खेल के जारी रहने में मज़ा है और काम के खत्म हो जाने में

 

 

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)वक्ता: दो बातें हैं। पहली, योग है। दूसरी, अनंत समय है।

“युगन युगन हम योगी।” और ये दोनों ही बातें जब एक साथ कह दी जाती हैं, तो पूर्ण कह दिया जाता है। योग का अर्थ है: केंद्र। ‘अनंत समय’ का अर्थ है: उस केंद्र से फैला हुआ पूरा विस्तार। “युगन युगन हम योगी।”

‘हाँ! हम युगों-युगों से हैं पर भटक नहीं रहे हैं। हम योग युक्त हैं। समय में हैं, पर केंद्र हमारा कालातीत है। समय में हैं, इससे हमें कोई इनकार नहीं है। युगों से हैं, लगातार हैं। हमारे अलावा और कौन हो सकता है? जहाँ तक समय हैं, वहाँ तक हम हैं। पर मात्र समय नहीं हैं हम। हम उससे जुड़े हुए हैं, जहाँ से समय ही उद्भूत होता है।’ उसी जुड़े होने का नाम है योग। युगन युगन हम योगी।

‘आवे न जावे, मिटे न कबहूँ।’ न आना है, न जाना है। या तो ये मान लो कि हम लगातार उपस्थित ही हैं या ये मान लो कि हम कभी आए ही नहीं। लेकिन आरम्भ और अंत के कोई बिंदु नहीं है जिनके बीच में तुम हमें कह सको कि हम हैं। या जिनके इस पार या उस पार तुम कह सको कि हम नहीं है। ‘आवे न जावे, मिटे न कबहूँ।’ हमारे मिटने का कोई प्रश्न नहीं उठता क्योंकि हम कुछ वस्तु विशेष नहीं है। जब तक कुछ भी है, तब तक हम ही हैं। हम केंद्र से जुड़े हुए हैं, उसी का नाम योग है। तो केंद्र का पूरा जितना विस्तार है, वो भी हम ही हैं। हमारे मिटने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

‘आवे न जावे, मिटे न कबहूँ।’ जब तक कुछ भी है, हम ही हैं। हम कोई सीमित शरीर नहीं है, जो कुछ सालों में खत्म हों जाना है। जब तक कुछ भी है, हमारी हस्ती है। कुछ भी का होना, मेरा ही होना है।

‘आवे न जावे, मिटे न कबहूँ।’ हमारा जन्म नहीं होता। हमारी मृत्यु नहीं होती। हमारा होना है। हम शरीर होते, तो जन्म होता, मृत्यु होती। हम कोई विशेष वस्तु होते, तो आना होता और जाना होता। हम तो अस्तित्व मात्र हैं। ऐसा घुल गए हैं कि हमारी व्यक्तिगत सत्ता कुछ बची नहीं है। हमारा निजी कुछ है नहीं। कुछ ऐसा नहीं है, जिसको हम दावा कर सकें कि ये हम हैं, ये हमारा है। बिलकुल कुछ ऐसा नहीं है। और जब आप बिलकुल ये कहने की स्थिति में पहुँच जाते हो, कि कुछ नहीं है, कि हम हैं या हमारा है, तो फिर आप सब कुछ के साथ लय हो जाते हो क्योंकि आपको पहचाना ही नहीं जा सकता अब। आपको अलग करके देखा ही नहीं जा सकता अब।

‘आवे न जावे, मिटे न कबहूँ शब्द-अनाहत भोगी।’ ठीक वैसे जैसे युगन-युगन हम योगी, जहाँ केंद्र भी और केंद्र के विस्तार, उसको भी, दोनो को ही इंगित किया गया था, वैसे ही शब्द अनाहत भोगी। अनाहत भी है, और शब्द भी है। मौन भी है, और शब्द भी है। और उसको भोग भी रहे हैं हम। ध्यान दीजियेगा! दोनो हैं। एक साथ हैं। केंद्र भी है, परिधि भी है, शब्द भी है और मौन भी है, योग है और भोग भी है। “अवधूता! युगन-युगन हम योगी।” और यहाँ क्या कह रहे हैं? ‘शबद अनाहद भोगी।’ योग भी है और भोग भी है। योग का अर्थ हुआ जहाँ दो है ही नहीं। और भोग का अर्थ हुआ जहाँ पर कोई भोक्ता है और कुछ भोगने के लिए है। तो अद्वैत भी है और द्वैत भी है। और यही जीवन है। और वही अवधूत है, जिसने ऐसा जीना जान लिया।

सड़क पर भटकने से आप अवधूत नहीं हो गए। जंगल-शमशान में घूमने से आप अवधूत नहीं हो जायेंगे। पहाड़ की छोटी पर जो बैठा हो, वही अवधूत नहीं है। जिसने योग और भोग को एक साथ जान लिया, जिसने मौन को और शब्द को एक साथ जान लिया, वो अवधूत है। जिसने कालातीत को, और काल को एक साथ जान लिया, जिसने एक को और अनेक को एक साथ जान लिया, वो अवधूत है। वो एक साथ दोनो आयामों में जीता है। उसकी सत्ता कपड़ा-व्यापक विस्तार है। एक आयाम है, जहाँ वो कुछ नहीं है। शून्य है, मौन है। और दूसरा आयाम है, जहाँ पर वो पूरी तरह विस्तीर्ण है। वो सब कुछ है। और दोनो एक साथ हैं – सो ही अवधूत।

“सब ठौर जमात हमारी।” हमारे अलावा किसी और की जमात है ही नहीं। मुझको देखोगे जहाँ तक, मुझको पाओगे वहाँ तक। “सब ठौर जमात हमारी।” जो ही है, वो हम ही हैं। हमारी ही जमात घूम रही है। तो कुत्ता है कि बिल्ली है, हाथी, घोड़ा, रेत, पत्थर, घास, नदी, मैदान, हमारी ही जमात है।

“सब ही ठौर पट मेला।” उत्सव चल रहा है चारों ओर हमारा ही। हमारे होने का उत्सव है। शून्य लगातार, निरंतर पूर्ण को जन्म दे रहा है। और लगातार पूर्ण उसी में जा करके लय भी हो जा रहा है। और ये अद्भुत मेला चल रहा है। हमारा ही मेला चल रहा है। मौज के अलावा हमारा कुछ काम नहीं है। और किसके साथ मौज कर रहे हैं हम? अपने ही साथ। और करें क्या? अपने साथ और करें क्या? खेलते हैं।

“सब ही ठौर पट मेला।” सीमित नहीं है। कभी-कबार आने वाला नहीं है। तिथिबद्ध नहीं है। “सब ही ठौर पट मेला।” जिधर देख रहे हैं, उधर…।

“हम सब माय, सब हैं हम माय।” एक ही तत्व है, जो हमें दिखाई देता है। एक ही तत्व है-आत्मतत्व। ये आत्मतत्व जो है, मुझे सब जगह दिखाई दे रहा है। “हम सब माये, सब हैं हम माये।” विविधता हमको दिख कर के भी दिखती नहीं है। और हम विविधता से पूरा खेल पाते हैं क्योंकि विविधता में हमको तत्व एक ही दिखाई देता है। कौन सा तत्व? आत्मतत्व। हम ही हैं। कोई और नाम भी आप दे सकते हैं। परमतत्व बोल दीजिये। कुछ भी आप नाम दीजिये। पर तत्व है एक ही। अलग-अलग दिखना कब का बंद हो गया। नहीं! अवधूत ये नहीं कहेगा कि दिखना बंद हो गया। वो कहेगा बेशक दिखता है अलग-अलग। पर अलग-अलग दिख करके भी….

“हम हैं बहुरि अकेला” इससे सुन्दर और संक्षिप्त वचन, जो बिलकुल सत्य को खोल के रख दे कहा नहीं जा सकता। “हम हैं बहुरि अकेला।” ‘बहुरि’ भी हैं, बहुत सारे भी हैं, अकेले। जैसे कोई अवधूत खड़ा हो और घोषणा कर रहा हो, “मैं अनेक हूँ।” जैसे कि वो खड़ा हो करके कह रहा हो, “एक अनेक हैं।” अनेक एक हैं, वो नहीं कह सकता क्योंकि एक तो एक ही है। उसका कोई दूसरा नहीं है। बात समझ रहे हैं? एक तो एक ही है, पर वो एक अनेक रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है।

‘ट्रुथ इज़ मेनी बट देयर आर नॉट मेनी ट्रुथ्स’

‘ट्रुथ इज़ मैनी’ – वो एक तत्व अपनेआप को अनंत रूपों में अभिव्यक्त करता है। पर इसका ये अर्थ नहीं है कि सत्य अनेक हो सकते हैं। हम हैं बहुरि अकेला। बहुरि हैं पर फिर भी अकेला। वन, वेहदत, कैवल्य, अद्वैत, एक।

“हम हैं बहुरि अकेला। अवधूता! युगन-युगन हम योगी।” तो अवधूत का मन्त्र ही यही है।

बहुरि भी, अकेला भी। वही अवधूत है। योग और भोग एक साथ। शब्द और मौन एक साथ। बहुरि और अकेला एक साथ – सो ही अवधूत है।

“हम ही सिद्धि, समाधि हम ही। हम मौन ही, हम बोलें।”

“हम ही सिद्धि, समाधि हम ही।” जो कुछ भी तुम ऊंचे से ऊँचा सोच सकते हो, वो हम ही हैं। चाहे इस जगत का, और चाहे पारमार्थिक रूप से। इस जगत की जो ऊंची से ऊंची उड़ान होती है, वो कहलाती है सिद्धि। लौकिक, भौतिक रूप से जो ऊंचे से ऊंचा पाया जा सकता है, वो कहलाती है सिद्धि। सिद्धि का अर्थ होता है कि अब आप पदार्थ के साथ खिलवाड़ कर सकते हो। आप पदार्थ के मालिक हो गए। आप शरीर के मालिक हो गए। भूतों के मालिक हो गए। और आत्यंतिक     रूप से जहाँ ऊंचे से ऊंचा पहुंचा जा सकता है, वो कहलाती है समाधि। समाधि का अर्थ हुआ कि अब आप सिद्धि से भी आगे निकल गए। सिद्धि की ज़रूरत किसको है। सिद्धि अब आपके लिए बच्चों का खेल हो गई। आपको पदार्थ से ही कोई प्रयोजन नहीं रहा, आप सिद्धि ले करके क्या करोगे?

“हम ही सिद्धि, समाधि हम ही।” इस जगत की चोटी भी हम ही हैं, और उस जगत का शिखर भी हम ही हैं। दोनो ओर जो हो सकता है, वो हम ही हैं।

श्रोता: समान-अधिकार, ‘समाधि’?

वक्ता: नहीं! समाधि-समाधान।

“हम मौन ही, हम बोलें।” शब्द भी हम ही, मौन भी हम ही। जब शब्द भी हमारा आता है, तो कहाँ से आता है?

श्रोतागण: मौन से आता है। तो ऐसा होता है अवधूत। जो बोलता भी है, तो उसमें मौन का गुंजन रहता है। आप सुनेंगे उसको, तो यूँ लगेगा कि जैसे आवाज़ पता नहीं किस मौन की गहराई से आ रही हो। जैसे गहरे कुँए होते हैं। कभी उनमें से आती हुई आवाज़ सुनी है? ऐसी होती है अवधूत की आवाज़।

“हम मौन ही, हम बोलें। “अपना रूप, स्वरूप, अ-रूप दिखा के,” — कबीर बिलकुल खेलने के मन में हैं। रूप, स्वरूप, अरूप दिखा के, रूप, स्वरूप माने अपना। रूप, स्वरूप अरूप दिखा के। ‘स्वरूप’ है जो अरूप है। हमारा रूप कैसा? अरूप। तभी तो हम अवधूत हैं। हमारा रूप है स्वरूप, जो कि अ-रूप है। हमारा कोई रूप हो ही नहीं सकता। स्वरूप भी रखते हैं, तो ऐसा कि वो अ-रूप है।

रूप का अर्थ होता है कि एक ख़ास आकार में कैद हो जाना। रूप का अर्थ होता है कि एक ख़ास नक़्शे से जुड़ जाना। रूप का अर्थ होता है कि इन्द्रियों से जो आ रहा है, उसी को आखिरी मान लेना। नहीं! ‘हमें इन्द्रियों से कोई दुश्मनी नहीं है क्योंकि हमें अच्छे से पता है कि इन्द्रियाँ भी कहाँ से आ रही हैं? उसी आत्म तत्व से आ रही हैं। हमें इन्द्रियों से कोई दुश्मनी नहीं है। हमें स्वरूप की मौज लेते हैं। हम तो अवधूत हैं। हर ‘ठौर’ मेला है हमारा। तो जहाँ इन्द्रियों का उत्सव चल रहा है, हमारा मेला वहाँ भी है। हमें कोई दिक्कत नहीं है। हमारे योग में भोग की कोई वर्जना नहीं है। हम योगी, हम भोगी। लेकिन हम ये भूलते नहीं है कि स्वरूप के पीछे, स्वरूप के साथ-साथ, स्वरूप के तत्व रूप में अ-रूप विद्यमान है।’

“रूप, स्वरूप, अरूप दिखा के, हम ही हममें हम तो खेलें।” तो कबीर अभी खूब खेल रहे हैं। बड़ी मौज में हैं, कबीर हैं! “रूप, स्वरूप, अरूप दिखा के, हम ही हममें हम तो खेलें।” अभी थोड़ी देर पहले हुआ था न? खूब खेलते हैं। किसके साथ? अपने साथ। हम ही हममें, हम तो खेलें।” कबीर एक कदम और आगे निकल गए हैं। अपने साथ तो खेल ही रहे हैं, जिस मैदान में खेल रहे हैं, वो भी हम ही हैं। ‘हमारा’ नहीं! हम ही हैं। जिस आकाश में ये पूरी क्रीड़ा चल रही है, वो आकाश भी हम ही हैं।

“रूप, स्वरूप, अरूप दिखा के, हम ही हममें हम तो खेले।

कहें कबीर सुनो भई साधो, न ही कोई इच्छा,

अपनी मढ़ी मैं आप में डोलूं। खेलूं सहज स्वेछा।

अवधूता! युगन-युगन मैं योगी।”

खेल है; आकांशा नहीं है। खेल है; काम नहीं है। खेल में और काम में अंतर ये होता है कि खेल अनवरत जारी रह सकता है, और काम करा ही इसीलिए जाता है कि खत्म हो जाए।

खेल के जारी रहने में मजा है और काम के ख़त्म हो जाने में।

मैं क्रिकेट और फुटबॉल की बात नहीं कर रहा हूँ कि जहाँ पर आप कोशिश करते हो कि आप खेल ख़त्म कर दें जल्दी क्योंकि यें खेल नहीं है; ये तो हिंसात्मक प्रतियोगिताएं हैं। हम जिनको खेल कहते हैं, ये खेल हैं ही नहीं क्योंकि इनमें प्रतियोगिताएं रहती हैं। इनमें जीतने की भावना रहती है।

खेल वो होता है, जो दो बच्चे खेलते हैं आपस में। वहाँ ये कोशिश नहीं की जाती कि जल्दी से जल्दी जीत लूँ और खेल ख़त्म हो जाए। वहाँ तो प्रेम में खेला जाता है और कहा जाता है कि ऐसा खेलो कि खेलते ही रहो। ये नहीं कहा जाता कि, “अरे वाह! पंद्रह अंक बनाने थे जीतने के लिए। मैंने पहले बना लिए। खेल ख़त्म।” न! तो बड़े जो खेल खेलते हैं, और बच्चे जो खेल खेलते हैं, उसमें ज़मीन-आसमान का अंतर है। बड़े जो खेल खेलते भी हैं, वो खेल नहीं है। वो खेल भी हमारे प्रतियोगी मन से निकला है। वो हिंसा है एक प्रकार की। वो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का उपाय है।

“तुमसे ज़्यादा तेज़ दौड़ सकता हूँ,..तुमसे ज़्यादा.. ।” वहाँ पर एक दूसरे को उठाया नहीं जाता। वहाँ पर लगातार किसी से जीतने की कोशिश की जाती है। तो वो खेल तो बंद होकर रहेगा। और उस खेल में थकान आनी लाज़मी है। और उस खेल में बड़े नियम कायदे होंगे। अवधूत के खेल में कोई नियम कायदे नहीं है। वहाँ प्रेम है। वहाँ तो योग और भोग का खेल चल रहा है। वहाँ तो पुरुष और प्रकृति एक साथ खेल रहे हैं। कौन जीतेगा, कौन हारेगा?

“हम ही, हमसे हममें खेलें।”

न ही कोई इच्छा, खेलूं सहज स्वेछा।”

इच्छा खातिर कुछ नहीं कर रहा हूँ। किसकी इच्छा करूँगा? ‘’जब चारों दिशा से मैं ही व्यापा हुआ हूँ, तो है कौन जिसकी इच्छा करूँ? कुछ और हो, तो न उसे पाने का उद्यम हो? किसको पाऊं? तो करूँ क्या? करने को है क्या?’’

खेलो! जाओ, खेलो! कुछ है ही नहीं और करने को।

“सर, जीवन का उद्देश्य क्या है?” जाओ! खेलो!


सत्र देखें : आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर:खेल के जारी रहने में मज़ा है और काम के खत्म हो जाने में (Kabir song)


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सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

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सम्पादकीय टिप्पणी :

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फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

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