दो सूत्र – अपने प्रति ईमानदारी, अपने प्रति हल्कापन

 

 

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2) वक्ता: क्या चर्चा कर रहे थे आप लोग आरम्भ में?

श्रोता: मज़बूती और कमज़ोरी ये द्वैत के दो सिरे हैं और किसी भी एक सिरे पर बैठ कर इन दोनों को समझा नहीं जा सकता है, सर ने ये बात बताई थी, यहाँ से शुरुआत होती है । फिर मोहित जी (एक श्रोता) अपने जीवन के बारे में कुछ बता रहे थे कि कैसे जो मज़बूती और कमज़ोरी द्वैत के दो सिरे हैं,उसी तरह से चलते रहना और फिर फिसल जाना और ये जो पूरा इसका चक्रवात है ,यह भी द्वैत का ही एक अंग है, तो इससे कैसे बाहर निकला जा सकता है। तो मोहित जी बता रहे थे कि जो इसमें है, वो इससे कभी भी बाहर नहीं निकल सकता। अगर मैंने ठीक समझा था।

वक्ता: कहते हैं कि सांड लाल रंग के पीछे भागता है, उत्तेजित हो जाता है। कहानी ही है क्योंकि वस्तुतः वो रंग देख ही नहीं सकता पर कहानी पर ही चलते हैं। तुमने लाल रंग की कमीआध्यात्मज़ पहन रखी है और वो उत्तेजित हो रहा है, क्रोध से उफना रहा है। लम्बा-चौड़ा, दौड़ पड़ता है और तुमे जानते हो कि तुम्हारी कमीज़ के लाल रंग के पीछे है, तुम क्या करोगे?

श्रोता: कमीज़ उतार देंगे।

वक्ता: कमीज़ उतार दोगे। यही संसार का और तुम्हारा रिश्ता है। देखो कि संसार किसके पीछे है। देखो कि दुःख किसे हैं? देखो कि डर किसे है ?जिसे है, उसे रहेगा। जब तक लाल रंग है, तब तक सांड रहेगा और वो उसका पीछा करता ही रहेगा। हाँ, तुम्हारे हाथ में ये है कि तुम इस पूरे चक्र से बाहर निकल जाओ। वो खेल चलता रहेगा। अब तुम दूर खड़े हो गए हो, कमीज़ उतार दी तुमने और सांड उस कमीज़ को फाड़ रहा है, उसके चीथड़े कर रहा है, नोंच रहा है। वहाँ जो चलना है चल रहा है, बस तुम उससे?

श्रोता: अलग हो गए।

वक्ता: दूर हो गए, बाहर हो गए। वहाँ जो चलना है, वो चलता रहेगा; उसको रोकने की कोशिश मत करना। अगर तुमने ये कोशिश की कि लाल कमीज़ पहने-पहने सांड को रोक लोगे, तो भूल जाओ, नहीं। यह संसार है, यह तुम हो, वहाँ जो चलना है वो चलेगा, तुम उससे अलग हो जाओ, तो ही बच सकते हो। वो मृत्यु है, कमीज़ शरीर है, सांड मृत्यु है और कमीज़ शरीर है। मृत्यु शरीर की ओर आकर्षित होगी ही, तुम कुछ नहीं कर पाओगे। भाग नहीं पाओगे, लड़ नहीं पाओगे, तुम इतना ही कर सकते हो कि तुम ज़रा शरीर से अलग हो जाओ।

वहाँ समाज है, उपयोगिता है। समाज पीछा करता है तुम्हारी उपयोगिता का, और वहाँ वो खेल चलेगा ही।

जब तक उपयोगी हो, समाज तुम्हारे पीछे लगा ही रहेगा।

तुम इतना ही कर सकते हो कि ज़रा अनुपयोगी हो जाओ। दे दो, उन्हें जो कुछ चाहिए अब तुम कोने में खड़े हो जाओ। ‘’अब मैं तुम्हारे किसी काम का नहीं रहा,’’ अब नहीं करेंगे तुम्हारा पीछा। फिर कह रहाँ हूँ दूसरी विधि मत लगा लेना; यह व्यर्थ का युद्ध होगा। इस युद्ध में मत पड़ जाना कि कमीज़ भी पहने रहनी है, कमीज़ भी बचानी है, और सांड से भी बचना है।

सांड एक नहीं है, ‘साधू ये सांडों का गाँव’  । यहाँ हर गली सांड है और कमीज़ तुम्हारे पास बस एक रंग की है। गली बदलोगे तो नया सांड मिलेगा, कमीज़ बदलोगे तो नई कमीज़ वो भी लाल। जब तक तुम्हारे पास कमीज़ है, तब तक गली में सांड है। गलियाँ है संकरी, सोचो…? तुम, सांड और गलियाँ है संकरी। एक ही उपाय है, उसी उपाए को निर्लिप्तता कहते हैं, उसी उपाए को साक्षित्व कहते हैं ।

श्रोता: आपने जैसे बोला कि दूर हो जाओ, अब जैसे किसी को किसी आदत की लत पड़ी है और वो लत देख ली। अब लत तो छूटेगी जिससे कि वो उसका भोग ना करे। जैसे वो सिगरेट पी रहा है ।

वक्ता: ग़लत, तुम कमीज़ पहने-पहने सांड से दूर नहीं हो सकते। हमारी कोशिश यही रहती है, इस बात को समझना तुम्हें थोड़ा चौकाने वाली लग सकती है। हम कहते हैं मुझे कोई बुरी लत है, मुझे कोई गन्दी आदत है, तो हम क्या कहते हैं? हम कहते हैं हमें यह आदत छुड़ानी है। आदत जिसे है उसे लग गई, तुम ये कर सकते हो कि जिसे आदत लगी है, उससे तुम अपनेआप को छुड़ा लो। समझना, तीन चीज़े हैं : सांड, कमीज़  और तुम; आदत, मन  और तुम । तुम कोशिश यह करते हो कि सांड और कमीज़ के रिश्ते को बाधित कर दो, तुम कहते हो, ‘सांड आये, पर कमीज़ पर धावा ना बोले’ तुम यह चाहते हो। तुम चाहते हो तुम्हारा और कमीज़ का रिश्ता बना रहे। तुम कमीज़ बचाना चाहते हो ना, तो तुम चाहते हो तुम्हारा और कमीज़ का रिश्ता कायम रहे। ‘’मैं कमीज़ पहने रहूँ लेकिन सांड कमीज़ के पीछे ना आये’’ तो तुम कौनसा रिश्ता तोड़ना चाहते हो?

श्रोता: सांड का और कमीज़ का।

वक्ता: तुम कौनसा रिश्ता कायम रखना चाहते हो?

श्रोता: अपना और कमीज़ का।

वक्ता: अपना और कमीज़ का तो ये ग़लत है, यह कभी सफल नहीं हो पायेगा। सांड और कमीज़ एक हैं, वो द्वैत के दो सिरे हैं, उनमें पारस्परिक आकर्षण होगा, वो कभी अलग नहीं हो सकते। तुम अलग हो सकते हो।

तुम्हारा स्वभाव है अनछुआ रहना, तुम्हारा स्वभाव है – अद्वैत।

सांड और कमीज़ एक हैं और वो द्वैत हैं, ठीक इसी तरह से शरीर, मन, आदतें एक हैं। आदत माने ढर्रा , क्या ढर्रों के बिना मन है? तो जहाँ ढर्रा है, वहाँ मन होगा ही होगा, जहाँ मन है, वहाँ ढर्रा होगा ही होगा। मन का तो अर्थ ही है आदत, पर तुम्हारी कोशिश क्या रहती है? तुम कहते हो, ‘’जैसे मैं सांड से कमीज़ बचाना चाहता था, वैसे ही मैं ढर्रों से मन बचाना चाहता हूँ । मैं आदते छोड़ना चाहता हूँ।’’ ये हो नहीं सकता, आदत छूटेगी नहीं और जो छूट सकता है, वो तुम छोड़ोगे नहीं क्योंकि उसमें तुम्हारा अहंकार आड़े आ जाता है।

मन छूट सकता है, मन से ढर्रे नहीं छूट सकते उसके बाद मन को छोड़ो, उसके बाद बोलो जा जितने ढर्रो में जीना है, जी।

श्रोता: मन को छोड़ना माने क्या?

वक्ता: मन को छोड़ना माने यही तुम्हें अब ढर्रो से कोई परेशानी ही नहीं, तुम्हें ढर्रों से अब कोई लेना ही देना नहीं । कमीज़ कब छूटती है? जब कमीज़ के प्रति अनासक्त हो जाते हो । ‘’हमें कुछ लेना ही देना नहीं इस कमीज़ से। मन कब छूटेगा? हमें कुछ लेना ही देना नहीं। तुझे तकलीफ हो तू जान, तुझे ख़ुशी हो तू जान।’’ अब सांड कमीज़ पहन ले और उसी पर इतर मारे तो बहुत अच्छा और सांड कमीज़ को फाड़ डाले तो भी बहुत अच्छा। अब ये कमीज़ का व्यक्तिगत मामला है। अब ये कमीज़ की निजी चिंता है, हम ये सब में नहीं पड़ते, हमने त्याग दी, हम नग्न हो गए। अब आदत मन का जो करे उसे करने दो, हमने त्याग दिया। चल रही है आदत, चलने दो।

श्रोता: या तो शायद सोच रहा हूँ इसके बारे में तो समझ में नहीं आ रहा है, ये नहीं आ रहा है समझ, ये अलग होना माने क्या?

वक्ता: ये समझने की बात ही नहीं है, यह समझने के लिए तुम्हें मन से समझना पड़ेगा।

श्रोता: हाँ।

वक्ता: और हम क्या कह रहे हैं?

श्रोता: मन को त्याग दो।

वक्ता: जिसे त्यागना है, उसी को पकड़ के समझ रहे हो तो कैसे समझ में आएगा। जिसे त्यागना है उसी को पकड़ के समझ रहे हो तो क्या त्यागा जाएगा? तुम्हारे पास जीने का माध्यम ही एक है, मन।

मन के अतिरिक्क्त कभी जीना सीखा नहीं, और जब तक मन से संग्लग्न रहोगे, तब तक मन की हर बीमारी, तब तक मन की हर लघुता, तुम्हारी बीमारी और तुम्हारा छोटापन बन जाएगी । यह गलत संगत का नतीजा है ।

ग़लत चीज़ के साथ जी रहे हो। मन के साथ जो जियेगा, वो मन जैसा ही हो जायेगा। जो लाल कमीज़ में है, वो कैसा दिखेगा?

श्रोता: लाल।

वक्ता: जो लाल कमीज़ में है, वो कमीज़ पर पड़ती चोट कहाँ लेगा और सांड ने सींघ किसमें घुसेड़ा?

श्रोता: कमीज़ में।

वक्ता: कमीज़ में और लगा किसको?

श्रोता: पहनने वाले को।

वक्ता: तुमको। आदत किसको लगी है?

श्रोता: मन को।

वक्ता: मन को, और परेशान कौन हो रहा है? तुम। अरे! क्यों परेशान हो रहे हो? उसे कमीज़ चाहिए ना, तो दे दो उसको। सांड कहेगा कमीज़ के पीछे तूने अपना पेट रखा क्यूं? हमने तो कमीज़ में मारी थी सींघ, हमने कहा था पेट ले आ बीच में? व्यर्थ तू हर जगह अपनी छाती घुसेड़ता है । क्यूँ तुम वहाँ घुसे हुए हो, जहाँ तुम्हारी कोई जगह नहीं? कोई आदतों से जीत नहीं सकता क्यूंकी आदतों से जीतने, तुम जो लेकर के निकले हो, वो स्वयं एक आदत है। ये ऐसी सी बात है कि सामने कोई ज़बरदस्त चुम्बक हो, एक राज्य ने एक जादुई चुम्बक पर आक्रमण किया; भीमकाय चुम्बक, दैत्याकार चुम्बक। राजा निकल पड़ा कि आज मरूँगा इस चुम्बक को, और कैसे निकला? लोहे की तलवार लेकर, क्या होगा?

श्रोता: हार जाएगा।

वक्ता: ऐसे तुम आदतों से लड़ने निकलते हो। जो लेकर के तुम लड़ने निकले हो, वो स्वयं आदत का शिकार है। ठीक वैसे, जैसे लोहा चुम्बक का शिकार होके रहेगा। तुम जिससे लड़ने निकले हो, तुम उसी के गुर्गों पर आश्रित हो, उससे लड़ने के लिए। आदत से आदत को काटोगे क्या? आदत को तुम वास्तव में जानते नहीं। दूर रहकर ही ये खेल देखा जा सकता है कि वो देखो सांड क्या कर रहा है कमीज़ के साथ। अभी प्रश्न पूछता हूँ बताना, जब आदत के शिकार होते हो, तो कभी देखा है खुद को ऐसे जैसे सांड और कमीज़ को देखा जाता है  कि वो देखो आदत आई और वो रहा मेरा मन और आदत ने मन के चीथड़े कर दिए। कभी देखा है ऐसे? देखो ऐसे उसके बाद जितने चीथड़े होने हैं, होने दो। क्या पता ना हों, क्या पता हो भी पर तुम निर्लिप्त रहो।

ये आई आदत, ये आई आदत, आई और मारा मन को, फिर गया। ये गई दाई बाजु, अब लगा जेब का नंबर, फटा कालर। देखो ना ऐसे कभी और देखो ये अपने साथ होते ही और यही होता है तुम्हारे साथ। आतें है बाहरी प्रभाव और फाड़ के रख देते हैं कमीज़ की तरह। ये होते देखो तो। जब हो रहा होता है, तब तुम्हें होश कहाँ होता है, तुम तो कमीज़ के अन्दर होते हो और जो कमीज़ के अन्दर है, वो कमीज़ का हश्र कभी जान नहीं पायेगा क्यूं क्योंकी कमीज़ का हश्र उसका हश्र बन चुका है। जिसकी छाती में सींघ घुसा हुआ हो, वो कमीज़ को क्या देखेगा, वो तो यही कहेगा कमीज़ नहीं फटी।

बाहर से जो आ रहा है वो प्रभाव है, आदत है, ढर्रा है, सुख-दुःख और कुछ नहीं है, यही ढर्रों के नाम हैं। प्रयोग करके देख लो अपनेआप को ये प्रशिक्षण करके देख़ लो कि रोज़ शाम के 7 बजे सुखी हो जाना है, हो जाओगे। अकारण, बस ढर्रा है, ढर्रों का कोई कारण थोड़ी होता है। रोजाने आपको ये प्रशिक्षण दे लो कि कौवे की आवाज़ सुनते ही दुखी हो जाना है, हो जाओगे। मन और शरीर तो प्रशिक्षण पर चलते हैं। हाँ, प्रशिक्षण ऐसे गहरे हो जाते हैं कि लगते ही नहीं कि कभी प्रशिक्षित हुए थे, फिर लगता है कि जैसे ये तो स्वभाव है। तुम्हारी गहरी से गहरी वृत्ति भी मात्र प्रशिक्षण है, जो तुम्हें समय ने दिया है, बड़े लम्बे समय ने, और कुछ नहीं है। उसके पीछे कोई वैध मूल कारण नहीं है। माया अनादि होती है, उसका कारण नहीं खोज पाओगे।

दो सूत्र हैं: अपने प्रति ईमानदारी, अपने प्रति हल्कापन। तो जब आदत तुम पर छाये, तो अब वो आदत तुम्हारे व्याकरण में भले ही कितनी भी घटिया आदत क्यूँ ना हो, पहले सूत्र की मांग है कि तुम उसे स्वीकारो कि बड़ी घटिया चीज़ है, जो मन पर छा गई। भूलना नहीं घटिया सिर्फ़ तुम्हारी परिभाषा में है। अस्तित्व में कुछ अटीया-घटिया, ऊंचा-नीचा कुछ होता नहीं। तो पहली बात ये की स्वीकारा, ये ईमानदारी है और दूसरा सूत्र है हल्केपन का, हास्य का, कि यदि ये स्वीकारा कि कोई घटिया चीज़ छा गयी है  मन पर, तो इस स्वीकार के कारण बोझिल नहीं हो गए, इस स्वीकार के कारण दुखी नहीं हो गए। स्वीकारा भी और हंस भी लिए, मान भी लिया कि बड़ा घटिया काम है, और मान कर भी अपनी नज़रों में गिर नहीं गए। जिसने ये दोनों चीज़ें एक साथ सीख ली, उसने साक्षित्व सीख लिया – यही है साक्षित्व।

साक्षित्व मतलब दूरी और आनंद । मन से दूरी, आत्मा का आनन्द ।

दूरी है ईमानदारी, साफ़-साफ़ कहेंगे, ठीक-ठीक कहेंगे, निहित्त होकर नहीं, जुड़ के नहीं, आसक्ति में नहीं। साफ़-साफ़ कहेंगे देखो अभी डर उठा था, देखो अभी लालच उठी थी, देखो अभी वासना उठी थी, देखो अभी बेईमानी उठी थी, ये दूरी है । ये मन से दूरी है, कि ठीक है जो भी हो रहा था मन में हो रहा था, हमने कहा मन में हो रहा था और दूसरा, हम आत्मा में ही है। हमारे अन्दर कोई हीनता नहीं आ गई, जो हो रहा था मन में हो रहा था, हम मग्न हैं, हम आनंद में है। हम कहेंगे भी शुभांकर (एक श्रोता) बड़ा घटिया आदमी है पर हंस कर कहेंगे।

ये अपने ऊपर चुटकुला सुनाने जैसी बात हुई। दो बातें हैं इसमें, पहली तो ईमानदारी की के किसी और पर नहीं सुना रहे, अपना सुना रहे और दूसरा, अपना जो सुना रहें हैं वो रो-रो के नहीं सुना रहें हैं, हंस के सुना रहें हैं। अपनी सब कलई खोल देंगे, सब स्वीकार कर लेंगे और वैसे भी नहीं स्वीकार करेंगे जैसा कि पादरी के सामने किया जाता है कि सर झुका देंगे, हीनता के भाव में, अपने को क्षुद्र और तुच्छ बोल कर। सब मानेंगे पर मज़े में मानेंगे, अब सांड को कमीज़ फाड़ने दो।

ये लड़ाई आजतक कोई जीत नहीं पाया। इससे दूरी ही बनाई जा सकती है, इसे जीता नहीं जा सकता। ये वो लड़ाई है, जो तब जीती जाती है, जब तुम्हारा इस लड़ाई से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। ये वो लड़ाई है, जो तब जीती जाती है, जब तुम्हें इस लड़ाई में कोई रुचि नहीं रह जाती है। जिस दिन तक तुम्हें इस लड़ाई में रुचि है, तुम हारे ही हारे ; तुम्हारी हार भी हार और तुम्हारी जीत भी हार। तुम जीते उस दिन, जिस दिन तुम कहो हमें लड़ने में कोई रुचि नहीं रही, अब तुम जीत गए। अब तुम जीत गए, अब तुम अलग हो गए। अब तुमने अपनी शुद्धता को पा लिया।

आदत से हारोगे तो हारे ही और जो दावा करें कि आदत से जीत गए, उनकी ज्यादा बड़ी हार है।

जो आदत से हारे, वो तो हारे ही; जो आदत से जीत गए उनकी ज्यादा बड़ी हार है क्योंकि कौन जीत गया? अहंकार जीत गया ।

 वो जीत गया, हम वो जिन्होंने आदत को हरा दिया। अब ये नई आदत है , पुरानी आदत ने नई आदत को हरा दिया।

आदत से लड़ो नहीं, ‘ना लड़ना ही जीत है’।

श्रोता: सर, जैसे आप कह रहें हैं कि अपनेआप से ही पराये हो जायेंगे एक दिन। क्या हो रहा है, फर्क नहीं पड़ता तो इससे नुकसान भी तो होगा हमारा।

वक्ता: अपने से पराये नहीं हो गए। जब सांड कमीज़ फाड़ रहा हो, तो तुम्हारा क्या है तुम्हारा जिस्म या कमीज़? तुम किससे पराये हुए हो और किसके अपने हुए हो?

श्रोता: ‘हमसे’ मेरा मतलब वही था जो अहंकार है ।

वक्ता: हाँ, तो समझो ना इस बात को, तुम्हें ये तो दिख रहा है कि किससे पराये हो गए हो,तुम्हें ये नहीं दिख रहा है कि क्या अपना था जिसे बचा लिया। तुम्हें ये नहीं दिख रहा है कि किसके निकट आ गए। या तो ये होता कि जो पराया है, पराया माने कमीज़ उसके साथ-साथ वो भी लहूलुहान हो जाता है, जो अपना है । उदहारण की बात कर रहा हूँ, मात्र उस उदहारण में तुम्हारा अपना क्या है?

श्रोता: शरीर।

वक्ता: शरीर, तो पराये के साथ अपना भी मारा जाता। पराये को पराया घोषित करके तुमने उसे बचा लिया जो वास्तव में अपना है। जिन्हें शरीर से कोई वास्ता हो, वो आसानी से कमीज़ को दाव पर लगा देंगे। वो कहेंगे मूर्खता है कि शरीर पर घाव सहें। अपना क्या है, पराया क्या है, समझो। तुमने परायो की रक्षा में अपने को कितना दुःख दिया है, ऐसे होते हुए कभी पाया है? कमीज़ बचाने के लिए शरीर को कितना कष्ट दिया है, कभी देखा है? फिर शरीर को बचाने के लिए मन को कितना कष्ट दिया है कभी देखा है? फिर मन बचाने के लिए आत्मा से कितनी दूर हो बैठे हो कभी देखा है। हमें पता कहाँ होता है, अपना क्या और पराया क्या?

‘स्व ‘ का कितना ज्ञान होता है हमें? हम तो पता नहीं किसको अपना समझे बैठे हैं, और जो अपना है उसे भुलाये बैठे हैं।तुम देखो ना क्या-क्या घूमता रहता है तुम्हारे मन में, जो घूमता रहता है उसे कभी कहते हो कि पराया है? उसको तो गंभीरता देते हो, गंभीरता से लेते हो, इसी कारण मन में घूम रहा है। तुम्हारे मन में जो भी कुछ है, चिंताए, सामग्री, उम्मीदें क्या वो तुम्हारे मन में हो सकती थी यदि वो तुम्हें परायी लगती?

श्रोता: नहीं।

वक्ता: तो वो तुम्हारे मन में बैठी ही इसीलिए हैं क्योंकि वो तुम्हें पराई लगती हैं और जब वो तुम्हें अपनी लगती हैं, तो कभी देखा है कि किससे दूर हो जाते हो? शांति से दूर हो जाते हो, स्वस्थ से, चैन से दूर हो जाते हो। परायों को अपना कर लिया और इस चक्कर में किससे दूर हो बैठे, ये जाना कहाँ तुमने?

श्रोता: सर लेकिन वो चिंताएं भी तो शरीर के लिए होती हैं, अगर उनको पराया कर देंगे तो शरीर को भी तो नुकसान पहुँच रहा है ।

वक्ता: शरीर सिर्फ उदहारण है तुम्हारा।

श्रोता: अगर आप देखें जब कभी चिंताएं होती है ,आपको खाने की या कहीं जाने की अगर उनको पराया कर देंगे कि तुम्हें चिंता ही शांति से दूर लेकर के जा रही है, तो उस चिंता को पराया करने से आप शरीर को नज़रंदाज़ कर रहें हैं।

वक्ता: तुम बार-बार कह रहे हो कमीज़ पर दाग लग जाएगा अगर सांड ने मार दिया।

श्रोता: मेरी उसमें हम कमीज़ हैं, शरीर नहीं।

वक्ता: तुम बार-बार ये कह रहे हो कि शरीर को कुछ दिक्कत हो जाएगी, मैं कह रहा हूँ शरीर कमीज़ है। जब तक तुम्हें कमीज़ से मोह है, तुम उसे उतारोगे ही नहीं, जब उतारोगे नहीं तो पिटते रहोगे और कुछ नहीं होगा। तुम ये नहीं देखते हो, जो पिट रहा है और जिसके कारण तुम्हें दर्द हो रहा है, वो कमीज़ नहीं तुम हो। जब सांड तुम पर वार कर रहा होता है, तो क्या घटना घट रही है? गौर करो! वो आ कर के मार किसको रहा है?

श्रोता: कमीज़ को।

वक्ता: और दर्द कहाँ हो रहा है?

श्रोता: शरीर में।

वक्ता: छाती में पर क्योंकी तुमने कमीज़ से एका कर रखा है, तो तुम्हें क्या लग रहा है दर्द भी किसे हो रहा है कमीज़ को ही क्योंकि मै तो कमीज़ ही हूँ ना। शरीर से तुमने एका कर रखा है इसीलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है कि शरीर को सुरक्षा की ज़रुरत है, ये ठीक ऐसा ही जैसे कोई कहे कि कमीज़ को बड़ा दर्द होगा न कमीज़ को कैसे छोड़ दूँ। कमीज़ को कोई दर्द नहीं होता, कमीज़ के जो पीछे है उसे दर्द होता है। ठीक उसी तरह से शरीर कोई मांग नहीं होती, शरीर के पीछे जो मन है, उसकी मांग होती है, उसकी बात करो। तुम्हारा तर्क बिलकुल यही है कि कमीज़ को बहुत दर्द होगा, अगर उसे उतार दी और तुम्हें पता कैसे है कि कमीज़ को दर्द होगा? मुझे पता है ना कि कैसे दर्द होगा। कैसे पता? पिछली बार जब सांड ने मारा था कमीज़ को, तो बड़ा दर्द हुआ था, तो देखो ना कमीज़ को दर्द होता है। यह तुम्हारा दर्द है, ये बड़ा ही मूर्खतापूर्ण दर्द है।

सो जाते हो, तो क्या शरीर मांग करता है कि भविष्य बनाओ या करियर बनाओ। ये सारी मांग शरीर की है क्या जिनसे तुम उलझे हुए हो?  शरीर तो अपनी गति पर चलता है, बहुत सीमित बातें करता है और बहुत सीमित उसकी मांगे हैं। पर तुम ये भेद ही भूल गए हो कि शरीर में और देह में अंतर है, देह में और मन में अंतर है। तुम्हारी तो हालत भी ये है कि तुम्हें उपचार भी करना होगा कि सांड आया और खूब तुमको धोभीपाट देकर गया है और जगह-जगह से खून बह रहा है और जगह-जगह दर्द हो रहा है और खून किसपर लग गया है ?

श्रोता: कमीज़ पर।

वक्ता: तो तुम जाओगे डॉक्टर के पास और कहोगे कि कमीज़ का उपचार करियेगा, देखिये यहाँ कितना खून है, कमीज़ का उपचार करिए और प्रमाण भी है न। कमीज़ फटी है और कमीज़ में ही लहू के दाग है, तो निश्चित रूप से दर्द भी किसे हो रहा है?

श्रोता: कमीज़ को।

वक्ता: और वही तुम्हारा तर्क भी है कि शरीर की तो सुरक्षा करनी पड़ेगी न। दर्द शरीर को नहीं होता, दर्द शरीर के जो पीछे होता है, उसे होता है। कभी तुम्हारे पाओं ने कहा है कि, ‘’मुझे दर्द हो रहा है,’’ किसने कहा है हमेशा?

श्रोता: मन।

वक्ता: आपको एक आदत लगी हुई है और पता है कि उस आदत के बाद पूरा शरीर भन्ना जाता है, वो है आदत लेकिन आदत से कुछ होता नहीं। अब वो नहीं करते हैं, तो वहाँ से प्रतिरोध आता है कि गयी ना आदत और वो प्रतिरोध आएगा ही आएगा, निश्चित तौर पर आएगा ही आएगा। पहले क्या होता था, जैसे कोई चीज़ का विरोध कर रहें हैं और कोई चीज़ देख लिया कि भाई, इसमें कुछ है नहीं लेकिन वो आदत लगी हुई है कि उसके पास जाना है, तो आपने बोला कि नहीं जा रहे। तो नहीं जा रहे ,है तो ठीक पर उसका जो प्रतिघात आएगा कि आप उसको रोक रहे हो, तो वो आएगा ही और आप बस उस बहाव को देख रहे हो कि ठीक है प्रतिघात  आ रहा है, तो क्या ये भी सहयोग है?

वक्ता: जब सांड अमनदीप (एक श्रोता) की शर्ट ले रहा था, तो तुमने अपने इस कैमरा से उसकी विडियो बना लिया और फिर उसको पूरी रिकॉर्डिंग दिखाई, पूरी फिल्म दिखाई की देखो इस-इस तरह से हो रहा है। उसको देखने से क्या उसका दर्द कम हो जाएगा?

श्रोता: नहीं।

वक्ता: ये सारी बातें तुम्हारे किसी काम आएँगी? सिर्फ एक चीज़ है, जो तुम्हारे काम आ सकती है कि जब सांड आये तुम्हारे सामने, तब तुम्हें ये होश रहे कि अभी कमीज़ उतारनी है। बाद में तुम रिकॉर्डिंग  देख कर बनते रहो बड़े ज्ञानी, उससे ना फटी शर्ट सिल जाएगी, ना देह का दर्द कम हो जाएगा। स्मृति वाला ज्ञान कोई ज्ञान नहीं होता।

ज्ञान जब स्मृति से उठे तो निरर्थक है, और वही ज्ञान जब एक आत्मिक बोध से उठता है, तत्काल, तब सार्थक होता है।

 दो तरह का ज्ञान होता है: स्मृतिबद्ध और बोधजनित। अभी जो तुम अपना ज्ञान सुना रहे हो कि जब वो होता है, तब ये होता है, तुम रोक-रोक के उस पिटाई की फिल्म का प्रशिक्षण करते रहो कि वो देखो बायाँ सींघ घुसा बगल में, अब उससे क्या बगल का इलाज हो गया? जब घटना घट रही हो तब जागो, इतनी बातें मत करो। तब उतारो!

श्रोता: रोक लो उसी वक्त।

वक्ता: हाँ, अन्यथा बाद में जब तुम सुना रहे हो, वो बस दूसरों के लिए मनोरंजन होगा।

श्रोता: जो वो रोकना होता है कि उस क्षण में कुछ गलत हो रहा है।

वक्ता: ना, गलत नहीं। ना गलत ना सही, उचित, सम्यक। गलत या सही में विकल्प बच जाता है। सम्यक में निर्विकप्लता होती है, मात्र यही विकल्प है इसके अलवा सही-गलत कुछ है ही नहीं, न ही कुछ और हो सकता है, यही है ही। सही-गलत निर्धारित करते समय ये हक तुम अपने पास रख लेते हो कि कुछ और भी कर सकता हूँ और जब कभी तुम सही-गलत का निर्धारण करोगे, तो उसमें समय लग जाएगा, आधा पल तो लग जाएगा। सांड बड़ा चतुर, उसे बस वो आधा पल चाहिए वो बड़ा चतुर, बड़ा तेज़ सांड है। तुमने उसे आधा पल दिया नहीं, उसको वो तुमको पकड़ लेगा, तुम्हें तुरंत उतारनी है। सोंच के लिए जो आधा पल लगता है, उस आधे पल की जगह नहीं है और सोचने में उतना समय लग जाएगा और उतनी देर में तुम्हारा काम-तमाम हो जाएगा। इसीलिए मन का इलाज सोच-सोच के नहीं हो सकता क्योंकि सोचने में त्वरित घटना, तत्काल घटना नहीं हो सकती।

श्रोता: मतलब कमीज़ उतारते समय मैं देख रहा हूँ?

वक्ता: या सोच रहा हूँ, इतने में वो आ जायेगा, उतने में तुम्हारा पूरा कार्यक्रम समाप्त। सोच के नहीं, तत्काल; सही-गलत में थोड़ा वक़्त लग जाएगा, कि दिखा नहीं कि उतरी।


सत्र देखें : आचार्य प्रशांत: दो सूत्र – अपने प्रति ईमानदारी, अपने प्रति हल्कापन 


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सम्पादकीय टिप्पणी :

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अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

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