आपके बच्चे आपकी सुनते क्यों नहीं?

 

 

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)प्रश्न:  पेरेंटिंग को निपुणता से कैसे किया जाए ? कभी-कभी हम चाहते भी हैं, करना, पर हम कर नहीं पाते, क्योंकि बाहर की स्थितियां ऐसी होती हैं।

वक्ता: जो आपने बाहरी स्थितियों के बारे में कहा, वो बिलकुल ठीक है। लेकिन निष्कर्ष दूसरा भी हो सकता है। आप यूँ ही किसी बाज़ार के बीच में से निकल रहे होते हैं, वहाँ चकाचौंध होती है, वहाँ चारों तरफ रोशनी है, बहुत सारी बत्तियां जगमगा रही हैं, तो किसी विशेष व्यक्ति पर ध्यान जाता है क्या? किसी रोशनी  पर ध्यान जाता है?

क्यों नहीं जाता? क्योंकि हर तरफ रोशनी ही रोशनी है। जहाँ इतनी रोशनियाँ हैं, वहाँ पर कोई एक रोशनी विशेष कैसे हो सकती है? कोई एक बल्ब, दिया, ख़ास कैसे हो सकता है?

अब ज़रा एक दूसरा दृश्य देखिये, कभी आप पहाड़ों में गए होंगे, और रात में पहाड़ी मार्ग से यात्रा कर रहे होंगे, तो दिखाई पड़ता है क्या, कि सामने पहाड़ पसरा हुआ है, और उस पर सिर्फ दूर-दूर दो प्रकाश स्रोत दिखाई दे रहे हैं। ऐसा कभी हुआ है? घुप्प अँधेरा है, मान लीजिये चांदनी रात नहीं है, और कोई दो रोशनियाँ दिखाई पड़ रही हैं। पूरा विस्तृत पहाड़ है, कालिमा और कोई दो जगह पर प्रकाश दिखाई पड़ रहा है।

तब उन दोनों रोशनियों पर नज़र जाती है कि नहीं जाती? आप की आँख कहाँ जा कर ठहरती है? फैली हुई कालिमा पर, या उन टिमटिमाते बिंदुओं पर?

श्रोता: जहाँ रोशनी है।

वक्ता: अब वही रोशनी तो बाज़ार में थी, तब वो महत्वपूर्ण क्यों नहीं लगी? मतलब अँधेरा जितना घना होता है, रोशनी की क़ीमत उतनी ही ज़्यादा हो जाती है।

तो बच्चों और परिवार में भी यही होना होता है। बच्चा भले ही ये देख रहा हो कि बाहर अँधेरा घना है पर अगर उसे भीतर उजाला दिखाई देगा, एक भी प्रकाशबिन्दु दिखाई देगा; तो अब वह उस प्रकाशबिन्दु की और इज़्ज़त करेगा, इसलिए क्योंकि बाहर अँधेरा घना है।

जैसे आप जब पहाड़ को देखते हो, तो उस छोटी सी, टिमटिमाती हुई रोशनी की इज़्ज़त इसलिए करते हो, क्योंकि वो अँधेरे के बीचोंबीच है। कि इतने अँधेरे के होते हुए भी, एक रोशनी है, क्या बात है। वैसे ही जब आपका बच्चा ये देखेगा कि बाहर कितना अँधेरा है, लेकिन आप में फिर भी रोशनी है, तब वो आपकी और ज़्यादा इज़्ज़त करेगा। तो बाहर के अँधेरे को, आप प्रतिकूल परिस्थिति ना माने। बाहर का अँधेरा आपकी रोशनी को, और ज़्यादा प्रखर कर के दिखा देगा। आप समझ रहे हैं?

कोई दिन भर झूठ में जीता हो और उसे मिल जाये कोई सच बोलने वाला, तो उस सच बोलने वाले की क़ीमत और ज़्यादा हो जाएगी कि नहीं? और वो जो एक व्यक्ति जो सच में है, वो दिन भर के झूठ पर भारी पड़ेगा या नहीं?

श्रोता: कभी-कभी ये उल्टा पड़ जाता है। अब जैसे, मैं अगर अपनी बेटी को बोलूँ – कि बेटा, आप ये काम गलत कर रहे हो, तो मैं माँ हूँ , मैं सच बोलूंगी। बाकी लोग बोल सकते हैं, नहीं बेटा बिलकुल सही कर रही हो। तो वो मेरा सच बाकी के लोगों के कहने पर भारी हो जायेगा क्या? मेरी बेटी बोल रही है, कि और किसी को तो नहीं है दिक्कत, आपको ही है बस। तो यहाँ ये सच बिलकुल नीचे हो गया ।

वक्ता: रोशनी की परिभाषा ये है – कि जो आपको देखने में मदद करे, जिसके होने के कारण आप देख पाओ ।

वो रोशनी किसी काम की नहीं, जो दावा तो करे होने का, पर जिससे किसी को देखने में मदद ना मिलती हो। आप अपनेआप को रोशनी कहने के हक़दार सिर्फ तब हैं, जब आपके कारण, जो आपके सम्पर्क में आये, उसकी दृष्टि खुल जाए। इस ट्यूब लाइट की क़ीमत तभी है ना, जब ये जले तो मुझे दिखाई दे। आप अगर अपने बच्चों के पास हैं लेकिन आपकी उपस्थिति की वजह से आपके बच्चे देखने में मदद नहीं पा रहे, तो आप अभी प्रकाशवान नहीं हैं। आप अभी स्वयं ही प्रकाश नहीं हैं, तो आप अँधेरे से कैसे लड़ेंगे? तो ये मत कहिये कि कई बार रोशनी अँधेरे से हार जाती है। ये कहिये कि अभी हमारी ही रोशनी प्रज्ज्वलित नहीं हुई है।

श्रोता: तो फिर उस रोशनी को कैसे प्रज्ज्वलित करें?

वक्ता: हाँ, तो वो अगला सवाल है। लेकिन उसके लिए पहले ये समझना पड़ेगा कि रोशनी का महत्व कितना है?

देखिये अँधेरा जीतता ही तब है, जब आप पहले रोशनी का तिरस्कार करते हो। रोशनी तो स्वभाव है, वो अपनेआप आ जाएगी। लेकिन उसके लिए पहले उसका महत्व समझना होगा और सम्मान करना होगा। हमें गौर से देखना होगा कि घना अँधेरा कितना भी बड़ा हो, और कितना भी हावी होता दिखे, बलशाली दिखे, लेकिन ज़रा सी रोशनी उस पर भारी पड़ती है। है कि नहीं? अब यहाँ पर भी आप देखिये, तो हर जगह तो प्रकाश स्रोत नहीं है ना? और अब इन दोनों लाइट्स को भी बंद कर दें, बस एक ही जल रही हो – तो अब इस कमरे का आकार देखिये, और उस बत्ती का आकार देखिये। लेकिन वो भारी पड़ता है अँधेरे पर। यही सच की ताकत होती है कि वो छोटा सा होकर भी जीत जाता है। इसलिए कहते हैं, सत्यमेव जयते कि वो छोटा होगा तब भी जीतेगा, अँधेरा बड़ा होगा तो भी हारेगा। पहले वो इज़्ज़त हमारे दिल में आये ना, सच्चाई के लिए। जब वो इज़्ज़त हमारे दिल में आयेगी सच्चाई के लिए, तो हम रोशनी बनते हैं, फिर हमारे बच्चे भी हमारे माध्यम से देख पाते हैं। उनकी दृष्टि खुलती है।

पहले हमारे जीवन में वो इज़्ज़त उतरे, और वो इज़्ज़त जो है, सिर्फ शाब्दिक या क़िताबी नहीं हो सकती।

हम कह तो सकते हैं, होंठों से, कि मुझ में भी प्यार है सफाई के लिए, निर्मलता के लिए, सच्चाई के लिए, ईमानदारी के लिए पर क्या हमारा जीवन ऐसा है? क्योंकि बच्चा, बच्चा तो होता ही है, वो एक छोटा वयस्क भी होता है। तो उसे आप मानिये, कि है वो पूर्ण वयस्क, जो अभी छोटा है। बहुत कुछ समझता है, उसकी भी दृष्टि है। वो भी आपके शब्दों से ज़्यादा आपके कर्मों से, आपके जीवन से सीखता है ।

रो- श- नी, को रोशनी नहीं कहते, दि- या, दिया नहीं है।

दिया मात्र तब दिया है, जब उसकी उपस्थिति में दूसरा सजग हो जाये। रोशनी मात्र तब रोशनी है, जब उसकी उपस्थिति में दूसरा जान पाए, बोध पाए।

रोशनी सिर्फ तब रोशनी है, जब उसके होने से कोई ठोकर खाने से बच जाए। अगर रोशनी मौजूद है, फिर भी लोग ठोकर खा-खा कर गिर रहे हैं, तो वो रोशनी है ही नहीं। तो वो रोशनी अपने रोशनी होने का दावा ना करे, फिर तो ज़रा अंतर्गमन करना होगा । अपने भीतर जा कर के देखना होगा, कि क्या हमारा जीवन ऐसा है जो दूसरे को भी प्रकाशित कर सके? और याद रखियेगा, जो आपके पास होता है, वो स्वत: ही दूसरों तक पहुँच जाता है ।

अगर यहाँ कोई जुखाम के विषाणु ले कर बैठा होगा, तो पक्का है कि कल तीन चार और लोग भी छींक रहे होंगे। भले ही वो चाहे य न चाहे, दूसरों को प्रभावित करना। लेकिन,

जैसे सत्य का स्वभाव है फैलना, वैसे माया का स्वभाव भी फैलना है। वो भी फैलती है, और खूब फैलती है।

आपको कोशिश नहीं करनी पड़ती, आप बस प्रचारक बन जाते हो, उसके, जो आप हो। आप सही हो जाओ, आप से सही चीज़ें फैलेंगी। आप अँधेरे हो, आपसे अँधेरा फैलेगा। आप बीमार हो, आपसे बीमारी फैलेगी। आप स्वस्थ हो, आपसे स्वास्थ्य फैलेगा। आप के बच्चों को ठीक वही मिलेगा, जो आप हो। तो बच्चों तक पहुंचाने की जिन्हें फ़िक्र हो, जो चाहते हों कि उनके बच्चे खिल के निखर के, उनके सामने आएं, उन्हें सबसे पहले अपना वर्धन, अपना उपचार करने की ज़रूरत है। एक बार आप स्वस्थ हो गए तो, फिर आपको ज़्यादा श्रम करना ही नहीं है। आप जैसे हो, आपके बच्चों तक वही चीज़ स्वयं ही पहुँच जाएगी।

बुद्ध होते थे, तो उनका जो बुद्ध क्षेत्र होता था, कहते थे उसमें शान्ति अपनेआप फैल जाती थी। उनको कुछ करना नहीं होता था, उनके होने भर से, दूर-दूर तक शान्ति फैल जाती थी। आप भी अगर प्रकाशित हो, तो आपको कुछ करना नहीं पड़ेगा। दीया कुछ करता है क्या? दीया तो बस दीया होता है। उसके होने भर से, आस-पास के लोग दृष्टि पा जाते हैं। आप भी वैसे हो जाओ, आपको भीतर मुड़ना पड़ेगा।

होता क्या है, कि हम जिनका भला चाहते हैं, हम उन्हीं की और देखना शुरू कर देते हैं। ये ऐसी सी बात है, कि कोई ड्राइवर गाड़ी चला रहा हो, और सवारियों की और देखना शुरू कर दे कि, ‘‘कितनी प्यारी सवारियां हैं, और मुझे उनका ख्याल रखना है, मुझे इन्हें मंज़िल तक पहुंचाना है। मुझे बड़ा प्रेम है इनसे।‘’ क्या होगा ऐसी गाड़ी का, जिसमें ड्राइवर गलत दृष्टि में देख रहा हो? आप बाइक चला रहे हैं, और जो आपके पीछे बैठा है, उसकी रक्षा करना चाहते हैं, और रक्षा के खातिर आप उसी को पकड़े हुए हैं। अब क्या होगा?

जो अपनेआप को नहीं बचा सकता, वो दूसरों को क्या बचाएगा? बात समझ रहे हैं?

जो अभिभावक बच्चों की भलाई चाहते होंजो सब ही चाहते हैं — उन्हें सबसे पहले अपने ऊपर ध्यान देना होगा लेकिन अभिभावकोंका तर्क क्या होता है? हम बच्चों की भलाई में, इतने उद्यत और इतने व्यस्त रहते हैं, कि हमें अपने ऊपर ध्यान देने का वक़्त ही नहीं मिलता।

 सत्र होते हैं हमारे, शिविर होते हैं, और तमाम माध्यम हैं जिनसे हम लोगों से मिलते हैं। उनमें अक्सर अभिभावक ना आने का यही कारण बताते हैं, कहते हैं, ‘’बच्चा बड़ा करना है ना, इसलिए हम नहीं आ पाते।‘’ मैं हँस कर उनसे पूछता हूँ, कि तुम अगर यहाँ नहीं आ रहे हो, तो बच्चे की भलाई कर कैसे लोगे? पर देखिये, माया कैसे-कैसे बहाने देती है? ‘’हमें बच्चे की भलाई करनी है, इसी में तो हम व्यस्त हैं। इसी कारण तो आचार्य जी, हम आपके पास आ नहीं पाते।‘’ अच्छा!  और देखा यही गया है, जो ज़रा बच्चों को छोड़ कर आ जाते हैं, उनके बच्चे फूल जैसे खिलते हैं। और जो बच्चों की भलाई को ही कारण बता कर के, नहीं आते, अपने पर ध्यान नहीं देते, अपनी सफाई पर ऊर्जा और समय नहीं लगाते, उनके बच्चे भी अध खिले ही रह जाते हैं।

माँ होना, बाप होना, करीब-करीब परमात्मा होने जैसा है। वो पूरी दुनिया चलाता है, सबका बाप है, आप भी, सबके नहीं पर बाप तो हो। तो कुछ तो परमात्मा का अंश आप में होना ही चाहिए। कुछ तो आपके मन में, आचरण में, परमतत्व की झलक होनी चाहिए। तभी आपका बच्चा एक स्वस्थ नौजवान या, नवयुवती बन कर के निकलेगा।

दूसरा जन्म होता है, माँ-बाप बनना। इसी अर्थ में नहीं कि जन्म की प्रक्रिया जटिल होती है, इस अर्थ में, कि जब आप बच्चे को बड़ा कर रहे होते हो ना, तो साथ-साथ अपने को भी बड़ा करना होता है क्योंकि अगर आप बड़े नहीं हुए, ‘बड़े’ मतलब बड़प्पन, वयस्कता, मैच्योरिटी। अगर आप बड़े नहीं हुए, तो बच्चा बड़ा कैसे होगा? अगर माँ की या बाप की मानसिक उम्र दस या बारह साल की है, जो कि अकसर होती है; तो बच्चा कहाँ से बीस साल का हो जायेगा। हमने ऐसा बच्चा आज तक देखा नहीं, जो माँ बाप से ज़्यादा उम्र का हो  लेकिन, कोशिश और अरमान हमारे यही होते हैं, कि हम तो बारह साल के हैं, बेटा बीस साल का हो जाए। ये असम्भव है। आपको अपने बच्चे से कम से कम पांच दस साल आगे-आगे चलना होगा। जैसे-जैसे वो बड़ा हो, आपको भी क्रमशः बड़े होते रहना होगा। जैसे उसकी प्रगति उत्तरोत्तर है, वैसे ही आपकी प्रगति को भी उत्तरोत्तर होना होगा। ऊपर बढ़ना कभी रुके नहीं। इस दम्भ में मत रह जाईएगा कि, ‘’हम तो माँ बाप हैं, हमें थोड़े ही आगे बढ़ना है। विकास तो बच्चों का होना है।‘’ नहीं!  आपका होना है।

सुविकसित माँ बाप, तो, सुविकसित बच्चे। और अर्धविकसित माँ बाप, तो? फिर बच्चे को दोष दें, समाज को दोष दें, और शिक्षा को दोष दें। उन्हें भी दे दीजियेगा, लेकिन सर्वप्रथम? अपने को दीजिये।

मैं इतने लोगों से मिलता हूँ, मैंने आज तक नहीं देखा, ऐसा घर जहाँ माँ बाप, स्वस्थ हों, सहज हों, और बच्चा उद्द्ण्ड हो और अर्धविक्षिप्त हो। नहीं देखा। मैंने तो सदा यही देखा है कि जब भी कभी बच्चे में समस्या रही है, उसका प्रथम कारण घर का माहौल है। जब भी कभी किसी बच्चे की समस्या को हल करना होता है, मैं बच्चे को तो बिलकुल हटा देता हूँ। मैं घर पर जाता हूँ, मैं घर की बात करता हूँ। घर बताओ, कैसा चल रहा है? घर यदि ठीक चल रहा होता, तो ये तो घर से ही पैदा हुआ है, घर का ही फूल है। घर की मिट्टी यदि ठीक होती, तो फूल कैसे खराब हो जाता?

घर अच्छा रखिये। घर में परमात्मा का नाम हो, घर में ईमानदारी की बात हो, घर में जैसा आपका आचरण हो, व्यवहार हो उसमें प्रेम हो। घर में हिंसा ना हो, घर में कटुता न हो। घर में तमाम तरीके के दुष्प्रभावों को आमंत्रण न हो। ये जो टीवी है ना, ये टीवी नहीं है, ये एक पाइपलाइन है जिससे दुनिया भर का मल बह-बह के आता है। इसको एक नाला जानिएगा, ये एक वैश्विक नाला है।

इट्स गलोबल ड्रेनेज पाइप दैट एम्प्टीस इटसेल्फ इन टू ईच हाउस

श्रोता: सबको मालूम है, लेकिन छोड़ता कोई नहीं है।

वक्ता: बच्चे नहीं छोड़ते या?

श्रोता: अभिभावक नहीं छोड़ते। पता सबको है, पर छोड़ता कोई नहीं।

वक्ता: जब सबकुछ पता हो, और स्वयं से ना होता हो, तो जानते-बूझते अपनेआप को किसी ऐसे के हाथों सौंप दो, जो ‘पता है’ के आप को अनुशासन में रखेगा। आप में से कुछ लोग जिम वगैरह जाते होंगे। आप अच्छे से जानते हैं कि क्या करना होता है, किन-किन नियमों पर करना होता है। लेकिन फिर भी ट्रेनर की ज़रुरत होती है क्योंकि ट्रेनर हाथ पकड़ कर करा देता है। वो आपके बहानो को झुठला देता है। ज़रुरत पड़े, तो वो आपको डांट भी देता है। वो आपसे कहता है, बहाना मत बनाओ, चलो दौड़ लगाओ। दौड़ लगानी चाहिए, ये आपको भी पता है, पर आप स्वयं करेंगे नहीं, आलस और वृत्तियाँ हावी हो जाती हैं। तो इसलिए आपको कोई चाहिए जो आपको अनुशासन में रखे।

वैसी व्यवस्था अगर आप खुद आयोजित कर लें, तो बहुत अच्छा। आत्म अनुशासन से अच्छा तो कुछ होता ही नहीं और अगर खुद आयोजित ना कर पाएं? तो किसी और से आग्रह करें कि वो आपकी मदद कर दे, पर करें ज़रूर। क्योंकि उसको करे बिना जीवन में कोई रस नहीं है, खुशबू नहीं है। ऐसा समझ लीजिये कि बच्चे का आना माने दूसरी पारी का शुरू होना और दूसरी पारी का शुरू होना माने? अब वो गलतियां मत दोहराना, जो पहली पारी में करी थी। तुम भी कभी बड़े हो रहे थे, और जब तुम बड़े हो रहे थे, उन वर्षों में कुछ चूक, कुछ कमी रह ही जाती है। अब तुम उसको पूरा करो, अपनेआप में। बच्चे के साथ-साथ। बच्चे के मित्र की तरह बड़े होते रहो। माँ बाप हैं, और बच्चा पैदा होता है, तो समझ लीजिये कि घर में एक नहीं, तीन नए बच्चे आये हैं। तीनों को अब बड़ा होना है, एक साथ। तीन माने, कौन कौन? माँ, बाप, और बच्चा।

और ये बड़े नहीं हुए, तो बड़ी दिक्कत हो जाएगी।

हमें ये कहना बड़ा अच्छा लगता है ना, माँ-बाप भगवान समान होते हैं? तो फिर भगवान समान उनका? जीवन भी तो होना चाहिए। बच्चे को भी बड़ी हैरानी होती है, कि ये कहते हैं कि माँ-बाप भगवान समान होते हैं !! क्या ऐसे होते हैं भगवान?

हम देवासुर संग्राम तो सुनते थे, देव-देवी संग्राम कभी सुना नहीं। तो फिर, मेरे ये दो भगवान आपस में क्यों भिड़ते हैं? घर में तो लगातार श्री भगवान और श्रीमती भगवान का धर्मयुद्ध छिड़ा रहता है, तो फिर कैसे होगा?

श्रोता: सर इंसान ही है, लड़ेंगे तो सही। भगवान तो नहीं हैं हम।

वक्ता: हाँ, बढ़िया है। हाँ,

तो जो इंसान होता है, उसका फिर धर्म होता है, भगवान के सामने सर झुकाना।

ताकि भगवत्ता की कुछ बूंदें उस पर भी पड़ें, ताकि शांत हो सके, सहज जी सके। दुःख से ज़रा आज़ादी मिल सके। है ना? तो वो जो विनम्रता होती है सर झुकाने की, वो एक बार आ गयी माँ-बाप में, तो माँ- बाप भी आनंद पाते हैं और बच्चा भी। वो विनम्रता रखियेगा। जहां से सीखने को मिले सीखेंगे, और कभी भी, ये दावा, ये गर्व, ये दम्भ नहीं रखेंगे कि हमें तो सब पता है, हम अच्छे हैं, और दुनिया ही खराब है, मेरे बच्चे को भ्रष्ट किये जा रही है।

 विनम्रता का अर्थ होता है: सर्वप्रथम अपनी ओर देखना।

“अपने माही टटोल” – दोनों, माया भी, ब्रह्म भी। सब भीतर ही है।

आज यहाँ हम बैठे हैं, मैं बच्चे तो एक दो ही देख रहा हूँ, बाकी तो सब वयस्क हैं। लेकिन आप जान लीजिये, कि आज आप लौट के जायेंगे, तो आप बच्चों के लिए बड़ी भेंट ले कर जा रहे हैं।

शांत अभिभावक से बड़ी भेंट बच्चों के लिए कोई हो ही नहीं सकती।

आप बच्चे को ले जा कर के लाखों के तोहफे दे दें, वो तोहफा कम क़ीमत का है। ज़्यादा बड़ी क़ीमत का जानते हैं क्या तोहफा है? आप स्वयं शांत हो कर के, सुंदर हो कर के, सहज हो कर के अपने बच्चों के सामने जाएँ। इससे बढ़िया तोहफा क्या हो सकता है? तो आज आप अपने बच्चों के लिए बड़ी अमूल्य भेंट ले कर के जा रहे हैं।

ये आपका आशीर्वाद है उन पर, कि देखो हम तुम्हारे लिए उपहार लाये हैं। वो कहेंगे क्या? आप कहेंगे, ‘ मैं।‘ चाहें तो एक रिबन भी बाँध सकते हैं। इसीलिए जो हम टीनएजर्स के लिए और बच्चों के लिए जो शिविर आयोजित करते हैं, उसमें, ये सुविधा रखी है कि अभिभावक भी आएं बच्चों के साथ। जो अभिभावक बच्चों को अकेले भेज रहे हैं, और जो साथ आना चाहें, उनका पूर्ण स्वागत है क्योंकि बच्चा और सीखता है क्योंकि उसके साथ उसकी माँ सीखती है।

ये गुरुकुल का एक नया प्रयोग है। पुराने आश्रमों में, गुरुकुलों में तो बालक को रख लिया जाता था, कि बच्चा अब हमारी ज़िम्मेदारी। हमारे पास जब कोई आता है, बालक को ले कर के तो हम बालक को तो पकड़ते ही हैं, माँ-बाप को भी पकड़ लेते हैं। हम कहते हैं, तुम भी बैठो। तीनों बच्चे हो, हम बड़ा माने किसको? बच्चे का भला चाहते हो, तो तीनों दाखिला लो। और प्रयोग के नतीजे बड़े अच्छे हैं; होने ही हैं।

आप सब लोग, एक कड़ी में जुड़े हुए हो, सबने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ है। उबरोगे तो सब एक साथ, और डूबोगे तो सब एक साथ। पत्नियाँ आती हैं अकेले अकेले, उन्हें असुविधा हो जाती है। उनकी प्रक्रिया एक सीमा पर जाकर रुकने लग जाती है। उससे आगे तभी जाती हैं, जब वो पति को घसीट के लाती हैं, कि तुम भी चलो। पति आते हैं अकेले, तो एक सीमा के बाद उन्हें भी पत्नियों को साथ लाना ही पड़ता हैं क्योंकि आप जुड़े हुए हो। आपने अब रिश्ता तो जोड़ ही लिया है, हाथ तो पकड़ ही लिया है। अब जब पकड़ लिया है तो, बढ़ो तो साथ-साथ आगे बढ़ो, और रुको तो फिर साथ-साथ रुके रहो। ऐसे ही बच्चों का है, हाथ तो पकड़ा ही हुआ है ना? सब एक साथ बढ़ेंगे।

हम सब जानते हैं, होशियार हैं।

हम सबको पता है कि अशांति पैदा करने वाले तत्व कौन से होते हैं जीवन में। जानते हैं ना? संकल्प पक्का कर लीजिये और उनसे दूर हो जाइए। चाहे जो क़ीमत देनी पड़े और हम सब ये भी जानते हैं कि शान्ति लाने वाले तत्व कौन से होते हैं? वहाँ भी संकल्प कर लीजिये कि जो भी क़ीमत अदा करनी पड़े, इनको घर ले के आएंगे। बस इतना सा खेल है।

और संकल्प तोड़ने वाले मत बनिएगा। हमारा चित्त, इतना कमज़ोर होता है ना, कि संकल्प लेता है और कुछ दिनों में तोड़ भी देता है। नहीं। संकल्प उठाइए, छोटा उठाइए, तो उसके साथ चलिए। बड़े-बड़े संकल्प करिये ही मत। कोई लाभ नहीं है स्वयं से ही वादा कर के वादा तोड़ देने का।

तो छोटा सा संकल्प उठाइए, जो कि पता है निभा लेंगे। फिर उसको निभाईये।

ज़्यादा बड़ा संकल्प उठाना भी, अहंकार है। वो बताता है कि आप अपनेआप को वो समझते हो, जो आप हो नहीं।

सही काम के रास्ते में, बुद्धि को और तर्क को मत आने दीजिये। बुद्धि और तर्क का इस्तेमाल करियेगा सही काम करने के लिए। ये दो अलग-अलग बातें हैं।

बुद्धि, तर्क और स्मृति, आपके ग़ुलाम होने चाहियें, मालिक नहीं।

जब आप जान जाएँ कि सही क्या है, तब पूरी बुद्धि लगाइये, पूरा तर्क लगाइये ताकि? जो सही है, आप उसको कर पाएं। लेकिन जब बुद्धि, कुबुद्धि होती है, और तर्क, कुतर्क होता है, तो वो सही लक्ष्य के आड़े आता है, वो विरोधी बन जाता है। उसको विरोधी नहीं बनने देना है, उसको सेवक रखना है।


सत्र देखें : आचार्य प्रशांत: आपके बच्चे आपकी सुनते क्यों नहीं? 


आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

  • अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

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आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com प या

 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

  •    जागृति माह

    जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

  •  आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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संपर्क करें:  सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

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