जो डूबने से डरते हैं, गहराइयाँ उनके लिए नहीं है

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वक्ता: शिव केंद्र हैं, शिव सत्य हैं। शिव वो हैं, जिन तक मन, मन रहकर पहुँच नहीं सकता। शिव को तो रहस्य रहना है सदा। ‘शक्ति’, मन है, संसार है। शिव में, स्थिरता है, अचलता है। शक्ति में, गति है, चंचलता है। शक्ति जीवन है, शक्ति वो सब कुछ है, जिससे आप एक मनुष्य हो कर के संबंध रख सकते हैं। शक्ति भाव है, शक्ति विचार हैं, शक्ति में संसार के सारे उतार-चढ़ाव हैं, आंसू हैं और मुस्कुराहटें हैं।

इन नौ दिनों में, नवरात्र में, शक्ति के नौ रूपों की पूजा बताती है हमको कि संसार के, जीवन के, समस्त रूप पूजनीय हैं। और वो बहुत कुछ हमको, धर्म के विषय में, सिखा जाती है। कहा गया है हमसे कि सत्य अरूप है, अचिन्त्य है, निर्गुण है, निराकार है। लेकिन जब आप शक्ति के नौ रूपों को पूजते हो, तो उससे आपको एक आगे की बात कही जाती है। ऐसी बात जो ज़्यादा सार्थक, व्यवाहरिक, और उपयोगी है। सत्य होगा अरूप, पर हम रूपों में जीते हैं। सत्य होगा अचिन्त्य, पर हम विचारों और भावों में जीते हैं। सत्य होगा निराकार, पर हम तो आकार और रंग और देह में जीते हैं। सत्य होगा असीम, पर हमारा तो सब कुछ ही सीमित है। जिन्होनें असीम की पूजा शुरू कर दी, जिन्होंने निर्गुण, निराकार को पकड़ने की चेष्टा कर ली, जिन्होंने ये कह दिया कि वो सब कुछ जो प्रकट और व्यक्त है, वो तो क्षुद्र है और असत्य है, उन्होंने जीवन से ही नाता तोड़ लिया। उनका मन बिलकुल शुष्क और पाषाण हो गया। अरूप तक जाने का एकमात्र मार्ग रूप है। सत्य तक जाने का, हमारे लिए, एक मात्र मार्ग संसार है।

शिव के अन्वेषण का एकमात्र मार्ग शक्ति है जिन्होंने संसार से किनारा कर लिया, ये कह के कि संसार तो सत्य नहीं ,उन्होंने संसार को तो खोया ही, सत्य से भी और दूर हो गए

शक्ति के नौ रूप, बताते हैं हमको कि जीवन अपने समस्त रंगों में सम्माननीय है, प्यारा है, पूजनीय है। धर्म जीवन को, काटने की बात नहीं है, कि कुछ बातों का, कुछ मुद्दों का, कुछ पहलुओं का निषेध कर दिया। करा जा सकता है, सीखा जा सकता है, आप अपनेआप को शिक्षा दे सकते हैं, कि होठों को इतना सख्त बना लें, कि मुस्कुराएं नहीं, कि आँखों को ऐसा पत्थर कर लें कि वो रोएं नहीं, मन को ऐसा जड़ कर दें, कि वो कभी तरंगित ही ना हो। पर ये शिक्षा, धर्म नहीं है। हमने तो वैसे भी अपने ऊपर हज़ार वर्जनाएं लगाई हुई हैं, उन वर्जनाओं को और बढ़ाने का नाम धर्म नहीं है। और ये बड़े अचरज की बात है कि, हमारे जैसे लोग, जो पहले ही बंधे हुए हैं, जो पहले ही अपनी बेड़ियों से आगे जाने में असमर्थ मालूम होते हैं; वो लोग, उन्हीं दायरों को, उन्हीं बेड़ियों को, और सख्त, और मज़बूत, और जड़ करने को धर्म का नाम दे देते हैं। जैसे कि कोई बीमार अपनी बीमारी को और गहरा करने को स्वास्थ्य का नाम दे देता हो। और, पूर्ण मुक्ति की बात, बंधनों के परिपेक्ष में ही सम्भव है। अन्यथा मुक्ति की बात क्या? प्रासंगिकता क्या?  हम उल्टा सोच लेते हैं, हम कहते हैं, मुक्ति का अर्थ है जीवन से मुक्ति।

मुक्ति का अर्थ है: जीवन पर पड़े बंधनों से मुक्ति।

जीवन मुक्त की बड़ी सुन्दर अवधारणा रही है हमारे यहाँ। और जीवन मुक्त का अर्थ, बहुदा लगा लिया जाता है, जीवन से मुक्त।

जीवन मुक्त का अर्थ होता है: जिसका जीवन मुक्त हो बंधनों से, जीवन से मुक्त नहीं; मुक्त जीवन वाला।

 वो हुआ जीवन मुक्त। जो मुक्त जीवन जीता हो ,और मुक्त जीवन जीने का अर्थ है, जीवन के सभी चेहरों को गले लगा पाने का साहस, का प्रेम। अक्सर लोग धार्मिकता की ओर आते ही इसलिए हैं क्योंकि वो कुछ छोड़ना चाहते हैं, कुछ त्यागना चाहते हैं। और आप, तथाकथित धार्मिक लोगों को देखेंगे, तो उनमें एक ख़ास रूखापन पाएंगे अक्सर। उनकी ऊंचाई नापने का पैमाना ही यह होता है कि उन्होंने क्या छोड़ रखा है, कि वो कितने अद्भुत हैं, असाधारण हैं, और असाधारण होने का अर्थ ही यह होता है कि वो सब कुछ जो साधारण है, सरल है, जीवन के सहज प्रवाह में सम्मिलित है, तुम उससे किनारा कर लो। तुम उसे हीन मानो, तुम उसे त्याज्य मानो – ये धार्मिकता की बड़ी विद्रुप परिभाषा है।

वास्तविक रूप से, धार्मिक व्यक्ति, जीवन के साथ एक होता है। उसने अपने और जीवन के बीच की सारी दीवारें गिरा दी होती हैं। वो जीवन के सहज प्रवाह में निर्विरोध बह रहा होता है, और जीवन सब कुछ लेकर के आएगा। एक सीमित व्यक्ति, एक सीमित मन, एक सीमित देह के साथ जितने भी अनुभव हो सकते हैं, वो सारे अनुभव जीवन दिखायेगा। इन अनुभवों से आपको चोट लग सकती है, इन अनुभवों से आप गौरवमंडित हो सकते हैं। ये अनुभव आपको बहुत रुचि देने वाले कहते  हैं, ये अनुभव आपको बड़े अप्रिय लग सकते हैं, कटु लग सकते हैं। इन्हीं में जीना और इन्हीं के विरोध से मुक्त रहना, धार्मिकता है।

आप बैठ कर के, उपनिषदों का पाठ कर रहे हों, और सूचना आ जाये कि आपके दोस्त की मौत हो गयी है, और आप कहें कि नहीं, अभी तो गीता का पाठ कर रहा हूँ, और कृष्ण यही तो समझा रहे हैं कि, ‘ना कोई आता है, ना कोई जाता है। ऐसा कोई समय नहीं था, हे अर्जुन! जब तुम नहीं थे या ये नहीं थे या मैं नहीं था।‘ ‘’तो ख़ास गीता के पाठ के समय में मृत्यु की खबर को वज़न कैसे दे सकता हूँ?’’ यदि आप ये कह रहे हैं, तो आप घोर अधार्मिक हैं। अब गीता को आपने नियम बना लिया है। अब गीता आप के लिए मात्र शब्द है। आप भूल ही गए हैं कि गीतकार स्वयं, मुरली भी बजाता था, हँसता भी था, रोता भी था और विरह वेदना में छटपटाता भी था।

जापान की कहानी है, एक ज़ेन गुरु थे, उनकी मृत्यु हो गयी, उनके शिष्य विलाप करने लगे। जीवन भर आचार्य ने और उनके शिष्यों ने, सबसे स्थिरता की और अनासक्ति की बातें करीं थी। उन्हें देख कर यूं लगा  था, ज्यों विराग की मूर्ती हों, और आज, इस क्षण में जब गुरु का देहावसान हुआ, शिष्य रोते नज़र आये। तो आसपास के लोगों ने आकर के कहा, कि आपके गुरु तो कहते थे, और आप भी कहते थे, कि सब कुछ शून्य है, देह द्वैत है, शरीर प्रतीति मात्र है, आंतरिक परम शून्यता है और वही एक मात्र सत्य है। तो अब ये रोना कैसा?

उन्होंने कहा, ठीक, शून्य है, सत्य है, पर हम तो देह के लिए रोते हैं। सत्य के लिए कौन रो रहा है? शून्य के लिए कौन रो रहा है? गुरु थे, प्यारे थे, हमें उनका शरीर भी प्यारा था, शरीर चला गया है; हम शरीर के लिए रो रहे हैं। इतना भी हक़ नहीं है हमें? ये धर्म है। जब आप आत्मा के समक्ष समर्पित होते हैं, तब आपको ये अधिकार मिल जाता है कि आप निसंकोच संसार के हो सकें।

हम कहाँ निसंकोच संसार के हो पाते हैं? हम तो डर जाते हैं, संसार! कौन नहीं है जिसे दुश्मन ना प्रतीत होता हो? कौन नहीं है, जिसने संसार के खंड नहीं कर रखे हों? कौन नहीं है जिसने अपनी सुरक्षा के लिए दीवारें ना बना रखी हों?

धर्म, सत्य सत्य जपने का नाम नहीं है धर्म, संसार में अपने इर्द गिर्द खड़ी करी गयी इन दीवारों को ढहाने का नाम है।

आप इन दीवारों के मध्य बैठ के, अलख जगाते रहे, ‘’मैं ब्रह्म हूँ, मैं आत्मा हूँ,’’ आप शास्त्रों के श्लोकों का उच्चारण करते रहे; उन सारे श्लोकों से ज़्यादा बड़ी हक़ीक़त वो दीवारें होंगी। और यदि दीवारें नहीं हैं, और खुले आसमान के नीचे सीमाओं से मुक्त आप बस रमण कर रहे हैं, चाहे समाज में, चाहे संसार में, चाहे जंगल में, जन में, चाहे वन में, तो आप फिर ब्रह्म ही हैं। ब्रह्मत्व, ब्रह्म-ब्रह्म जपने का नाम नहीं है।

 ब्रह्मत्व असीम हो जाने का नाम है। दीवारें गयी नहीं आप कि आप ब्रह्म।

 ‘ब्रह्म’ शब्द, ‘वृहद’ शब्द के बहुत निकट है। ‘वृहद’ माने वो, जो बड़ा, जिसके दायरे नहीं।

 जो दायराबद्ध, वो कष्ट में

 जो दायरों से मुक्त, वो ब्रह्म के आनंद में। अब होठों से वो कुछ कहे न कहे, फर्क क्या पड़ता है? ब्रह्म कोई, होठों की बात थोड़े ही है।

आप यहाँ आये हैं, मेरा अनुरोध है कि धर्म को जीवन की अवज्ञा मत बना लीजियेगा। धर्म को, कृत्रिम गंभीरता मत बना लीजियेगा। वयस्कता, प्रौढ़ता, मैच्युरिटी, के नाम पर धर्म को, एक बोझ सा मत बना लीजियेगा। ऐसे लोगों को दिन रात देखता हूँ, इसलिए ये विनय करनी पड़ रही है। आम जीवन में आप अपनेआप को पूरा अधिकार देते हैं, हंसने का, खेलने का। आप जब उपनिषदों के साथ भी बैठें, तो अपनेआप को उनसे खेलने का हक़ दें। आप मुझसे बात कर रहे हैं, बीच में कुछ गलत नहीं हो जायेगा, यदि आप ठहाका मार दें। ठहाका नहीं मार सकते, तो कम से कम मुस्कुरा ही दीजिये। धर्म का मतलब मुर्दा हो जाना नहीं है। लेकिन मैं देखता हूँ, कि धार्मिक आयोजनों में अधिकांशत: वही लोग जुड़ते हैं, जो या तो मर चुके होते हैं, या जिनकी मरने की पूरी तैयारी होती है।

धर्म परम जीवन है। शक्ति के नौ चेहरों को जीवन का अनंत चेहरा समझियेगा।

जीवन के अनंत रूपों के पर्याय हैं: शक्ति के नौ रूप

एक सुंदर है, तो दूसरा भी सुंदर है। एक क्रूर लग सकता है, दूसरा मोहक लग सकता है। कोई फर्क नहीं पड़ता। एक में माँ है, और दूसरे में? संहारकर्त्री। एक रूप में जीवन दे रही है, दूसरे  रूप में जीवन ले रही है। एक रूप में विद्या दे रही है, एक रूप में ऐश्वर्य। एक रूप में, किसी की अर्धांगिनी है, एक रूप में जगत जननी है। आप देख रहे हैं, ये सारे रूप आप से कितने जुड़े हुए हैं? ये देख रहे हैं, कि इन सब का हमारे निजी जीवन से कैसा वास्ता है? जब आप इनकी पूजा करने जाएँ तो समझ लीजियेगा, कि आप उनकी नहीं, अपने ही जीवन के भिन्न-भिन्न पहलुओं की पूजा कर रहे हैं, और यदि आप जीवन के इन पहलुओं की पूजा किये बिना पहुँच गए, माँ को अर्पण देने, तो आपकी भेंट व्यर्थ ही जानी है। आप घर बैठे हैं, आप खाना खा रहे हैं, ये जीवन का एक रूप है। इसको आदर देना सीखें। ये कोई हीन बात नहीं है। अलौकिक घटनाओं की तालाश में ना रहें कि आदरणीय तो कुछ तभी हुआ, जब वहाँ कुछ विलक्षण हो। ‘’हम तो बैठ कर के रोटी सब्ज़ी खा रहे हैं,’’ – इस बात को क्या महत्व दें? वो परम घटना है। ऐसा समझिये कि आप मंदिर में ही हैं।

 जन्म होता है एक बच्चे का आपके यहाँ पर, परम घटना है। मृत्यु घटती है आपके यहाँ  पर, परम घटना है। और जन्म और मृत्यु जब मैं बोल रहा हूँ, तो ये तो फिर भी विरल घटनाएं हैं, कभी-कभी होती हैं। जो रोज़मर्रा की साधारण घटनाएं हैं, इनको आप शक्ति का नृत्य समझें। नृत्य की कलाएं समझें। आप कुर्सी पर बैठे हैं, अखबार पढ़ रहे हैं, या थक कर आये हैं, नहाने चले गए हैं; ये जीवन का नृत्य ही तो है। आप पड़ोसी से बातचीत में मग्न हैं, आप टीवी देख रहे हैं, कोई किताब पढ़ रहे हैं, शाम को आये हैं बच्चे से बात कर रहे हैं  या खिड़की से बाहर देख रहे हैं, डूबते हुए सूरज को, या अपनी अर्धांगिनी के साथ हैं। ये सब घटनाएं रोज़ घटती हैं, और चूंकि रोज़ घटती हैं ,तो हमें लगता है इनमें तो कुछ ख़ास नहीं। नौ दुर्गा आपको बताने आयी हैं, कि इन्ही में ही सब कुछ ख़ास है। और इनके अतिरिक्त कुछ और ख़ास होता नहीं। और जो इनमें सत्य को नहीं देख सकता, सत्य फिर उसके लिए है नहीं। मैं दोहरा के कह रहा हूँ:

संसार की गहराईयों में ही सत्य पाएंगे आप; संसार से पलायन में नहीं।

और जो संसार की गहराईयों में उतरने से डरते हैं, “जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ” । इस पानी को, इस प्रवाह को, बुद्ध ने जीवन कहा है। इसी में गहरे बैठना होता है। इसी में गहरा गोता मारना होता है, और यदि आप डरते हैं, “मैं बौरा डूबन डरा, रहा किनारे पैठ”, अगर जीवन का कोई भी पक्ष आपको आतंकित कर जाता है, तो सत्य आपके लिए नहीं है क्योंकि शिव की अभिव्यक्ति ही तो है शक्ति।

शिव का वो रूप, जो आपके सामने सके, जिसे मन जान सके, जिसे इन्द्रियाँ पहचान सकें, उसको शक्ति कहते हैं।

 और सत्य की अभिव्यक्ति ही तो है संसार। निराकार आएगा आपके सामने तो पकड़ लेंगे क्या? कहिये? आपकी आँखों ने आज तक कुछ भी निराकार देखा है क्या? हम तो मलिनताओं में जीने वाले जीव हैं। कुछ बिलकुल निर्मल निर्विकार आ गया आपके सामने, तो उससे क्या रिश्ता बनेगा आपका? जीवन की तथाकथित मलिनताओं में, विकारों में ही बिना शिकायत के पैठना होता है, और शिकायत करने का मौका तो आपको मिलेगा, क्योंकि मलिनता तो मलिनता है, विकार तो विकार है। आपको लगेगा कि हम कहें कि देखो ये सब, झूठ है, गलत है, गंदा है। नहीं, ये झूठ लग सकता है, गलत लग सकता है, गंदा प्रतीत हो सकता है, उससे भागिए मत। यहाँ त्यागने लायक कुछ भी नहीं है। त्यागना है, तो त्यागने का भाव त्याग दीजिये। यहाँ कुछ ऐसा नहीं है जो इतना हीन है कि आप कहें कि ये तो तुच्छ, मैंने छोड़ा इसको। या कि यह कह दीजिये कि रचनाकार से ज़्यादा बड़ी है आपकी होशियारी। आप कह रहे हैं: उसने बनाया, हमने त्यागा । “गॉड प्रोपोसिस, मैन डिस्पोसिस”, और करते तो हम यही है ना?

आत्मा अजर अमर होगी, आपका देह से बड़ा गहरा संबंध है। और ये देह दोबारा नहीं मिलेगी। देह का तो एक ही जीवन है और मौका बीतता जा रहा है, जीवन गुज़रता जा रहा है। और मत चूकिए! सत्य की इतनी बातें करते हैं, तो सत्य पर ज़रा भरोसा भी रखिये। कुछ ऐसा नहीं हो जाने वाला है कि आप टूट जाएँ। कोई अनुभव, इतना विकराल नहीं हो सकता कि आप कहें कि आपको तोड़-निचोड़ दे। और यदि वो आपको खंड-खंड कर भी देता है, तो भी क्या हो गया? गुज़रिये ना उससे। आप पाएंगे कि टूटने के बाद भी, कचरा हो जाने के बाद भी, धूल-धुंआ हो जाने के बाद भी, आप शेष हैं। अब सत्य है। शक्ति के केंद्र में सत्य है। वास्तव में जब शिव और शक्ति का निरूपण किया जाता है चित्रों में, तो बड़े भ्रामक तरीके से किया जाता है। यूं दिखा दिया जाता है, आपने अर्धनारीश्वर की मुद्राएं देखी होंगी, कि आधे शिव हैं, और आधी शक्ति; ये बात बचकानी है।

शक्ति ही शक्ति है, शिव कहीं नहीं है। संसार ही संसार है, सत्य कहीं नहीं है मात्र शक्ति को प्रतिबिंबित किया जाना चाहिए शिव का कोई निरूपण हो नहीं सकता

 और यदि इतना ही शौक है आपको शिव को प्रदर्शित करने का, तो शक्ति के हृदय में एक बिंदु रूप में, शिव को दिखा दिया। शक्ति यदि पूरा विस्तार हैं, तो उस विस्तार के मध्य में, जो बिंदु बैठा हुआ है, वो शिव हैं। तो यदि आपको, शिव को, दिखाना भी है, निरूपित भी करना है, या वर्णित करना है, तो शक्ति के हृदय रूप में करें। ये तो बड़ी अजीब बात है कि आपने दो चित्र लिए, और दोनों को आधा आधा जोड़ दिया और कह दिया, ये अर्धनारीश्वर हो गए । ये शिव शक्ति हो गए । शिव शक्ति ऐसे नहीं होते।

मैं फिर कह रहा हूँ: मात्र शक्ति ही शक्ति हैं। कैसे पहुंचोगे शिव तक,

 शक्ति के दिल में जो बैठा है, उसे शिव कहते हैं।

 अब पहुंचना है शिव तक, तो क्या करोगे? शक्ति को ही अंगीकार करना पड़ेगा। और शिव को तुम पाओगे कहाँ? शक्ति के हृदय में है वो, शक्ति के आँचल में है, और शक्ति माने संसार। शक्ति माने संसार के सारे पहलू, सारी ऊँच-नीच; उसके अलावा और कहाँ मिलने वाले हैं?

शिव की आराधना बिना शक्ति के पूरी हो नहीं सकती। वास्तव में आराधना तो शक्ति की ही हो सकती है, और जिसने शक्ति की आराधना कर ली, उसने शिव को पा लिया। और जो शक्ति को दरकिनार कर शिव की ओर जाना चाहे, वो भटकता ही रहेगा। ये भूल बहुत आम है, इसलिए इसकी चर्चा कई बार कर रहा हूँ।


सत्र देखें : आचार्य प्रशांत: जो डूबने से डरते हैं, गहराइयाँ उनके लिए नहीं है


आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

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    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

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  •  आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

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