पेड़ पर दो पक्षी बैठे हुए है एक पक्षी जो है, वो हल्का सा स्वादन करता है, और दूसरा जो है, उसे केवल देखता रहता है। जो देखता रहता है, उसी को साक्षी भाव कहते है। मैं समझता हूँ कि ये व्याख्या भी सम्भवतः उतनी सही नहीं है क्यूंकि जो स्वादन करता है, और जो देखता रहता है उन दोनों पक्षियों के अंतर को जो साक्षी भाव से स्पष्ट किया गया है, वो शायद उचित नहीं है। उसकी कोई दूसरी व्याख्या भी हो सकती है।

वक्ता: उपनिषद सिर्फ़ इतना कहते हैं कि एक डाल पर दो पक्षी बैठे हैं। एक मज़े ले ले के रस ग्रहण कर रहा है फलों का, और दूसरा देख रहा है। इस पूरे श्लोक में साक्षी शब्द कही आता ही नहीं है।

श्रोता5: नहीं लेकिन उसके अंतर में है।

वक्ता: नहीं, उसका हमने ये अर्थ किया है कि ये जो पूरी चीज़ है ये साक्षित्व को दर्शाने के लिये है। वो साक्षित्व को दर्शाने के लिए नहीं है, वो वास्तव में अवलोकन को दर्शाने के लिये है। देखिये अभी थोड़ी देर पहले मैंने कहा था कि साक्षित्व और परमात्मा एक है। उपनिषद कहते हैं कि परमात्मा अमूर्तिय, अप्रतीन है, अचिन्त्य है। कहते है ना? अमूर्तिय, अप्रतीन है, अचिन्त्य है और साक्षित्व परमात्मा के समतुल्य है। तो साक्षित्व को लेकर, सीधे-सीधे, वो कोई छवि हमे देंगे नहीं। यदि देनी होती, तो उस श्लोक में ये स्पष्ट लिख दिया जाता कि ये बात साक्षित्व की हो रही है। श्लोक बहुत सीधा-साधा और बड़ा रहस्यपूर्ण है। श्लोक बस इतना कहता है कि एक डाल पर दो पक्षी बैठे हुए हैं, एक वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हुए है; मैं समझता हूँ शायद नीम के पेड़ का नाम लिया गया है उसमें और एक पक्षी है, जो फलों को खा रहा है और दूसरा बस शांत भाव से उसे देख रहा है।

ये जो पूरा चित्र हमारे सामने दिया है उपनिषदों ने, ये साक्षित्व के लिये नहीं है; ये अवलोकन के लिए है, ऑब्जरवेशन के लिए है। असल में साक्षित्व का कोई चित्र बन ही नहीं सकता, ठीक वैसे ही जैसे परमात्मा का कोई चित्र नहीं बन सकता। तभी कहा आपसे कि जब उपनिषद कहते हैं परमात्मा अमूर्तिय, अप्रतीन है, अचिन्त्य है, तो वो साक्षित्व का भी प्रतीक या चित्र बना के नहीं देंगे। तो उसको साक्षित्व का प्रतीक मानने की जगह अवलोकन का प्रतीक मानिए कि आप हो, जो लगातार कर्मो में उद्यत रहते हो, और आप ही के पास वो शक्ति है, जो अपने इन सारे कर्मों को देख सके। मन ही मन का अवलोकन करता है। शास्त्र कहते है: मन से ही मन को विचारो, मन से ही मन को आवलोकित करो। इसीलिये दोनों को पक्षी कहा गया है क्यूंकि दोनों एक ही तत्व है, पक्षी माने मन। मन का ही एक हिस्सा है, जो कर्मो में रत है, जो संसार में रत है और मन का ही एक हिस्सा है जो शांत भाव से मन को देख रहा है इसीलिये दोनों को पक्षी कहा गया है, अन्यथा दूसरे को कुछ और कहा जाता।

साक्षी का कोई रूप नहीं होता, तो साक्षी को पक्षी कैसे बना दिया जाए। वो मन का ही एक कोना है, जो बाकी पूरे मन को देख रहा है, और मन का उचित उपयोग भी यही है। हम मन का क्या इस्तेमाल करते है? पूरी दुनिया को देखने के लिये। और जो सुबुद्धि होती है, वो उसी मन का अपने देखने की उसी ताकत का इस्तेमाल कर लेती है अपनेआप को देखने के लिये। ये दोहरा रहा हूँ: ये मानसिक प्रक्रिया ही है, और ये साक्षित्व नहीं है पर ये मानसिक प्रक्रिया बहुत कीमती है क्यूंकि यही मानसिक प्रक्रिया अंततः साक्षित्व में परिमित हो जाएगी। साक्षित्व को तुम सीधे नहीं साध पाओगे, तुम मन हो और तुम्हें शुरुआत मन से ही करनी पड़ेगी। क्यूंकि तुम मन हो, इसीलिये तुम जब भी शुरुआत करोगे, किसी ना किसी मानसिक प्रक्रिया से ही करोगे। ध्यान को भी तुम सीधे नहीं पाओगे, तुम्हें तो शुरुआत विचार से करनी पड़ेगी और विचार सूक्ष्म हो करके ध्यान में भलिभूत हो जायेगा।

विचार निर्विचार की ओर बढ़ता जायेगा, बढ़ता जायेगा और अंततः निर्विचार में समा जायेगा पर तुम्हें शुरुआत कहाँ से करनी पड़ेगी?

श्रोता: विचार से।

वक्ता: तुम्हें तो विचार से ही करनी पड़ेगी क्यूंकि तुम तो विचार रूप ही हो। बात समझ में आ रही है? तो तुम अवलोकन से शुरुआत करो, ओब्सर्वे करो और ओब्सर्वे करते-करते, कुछ और पा जाओगे। क्या पा जाओगे, ये तुम नहीं जानते और जानने की ज़रूरत भी नहीं है। जैसे प्रेम को जानने की ज़रूरत नहीं है, जैसे सत्य को जानने की ज़रूरत नहीं है, ठीक उसी तरह से साक्षित्व को भी जानने की ज़रूरत नहीं है। अपने गंदे हाथ क्यों इन पर डालते हो? क्या ज़रुरत है जानने की? तुम्हारे लिए जानने का क्या अर्थ होता है?

श्रोता: सोचना।

वक्ता: सोचना, क्यों सोचना इनके बारे में? जो सोचने की वस्तु हो, उसके बारे में सोचो और जो सोचने की वस्तु नहीं है, उसके बारे में नहीं सोचो, बस यही आध्यात्म है पूरा। जिसके बारे में सोचा जा सकता है, उसके बारे में खूब सोचो पर कृपा करके उसके बारे में मत सोचने लग जाओ, जिसके बारे में सोचना व्यर्थ है। हम उलटे हैं, जिसके बारे में सोचना चाहिये वहाँ हम सोचने से डरते हैं, हम विचार भी तो नहीं करते ताकतवर, पूर्ण, गहरा विचार हम कहाँ करते है? डरते हैं। जहाँ सोचना चाहिये, वहाँ हम सोचते नहीं और जहाँ सोचना मूर्खता है, वहाँ हम खूब सोच का जाल फेंकते रहते हैं।

परमात्मा दिखता कैसा है? आदमी है कि औरत? मरने के बाद क्या होगा? तुम पिछले जन्म में भी मेरे साथ थे कि नहीं मुझे शक है कि पड़ोसन के साथ थे? बेहूदा, जो सोचने की ज़रुरत नहीं, उसमे क्यों व्यर्थ दिमाग लगा के गर्म होते हो? बिलकुल जैसे कोई गाड़ी न्यूट्रल में खड़ी हो, और एक्सेलरेटर लिये जा रहे हो, लिये जा रहे हो, लिये जा रहे हो और इंजन बैठ गया है। मिस्त्री को भी दिखाते हुए शर्म आ रही है कि कैसे बैठ गया है? (सब हँसते है) न्यूट्रल में इतनी रेस मारी कि बैठ गया। गयी कहीं नहीं, चली जरा भी नहीं इंजन सीज़ हो गया। ऐसी हमारी हालत है बैठे-बैठे हीट हो रहे है। गर्मा जाते हो कि नहीं बैठे-बैठे, हो कुछ नहीं रहा है, बिलकुल धुआं उठ गया है।

दो चिड़िया है, एक वो जो देख रही है दूसरी वो जिसे देखना है।


सत्र देखें : Acharya Prashant on Upanishad: साक्षित्व का वास्तविक अर्थ (The real meaning of Witnessing


आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

  • अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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2 टिप्पणियाँ

    • नमस्कार,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है |

      बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:
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      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।

      इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर:
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं।

      इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।

      सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com
      या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।

      सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर
      या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917
      _______________________________________________

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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