चालाक आदमी को उसकी चालाकी ही भारी पड़ती है

वक्ता: देखो, अंधविश्वास आज के जमाने में बहुत आगे नहीं बढ़ सकता है, विज्ञान इतना फैला हुआ है कि अब अंधविश्वासी होने का कोई वास्तविक डर बचा नहीं है, या है भी तो बहुत कम है|आज अन्धविश्वाश से कहीं ज़्यादा बड़ा जो खतरा है वह खतरा है अश्रद्धा का| आप कहते हो कि मुझे अन्धविश्वाशी नहीं होना, लेकिन करियर में आपका पूरा विश्वास है, यह अंधविश्वास नहीं है ?

पुराने समय में अन्धविश्वाश का मतलब होता था भूत-प्रेत, जादू-टोटके वगैरह में विश्वास करना, और आज आप जिन चीजों में विश्वाश करे जा रहे हो बिना जाने वह क्या है, वह अंधविश्वास नहीं है? अंधविश्वास की तो परिभाषा ही यही है ना कि जाना नहीं, समझा नहीं यकीन कर लिया – वो अन्धविश्वाश है|

तो आप भी तो हजारों चीजों  में यकीन करते हो| बल्कि आपके सारे ही यकीन ऐसे हैं जिनके बारे में आप ज्यादा जानते नहीं हो पर चूँकि दुनिया उन यकीनो पर चल रही है तो आप भी उन पर चल रहे हो, तो यह अंधविश्वास नहीं है? अंधविश्वास उस रूप में अब बिलकुल नहीं है जिस रूप में पहले था लेकिन रूप बदल कर के पूरे तरीके से मौजूद है अंधविश्वास|

जहाँ कहीं भी अश्रद्धा रहेगी वहां अंधविश्वास को रहना ही रहना है|

आपके सामने खतरा – मैं दोहरा रहा हूँ यह नहीं है कि पुराना अंधविश्वास आपके ऊपर हावी हो जाएगा| पुराना अंधविश्वास अब नहीं आ सकता लेकिन नया अंधविश्वास तो है ना सामने|

देखिए कि जिंदगी में आप जिन जिन चीजों को आधार बनाए हुए हो मानते हो कि यह तो सही हैं, वह सब क्या है? आपको वास्तव में उनके बारे में क्या पता है ? तो अंधविश्वासी तो हुए ही आप| अंधविश्वास का एक ही इलाज है – “श्रद्धा”, जहाँ श्रद्धा है सिर्फ वही अंधविश्वास नहीं रहेगा| और श्रद्धा और विवेक अलग-अलग चीजें नहीं होती है, श्रद्धा और ज्ञान अलग चीजें नहीं होती हैं| गहराई से जानना यही श्रद्धा है| सही-गलत का भेद कर पाना यही विवेक है और यही श्रद्धा भी है| जब मैं सही-गलत कह रहा हूँ, मेरा मतलब है वह जो भ्रम है, और वह जो वास्तविक है| जो वास्तविक है वह सही, जो भ्रामक है वह गलत|

श्रोता : एक दिन पहले हमने एक एक्टिविटी की थी कबीर के दोहों पर म्यूजिक वाली| उसमें हमने जो दिखाया था जैसे एक मित्र  में बुरी आदतें हैं, बहुत सारी आदतें है, स्वप्न देखता है, और भी| तो हमें उससे दूर रहना चाहिए| एक मित्र से तो हम दूर रह सकते हैं क्योंकी उससे हमारा खून का रिश्ता नहीं है| हो सकता है कोई बुरी आदत हमारे करीबी, हमारे परिवार में हो तो हमे उसको कैसे ट्रीट करना चाहिए ? उसको हटा दें अपनी लाइफ से या कैसे ? और अगर हम उसको समझाते हैं ,सुधारें तो वह हमारी सुने ही ना और वह हमसे थोड़ा सा फ़ासला बनाने की कोशिश करता है तो उसको कैसे संभालें?

वक्ता : देखिए, हर आदमी के हजार चेहरे होते हैं वह सारे चेहरे आपको नहीं दिखाता| आपको भी वह कौन सा चेहरा दिखाता है वह इस पर निर्भर करता है कि आप कौन हैं| जब एक जुआरी मंदिर में बैठा होता है तो क्या वह देवमूर्ति के सामने जुआ खेलता है? हर किसी के दस चेहरे हैं, आप जैसे हैं आपको उसका वैसा चेहरा देखने को मिल जाएगा| लोग होंगे बड़े हिंसक, लेकिन जब आते हैं यहाँ सत्र में बैठते हैं तो वो जिस हद तक हो सके शांत रहने की कोशिश करते हैं ना? यहां तो नहीं शोर मचाते हैं| लेकिन यही वह अपने किसी झगड़ालू साथी के साथ हो जाए , यही वह अपने पत्नी के साथ हो जाए तो वहाँ झगड़ना शुरु कर देंगे| मान रहे हैं कि नहीं मान रहे हैं?

एक डॉक्टर हो सकता है जो पियक्कड़ भी हो, उसे शराब की लत हो| क्या वो अपने क्लीनिक में बैठ कर या सर्जरी करते हुए शराब पिएगा? क्या अपना वो वह चेहरा अपने पेशेंट्स को दिखाएगा? पर जैसे ही उसका वह शराबी दोस्त उसको मिलता है तो इसका भी शराबी चेहरा सामने आ जाता है, आप समझ रहे हैं?

एक नयायधीश हो सकता है, कोर्ट का जज| उसको हो सकता है किसी व्यसन की लत हो| उदाहरण दो कोई भी ? कुछ भी?

श्रोता: जुआ, शराब, यही सब|

पर क्या वो वह काम कोर्ट में बैठे कर करेगा? पर जैसे ही उसे उसका कोई दोस्त मिलेगा जो उसके ही जैसा हो, उस बुरी आदत के मामले में, वैसे ही उसको वह अपना वह वाला चेहरा दिखा देगा | तो दुनिया आपको कौन सा चेहरा दिखा रही है वह इस पर निर्भर करता है कि आप कैसे हो, दुनिया आपको क्या चेहरा दिखा रही है यह इस पर निर्भर करता है कि आप कैसे हो | इसलिए हमें बड़ा ताज्जुब होता है जब कोई जो हमारे लिए बहुत बुरा हो, मान लीजिए यह शौर्य मेरे लिए बहुत बुरा है और मैं रजनी जी से बात करूँ ,ठीक है? और गौरव से बात करूं और वह कहें शौर्य तो बहुत अच्छा है| अब मुझे ताज्जुब होता है, मुझे लगता है की  रजनी जी और गौरव, शौर्य के प्रति पक्षपाती हैं, मुझे लगता है की  वह पक्षपात कर रहे हैं, वो यूँही उसकी हिमायत कर रहे हैं, बात ऐसी है ही नहीं| बात यह है कि मैं जैसा हूं शौर्य ने वैसा चेहरा मुझे दिखा दिया और वो जैसे हैं शौर्य ने वैसा चेहरा उनको दिखा दिया| वह शांत थे तो शौर्य का हमेशा उन्हें कौन सा चेहरा दिखाई दिया ?

श्रोता : शांत!

वक्ता : क्योंकि शौर्य को कोई जरूरत ही नहीं है उन्हें अपना रोष दिखाने की या हिंसा दिखाने की| और मुझे शौर्य हमेशा क्या दिखा रहा है जो में शिकायत करने आया हूं तो मुझे क्या दिखा रहा है ? हमेशा अपना गुस्सेल चेहरा दिखा रहा है| क्यों दिखा रहा है मुझे अपना गुस्सैल चेहरा?  क्योंकि जो जैसा होता है उसे वैसा मिलता है| तो आप अपने सुधरने पर ज़ोर दीजिए, आप सुधरे हुए हो तो दुनिया भी आपको एक शांत चेहरा ही दिखाएगी| अभी यह नीचे मेस के लोग हैं जो आपको खाना वगैरह बना कर दे रहे हैं इनका व्यवहार आपके साथ कैसा है?

श्रोता : बहुत अच्छा है |

वक्ता: और अभी यह नीचे सड़क पर उतरेंगे तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि यह आपस में गाली गलौज  करें, किसी को पत्थर मारे, किसी के प्रति हिंसा करें ? बोलिए ?

श्रोता: हो सकता है |

वक्ता : तो बताइए किसको कहेंगे आप इंसान की हकीकत? इंसान की कोई हकीकत नहीं है, इंसान तो परिस्थितियों के हाथ में खिलौना है| संसार को इसीलिए कहा गया है कि संसार आईना है, दर्पण है| आप जैसे हो संसार आपको वैसे ही दिखाई देने लगता है, आप जैसे हो संसार आपके साथ वैसा ही व्यवहार करने लगता है|

और कहा गया है कि संसार ऐसा है कि जैसे सामने पहाड़ हो और आप उस से कुछ बोलें तो गूंज लौट कर आती हैं आप तक| आप अगर उससे कहेंगे, “तू कमीना”, तो आपको प्रत्युत्तर में क्या सुनाई देगा? अब आप क्या बोलोगे ? आप यह तो देखोगे नहीं कि आपने ही कहा था तू कमीना, आप कहोगे, “देखो यह पहाड़ मुझे गाली देता है|”  पहाड़ नहीं गाली दे रहे हैं, आप जैसे हो आपको उसकी प्रतिध्वनि सुनाई दे गई है |

यही कारण है कि संतों को संसार बड़ा मीठा लगता है और दुर्जनों से पूछोगी तुम दुर्जन क्यों हो? तो कहेंगे कि हम दुर्जन इसलिए हैं  क्योंकि संसार बड़ा कमीना है, हम थोड़ा ही बुरे हैं हमें तो बुरा होने के लिए मजबूर किया गया ,क्यों मजबूर किया गया ? क्योंकि संसार बुरा है, संसार बुरा है तो संसार को जवाब देने के लिए हम बुरे हैं, नहीं ऐसी बात नहीं है संसार तुम्हारे लिए बुरा है ही इसीलिए क्योंकि संसार आईना है, संसार आईना है |

वही व्यक्ति जो किसी के साथ बहुत अच्छा होता है, तुम यह देखो ना कि तुम्हारे साथ आकर बुरा क्यों हो जाता है| तुम यह देखो ना कि तुम्हारी ही क्यों लड़ाइयाँ होती रहती है सबसे, ऐसे लोगों से भी जिन कि किसी और से ना लड़ाई हो| आप सुधर जाइए आपका संसार सुधर जाएगा| आप जैसे  हैं, आपका समाज ठीक वैसा रहेगा|

कोई जान जाए, उदहारण देता हूँ  – कि आप मांस नहीं खाते और आप टेबल पर बैठ करके खाना खा रहे हो और उसको पता है कि आप मांस तो खाते नहीं, और उसकी थाली में मांस है क्या वो आकर आपके साथ खाएगा ? जो मांस नहीं खाता उसे फिर कोई मांस खाता दिखाई भी नहीं देगा क्योंकि मांस खाने वाले लोग यदि उसके पास आएंगे तो मांस नहीं खाएंगे | बात समझ में आ रही है? और अगर आप खुद ही मांस खाते हो तो सामने वाले का मन अगर मांस खाने का नहीं भी हो तो कहेगा उससे मिलने जा रहा हूं वह मांस खाता है चलो थोड़ा मास खरीद लेता हूं|

देख रहे हो ? जो मांस नहीं खाता वह अपने आस-पास माहौल ही ऐसा बना देगा कि जिसमें कोई भी मांस खाने वाला मौजूद नहीं रहेगा या मांस खाने वाले भी मौजूद रहेंगे तो कम से कम उसके माहौल में मांस नहीं खाएंगे, उसके सामने मांस नही खाएंगे| तुम कौन हो, तुम्हारे आसपास माहौल कैसा है, तुमने आसपास अपने कैसा क्षेत्र निर्मित कर कर रखा है तुम यह जवाब दो ना , बात आ रही है समझ में ?

श्रोता : सर, यह भी तो होता है ना कि जो लोग अच्छे होते हैं लोग उनका फायदा उठाते हैं वह तो अपना अच्छा चेहरा दिखा रहे हैं तो बाकी लोग उनको क्यों ऐसे ट्रीट करते हैं?

वक्ता : जो अच्छा होता है कोई उसका फायदा नहीं उठा सकता| हाँ, जो अच्छा होता है उससे सबका फायदा होता जरूर है| दोनों बातों में बड़ा अंतर हैं, समझना| अच्छे आदमी का कोई फायदा नहीं उठाया जा सकता क्योंकि किसी का तुम फायदा उठा सको इसके लिए जरुरी है कि उसमे लालच हो, गौर करो कि जब भी किसी ने तुम्हारा फायदा उठाया है तुम्हे ललचा के उठाया है| कोई विज्ञापन दाता तुम्हारा फायदा उठा लेता है, कैसे? लालच देकर

कोई भी तुम्हें लूटता बाद में है पहले तुम्हें ललचाता है| जब तक तुम ललचाए नहीं गए तुम लुट नहीं सकते, मैं उन स्थितियों की बात नहीं कर रहा हूं कि जहाँ कोई आकर के तुम्हारे ऊपर बंदूक ही रखकर लूट ले| आमतौर पर यदि हम सौ बार लूटते हैं तो निन्यानवे बार इसलिए नहीं लूटते कि किसी ने बंदूक रखकर लुटा था, निन्यानवे बार इसलिए लुटते हैं क्योंकि किसी ने लालच का जाल बिछाया था और हम जा कर के उसमें फंस गए| और अच्छे आदमी का कोई फायदा नहीं उठा सकता, अच्छे आदमी को लूटा जा ही नहीं सकता, अच्छे होने का फायदा ही यही है कि कोई तुम्हारा फायदा नहीं उठा पाएगा अब|

फायदा तो बुरे आदमी का ही उठा सकते हो क्योंकि वह लालच में फंसने के लिए हमेशा तैयार है| अच्छा आदमी न ललचाता है न डरता है, तो उसका फायदा कैसे उठाओगे? अच्छे आदमी को न लालच है न डर है तो उसका फायदा कैसे उठा लोगे तुम ? बुरे आदमी को दोनों है लालच भी है, डर भी है, तो उसका फायदा तुम जरूर उठा लोगे| दूसरी बात मैंने कही, “अच्छे आदमी का कोई फायदा तो नहीं उठा सकता लेकिन अच्छे आदमी से सब को फायदा होता है”, क्या फायदा होता है? तुम गए किसी को ललचाने, तुम गए किसी को डराने और उसने न लालच खाया और न डरा| तुम्हारे सामने एक उदाहरण आता है, तुम्हारे सामने एक अनोखी चीज जाती है जो तुमने आमतौर पर देखी नहीं| तुम कहते हो दुनिया में ऐसा भी हो सकता है? कोई ऐसा भी हो सकता है जो लालच में ना फसें?

फिर तुम्हें अपमान प्रतीत होता है फिर तुम्हें अपनी ओर मुड़ना पड़ता है फिर तुम कहते हो कि जब वह ऐसा कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर पाया| तुम्हारा फायदा हो गया| तुम यह कह लो कि उसके सामने अनुप्रेरित महसूस करते हो तो भी ठीक है और तुम यह कह लो कि तुम उसके सामने अपमानित महसूस करते हो वो भी ठीक है| दोनों बातें एक हैं, उसे देख करके तुम्हें प्रेरणा भी मिलती है लेकिन उसे देख कर के तुम्हे अपनी छुद्र्ता का भी एहसास होता है| दोनों बातें एक साथ होती है, दोनों स्थितियों में लेकिन तुम्हारा फायदा है|

इस भावना को बिलकुल मन से निकाल दो कि “नाइस गाइस फिनिश लास्ट” , तुम जो पूछ रही हो न वो वही  है और दुनिया तुम को लगातार यही सिखा रही है  कि अगर अच्छे रहोगे तो दुनिया लूट लेगी, फायदा उठा लेगी और तुमको कहीं मार काट के छोड़ आएगी| हमारे चारों ओर जो व्यवस्था है वह हमें लगातार चालाकी सिखा रही है, वह हमसे कह रही है कि बुरे बनो, चालाक बनो, होशियार बनो, ताकि कोई तुम्हारा फायदा न उठा सके और यह सबसे झूठी बात है, सबसे बेवकूफी की बात है| चालाक आदमी ही सबसे बड़ा बेवकूफ होता है और उसी का फायदा उठाया जाता है| चालाक आदमी को उसकी चालाकी मारती है|

मैं तुमसे कह रहा हूँ चालाकी और बेवकूफी एक बात है

और जिस बोध की बात हुई थी कल और परसों में, वह अलग बात है| चालाकी बराबर बेवकूफी, और इन दोनों से अलग कुछ होता है तो? बोध| बोध जहाँ है वहाँ कोमलता है, वहाँ  बहाव है, वहाँ  सरलता है, वहाँ  झुकाव है, वहाँ  लचीलापन है, वहां एक सरल हँसी है| वहाँ सहज जानना है, वहाँ पर अप्रयत्न है, वहाँ बिना कोशिश के ही सब पता हो जाता है, वहाँ पर कपट नहीं है| यह बात बिल्कुल मन से निकाल दो कि दुनिया में जीना है तो कपटी होना पड़ेगा, छल करना पड़ेगा, दूसरे तुम्हे मारें  इससे पहले तुम उन्हें मार दो – यह बहुत है दुनिया में सिखाने वाले |

श्रोता : सर हम यह नोट नहीं करते है कि हम सोचते हैं कि हमने दूसरों के साथ रहना है तो हमें चालाकी से रहना है| हम यह नहीं सोचते कि रहना तो अपने मन के साथ है, तुम चालाक मन के साथ कैसे रह पाओगे| तुम्हारा ही मन और चालाक|

वक्ता : और तुम तो जिस अभी स्थिति में हो, तुम्हारी परीक्षाएँ आ रही है, अब आगे तुम प्रतियोगिताओं में बैठोगी, वहाँ तो तुम्हें सिखाया ही यही जाएगा कितुम्हें अगर आगे बढ़ना है तो दस और को पीछे छोड़ो |

श्रोता : कॉर्पोरेट वर्ल्ड में यही होता है |

वक्ता : यह हिंसा है| और हिंसा करके किसी का ना भला हुआ है, ना होगा| अपने काम पर ध्यान दो, दूसरों को पीछे छोड़ने पर नहीं, जो तुम्हें भला लग रहा है जिससे तुम्हें प्यार आता है तुम उस में डुबो ना दूसरों को पीछे छोड़ने की तुम्हें क्या हसरत है|

कबीरा आप ठगाइये और न ठगिये कोय,

आप ठगे सुख उपजै, और ठगे दुःख होय।

तुम तो इतने भरे-पूरे रहो कि तुम कहो आओ ठगो मुझे, मेरा कुछ बिगड़ने वाला नहीं है, आओ ठग लो मुझे| “कबीरा आप  ठगाइये ” आओ ठगों मुझे, मेरे पास इतना है कि मुझे ठगे जाओ ठगे जाओ मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा, मैं ठगा जा ही नहीं सकता| “और न ठगिये कोय ”, दूसरे को मत ठग लेना| कोई आकर तुम्हें ठगे तुम्हे बड़ा आनंद आएगा क्योंकि तुम्हे पता है वो तुम्हे ठग रहा है और तुम ठगे जा नहीं सकते|

यह ऐसी सी बात है कि तुम किसी छोटे बच्चे को बुलाओ , मैं शौर्य को बुलाऊं , और मैं शौर्य से कहूँ  कि शौर्य आ मुझे मुक्के मार और शौर्य अपनी पूरी ताकत से मुझे पीट रहा है| शौर्य को क्या लग रहा है कि वह मेरी पिटाई कर रहा है और मैं क्या कर रहा हूं? मैं मजे ले रहा हूँ | यह ऐसी ही बात है|  “आप ठगे सुख  उपजे ” तुम इतने बड़े हो कि ये संसार तुम्हारा बिगाड़ क्या लेगा, संसार तुम्हारे सामने बच्चा है, शौर्य की तरह और तुम हो मस्त कलंदर, आचार्य जी की तरह|

यह संसार तुम्हारा बिगाड़ क्या लेगा| लेकिन तुम दूसरे को ठगोगे तो बड़ा दुख होगा, अब आचार्य जी को गुस्सा आ जाए की वह शौर्य के कान पकड़कर ऐसे लगा दे तो शौर्य को तो कम दुःख  होगा आचार्य जी को ज्यादा दुःख  होगा | गुस्से में कर तो दिया बाद में पछताते फिरेंगे कि यह क्या किया, छोटा सा बच्चा| बता आ रही है समझ में ?

एक बार को अपना नुकसान सह लो लेकिन यह भावना मन में मत रख लेना कि दूसरे का नुकसान करना जरूरी है | यही बल है, यही वीरता है – कोई आए तुमसे लड़ने और तुम प्रतिक्रिया में उसका नुकसान कर दो यह कमजोरी की निशानी है| कोई तुम्हारा नुकसान करने आया और वह अपनी समझ में तुम्हारा नुकसान कर भी गया और उसके बाद तुम हँस रहे हो यह ताकत की और बड़प्पन की निशानी है | इससे पता चलता है कि तुम में इतनी ताकत है कि तुम जानते हो कि तू मेरा कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा बच्चे | तुम उसे दुश्मन भी नहीं बोल रहे हो तुम उसे क्या बोल रहे हो ?

श्रोता : बच्चे|

वक्ता : तुम उससे बोल रहे हो, “बच्चे तू इतना छोटा है कि तुम मेरा कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा इसीलिए आ और बिगाड़| मैं तो तुझे बुला रहा हूँ , तू आ और बिगाड़| “आप ठगे सुख होत है” तू आ, तू आ देखते हैं तू मेरा कर क्या लेगा”| और जब वो तुम्हें मार रहा है उस वक्त भी तुम्हारे मन में हिंसा नहीं है तुम्हारे मन में क्या है?हंसी है | हिंसा नही, हिंसा नही है, हंसी है | सोचो ना शौर्य आ कर के मुझे मार रहा है और मैं क्या कर रहा हूं ? मैं इधर को मुंह करके हंस रहा हूं, उसको दिखा करके भी नहीं हँस  रहा – उसको दिखा करके हँसा तो हिंसा हो जाएगी, उसको दिखा कर अगर हिंसा  तो हिंसा हो जाएगी ना उस को नीचा दिखा रहा हूं| उसको यही लगना चाहिए कि उस ने मार लिया, उसको यही लगना चाहिए कि वह सफल हो गया और यही दिखाओ की आह बड़ी चोट लग गयी , अरे शौर्य क्या मुक्का चलाता है, तू तो बड़ा ताकतवर हो गया और थोड़ी देर में इधर मुँह करके थोड़ा सा हँस लो, “बच्चा तो है, क्या बिगाड़ लेगा ? बच्चा तो है क्या बिगाड़ लेगा?

तो आत्मा में और संसार में यही रिश्ता होता है, संसार है छोटा सा बच्चा ,और आत्मा है बाप सबका , बाप, आत्मा है बाप और संसार है ?

श्रोता : बच्चा|

वक्ता : बच्चा| तो संसार क्या बिगाड़ लेगा उसका जो आत्मा में रमता है, तो आत्मा में रमो, दिल के साथ रहो – संसार तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता|



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      प्रशांत-अद्वैत फाउंडेशन की ओर से आयोजित किया जाने वाला यह मासिक कार्यक्रम जन सामान्य को एक अनोखा अवसर देता है, गुरु की जीवनशैली को देख लाभान्वित होने का। चंद सौभाग्यशालियों को आचार्य जी के साथ शनिवार और इतवार का पूरा दिन बिताने का मौका मिलता है। न सिर्फ़ ग्रंथों का अध्ययन, अपितु विषय-चर्चा, भ्रमण, गायन, व ध्यान के अनूठे तरीकों से जीवन में शान्ति व सहजता लाने का अनुपम अवसर ।
      स्थान: अद्वैत बोधस्थल, ग्रेटर नॉएडा
      भागीदारी हेतु ई-मेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनु बत्रा: +91-9555554772

      ६. त्रियोग:
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      आवेदन हेतु ईमेल करे: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
      स्थान: अद्वैत बोधस्थल, ग्रेटर नोएडा

      यह चैनल प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उन्हीं से आ रहा है |

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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