कदम-कदम पर तरीके मौजूद हैं तुमको क्षुद्रता में धकेलने के लिए|

बड़ी कम्पनियाँ बड़े ऑफिस बनाती हैं| और तुम्हारे भीतर हसरत जागती है कि मैं इन बड़े-बड़े ऑफिसों में काम करूँ| और तुम ये देख ही नहीं पाते कि उन बड़े ऑफिसों से निकलते समय तुम कितने छोटे हो जाते हो| कोई बचती है तुम्हारी कीमत? जवाब दो|

पर तुम्हें लगातार कहा यही जाता है कि तुम्हरी ज़िन्दगी बन गई, तुमने खानदान का नाम रौशन कर दिया अगर तुम्हारी उस बड़े ऑफिस में नौकरी लग गई| वो बड़ा ऑफिस जिसके सामने तुम बहुत छोटे हो जाते हो| कभी देखा है कि तुम्हारा व्यवहार, तुम्हारी सोच, सब बदल जाते हैं जब तुम उस ऑफिस के सामने खड़े होते हो| भीतर जाना तो छोड़ ही दो| देखा है कभी?

एक ढाबे पर तुम जैसा व्यवहार करते हो, क्या तुम किसी फाईव स्टार होटल में भी वैसा ही व्यवहार करते हो? फाइव स्टार होटल इतना बड़ा हो जाता है कि उसके सामने तुम अपने आपको बड़ा छोटा अनुभव करते हो| वो इतना बड़ा हो गया कि उसने तुम्हारा चाल-चलन तक बदल दिया| ये गुलामी हुई की नहीं हुई? और वो कहते हैं कि तुम वैसे कपड़े  पहन के आओगे जैसे हम चाहते हैं| अन्यथा हम तुम्हें घुसने भी नहीं देंगे| कोई ढाबा तुमसे ये नहीं कहेगा| किसी ढाबे ने तुमसे आज तक कहा है? जवाब दो|

पर तुमको लगता है कि फाइव-स्टार होटल कितनी बड़ी बात है, “मेरी इज्ज़त बढ़ गई वहाँ पहुँच के|” तुम देख ही नहीं पाते कि इज्ज़त बढ़ नहीं गई| सबसे पहले उन्होंने तुम्हें यह एहसास कराया कि तुम  हो| “जाओ, कपड़े ठीक से पहन के आओ|”  तुम किसको कहोगे कि जाओ, कपड़े ठीक से पहन के आओ? किसको बोलोगे? जो पहले से ही प्यारा हो और पूरा हो, उसको क्या ये कहोगे कि जाओ, कपड़े ठीक से पहन के आओ? वो तो तुमसे कहते हैं कि जाओ, कपड़े ठीक से पहन के आओ| और तुम कहते हो,“देखो! कितनी सुन्दर बात कही| हमारी इज्ज़त बढ़ा दी|” जवाब दो|

कदम-कदम पर तरीके मौजूद हैं तुमको क्षुद्रता में धकेलने के लिए| उनसे सतर्क रहना है| उस सतर्कता के अलावा कोई विधि नहीं ओरिजिन (स्त्रोत )पर पहुँचने की| उसी सतर्कता का दूसरा नाम ध्यान है|



लेख पढ़ें: कहीं भी मन क्यों नहीं लगता?

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