बचपन से देखा सुना, उससे अचानक कैसे हटें?

34th ALC Poster 5

प्रश्न: सर, जो हम बचपन से करते आ रहे हैं, उससे कैसे हटें?

आचार्य प्रशांत: इस कमरे में तुम्हारे, बचपन से अँधेरा है। यहाँ पर एक बल्ब जला दूँ, तो रौशनी होने में क्या दो चार साल लगेंगे? कितना समय लगेगा?

अगर तुम अपने आप को वहाँ पर ले आओ, जहाँ पर इंसान कहता है कि एक ही ज़िन्दगी है मेरे पास, और मैं जवान हूँ । मेरे पास बहुत कुछ है अभी देखने के लिए, जानने के लिए, पूरा जीवन ही शेष है, मुझे इसे जीना है। पूरे तरीके से जीना है, सच्चाई के साथ, एक्सीलेंस के साथ जीना है। तो तुमको एक क्षण नहीं लगेगा।

फिर ये सब बहाने नहीं चलेंगे, कि हमें थोड़ा वक़्त दीजिये ना।

श्रोत्ता: सर, बल्ब जलाने में तो टाइम नहीं लगेगा, पर एक्सेप्ट करने में तो लगेगा?

वक्ता: एक्सेप्ट करने को कौन कह रहा है बेटा? क्यों एक्सेप्ट करना चाहते हो? मैं तुमसे समझने को कह रहा हूँ, और तुम एक्सेप्ट करने में लगे हुए हो।

श्रोता: सर, अगर हम अँधेरे में जा रहे हैं, और सामने एक गाड़ी आ गयी, तो हम कहेंगे अरे लाइट बंद करो, बहुत तेज़ है।

वक्ता: मैं उतनी तेज़ नहीं जला रहा। सर्च लाईट नहीं मार रहा तुम्हारी आँखों में।

अपने प्रति ईमानदार रहो । ये वक़्त लगना और बाकी सबकुछ, मन के बड़े प्यारे बहाने हैं कि बात तो ठीक लग रही है, पर धीरे धीरे करेंगे । ये सब धीरे धीरे की चीज़ें नहीं होती हैं। जो समझ में आया है, वो अभी आ जाता है।

ध्यान में रहना है, स्वयं देखना है, ये आदमी लगातार खुद करता है।

श्रोता: सर आपने कहा कि लाइट जला दो तो कमरे में रौशनी हो जाएगी। लेकिन अगर पौधा सूखा हुआ हो, तो चाहे कितना भी पानी डालो, क्या फरक पड़ेगा?

वक्ता: तुम ज़िंदा हो जब तक, तब तक तुम्हारा पौधा तब तक सूख नहीं सकता। जिस दिन तक ज़िंदा हो। तुम ज़िंदा हो, सांस ले रहे हो, ये इस बात का सबूत है कि पौधा अभी सूखा नहीं है, इंटेलिजेंस है। तुम्हारे रहते वो जाएगी नहीं । अगर मुझे ये दिख ही जायेगा कि पौधे सूखे हैं, तो मैं अपना समय बर्बाद करने यहाँ आऊंगा नहीं। मैं जानता हूँ कि तुम सूखे पौधे नहीं हो। बहुत कुछ है जो शेष है। जो असली चीज़ है वो तुमसे कभी छिन सकती नहीं, बस उस पर धूल पड़ गई है, गंदगी जमा हो गई है। तुम सब पूरे तरीके से ठीक हो, तुममें कोई कमी नहीं है। बिलकुल साफ़ हो लेकिन बहुत सारा अपने ऊपर…

एक बात बताओ कि सोने पर अगर मिट्टी भी चढ़ जाये, तो क़ीमत कम हो जाएगी क्या? शीशा है, उस पर बहुत सारी धूल जम जाए, तो शीशा व्यर्थ हो गया? हटाई जा सकती है धूल। कुछ करा जा सकता है| धूल बाहर से आयी थी और बाहर की ही कृतियों से हट भी सकती है।

 श्रोता: सर कभी कभी परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि समस्या बन जाती है, तो ऐसे समय में क्या किया जा सकता है? समस्याओं को हल करें या परिस्थितियों को हल करें?

वक्ता: “परि” माने बाहर, “स्थिति” माने सिचुएशन। जो बाहर है, तुम उसको बदल कैसे लोगे बेटा? अब मैं आया हूँ, बदल के दिखाओ मुझे।

(अट्टाहस)

नहीं कर पाओगे ना। जो भी तुमसे बाहर है, वही परिस्थिति कहलाता है। और मज़े की बात ये है, कि जो शब्द है ‘परिस्थिति’, ये शब्द ही बड़ा गड़बड़ है। क्यों? क्योंकि हर स्थिति बाहरी स्थिति ही है। हर स्थिति परिस्थिति ही है। चाहे वो मनोस्थिति हो या कोई और स्थिति हो। हर स्थिति बाहरी ही है। प्रत्येक स्थिति परिस्थिति ही है। और अपने आप को उससे प्रभावित ना होने देना, इसी का नाम है, ‘मुक्त होना’, इंडिपेंडेंट होना।

परिस्थितियां तो अपना काम करती रहेंगी, उनको तुम नहीं रोक सकते। तुम्हारे पेट में खाना पच रहा है, वो परिस्थिति है, पचने दो। थोड़ी देर में पेट सिग्नल देगा, भूख, भूख, भूख। उन्हें सिग्नल देने दो। निर्धारित तुम करो, अपनी चेतना से। पेट तुम्हारा मालिक न बन जाए। हर स्थिति परिस्थिति है, अंतःस्थिति कुछ नहीं होती। मनोस्थिति कुछ नहीं होती, ये सब परिस्थितियाँ ही हैं; पर तब, जब तुम मन को अपने से अलग जानो। जब मन को अपने से अलग जानते हो, तब मनोस्थिति भी परिस्थिति बन जाती है। तब अंतःस्थिति जिसको तुम बोलते हो, वो भी परिस्थिति हो जाती है।

अभी तो बस कोई लहर आती है, और तुम्हें बहा के ले जाती है । अभी बाहर से कोई अंदर आ जाए, तो बिलकुल तुम्हारा ध्यान ख़तम हो जाना है। बिलकुल भूल जाओगे, क्या था, क्या नहीं था; जिस स्थिति में हो, उसे बिलकुल लूज़ कर दोगे । ऐसे मत बनो, कि बस हवाए आयें और तुम बस बह  रहे हो इधर से उधर। जैसे, गर्मी के दिनों में होता है ना, हवा चल रही होती है और एक छोटा सा कागज़ का, किसी बड़े मैदान में एक टुकड़ा छोड़ दो, तो देखा है उसके साथ कैसा  होता है?

ये हवा बही तो, उधर को बह लिये| कौन सी हवा है?  ये इंजीनियरिंग की हवा है, तो साथ चल दिये| फिर उधर को हवा चली, कौन सी हवा है? ये आई.टी इंडस्ट्री की हवा, अब बीस बाईस साल हो गए, तो उधर को चल दिए| अब उधर क्या है? उधर गर्ल्स हॉस्टल है, तो अब शादी की हवा है।

(अट्टाहस)

और बहे जा रहे हैं, सब बाहरी परिस्थितियां आ रही हैं, और बहाये जा रही हैं । अपना कुछ नहीं है । एक उम्र हुई, बता दिया गया कि पढ़ाई करो, एक उम्र हुई, बता दिया गया नौकरी कर लो, एक उम्र हुई तो बता दिया गया, शादी कर लो, एक उम्र हुई तो बता दिया गया कि बच्चे कर लो । एक उम्र हुई तो बता दिया गया कि कुछ प्रॉपर्टी बना लो, घर वर होना चाहिए । उसके बाद एक उम्र हुई तो अब मर जाओ ।

(अट्टाहस)

तो अब मर भी गए ।

ऐसे मत बनो। हवाएँ तो बहती ही रहेंगी, तुम मत बदलो उनके साथ। अभी तुम बाहर निकलोगे, तो दिखेगा कैसे बहते हो हवाओं के साथ। ये फ़ालतू मेरी रिकॉर्डिंग हो रही है, रिकॉर्डिंग तो होनी चाहिए तुम्हारी, कि कैसे बदलते हो बाहर निकल के।

(छात्र हँसते हैं)

और फिर वही तुमको प्ले कर के दिखाना चाहिए, कि देखो, कैसे बहते हो। अभी ऐसे जो मुझे आँख फाड़ कर देख रहे हो, बाहर निकलते ही फिर कैसे हो जाओगे?

जैसे कि नाव हो कोई समुन्द्र में, खुले हुए हैं उसके पाल, और चलाने वाला उसको कोई नहीं, नाविक कोई नहीं। तो कभी इधर को बह जाती है, कभी उधर को। है, अंदर बैठा हुआ है , पर अपने साथ शराब का बड़ा सा क्रेट ले कर के| सोया हुआ है और बोतल पिए जा रहा है| एक पे लिखा है धन, एक पे लिखा हुआ है समाज, एक बोतल पे लिखा है मातापिता, एक पे लिखा हुआ है करियर, एक पे लिखा हुआ है एजुकेशन, और दनादन चढ़ाये जा रहा है और सोया पड़ा है । अब हवाएँ आ रही हैं, और उसको इधर उधर ले कर के जा रही हैं ।

जब तुम उठे हुए ही नहीं हो, तो तुम्हारी नाव को तो, जो परिस्थिति आएगी, उधर को ही ले कर के जायेगी। तुम मालिक बनो, इसके लिए तुम्हें उठना तो पड़ेगा ना, सजग तो होना ही पड़ेगा ना। “स जग”, जगना। उसी जगने का नाम होश है, उसी जगने से मदद होती है, उसी होश का नाम धर्म है, उसी होश का नाम है, अपना मालिक होना। ये सारी चीज़ें एक दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित हैं। दिख रहा है? बस उसी होश का ही सारा खेल है। जगो। क्या क्या नशे करते हो, ध्यान से देखो। सब नशे में हो।

श्रोता: कैसे?

(सब हँसते हैं)

वक्ता: जैसे पूछ रहे हो, ऐसे।

(अट्टाहस)

कोई सूखा पौधा नहीं है, बस नशे में ऐसा लग रहा है। बहुत जान है पौधे में, इतनी जल्दी नहीं जाएगा। कितनी कंडीशनिंग कर लो, कुछ भी कर लो, उसका जो ‘सत्व’ है, वो उसमें शेष रहेगा ही रहेगा। तुम छीन नहीं पाओगे। कुछ भी कर लो।

श्रोता: सर, जग कर भी क्या कर सकते हैं?

वक्ता: जो जग जाता है, वो किसी और से पूछता है कि क्या कर सकते हैं?

(छात्र हँसते हैं)

ये देखो, ये हंसने का नशा हैं; ये सब नशे ही हैं| किसी को रोने का नशा होता है। देखा होगा ऐसे लोगों को|स्त्रियाँ बहुत करती हैं ये, उन्हें रोने का नशा होता है कि हम बहुत बड़े विक्टिम हैं|और ये बहुत बड़ा अहंकार होता हैं – ‘आई ऍम अ विक्टिम’। अगले जन्म मोहे बिटिया ना कीजो।

(हँसते हैं)

और ये जो हँसने का नशा होता है, “आई ऍम अ फुल स्पिरिटेड मैन”, ये सब सच को ढकने वाले वक्तव्य हैं। जिनके पीछे, आदमी, सच को छुपा देता है।

जग गए हो, ये कहना बड़ी भ्रान्ति है कोई जग जाता नहीं है जगने की प्रक्रिया, सतत चेतना की है; कंटीन्यूअस अवेकनिंग ‘जग गए हो’, जैसे स्टेटमेंट का कोई अर्थ नहीं होता लगातार जगते रहना होता है क्योंकि सुलाने वाली ताकतें बहुत हैं

सुलाने वाली ताकतें बहुत हैं, और लगातार काम कर रही हैं। तो जगना भी लगातार होता है; लगातार। ‘जग गए हो’ जैसा कुछ नहीं है । फिर सो जाओगे ।



सत्र देखें : आचार्य प्रशांत: जो बचपन से देखा सुना, उससे अचानक कैसे हटें?


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हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  •   आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

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 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

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   जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

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2 टिप्पणियाँ

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      १: आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
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      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर हैं। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग अपने जीवन से चार दिन निकालकर प्रकृति की गोद में शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, मुक्त होकर घूमते हैं, खेलते हैं, और आचार्य जी से प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिकता अपने जीवन में देखते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, रानीखेत, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नयनाभिराम स्थानों पर आयोजित पचासों बोध शिविरों में हज़ारों लोग कृतार्थ हुए हैं।
      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु एक अभिभावक-बालक बोध शिविर का आयोजन भी करते हैं।
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      ५.पार से उपहार:
      प्रशांत-अद्वैत फाउंडेशन की ओर से आयोजित किया जाने वाला यह मासिक कार्यक्रम जन सामान्य को एक अनोखा अवसर देता है, गुरु की जीवनशैली को देख लाभान्वित होने का। चंद सौभाग्यशालियों को आचार्य जी के साथ शनिवार और इतवार का पूरा दिन बिताने का मौका मिलता है। न सिर्फ़ ग्रंथों का अध्ययन, अपितु विषय-चर्चा, भ्रमण, गायन, व ध्यान के अनूठे तरीकों से जीवन में शान्ति व सहजता लाने का अनुपम अवसर ।
      स्थान: अद्वैत बोधस्थल, ग्रेटर नॉएडा
      भागीदारी हेतु ई-मेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनु बत्रा: +91-9555554772

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      आवेदन हेतु ईमेल करे: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
      स्थान: अद्वैत बोधस्थल, ग्रेटर नोएडा

      यह चैनल प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उन्हीं से आ रहा है |

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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